Friday, 17 January 2014

मार्क्सवाद : सहजानंद

अर्जुन की मानवीय कमजोरियाँ
सहजानंद
यों तो दूसरे अध्‍याय के 33-36 श्लोकों में, मानव स्वभाव की कमजोरियों को समझ के ही, अर्जुन को खूब ललकारा है कि मुँह में कालिख पुत जाएगा, यदि पीछे हटे, लोग धिक्कारेंगे; हटने से तो मरना कहीं बेहतर है; शान की मौत बेइज्जती की गद्दी से लाख दर्जे अच्छी है, आदि आदि 37वें में भी कह दिया है कि तुम्हारे तो दोनों ही हाथों में लड्डू है - हारो तो शान तथा स्वर्ग और जीतो तो राजपाट! इसलिए हर्गिज मुँह न मोड़ो। असल में विवेक और अध्‍यात्मवाद की अपेक्षा यही बातें मनुष्य को स्वभावत: उत्तेजित करके कर्तव्य पथ में खामख्वाह जुटा देती है। गीता इसे बखूबी जानती है और इस पर जोर भी उसने इसीलिए दिया है। तथापि दूसरे अध्‍याय के शुरू के दो और तीन श्लोकों में जो कुछ कहा गया है वह इतना सुंदर है और मार्क्‍सवाद के साथ गीता को मिलाने में उसका इतना महत्त्व है कि हम उसे लिखे बिना रह नहीं सकते। वे दोनों श्लोक ये हैं, 'कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्। अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्त्तिकरमर्जुन॥ क्लैब्यं मा स्म गम: पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते। क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परंतप:॥'

इन दोनों का अर्थ ऐसा है, 'अर्जुन, इस विकट समय में, जब कि सारी तैयारी हो चुकने के बाद भिड़ंत होने ही वाली है, तुममें यह कमजोरी कहाँ से आ गई? कमजोरी भी ऐसी कि भले लोग जिससे लाख कोस दूर भागें, और जो निहायत मनहूस और अमंगल होने के साथ ही इज्जत को भी मिट्टी में मिला दे। खबरदार, नामर्दी मत दिखाओ। यह चीज तुममें जेबा नहीं देती। इसलिए बहादुर, दिल की इस बेहूदी कमजोरी को छोड़कर तैयार हो जाओ।' मगर इतने से ही काम नहीं चलेगा। इन बातों की खूबी और अहमियत समझने के लिए हमें अर्जुन की उन बातों पर सरसरी नजर दौड़ानी होगी जो उसने इससे पहले कही थीं और जिनके जवाब में यह कहा गया है।

पहले अध्‍याय के 28-46 श्लोकों को देखने से पता चलता है कि अर्जुन को जैसे धर्म और अक्ल का अजीर्ण हो गया हो। उसका हृदय उस समय दया से दब गया था, यह बात उससे ठीक पहले के 27वें श्लोक के 'कृपया परयाविष्ट:' से स्पष्ट है। यही कारण है कि बुद्धि ठीक काम करती थी नहीं। फलत: अक्ल का अजीर्ण मिटाना जरूरी हो गया। जो लोग ऐन कर्तव्य पालन के समय दिल की कमजोरी और नादानी से दयार्द्र हो जाते और रहम करने लगते हैं वह ऐसी ही बेसिर-पैर की बातें करते हैं। 1905 में काले सागर के रूसी जहाजी बेड़े के सिपाहियों को मजबूरन अपने ही अफसरों के विरुद्ध बगावत करनी पड़ी थी। क्योंकि अफसरों ने जानबूझ के ऐसी शैतानियत की और सिपाहियों की स्वतंत्रता पर ऐसी रोक लगाई कि बरदाश्त से बाहर थी। बात यह थी कि रूस के किसानों और मजदूरों के क्रांतिकारी आंदोलनों के साथ जहाजी सिपाही (Sailors) सहानुभूति दिखाना चाहते थे। कारण, वह आंदोलन उनके अपने ही मजलूम भाइयों का था। मगर इसमें अफसरों ने अड़ंगे डाले। फलत: विद्रोह की आग भड़क उठी और सिपाहियों ने सभी अफसरों को चटपट कैद कर लिया! फिर तो लेने के देने पड़े! अफसरों की सारी गरमी ही गायब हो गई। उनने आरजू मिन्नत की, माफी माँगी, आगे के लिए बाधा न डालने के वादे किए। फिर क्या था? दया में आके सिपाहियों ने उन्हें रिहा कर दिया। बस, मौका मिलते ही बाहर से अपने पक्ष की फौज मँगा के अफसरों ने उन्हीं सिपाहियों का कत्लेआम शुरू कर दिया। ऐसे समय की दया नादानी की पराकाष्ठा होती है और उसका नतीजा इसी तरह भुगतना पड़ता है। लेनिन ने इस दयावाली नादानी का सुंदर वर्णन सन् 1905 वाली रूसी क्रांति के संबंध के 22/1/1917 वाले ज्यूरिच के भाषण में किया है। महाभारत के समय वही गलती अर्जुन भी ऐन मौके पर करने जा रहा था।

मगर इस ऐन मौके पर पीछे हटने के लिए कोई कारण तो चाहिए ही। दया की बात तो की जा नहीं सकती थी। जिनने सब कुछ किया और पांडव परिवार का सर्वस्व छीनने, उन्हें तंग-तबाह करने, उनकी स्‍त्री तक को बेइज्जत करने और उन्हें मार डालने तक के लिए जिनने कोई भी दकी का बाकी नहीं रखा, यहाँ तक कि जंगल में भटकने के समय उन्हें चिढ़ाने तथा जले पर नमक छिड़कने के लिए वही राजसी ठाटबाट के साथ दुर्योधन का सारा समाज पहुँच गया था, उन्हीं के साथ दया! ऐसा बोलने की हिम्मत अर्जुन को थी नहीं। इसलिए वह धर्म, पाप, कुलसंहार, वर्णसंकर, नरकवास का भय आदि बातें पेश करने लगा, धर्म एवं नीतिशास्त्र के पन्ने के पन्ने उलटने लगा। उनने यह भी कहा कि यह ठीक है कि विरोधियों को भी ऐसा ही सोचना चाहिए; आखिर अक्ल की ठेकेदारी हमीं को तो नहीं है; एक ही पक्ष के सोचने से दुनिया में काम भी नहीं चला करता। फिर भी उनकी आँखें तो बंद हैं! वे तो लोभ में पड़े हैं! उन्हें तो लोक-परलोक कुछ सूझता नहीं! लेकिन हमारी तो खुली हैं। हम तो सारा अनर्थ साफ देख रहे हैं। इसलिए हम तो संतोष को ही कल्याणकारी मानते हैं। यह भी ठीक है कि हम हटेंगे तो शत्रु लोग हमें बर्बाद करके ही छोड़ेंगे। मगर इससे क्या? हमारा परलोक तो न बर्बाद होगा, स्वर्ग बैकुंठ तो मिलेगा, भगवान तो खुश होंगे। इसलिए हमें हर्गिज-हर्गिज लड़ना नहीं चाहिए।

ऐसा मालूम होता है कि किसी जमींदार या कारखानेदार के अत्याचारों से ऊबकर हड़ताल या और तरह की सीधी लड़ाई लड़ने को जब किसान और मजदूर पूरी तरह आमादा हैं, ठीक उसी समय कोई धर्मध्‍वजी, धर्म का ठेकेदार गुरु, पीर, पंडित, मौलवी या पादरी उन्हें धर्म और भगवान के नाम पर सिखा रहा है कि कभी संघर्ष और लड़ाई का नाम न लो! राम, राम महापाप होगा। यदि जमींदार-मालदार कष्ट देते हैं, तो बरदाश्त करो आखिर वे लोग बड़े हैं, मालिक हैं। छोटों के लिए बड़ों की बातें सहने में ही फायदा है! संतोष करो, तो भगवान खुश होगा, परलोक बनेगा। भुलावे में मत पड़ो। वे गलती करते हैं तो करें, मगर उनकी देखा-देखी तुम लोग क्यों नादानी कर रहे हो, आदि-आदि। और दूसरे अध्‍याय के शुरू के दो श्लोकों में जो कुछ कृष्ण के मुँह से गीता ने कहलवाया है वह तो ऐसा मालूम होता है कि कोई वर्गसंघर्षवादी मार्क्‍सवादी ऐसे उपदेशकों को और उन किसान-मजदूरों को भी फटकार रहा है जो भूलभुलैया में पड़के आगा-पीछा कर रहे हैं। गीता ने धर्म और पुण्य-पाप आदि की सारी दलीलों का जो उत्तर इन दो श्लोकों में ही खत्म कर दिया है वह निरी भौतिक दृष्टि से ही है। इतना चुभता हुआ, संक्षिप्त और माकूल उत्तर शायद ही मिले। अर्जुन की धर्म-वर्म की बातों की जरा भी परवाह नहीं की गई है। उनका खयाल ही नहीं किया गया है। सीधे सांसारिक दृष्टि से ही उसे कस के चपत लगाई गई है और करारी डाँट दी गई है। इन दो श्लोकों में जो सिर्फ एक शब्द 'अस्वर्ग्य' आया है उससे शायद यह भ्रम हो कि स्वर्ग या परलोक की बात भी इसमें है। मगर संस्कृत में 'अस्वर्ग या अस्वर्ग्य' शब्द मनहूस, अमंगल आदि के ही मानी में आता है। ऐन लड़ाई के समय इन बातों से बढ़ के मनहूस या अमंगल होई क्या सकता है? इसीलिए हम गीता-धर्म को मार्क्‍सवाद का साथी पाते हैं।

इस सिलसिले में हम दो और बातें कहके यह प्रकरण पूरा करेंगे। एक तो है अपने-अपने धर्मों में ही डटे रहने और दूसरे के साथ छेड़खानी न करने की। अपने धर्म को कभी किसी दूसरे धर्म से बुरा या छोटा न मानना और दूसरों के धर्मों पर न तो हाथ बढ़ाना और न उनकी निंदा करना, यह गीता की एक खास बात है। गीता ने इस पर खास तौर से जोर दिया है। चाहे और जगह भी यह बात भले ही पाई जाती हो; मगर गीता में जिस ढंग से इस पर जोर दिया गया है और जिस प्रकार यह कही गई है वह चीज और जगह नहीं पाई जाती।

यों तो किसी न किसी रूप में यह बात अन्य अध्यायों एवं स्थानों में भी पाई जाती है। मगर तीसरे अध्‍याय के 35 वें और अठारहवें के 47-48 श्लोकों में खास तौर से इसका प्रतिपादन है। यहाँ तक कि 'श्रेयान्स्वधर्मो विगुण: परधर्मात्स्वनुष्ठितात्' श्लोक का यह आधा भाग दोनों ही जगह ज्यों का त्यों लिखा गया है। इससे गीता की नजरों में इसकी अहमियत बहुत ज्यादा मालूम पड़ती है। यह भी जान पड़ता है कि इस मामले में जो एक निश्चित दृष्टि तय कर दी गई है उसी का ज्यों का त्यों पालन करने पर ही गीता का जोर है। वह उसमें जरा भी परिवर्तन बरदाश्त नहीं कर सकती। नहीं तो उन्हीं शब्दों को हू-ब-हू दोनों जगह दुहराने का और दूसरा मतलब होई क्या सकता है? यह भी नहीं कि वे शब्द साधारण हैं। वही तो गीता के इस मंतव्य के प्रतिपादक हैं। उनके साथ जो अन्य शब्द या वाक्य पाए जाते हैं उनका काम है इन्हीं की पुष्टि करना - इन्हीं के आशय को स्पष्ट करना।

अब जरा इनका अर्थ देखें। श्लोक का जो आधा भाग ऊपर लिखा गया है उसका आशय यही है कि 'दूसरे का धर्म यदि अच्छी तरह पालन भी किया जाए तो भी उसकी अपेक्षा अपना (स्व) धर्म अधूरा या देखने में बुरा होने पर भी कहीं अच्छा होता है।' एक तो गीता ने धर्म और कर्म को एक ही माना है यह बात पहले कही जा चुकी है और आगे भी इस पर विशेष प्रकाश डालेंगे। लेकिन इतना तो इससे साफ हो जाता है कि यह मंतव्य सभी कामों, क्रियाओं या अमलों के संबंध में है, न कि धर्म के नाम पर गिनाए गए कुछ पूजा-पाठ, नमाज आदि के ही बारे में। इसका मतलब यह हुआ कि हमें अपने-अपने कामों की ही परवाह करनी चाहिए, फिक्र करनी चाहिए, फिर चाहे वे कितने भी बुरे जँचते हों, भद्दे लगते हों या उनका पूरा होना गैरमुमकिन हो। वे अधूरे भी दूसरों के पूरों से कहीं अच्छे होते हैं। इसलिए दूसरों के अच्छे, सुंदर और आसानी से पूरे होने वाले कामों पर हमारा खयाल कभी नहीं जाए; हम उन्हें करने और अपनों को छोड़ने की भूल कभी न करें। क्योंकि इस तरह हम दो कसूर कर डालेंगे। एक तो अपने कर्तव्य से भ्रष्ट होंगे और इस तरह उसकी पाबंदी के बिना होने वाली खराबियों की जवाबदेही हम पर होगी। दूसरे हम अनधिकार चेष्टा के भी अपराधी होंगे।

दूसरी बात है इसमें अपने या 'स्व' की। स्वकर्म या स्वधर्म का मतलब है जो प्रत्येक आदमी के लिए किसी वजह से भी निर्धारित है, निश्चित है उसके जिम्मे लगाया गया (assigned) है, या जो उसके स्वभाव के अनुकूल होने के कारण ही उस पर लादा गया है, उसके माथे मढ़ा गया है। अठारहवें अध्‍याय वाले श्लोक में ऊपर लिखे आधे श्लोक के बाद कारण के रूप में लिखा गया है कि 'स्वभाव के अनुकूल जो काम हो उसे करने में पाप या बुराई होती नहीं' - "स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्विषम्" इससे पता चलता है कि स्वकर्म या स्वधर्म का अर्थ है 'स्वाभाविक धर्म या कर्म।' उसके पहले 41-46 तक के छह श्लोकों में चारों वर्णों के धर्मों को गिनाते हुए सबों को 'स्वाभाविकधर्म' ही कहा है। उन श्लोकों में केवल कर्म शब्द ही है और इस 47वें में भी पूर्वार्द्ध में 'धर्म' कहके उत्तरार्द्ध में, जैसा कि अभी दिखाया है, 'कर्म' ही कहा गया है। बाद वाले 48वें में भी 'सहजं कर्म-कौंतेय' में पुनरपि कर्म शब्द ही आया है। फलत: मानना होगा कि धर्म और कर्म एक ही मानी में बोले गए हैं और इन शब्‍दों का अर्थ है स्वभावनियत, स्वभाव के अनुकूल या स्वाभाविक काम।

मगर समस्त गीता के आलोड़न करने और अठारहवें अध्‍याय के आरंभ के ही कुछ वचनों को भी देखने से पता चलता है कि कुछ कर्म ऐसे हैं जिनके बारे में स्वभाव का सवाल होता ही नहीं। वे तो सबों के लिए नियत, स्थिर या तयशुदा हैं। दृष्टांत के लिए 5-6 दो श्लोकों में यज्ञ, दान, तप के बारे में कहा गया है कि ये सबों के लिए समान रूप से कर्तव्य हैं। इन्हें कोई छोड़ नहीं सकता। बेशक फल और कर्म - दोनों की ही - आसक्ति छोड़ के ही ये किए जाने चाहिए, कृष्ण ने अपना यह पक्का मंतव्य कहा है। इसके बाद ही 'नियतस्य तु संन्यास: कर्मण:' आदि में कहा है कि नियत कर्म का त्याग उचित नहीं है। वह तो तामस त्याग है। 9वें श्लोक में भी 'कार्यमित्येव यत्कर्म नियत:' शब्दों के द्वारा नियत कर्म को कर्तव्य समझ के करते हुए फलासक्ति के एवं कर्मासक्ति के त्याग को ही सात्त्विक-त्याग कहा है। इससे स्पष्ट है कि नियत कर्म कहते हैं स्वाभाविक कर्म को और किसी कारणवश स्थिर या निश्चित किए गए (assigned) कर्म को भी। यज्ञ, दान, तप ऐसे की कर्मों में आते हैं। अपने आश्रितों का पालन या रक्षा भी ऐसे ही कर्मों में है। पहरेदार का पहरा देना, अध्यापक का पढ़ाना या सेवक की सेवा भी ऐसी ही है। अनेक धर्म, मजहब या संप्रदायों के अनुसार जिसे जो करने को कहा गया है वह भी नियतकर्म या स्वधर्म में आ जाता है। अपनी श्रद्धा और समझ से जो कुछ भी करता है वह तो पक्का-पक्की स्वधर्म है।

इस प्रकार यदि देखा जाए तो गीता ने धर्म-मजहब के झगड़े और शुद्धि या तबलीग के सवाल की जड़ को ही खत्म कर दिया है। गीता इन झगड़ों और सवालों को भेड़ों का मूँड़ना ही समझती है। और आदमी को भेड़ बनाना तो कभी उचित नहीं। इसलिए इन झमेलों में पड़ने की मनाही उसने कर दी है। उसने तो अठारहवें अध्‍याय के 48वें श्लोक में यह भी कह दिया है कि बुराई-भलाई तो सभी जगह और सभी कामों में लगी हुई है। इसलिए कर्मों के संबंध में अच्छे और बुरे होने की क्या बात? हमारा धर्म अच्छा, तुम्हारा बुरा, यह बात उठती ही कैसे है? सभी बुरे और सभी अच्छे हैं। किसने देखा है कि कौन-से धर्म भगवान या खुदा तक सीढ़ी लगा देते हैं? इसीलिए तीसरे अध्‍याय में 'श्रेयान्स्वधर्मो विगुण:' आदि आधे श्लोक के बाद कहा है कि 'इसलिए स्वधर्म करते-करते मर जाना ही कल्याणकारी है; दूसरे का (पर) धर्म तो भयदायक है।'

इतना ही नहीं। ठीक इस श्लोक के पूर्व वाले 34वें श्लोक में कहा है कि 'हरेक इंद्रियों के जो पदार्थ (विषय) होते हैं उनके साथ रागद्वेष लगे ही होते हैं; उनसे किसी का भी पिंड छूटा नहीं होता। इसलिए इन रागद्वेषों से ही बचना चाहिए। असल में चीजें या उनका ताल्लुक ये खुद बुरे नहीं हैं - इनसे किसी की हानि नहीं होती। किंतु उनमें जो रागद्वेष होते हैं वही सब कुछ करते हैं - वही जहर हैं, घातक है' - ''इंद्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यस्थितौ। तयोर्न वशभागच्छेत्‍तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ॥'' इस बात का प्रतिपादन तो पहले बहुत विस्तार के साथ किया गया है। यहाँ ऐसा कहने का अभिप्राय यह है कि भले बुरे का सवाल उठाके जो किसी धर्म या काम को बुरा और दूसरे को अच्छा कहते हैं और इसीलिए आपस में लोगों के सर भी फूटते हैं, वह तो नादानी है। न कोई भला है न बुरा। भला-बुरा तो अपना मन ही है। यही तो चीजों या कामों में रागद्वेष पैदा करके जहन्नुम पहुँचाता है। इसलिए हमें इस भूल में हर्गिज नहीं पड़ना होगा। गीता का यह कितना सुंदर मंत्र है और यदि हम इस पर चलें तो हमारे हक की लड़ाई कितनी जल्दी सफल हो जाए। ऐसा होने पर तो मार्क्‍सवाद के सामने की भारी चट्टान ही खत्म जो जाए और वर्गसंघर्ष निर्बाध चलने लगे।

जिन दो बातों को कहके यह प्रकरण पूरा करने की इच्छा हमने जाहिर की थी उनमें स्वधर्मवाली यह एक बात तो हो चुकी है। अब दूसरी को देखना है। गीता के छठे अध्‍याय के 45वें और सातवें अध्‍याय के तीसरे एवं 19वें श्लोकों के अनुसार गीतोक्त योग प्राय: अप्राप्य है। लाखों-करोड़ों में शायद ही एकाध आदमी इसमें पूरे उतरते हैं। उक्त 45वें श्लोक में तो कहा है कि 'योग की प्राप्ति के लिए यत्न करने वाला मनुष्य जब इसमें सारी शक्ति लगाके पड़े तो उसके भीतर की मैल धुलते-धुलते बहुत जन्म लग जाते हैं तब कहीं वह पूर्ण योगी बनके परमगति प्राप्त करता है' - ''प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धिकिल्विष:। अनेक जन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम्॥''

इसी प्रकार सातवें अध्‍याय के 19वें श्लोक में भी कहा है कि 'बहुत जन्मों में कोशिश करते-करते ज्ञान हासिल होता है, समस्त संसार में वासुदेव बुद्धि या परमात्मज्ञान होता है। उसी के बाद ब्रह्मप्राप्ति होती है। ऐसे महात्मा लोग अत्यंत अलभ्य हैं।' ''बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते। वासुदेव: सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभ:॥'' मगर तीसरे श्लोक में तो और भी कठिनाई का वर्णन इस मार्ग के सिलसिले में मिलता है। वहाँ तो कहा है कि 'हजारों-लाखों में एकाध आदमी ही योगी होने के लिए यत्न करते हैं और ऐसे लाखों में बिरला ही कोई मुझे - परमात्मा को - ठीक-ठीक जान पाता है' - ''मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये। यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वत:॥''

यदि इन तीनों वचनों को मिलाके देखें तो पता चलता है कि गीता का योग नियम तो हो सकता है नहीं। यह तो इतना कठिन है कि असंभवप्राय है। कठोपनिषद् में इसी संबंध के प्रश्न के उत्तर में यम ने नचिकेता से कहा था कि 'नचिकेता, मौत की बात मत पूछो - जीते-जी मर जाने की बात न पूछो' - "नचिकेतो मरणंमाऽनुप्राक्षी:" (1। 9। 25)। उनने यह भी कह दिया था कि 'इस मार्ग पर चलना क्या है छुरे की तीखी धार पर चलना समझो, जो असंभव जैसी बात है। इसीलिए जानकार लोगों ने कहा है कि यह मार्ग दुर्गम है' - "क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति" (1। 3। 14)। हमने भी योग के संबंध में जो कुछ कहा है उससे भी निस्संदेह यही बात पक्की हो गई है।

तृतीय अध्‍याय के 'यस्त्वात्मरतिरेव' श्लोक का बार-बार उल्लेख तो आया है। मगर इस संबंध में उसे मनन करना चाहिए। चौथे अध्‍याय के 19-23 श्लोकों को भी गौर से पढ़ना होगा। पाँचवें के 7-21 श्लोक भी इस संबंध में बहुत महत्त्व रखते हैं। छठे अध्‍याय के 7-32 श्लोकों में जितनी बातें कही गई हैं उनमें भी इस विषय पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है। आठवें के 8-16 श्लोक भी विचारणीय हैं। दूसरे अध्‍याय के अंत में जो स्थितप्रज्ञ का, बारहवें के 13-19 श्लोकों में जो भक्त का और चौदहवें के 22-25 श्लोकों में जो गुणातीत का वर्णन है वह हमारी आँखें खोल देता है, ताकि इस चीज की कठिनाई का अनुभव करें। तेरहवें के 27-28 श्लोकों में भी यह बात मिलती है। अंत में अठारहवें अध्‍याय के 50-58 श्लोकों में भी यह बात लिखी गई है। यदि हम इन सभी वचनों का पर्यालोचन और मंथन करते हैं तो कठोपनिषद्वाली बात अक्षरश: सत्य सिद्ध होती है और मानना पड़ जाता है कि गीता का योग असंभव-सी चीज है। फलत: वह अपवाद स्वरूप ही हो सकता है न कि मनुष्यों के लिए नियम या सर्व-जन-संभव पदार्थ। सभी लोग ऐसी चीज को कम से कम आदर्श बनाएँ यह भी उचित नहीं। आकाश के चाँद को जो आदर्श बनाए और उसी के पीछे अपने सभी कामों को चौपट करे वह पागल के सिवाय और कुछ नहीं। यह योग ऐसा नहीं कि उसे आदर्श बनाके हम कुछ और भी कर सकते हैं जब तक वह प्राप्त न हो जाए।

जब इस भौतिक संसार में गीताधर्म - योग - अपवाद ही हो सकता है, न कि नियम, तो स्वभावत: यह प्रश्न उठता है कि सर्वसाधारण के लिए जो चीज साध्‍य हो और इसीलिए जो हमारे लिए नियम जैसी सार्वजनिक वस्तु हो सके वह क्या है? उत्तर में बेखटके कहा जा सकता है कि वह है मार्क्‍सवाद। बहुत लोग इस बात को नहीं समझ के ही नाक-भौं सिकोड़ते हैं। हालाँकि हमने धर्म तथा ईश्वर के संबंध में मार्क्‍सवाद का जो विश्लेषण किया है उससे लोगों का भ्रम कम से कम उस संबंध में तो मिट जाना ही चाहिए। मगर वह तो मार्क्‍सवाद का एक पहलू मात्र है। असल में तो मार्क्‍सवाद साम्यवाद या वर्गविहीन समाज का निर्माण ही है। मार्क्‍सवाद का तो यही लक्ष्य माना जाता है कि इस संसार को आनंदमय, सुखमय, स्वर्ग या बैकुंठ जैसा बना दिया जाए; न बीमारियाँ हों और न अकाल-मृत्यु हो, न कोई गरीब हो और न अमीर; सबों को समानरूप से खाने-पीने, पढ़ने-लिखने, कला-कौशल तथा ज्ञान-विज्ञान की सभी सुविधाएँ प्राप्त हों; सबसे ऊँचे दर्जे के आराम का सभी के लिए - मानवमात्र के लिए - पूरा सामान होने पर भी अंवेषण, विज्ञान, कला आदि के लिए पर्याप्त समय सबको प्राप्त हो; अनावृष्टि, अतिवृष्टि, पाला आदि को निर्मूल कर दिया जाए; प्रकृति के साथ ही संघर्ष करके मौत के ऊपर भी कब्जा कर लिया जाए, आदि-आदि। एक वाक्य में 'सर्वे भंतु सुखिन: सर्वे संतु निरामया:। सर्वे भद्राणि पश्यंतु मा कश्चिद् दु:खभाग्भवेत्,' पूरी तरह चरितार्थ हो जाए। यह बातें केवल मनोराज्य नहीं हैं। विज्ञान के लिए ये सभी संभव हैं। यदि विश्वामित्र की नई सृष्टि मानी जाती है तो आज भी विज्ञान क्या नहीं कर सकता है? विश्वामित्र ने भी यदि किया होगा तो विज्ञान के ही बल से।

यह ऐसी चीज नहीं है कि मानवमात्र में किसी के भी लिए असाध्‍य हो। यह भी नहीं कि इसके लिए कोई खास ढंग की या अलौकिक तैयारी चाहिए। मार्क्‍स ने तो इसका सीधा उपाय वर्गसंघर्ष बताया है। उसी का मार्ग अबाध हो जाने पर यह सभी बातें अपने आप धीरे-धीरे हो जाएँगी। रूस ने इसका नमूना पेश भी कर दिया है। वह इस मामले में बहुत कुछ अग्रसर हो गया है। असल में पूँजीवादी राष्ट्रों से घिरे होने के कारण ही - ऐसे राष्ट्रों से जो उसे हजम करने पर तुले बैठे हैं - उसकी प्रगति में वैसी तेजी नहीं आ सकी है। यदि यह बात न होती तो वह देश आज कहाँ का कहाँ जा पहुँचा होता। फिर भी उसने जो कुछ किया है वह भी कम नहीं है।

हमने अनीश्वरवाद के संबंध में मार्क्‍सवाद का मत स्पष्ट करी दिया है। मगर थोड़ी देर के लिए मान भी लें कि वह धर्म-वर्म से नाता तोड़ने को ही कहता है, तो हर्ज क्या है? यदि ऊपर लिखी सभी बातों की सिद्धि के लिए - भूमि पर ही स्वर्ग लाने के लिए - यह करना भी पड़े और ईश्वर को भी विदाई देनी हो तो क्या बुरा है? मामूली जमीन-जायदाद, रुपये-पैसे और कारबार के लिए भी तो रोज ही धर्म और ईश्वर को धकियाते ही हैं, गर्दनियाँ देते ही हैं। कचहरियों में, सर्वेसेटलमेंट के समय और खरीद-बिक्री में तो रोज ही शालिग्राम, गंगा, तुलसी, वेद, कुरान, बाइबिल उठाके झूठी कसमें खाते ही हैं। क्या इतने पर भी धर्म और ईश्वर रही गए? फाटका और सट्टेबाजी में तो कोई भी जाल-फरेब बच पाता नहीं और आजकल का व्यापार तो केवल जुआ ही है। फिर भी क्या हम लोगों ने धर्म और ईश्वर को भूमंडल में कहीं भी रख छोड़ा है? यदि इतने पर भी हमने कोई ऐसा कहने की धृष्‍टता करे कि वह धर्मवादी और ईश्वरवादी है तो यह पहले दर्जे का धोखा है, आत्मप्रवंचना और लोकवंचन है।

फिर हम साफ ही क्यों न कह दें कि हम धर्म-वर्म नहीं मानते? इसमें ईमानदारी तो है। उसमें तो यह भी नहीं है। इसका परिणाम भी सुंदर होगा। हम धर्म के ठेकेदारों से बाल-बाल - साफ-साफ - बच जाएँगे और अपने हक की लड़ाई बेखटके अच्छी तरह चला के श्रेणी-विहीन समाज जल्द से जल्द स्थापित कर सकेंगे। धर्म मानने की दशा में तो दुविधे में - रमखुदैया में - रह जाने के कारण कोई काम ठीक-ठीक कर पाते नहीं। न इधर के रह जाते हैं और न उधर के। परिणाम बहुत ही बुरा होता है। इसमें यह बात न होगी। कोई रुकावट तो होगी ही नहीं। मालदार-जमींदारों का अंतिम ब्रह्मास्त्र तो यही है और जब यही न रहा, तो उनकी तो कमर ही टूट जाएगी और जल्दी ही धड़ाम से गिर पड़ेंगे। इसलिए हमारी - शोषितों एवं पीड़ितों की - जीत शीघ्र ही होगी और अवश्य होगी। धर्म और ईश्वर के नाम पर जो स्वर्ग, बैकुंठ या बिहिश्त मिलने वाला बताया जाता है वह एक तो अनिश्चित है। दूसरे उसका आँखों देखा प्रमाण तो है नहीं। तीसरे वह मिलेगा भी तो मरने के बाद। मगर इसका फल तो यहीं पर प्रत्यक्ष स्वर्ग और बैकुंठ है। इससे तो यहीं पर आनंद-समुद्र में गोते लगाना है।

इतना ही नहीं। जब ज्ञान-विज्ञान का मार्ग उन्मुक्त हो जाएगा और सभी को इसका पूरा अवसर प्राप्त होगा, सारी सुविधाएँ सुलभ होंगी, तो यह भी हो सकता है कि हम उसी विज्ञान के जरिए धर्म और ईश्वर को भी ढूँढ़ निकालें। आखिर विज्ञान और साइंस का तो यही काम ही है न, कि सत्य का पता लगाए? वह तो असत्य का शत्रु और सत्य का साथी है। उसका तो एक ही काम है कि सत्य का पता चाहे जैसे हो लगाए। और अगर ईश्वर, धर्म और परलोक सत्य हैं, अबाध्य हैं, अखंडनीय हैं, जैसा कि धर्मवादी लोग दावा करते हैं, तब तो उन्हें और भी घबराना नहीं चाहिए। साँच को आँच क्या? तब तो विज्ञान ईश्वर वगैरह को जरूर ढूँढ़ लाएगा। जैसे बादलों में छिपा सूर्य कुछी देर के बाद बाहर आ जाता है और उसकी चमक-दमक और भी तेज मालूम होती है, वही बात धर्म और ईश्वर के बारे में भी होगी। इस दरम्यान कुछ समय के लिए छिपे रहने के कारण वे और भी सर्वजनप्रिय हो जाएँगे। तब तो हम उनकी कदर और भी ज्यादा करेंगे।

अभी तो ऐसा नहीं होता है। अभी तो हम उन्हें आधे मन से सिर्फ दिखाने के लिए ढोंग की तौर पर ही मानते हैं। हमारा मतलब है आम लोगों से ही। इसीलिए, जैसा कि कहा है, भौतिक स्वार्थों के सामने उन्हें ताक पर रख भी देते हैं। मगर तब तो यह बात न होगी। तब तो पूरी तौर से मानेंगे और कचहरियों या सट्टों का सवाल तब होगा ही नहीं और न रोजगार-व्यापार वाले ही होंगे कि झूठी कसमें खाने और जाल-फरेब की जरूरत पड़े। इसलिए तो धर्मवादियों को मार्क्‍सवाद का कृतज्ञ होना चाहिए, यदि वे ईमानदारी से धर्म तथा ईश्वर को मानते हैं, कि वह उनका रास्ता निष्कंटक और निर्बाध बना देता है। यदि थोड़ी देर के धर्मत्याग से - यदि कुछ समय तक इस त्यागरूपी घोर तप के प्रताप से - धर्म और भगवान का मार्ग सदा के लिए निरुपद्रव हो जाए तो हमें खुशी-खुशी इस त्याग को अपनाना चाहिए। आखिर बिना त्याग के तो कुछ होता-जाता नहीं।

लेकिन यदि धर्म और ईश्वर सत्य नहीं हैं तब तो विज्ञान उनका पता नहीं ही लगा पाएगा, यह बात पक्की है और जो विज्ञान की कसौटी पर खरा न उतरे वह तो जरूर ही नकली होगा। फिर हमें उसकी चिंता ही क्यों हो? हमें तो उलटे इसमें खुशी होनी चाहिए कि मिथ्या चीजों से पिंड छूटा। तब तो हमें मार्क्‍सवाद का कृतज्ञ भी होना चाहिए कि उसने सत्य का पता लगाया और धर्म या ईश्वर जैसी मिथ्या चीजों से हमारा पिंड छुड़ाया। आखिर मिथ्याचार और मिथ्या पदार्थों से चिपटे रहना तो कोई बुद्धिमानी है नहीं। यह तो किसी भी भलेमानस का काम नहीं है और हम - धर्मवादी - लोग यह तो दावा करते ही हैं कि हम भले लोग हैं। फिर तो हृदय से धर्मवादी खुश ही होंगे कि चलो अच्छा ही हुआ और मिथ्या पदार्थों से पिंड छूटा। ईमानदारी का तकाजा तो यही है।

इस प्रकार इस लंबे विवेचन ने यह साफ कर दिया कि गीताधर्म और मार्क्‍सवाद का कहीं भी विरोध नहीं है। वे अनेक मौलिक बातों में एक दूसरे के निकट पहुँच जाते हैं - मिल जाते हैं। बल्कि यों कहिए कि कई बुनियादी बातों में गीताधर्म मार्क्‍सवाद का पूर्णतया पोषक है। इतना कहने में तो किसी को भी आनाकानी नहीं होनी चाहिए कि मार्क्‍सवाद को गीता से कोई आँच नहीं है - कोई भय नहीं है। मार्क्‍सवाद से गीताधर्म के डरने या उसे आँच लगने का प्रश्न तो उठी नहीं सकता। ऐसा प्रश्न उठाना ही तो गीताधर्म को नीचे गिराना और उसके महत्त्व को कम करना है। वह तो इतनी मजबूत नींव पर खड़ा है, उसकी बुनियाद तो इतनी पक्की है कि वह सदा निर्भय है। उसे किसी से भी भय नहीं है। वह इतना ऊँचा है कि उस तक कोई दुश्मन पहुँच नहीं सकता है। असल में उसका शत्रु कोई हई नहीं। गीताधर्म का तो निष्कर्ष ही है 'तुल्यो मित्रारिपक्षयो:' (14। 25), 'सम: शत्रौ च मित्रे च' (12। 18) आदि-आदि।

गीता की प्रमुख बातें और मुख्य मंतव्यों के विवेचन के सिलसिले में ही हमने जो 'गीता का धर्म और मार्क्सवाद' का स्वतंत्र रूप से विचार किया है उसका कारण तो बताई चुके हैं। उस लंबे विवेचन से भी उसके स्वतंत्र निरूपण की आवश्यकता का पता लोगों को लग जाता है। अतएव हमें फिर उसी साधारण मार्ग पर आ जाना और गीता की बची-बचाई प्रमुख बातों पर कुछ विशेष प्रकाश डाल देना है। बेशक, अब जिन बातों का विवेचन हम करेंगे वह भी अहमियत तथा महत्त्व रखती हैं और गीता में उनका भी अपना स्थान है। मगर यह ठीक है कि उन्हें वैसी महत्ता मिल नहीं सकती जो अब तक कही गई गीताधर्म की बातों को मिली है। आगे वाली बातों में भी कुछ मौलिक जरूर हैं। मगर उनका जिक्र किसी न किसी रूप में पहले आ चुका है। फलत: यहाँ उनका कुछ विस्तार मात्र कर दिया है। हाँ, जो नई हैं उनकी विशेषता यही है कि गीता ने उन्हें नए ढंग से रखा है और इस तरह उन पर अपनी मुहर लगा दी है।

सबसे पहली बात आती है ईश्वर की। गीता में ईश्वर का नाम और उसकी चर्चा बहुत आई है, इसमें शक नहीं है। मगर यह चर्चा कुछ निराले ढंग की है। अठारहवें अध्याय के 'ईश्वर: सर्वभूतानां' (61) श्लोक में ईश्वर शब्द से ही उसका उल्लेख आया है। जितना स्पष्ट वहाँ लिखा गया है उतना और कहीं नहीं। और जगह दूसरे-दूसरे शब्दों के द्वारा उसका उल्लेख होने से वह सफाई नहीं है। एक बात और भी है। तेरहवें अध्याय के 'समं पश्यन्हि सर्वत्र' (28) में भी ईश्वर शब्द आया है। उससे पहले के 27वें श्लोक में परमेश्वर शब्द भी आया है। मगर उसमें वह सफाई नहीं है जो अठारहवें अध्याय के उस ईश्वर शब्द में है। वहाँ तो कुछ ऐसा मालूम होता है कि सबों से अलग और सबों के ऊपर कोई पदार्थ है जिसे ईश्वर कहते हैं और उसकी शरण जाने से ही उद्धार होगा। इस प्रकार जैसा आमतौर से ईश्वर के बारे में खयाल है ठीक उसी रूप में वहाँ आया मालूम होता है। मगर यहाँ जो ईश्वर और परमेश्वर है वह उस रूप में उसे बताता मालूम नहीं पड़ता है। 'प्रकृतिं पुरुषं चैव' इस 19वें श्लोक से ही शुरू करके यदि देखा जाए तो देह और जीव या प्रकृति और पुरुष का ही वर्णन इस प्रसंग में है। उन्हीं को क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ भी पहले तथा इस प्रसंग में भी कहा है। फिर 22वें श्लोक में तो साफ ही कहा है कि इसी पुरुष को पर, परमात्मा, महेश्वर आदि भी कहते हैं जो इसी देह में मौजूद है। आगे चल के 26वें में उसे ही क्षेत्रज्ञ कह के 27-28 में परमेश्वर और ईश्वर कहा है। इसलिए वह सफाई यहाँ है कहाँ? यहाँ तो जीव और ईश्वर एक ही प्रतीत होते हैं। 31वें श्लोक में भी 'परमात्माऽयमव्यय:' शब्दों के द्वारा इसी पुरुष को ही अविनाशी परमात्मा कह दिया है।

बेशक पंदरहवें अध्याय के 17-18 श्लोकों में परमात्मा, उत्तम पुरुष, पुरुषोत्तम तथा ईश्वर शब्दों से ऐसे ही ईश्वर का उल्लेख आया है जो प्रकृति एवं पुरुष के ऊपर - दोनों से निराला और उत्तम - बताया गया है। लेकिन यहाँ वाला ईश्वर शब्द मुख्य नहीं है, ऐसा लगता है। चौदहवें अध्याय के 19वें श्लोक में पर शब्द आया है। उसी के साथ 'मद्भाव' शब्द है। 26 और 27 श्लोकों में 'माँ' या 'अस्मत्' शब्द है। इससे पता लगता है कि पर शब्द भी परमात्मा का वाचक है। मगर वह जीवात्मा से अलग यहाँ प्रतीत नहीं होता। हाँ, सोलहवें अध्याय के 'असत्यमप्रतिष्ठन्ते जगदाहुरनीश्वरम्' (8) में जो अनीश्वर शब्द के भीतर ईश्वर है वह उसी ईश्वर का वाचक है, यद्यपि सफाई में कुछ कमी है। आगे चौदहवें श्लोक का ईश्वर शब्द तो मालिक या शासक के ही अर्थ में आया है। हाँ, 18, 19, 20 श्लोकों में जो 'अहं' और 'माँ' शब्द आए हैं वह जरूर ईश्वर के मानी में हैं। सत्रहवें अध्याय के छठे श्लोक में 'माँ' शब्द स्पष्ट ईश्वर के अर्थ में नहीं है। किंतु जीवाभिन्न ईश्वर ही उसका आशय मालूम पड़ता है। बेशक, 27वें श्लोक में जो 'तदर्थीय' शब्द है उसका 'तत्' शब्द ईश्वरवाचक है। लेकिन वह व्यापक अर्थ में ही आया है।

अठारहवें अध्याय के 46वें श्लोक में 'तं' शब्द ईश्वर के ही मानी में आया है, चाहे स्पष्टता उतनी भले ही न हो। उससे पहले के 43वें श्लोक का ईश्वर शब्द शासक के ही अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। 50-58 श्लोकों में ब्रह्म और अस्मत् शब्द बार-बार आए हैं और ईश्वरार्थक हैं। यही बात 65-66 श्लोकों के 'अहं', 'मत्' आदि शब्दों की है। इस पर आगे विशेष बातें लिखी जाएँगी। 68वें श्लोक में भी यही बात है। ग्यारहवें अध्याय के 5-55 श्लोकों में 'अहं', 'माम्', 'मत्', 'मे', 'मम्', 'ऐश्वरम्' आदि शब्द ईश्वरवाची ही हैं। दसवें के 2-42 श्लोकों में भी बार-बार 'अहं' शब्द 'परमात्मावाची' ही है। यही हालत नवें अध्याय की भी है। सातवें के 29-30 श्लोक में और आठवें के शुरू के चार श्लोकों में भी ब्रह्म, अधियज्ञ आदि शब्द ईश्वर के ही अर्थ में प्रयुक्त हुए हैं। आगे के 'अक्षर' शब्द का भी यही मतलब है। अव्यक्त, परपुरुष आदि शब्द भी इसी मानी में आए हैं। यहाँ 'अस्मत्' शब्द के जितने रूप हैं सभी ईश्वर के ही अर्थ में हैं। सातवें अध्याय के 'वासुदेव' तथा 'अनुत्तमागति' ईश्वरार्थ कही हैं। वहाँ 'माम्', 'अहम्' आदि बार-बार आने वाले शब्द भी उसी मानी में आए हैं। छठे अध्याय की भी यही बात है। पाँचवें के 10वें श्लोक का 'ब्रह्म' शब्द और 29वें श्लोक में 'महेश्वर' शब्द निस्संदेह ईश्वरवाचक हैं। 'अहं' या 'माँ' आदि शब्द भी वैसे ही हैं। चौथे अध्याय के पहले श्लोक का 'अहं' शब्द ईश्वरार्थक है। मगर तीसरे के 'मया' और 'मे' कृष्ण के ही अर्थ में आए हैं। छठे के 'अज' एवं 'ईश्वर' शब्द ईश्वर के अर्थ में आए हैं। फिर 14 श्लोक तक 'अस्मत्' शब्द का प्रयोग भी उसी मानी में है। 23वें का यज्ञ शब्द व्यापक अर्थ में ईश्वर को भी कहता है। उसके बाद का ब्रह्म शब्द परमात्मा का ही वाचक है। 31वें में भी ब्रह्म का वही अर्थ है। 35वें का 'मयि' शब्द ईश्वरार्थ है।

तीसरे अध्याय के तीसरे श्लोक में 'मया' शब्द ईश्वर के ही अर्थ में आया है। दसवें का प्रजापति ईश्वर ही है और पंदरहवें का अक्षर भी वही है। 30वें में 'मयि' शब्द ईश्वर को ही कहता है। मगर 31-32 में जो 'मे' शब्द है वह कृष्ण का वाचक है। जिस प्रकार अठारहवें अध्यावय में अत्यंत सफाई के साथ ईश्वर का जिक्र अंत में आया है, ठीक उसके उलटा दूसरे अध्याय में उसकी चर्चा तक कहीं हई नहीं! वह वहाँ कतई बेदखल कर दिया गया है! वहाँ तो आत्मा ही परमात्मा बना बैठा है। इस प्रकार स्पष्ट रूप में तो बहुत ही कम, लेकिन अस्पष्ट रूप में ईश्वर का उल्लेख गीता में पद-पद पर पाया जाता है।

इस तरह मालूम हो गया है कि गीता में ईश्वर की किसी न किसी रूप में सैकड़ों बार से ज्यादा चर्चा आई है। मगर असली रूप में हम उसे केवल अठारहवें अध्याय के 61वें श्लोक में ही साफ-साफ पाते हैं। कृष्ण ने खुद जो 'मैं' और 'मेरा' आदि के रूप में सैकड़ों बार कहा है उसमें कुछी बार अपने लिए - साकार वसुदेवपुत्र के लिए - कहा है। मगर आमतौर से अपने ईश्वरीय स्वरूप को ही लक्ष्य करके बोल गए हैं। यदि पूर्वापर का विचार करके देखा जाए या शरीरी कृष्ण में वे बातें लागू होई नहीं सकती हैं, जिनका उल्लेख उनने ऊपर बताए स्थानों में जानें कितनी बार किया है। जब चौथे अध्याय के शुरू में ही उनने कहा है कि मैंने यह योग पहले विवस्वान को बताया था और विवस्वान ने मनु को, तो यह बात शरीरी कृष्ण में कथमपि लागू हो सकती है नहीं। उसी के आगे जब अवतार की बात के प्रसंग में कहा है कि मैं समय-समय पर पैदा हो जाता हूँ, तो यह भी शरीरधारी के लिए संभव नहीं। कोई नहीं मानता कि कृष्ण बार-बार जन्म लेते हैं। यों तो हर मनुष्य भी बार-बार जन्मता ही है। मगर उसे अवतार नहीं कहते। चातुर्वर्ण्य की रचना भी कृष्ण के शरीर से नहीं होती। हालाँकि उनने कहा है कि मैं ही चातुर्वर्ण्य बनाता हूँ। सातवें अध्याय में अपने को अधियज्ञ कहा है। यह भी ईश्वर के ही लिए संभव है, न कि शरीर वाले के लिए। अधियज्ञ का आशय आगे मालूम होगा। इसी प्रकार प्रत्येक प्रसंग के देखने से पता चलता है कि आत्मज्ञान के बल से कृष्ण अपनी आत्मा को परमात्मस्वरूप ही अनुभव करते थे और वैसा ही बोलते भी थे। वह उपदेश के समय आत्मा का ब्रह्म के साथ तादात्म्य मानते हुए ही बातें करते थे। मालूम होता है, जरा भी नीचे नहीं उतरते थे! उसी ऊँचाई पर बराबर कायम रहते थे। इसीलिए तो इन उपदेशों में अपूर्व आकर्षणशक्ति और मोहनी है। बृहदारण्यक उपनिषद् में वामदेव के इसी प्रकार के अनुभव का उल्लेख आया है। वहाँ लिखा है कि 'तद्वैतत्पश्यन्नृषिर्वामदेव: प्रतिपेदेऽहं मनुरभवं सूर्यश्चेति। तदिदमप्येतहि य एवं वेदाहं ब्रह्मास्मीति स इदं सर्व भवति' (1। 4। 10)।

इसका अर्थ यह है कि 'वामदेव ऋषि को जब अपनी ब्रह्मरूपता का साक्षात्कार हो गया तो उनने कहा कि ऐं, हमीं तो मनु, सूर्य आदि बने! आज भी जिसे ठीक वैसा ही अनुभव अपनी ब्रह्मरूपता का हो जाए वह भी यही मानता है कि वही यह सारा संसार बन गया है।' संसार तो ईश्वर का ही रूप माना जाता है। गीता में तो इसकी घोषणा है। इसलिए जो अपने को ब्रह्मरूप ही मानने लगेगा वह तो यह समझेगा ही कि सारी दुनिया उसी का रूप है। कृष्ण का अनुभव ऐसा ही था। इसीलिए सातवें अध्याय के 3-12 श्लोकों में, नवें के 16-19 श्लोकों में और दसवें के प्राय: सभी श्लोकों में विभूति के रूप में उनने सबको अपना ही रूप बताया है। ग्यारहवें अध्याय में अपने आपको ही उनने कालरूपी कहा है। फलत: गीता के अहम् और मम आदि शब्दों को देख के जो ऐसा मानते हैं कि सगुण ईश्वर का वर्णन गीता में है वह भूलते हैं। अठारहवें अध्याय के 'सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं' (66) इत्यादि पूरे श्लोक में भी निर्गुण तथा निराकार से ही मतलब है, न कि साकार से। क्योंकि यदि कृष्ण का अभिप्राय अपने साकार रूप से होता तो सिर्फ 'मेरी ही शरण जाओ' - "मामेकं शरणं व्रज" की जगह वह कह देते कि मेरी ही शरण आओ - 'मामेकं शरणमाव्रज'। 'व्रज' का अर्थ है जाओ और आव्रज का अर्थ है आओ। जब वह सामने ही मौजूद थे तो जाओ कहना ठीक न था। जाओ तो परोक्ष या दूरवर्ती पदार्थ के ही लिए कहा जा सकता है। 'मामेकं शरणं चेहि' कह देने से श्लोक भी ठीक रहता। 'एहि' का अर्थ है आना। या कुछ दूसरा ही पद कह देते जिसका अर्थ आओ होता। इस पर ज्यादा विचार आगे मिलेगा।

हमें यहाँ ईश्वर के संबंध की एक खास बात की ओर ध्यान देना है। वह यह है कि गीता के मत से ईश्वर की सत्ता को स्वीकार करने का एक ही परिणाम होता है कि हमारा आचरण प्रशंसनीय और लोकहितकारी हो जाता है। इसीलिए गीता ने ईश्वर की सत्ता की स्वीकृति की तरफ उतना ध्यान नहीं दिया है, जितना हमारे आचरण की ओर। इस संबंध में ज्यादा महत्त्वपूर्ण बात कहने के पहले हम एक बात कहना चाहते हैं। उसकी ओर ध्यान जाना जरूरी है। ईश्वर के बारे में तेरहवें अध्याय में कहा है कि 'वह ज्ञान है, ज्ञेय-ज्ञान का विषय - है, ज्ञान के द्वारा अनुभवनीय है और सबों के हृदय में बसता है' - ''ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्'' (17)। अठारहवें अध्याय के 61वें श्लोक में तो यह कहने के साथ ही और भी बात कही गई है। वहाँ तो कहते हैं कि 'अर्जुन, ईश्वर तो सभी प्राणियों के हृदय में ही रहता है और अपनी माया (शक्ति) से लोगों को ऐसे ही घुमाता रहता है जैसे यंत्र (चर्खी आदि) पर चढ़े लोगों को यंत्र का चलाने वाला' - ''ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति। भ्रामयन्सर्वभूतानि यंत्ररूढाणि मायया''॥

यहाँ दो बातें विचारणीय हैं। पहली है हृदय में रहने की। यह कहना कि हृदय ईश्वर का घर है, कुछ ठीक नहीं जँचता है। वह जब सर्वत्र है, व्यापक है, तो हृदय में भी रहता ही है, फिर इस कथन के मानी क्या? यदि कहा जाए कि हृदय में विशेष रूप से रहता है, तो भी सवाल होता है कि विशेष रूप से रहने का क्या अर्थ? यह तो कही नहीं सकते कि वहाँ ज्यादा रहता है और बाकी जगह कम। यह भी नहीं कि जैसे यंत्र का चलाने वाला बीच में बैठ के चलाता है तैसे ही ईश्वर भी बीच की जगह - हृदय - में बैठ के सबों को चलाता है। यदि इसका अर्थ यह हो कि हृदय के बल से ही चलाता है तो यह कैसे होगा? जिस यंत्र के बल से चलाते हैं उसका चलानेवाला उससे तो अलग ही रहता है। मोटर या जहाज वगैरह के चलाने और घुमाने-फिरानेवाले यंत्र से अलग ही रह के ड्राइवर वगैरह उन्हें चलाते-घुमाते हैं। हृदय में बैठ के घुमाना कुछ जँचता भी नहीं, यदि इसका मतलब व्यावहारिक घुमाने-फिराने जैसा ही हो।

इसीलिए मानना पड़ता है कि हृदय में रहने का अर्थ है कि वह हृदय-ग्राह्य है। सरस और श्रद्धालु हृदय ही उसे ठीक-ठीक पकड़ सकता है। दिमाग या बुद्धि की शक्ति हई नहीं कि उसे पकड़ सके या अपने कब्जे में कर सके। ईश्वर या ब्रह्म तर्क-दलील से जाना नहीं जा सकता, यह बात छांदोग्योपनिषद् में भी उद्दालक ने अपने पुत्र श्वेतकेतु से कही है। वहाँ कहा है कि अक्ल बघारना और बाल की खाल खींचना छोड़ के श्रद्धा करो ऐ मेरे प्यारे, - 'श्रद्धत्स्व सोम्य' (6। 12। 3)। और यह श्रद्धा हृदय की चीज है। यह पहले ही कहा जा चुका है। इसलिए गीता के मत से ईश्वर हृदयग्राह्य है। फलत: जो सहृदय नहीं वह ईश्वर को जान नहीं सकता।

अब दूसरी बात रही लोगों के चलाने की। सो भी ठीक ही है। जिस हृदय ने भगवान को जान लिया, पकड़ लिया, कब्जे में कर लिया वह दुनिया को चाहे जिस ओर घुमा सकता है। नरसी, नामदेव, सूर, तुलसी आदि भक्तजनों की बातें ऐसी ही कही जाती हैं। बताया जाता है कि भीष्म ने कहा कि 'आज मैं हरिसों अस्त्र गहाऊँ।' उनने अपने प्रेम के बल से अपनी प्रतिज्ञा रख ली थी और कृष्ण की तुड़वा दी थी। सूरदास ने कहा था कि 'हिरदयसे जौं जाहुगे बली बखानौ तोहिं।' रामकृष्ण ने विवेकानंद जैसे नास्तिक को एक शब्द में आस्तिक बना दिया। वह सच्चे हृदय की ही शक्ति थी जिसने भगवान को पकड़ लिया था। इसीलिए जिसने शुद्ध हृदय से श्रद्धा के साथ भगवान को अपना लिया है वह दुनिया को इधर से उधर कर सकता है।

गीता के इस कथन में एक बड़ी खूबी है। संसार के लोगों को हम तीन भागों में बाँट सकते हैं। या यों कहिए कि पहले दो भाग करके फिर एक भाग के दो भाग कर देने पर तीन भाग हो जाते हैं। आस्तिक और नास्तिक यही पहले दो भाग हैं। फिर आस्तिक के दो भाग हो जाते हैं - साकार ईश्वरवादी और निराकारवादी। इस प्रकार साकारवादी, निराकारवादी और निरीश्वरवादी ये तीन भाग हो गए। हमने देखा है कि ये तीनों ही आपस में तर्क-दलीलें करते और लड़ते रहते हैं। यह झमेला इतना बड़ा और इतना पुराना है कि कुछ कहिए मत। जब से लोगों को समझ हुई तभी से ये तीनों मतवाद चल पड़े। इन पर सैकड़ों पोथे लिखे जा चुके हैं।

मगर गीता इन तीनों पर तरस खाती और हँसती है। उसने जो ईश्वर को हृदय की चीज बना के बुद्धि के दायरे से उसे अलग कर दिया है, उसके चलते ये सभी झगड़े बेकार मालूम होते हैं और गीता की नजरों में ये झगड़ने वाले सिर्फ भटके हुए सिद्ध हो जाते हैं। इन झगड़ों की गुंजाइश तो बुद्धि के ही क्षेत्र में है न? इसीलिए जहाँ हृदय आया कि इन्हें बेदखल कर देता है, कान पकड़ के हटा देता है। क्यों? इसीलिए कि यदि ईश्वर है तो वह तो यह नहीं देखने जाता है कि किसके ऊपर आस्तिक या नास्तिक की छाप (label) लगी है, या साकारवादी और निराकारवादी की छाप। वह तो हृदय को देखता है। वह यही देखता है कि उसे सच्चाई से ठीक-ठीक याद कौन करता है।

जब इस प्रकार देखते हैं तो पता लगता है कि साकारवादी और निराकारवादी तो याद करते ही हैं। मगर निरीश्वरवादी भी उनसे कम ईश्वर को याद नहीं करते! यदि भक्ति का अर्थ यह याद ही है तो फिर नास्तिक भी क्यों न भक्त माने जाएँ? बेशक, प्रेमी याद करता है और खूब ही याद करता है, यदि सच्चा प्रेमी है। मगर पक्का शत्रु तो उससे भी ज्यादा याद करता है। प्रेमी तो शायद नींद की दशा में ऐसा न भी करे। मगर शत्रु तो अपने शत्रु के सपने देखा करता है, बशर्ते कि सच्चा और पक्का शत्रु हो। इसीलिए मानना ही होगा कि ईश्वर का सच्चा शत्रु भक्तों से नीचे दर्जे का हो नहीं सकता, यदि ऊँचे दर्जे का न भी माना जाए। पहले जो कहा है कि धर्म तो व्यक्तिगत और अपने समझ के ही अनुसार ईमानदारी से करने की चीज है, उससे भी यही बात सिद्ध हो जाती है। यदि हमें ईमानदारी से यही प्रतीत हो कि ईश्वर हई नहीं और हम तदनुसार ही अमल करें तो फिर पतन की गुंजाइश रही कहाँ जाती है?

इसीलिए प्रौढ़ नैयायिक उदयनाचार्य ने ईश्वर-सिद्धि के ही लिए बनाए अपने ग्रंथ 'न्यायकुसुमांजलि' को पूरा करके उपसंहार में यही लिखा है कि वे साफ ही सच्चे और ईमानदार नास्तिकों के लिए ही वही स्थान चाहते हैं जो सच्चे आस्तिकों को मिले। उनने प्रार्थना के रूप में अपने भगवान से यही बात बहुत सुंदर ढंग से यों कही है - 'इत्येवं श्रुतिनीति संप्लवजलैर्भूयोभिराक्षालिते; येषां नास्पदमादधासि हृदये ते शैलसाराशया:। किंतु प्रस्तुतविप्रतीप विधयोऽप्युच्चैर्भवच्चिन्तका:; काले कारुणिक त्वयैव कृपया ते भावनीया नरा:।' इसका आशय यही है कि 'कृपासागर, इस प्रकार वेद, न्याय, तर्क आदि के रूप में हमने झरने का जल इस ग्रंथ में प्रस्तुत किया है और उससे उन नास्तिकों के मलिन हृदयों को अच्छी तरह धो दिया भी है, ताकि वे आपके निवास योग्य बन जाएँ। लेकिन यदि इतने पर भी आपको वहाँ स्थान न मिले, तो हम यही कहेंगे कि वे हृदय इस्पात या वज्र के हैं। लेकिन यह याद रहे कि प्रचंड शत्रु के रूप में वे भी तो आपको पूरी तौर से आखिर याद करते ही हैं। इसलिए उचित तो यही है कि समय आने पर आप उन्हें भी भक्तों की ही तरह संतुष्ट करें।' कितना ऊँचा खयाल है! कितनी ऊँची भावना है! गीता इसी खयाल और इसी भावना का प्रसार चाहती है।

अच्छा, अब जरा ईश्वर की सत्ता को स्वीकार करने का परिणाम क्या होता है, क्या होना चाहिए, इस पर भी गीता की दृष्टि देखें। गीता के सोलहवें अध्याय के शुरूवाले छह श्लोकों में दैवी तथा आसुरी संपत्तियों का संक्षेप में वर्णन कर दिया है। इन दोनों का तात्पर्य मनुष्य के ऐसे गुणों और आचरणों से है जिनसे समाज का हिताहित, भला-बुरा होता है। कल्याणकारी और मंगलमय गुणों एवं आचरणों को दैवी संपत्ति और विपरीतों को आसुरी संपत्ति कहा है। पाँचवें श्लोक में यही बात साफ कह दी है कि दैवी संपत्ति मुक्तिसंपादक और कल्याणकारी है, जब कि आसुरी सभी बंधनों और संकटों को पैदा करती है। साथ ही यह भी कहा है कि अर्जुन के लिए चिंता की तो कोई बात हई नहीं। क्योंकि वह तो दैवी संपत्तिवाला है। इसके बाद छठे श्लोक के उत्तरार्द्ध में कहा है कि अब तक तो दैव संपत्ति का ही विस्तृत विवेचन किया गया है। मगर आसुरी तो छूटी ही है। इसलिए उसे भी जरा खोल के बता दें तो ठीक हो। फिर सातवें से लेकर अध्याय के अंत तक के शेष 18 श्लोकों में यही बात लिखी गई है। बेशक, अंत के 22-24 श्लोकों में निषेध के रूप में ही यह बात कही गई है। शेष श्लोकों में साफ-साफ निरूपण ही है।

यहाँ जो यह कहा गया है कि अब तक तो विस्तार के साथ दैव संपत्ति का ही वर्णन आया है, उससे साफ हो जाता है कि गीता के शुरू से लेकर सोलहवें अध्याय के कुछ श्लोकों तक मुख्यत: वही बात कही गई है। यह तो निर्विवाद है कि पहले अध्याय में खुल के समाज-संहार की कड़ी से कड़ी निंदा की गई है। दूसरे में भी जो अर्जुन को यह कहा गया है कि लोग तुम्हें गालियाँ देंगे और तुम पर थूकेंगे वह भी सामाजिक दृष्टि से ही तो है। तीसरे अध्याय में तो समाज रक्षार्थ यज्ञ का विस्तार ही बताया गया है और कहा गया है कि समाज के लिए उसे मूलभूत मानना चाहिए। इसी प्रकार चौथे के 'नायं लोकोऽस्त्यज्ञस्य' (31) आदि के द्वारा तथा छठे के 'आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति' (32) के जरिए लोक-कल्याणकारी भावनाओं एवं आचरणों का ही महत्त्व दिखाया है। सातवें से लेकर पंदरहवें अध्याय तक यही बात जगह-जगह किसी न किसी रूप में बराबर पाई जाती है। इसलिए स्पष्ट है कि समाज के कल्याण से ही गीता का मतलब है। यों तो योग का जो स्वरूप पहले बताया जा चुका है वह समाज के कल्याण की ही चीज है। दसवें अध्याय के अंत के 41वें श्लोक में तो साफ ही कह दिया है कि संसार में जोई चमत्कार वाली गुणयुक्त चीज है वह भगवान का ही रूप है, उसी का अंश है। इससे तो स्पष्ट है कि गीता की दृष्टि में भगवान का मतलब ही है जगन्मंगलकर्त्ता से। गीता वैसे भगवान को कहाँ देखती और मानती है जो केवल स्वर्ग और नरक में भेजने का इंतजाम करता हो, या मुक्ति देता हो? गीता ने तो ऐसे भगवान का खयाल ही नहीं किया है।

यही बात सोलहवें अध्याय के 7-24 श्लोकों से भी सिद्ध होती है। आमतौर से यही होता है, यही बात देखी जाती है कि जो कुकर्मों को करता हुआ ईश्वर की सत्ता में विश्वास नहीं करता हो उसकी निंदा या उसके खंडन-मंडन का जब प्रसंग आए तो इसी बात से शुरू करते हैं कि देखिए न, यह तो ईश्वर को ही नहीं मानता है और साफ ही कहता है कि इस सृष्टि की उत्पत्ति या इसके काम के संचालन के लिए उसकी जरूरत हई नहीं! फिर और लोगों की इसे क्या परवाह होगी? उनके हितों को क्यों न पाँव तले रौंदेगा? आदि-आदि। ठीक भी यही प्रतीत होता है और स्वाभाविक भी। भगवान तो लोगों के लिए सबसे बड़ी चीज है और जो उसे ही नहीं मानता वह बाकी को क्यों मानने लगा? लोगों का गुस्सा भी यदि उस पर उतरेगा तो यही कहके कि जब यह शालिग्राम को ही भून देता है तो इसे बैंगन भूनने में क्या देर? अंत में भी सब कुछ लानत-मलामत के बाद यही कहेंगे कि इसकी ऐसी हिम्मत कि भगवान तक को भी इनकार कर जाए?

मगर गीता में कुछ और ही देखते हैं। वहाँ तो असुरों का लक्षण बताते हुए पूरे सातवें श्लोक में ईश्वर का नाम ही नहीं आया है। आसुर-संपत्ति वाले इस संसार के मूल में ईश्वर को नहीं मानते यह बात सिर्फ आठवें श्लोक के पूर्वार्द्ध के अंत में यों पाई जाती है कि देखो न, ये लोग संसार के मूल में उसे नहीं मानते - 'जगदाहुरनीश्वरम्'। इसके पहले सातवें में तो यही कहा है कि 'असुर लोग तो क्या करें क्या न करें यह - कर्तव्याकर्तव्य - जानते ही नहीं, उनमें पवित्रता भी नहीं होती और न उनका आचरण ही ठीक होता है। सत्य का तो उनमें नाम भी नहीं होता' - ''प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुरा:। न शौचं नापिचाचारो न सत्यं तेषु विद्यते।'' आठवें के शुरू में भी कहा है कि 'वे जगत को बेबुनियाद और इसीलिए निष्प्रयोजन मानते हैं' - "असत्यमप्रतिष्ठन्ते जगदाहु:।" और जब ऐसी बात है तो फिर ईश्वर की क्या जरूरत? वह तो तभी होती जब यह संसार किसी खास मकसद या उद्देश्य को लेकर बनाया गया होता - बना होता। इसीलिए वे कहते हैं कि ईश्वर की कोई जरूरत हई नहीं।

इस प्रकार हम देखते हैं कि अनीश्वरवाद या नास्तिकता को पीछे धकेल दिया गया है। उसे वह महत्त्व नहीं मिला है जो आमतौर से दिया जाता है। गीता ने तो महत्त्व दिया है उन्हीं चीजों को जिनसे संसार के उत्थान-पतन का - इसकी उन्नति-अवनति का - गहरा संबंध है। भले-बुरे की पहचान होना, कर्तव्य-अकर्तव्य की जानकारी, उत्तम आचरण, बाहर-भीतर पवित्रता और सच्चा व्यवहार - यही चीजें तो समाज की बुनियाद हैं। इनके बिना न तो हमीं एक मिनट टिक सकते और न यह समाज ही चल सकता है। ईश्वर को आप मानिए, या मत मानिए। मगर ये चीजें मानिए खामख्वाह। आपका अमल अगर इन्हीं के अनुसार हो तो हमें आपके अनीश्वरवाद से - आपकी नास्तिकता से - कोई मतलब नहीं, उसकी परवाह हम नहीं करते। हम जानते हैं कि उसका जहरीला डंक खत्म हो गया है। फलत: वह कुछ बिगाड़ नहीं सकती। आप तो पिंजड़े में बंद पक्षी हो गए हैं इन्हीं बातों के करते। इसलिए समाज के ही गीत गाएँगे। न तो स्वच्छंद उड़ान ही मार सकते और न मनचाही डाल पर बैठ के स्वतंत्र गीत ही गा सकेंगे। यही है गीता का इस संबंध में वक्तव्य, यही है उसका कहना।

मगर जिनमें यही चीजें नहीं हैं - जो असुर हैं - जो देव नहीं हैं उनका क्या कहना? वे ईश्वर को क्यों मानने लगे? यह परस्पर विरोधी बातें जो हैं। यह होई नहीं सकता कि सदाचार और कर्तव्यपरायणता न रहे तथा बाहर-भीतर एक समान ही सच्चा व्यवहार भी न रहे; मगर ईश्वरवादी बने रहें। गीता की नजरों में ये दोनों बातें एक जगह हो नहीं सकती हैं। बेशक, आज तो धर्म और ईश्वर की ठेकेदारी लिए फिरने वाले ऐसे लोगों की ही भरमार है जिनमें ये बातें जरा भी पाई नहीं जाती हैं। एक ओर देखिए तो कंठी-माला, जटा, टीका-चंदन, दंड-कमंडल और क्या-क्या नहीं हैं। सभी के सभी धर्म वाले ट्रेडमार्क पाए जाते हैं। मगर दूसरी ओर ऐसे लोगों में न तो कर्तव्य-अकर्तव्य का ज्ञान है, न तदनुकूल आचरण है, न बाहर-भीतर सर्वत्र होने वाली पवित्रता ही है और न सच्चाई तथा ईमानदारी ही। आज तो यही बात धार्मिक संसार में सर्वत्र ही पाई जाती है। सब जगह इसी की छूट है। कोई पूछनेवाला ही नहीं कि यह क्या अंधेरखाता है। जिस हृदय में भगवान बसे वह कितना पवित्र और कितना उदार होगा! उसकी गंभीरता और उच्चता कैसी होगी! वह विश्वप्रेम से कितना ओतप्रोत होगा! (आखिर ईश्वर तो प्रेममय, सत्य, शुद्ध, आनंदरूप और निर्विकार है न? और वही हमारे हृदय में बसता भी है। फिर भी यह गंदगी और बदबू? कस्तूरी जहाँ हो वहाँ उसकी सुगंध न फैले, यह क्या बात? और ईश्वर की गंध तो भौतिक कस्तूरी के गंध से लाख गुना तेज है। फिर हमारे दिलों में, जहाँ वही मौजूद है, सत्य, प्रेम, दया, पवित्रता, सदाचार और आनंद क्यों नहीं पाया जाता? इन चीजों का स्रोत उमड़ क्यों नहीं पड़ता?

कहने के लिए तो लोग कहेंगे कि हम धार्मात्मा हैं, ईश्वरवादी हैं। मगर हैं ये लोग दरअसल पापात्मा और अनीश्वरवादी। नास्तिक लोग तो जबान से ही ईश्वर की सत्ता इनकार करते हैं। मगर ये भलेमानस तो अमली तौर पर उसे जहन्नुम पहुँचाते हैं। हम तो महान से महान नास्तिकों को जानते हैं जो अनीश्वरवादी तो थे, मगर जिनका आचरण इतना ऊँचा और लोकहितकारी था कि बड़े-बड़े पादरी, पंडित और धर्मवादी दाँतों तले उँगली दबाते थे। हिम्मत नहीं होती थी कि उनके विरुद्ध कोई चूँ भी करे, उँगली उठाए। मार्क्सवाद वैसे नास्तिकों को ही चाहता है जिनके काम से आस्तिक लोग भी शर्मिंदा हो जाएँ। वह बेशक उन धार्मात्माओं से अपना और समाज का पिंड खामख्वाह छुड़ाना चाहता है जो व्यवहार में ठीक उलटा चलते हैं। हमें तो अमल चाहिए, काम चाहिए, न कि जबानी हिसाब और जमाखर्च। हम तो 'कह-सुनाऊँ' नहीं चाहते; किंतु 'कर-दिखाऊँ' चाहते हैं।

यदि गीता के सोलहवें अध्याय के 9-18 श्लोकों पर गौर करें तो हमें पता चल जाएगा कि जो धर्म के ठेकेदार आज जनता के हकों की लड़ाई का विरोध करते फिरते हैं और इस मामले में धर्म और ईश्वर का ही सहारा लेते हैं उन्हीं का चित्र वहाँ खींचा गया है। यह चित्र ऐसा है कि देखते ही बनता है। इसमें शक नहीं कि 9-14 श्लोकों से तो यह साफ पता नहीं चलता कि धर्म के ठेकेदारों का ही यह चित्रण है। मगर पंदरहवें के 'यक्ष्ये दास्यामि' पदों से, जिनका अर्थ है कि 'यज्ञ करेंगे और दान देंगे' तथा 'यजंते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम्' (17) से तो यह बात बिलकुल ही साफ हो जाती है। जहाँ पहले वचनों में सिर्फ यज्ञ करने और दान देने की बात है तहाँ आखिरवाले तो साफ ही कहते हैं कि - 'वे लोग दिखावटी यज्ञ ख्याति आदि के लिए ही करते हैं। यज्ञों के विधि-विधान से तो उन्हें कोई मतलब होता ही नहीं।' यह 'अविधिपूर्वकम्' शब्द दूसरे मानी में आई नहीं सकता है। यह इसीलिए धर्म के ठेकेदारों की नकाब उतार फेंकता है, इसमें शक नहीं।

उनका चित्र खड़ा करना शुरू ही किया है यह कहते हुए कि 'संसार के तो वे शत्रु ही होते हैं। फलत: उसे चौपट करने के बड़े से बड़े उग्र काम कर डालने की ताकत रखते हैं' - ''प्रभवन्त्युग्रकर्माण: क्षयाय जगतोऽहिता:।'' 'संसार से तात्पर्य यहाँ समाज से ही है। वहाँ बताया गया है कि उनका तो काम ही है समाज को तहस-नहस करना। ऐसा करते हुए वे खुद भी चौपट हो जाते हैं। क्योंकि समाज से बाहर तो जा सकते नहीं। उनकी वासनाएँ तथा आकांक्षाएँ इतनी ज्यादा और बड़ी होती हैं कि उनकी पूर्ति हो सकती नहीं। उनका ठाटबाट और ढोंग इतना ज्यादा होता है, गरूर इस कदर होता है और प्रभुत्व, प्रभाव या शक्ति का नशा ऐसा होता है कि कुछ पूछिए मत। जिद में ही पड़के अंट-संट कर बैठते हैं। उन्हें पवित्रता का तो कोई खयाल रहता ही नहीं। दुनिया भर की फिक्र उन्हीं के माथे सवार रहती है, ऐसा मालूम होता है। खूब चीजें प्राप्त करो और खाओ, पिओ, मौज करो, यही उनका महामंत्र होता है। जानें कितनी उम्मीदें उन्हें होती हैं। काम और क्रोध ही यही दो उनके पक्के और सदा के साथी होते हैं। विषयवासना की तृप्ति और शान बढ़ाने के लिए वे हजार जुल्म और अत्याचार कर डालते हैं। बराबर यही सोचते रहते हैं कि अमुक काम तो हमने कर लिया, अब तो सिर्फ फलाँ-फलाँ बाकी हैं। इतनी संपत्ति तो मिल चुकी ही है। मगर अभी तो कितनी ही गुनी हासिल करेंगे! बहुत दुश्मनों को खत्म कर डाला है। बचे हुओं को भी न छोड़ेंगे। हमीं सबसे बड़े हैं, महलों में रहते हैं, जो चाहते हैं करके ही छोड़ते हैं। हमसे बड़ा ताकतवर है कौन? सुखी भी तो हमीं हैं। न तो हमसे बढ़के कोई धनी है और न संगी-साथियों वाला ही। हमारे मुकाबिले में कौन खड़ा हो सकता है? वे दिन-रात खुद अपने ही मुँह से अपनी बड़ाई करते रहते हैं। रुपये-पैसे, गरूर और नशा की गरमी में ही चूर रहते हैं। यज्ञ और दान तो वे केवल दिखाने और ठगने के ही लिए करते हैं। उनमें अहंकार इतना ज्यादा होता है कि मत कहिए। वे आत्मा-परमात्मा को तो समझते भी नहीं कि क्या चीज हैं - उनके नाम से ही उन्हें नफरत होती है। नतीजा यह होता है कि उनका पतन होता ही जाता है। ऊपर तो वे उठ सकते नहीं। दूसरे, तीसरे आदि जन्मों में भी अधिकाधिक नीचे गिरते ही जाते हैं। ईश्वर या आत्मा तक उनकी पहुँच कभी होती ही नहीं।'

इसी रूप में असुरों या धर्मध्वजियों का चित्र गीता ने खींचा हैं। 18वें और 20वें श्लोक में एक बार फिर परमात्मा का उल्लेख यद्यपि किया है। मगर वह है आत्मा के रूप में ही। चाहे ईश्वर के रूप में भी मानें, तो भी जो कुछ उसके साथ-साथ कहा गया है उससे स्पष्ट है कि ऊपर लिखे आसुरी व्यवहारों और आचरणों के करते ही उनकी परमात्मा तक पहुँच हो पाती नहीं। इससे भी यही सिद्ध हो जाता है कि असल चीज आचरण ही हैं। 21-22 श्लोकों में तो खुल के कही दिया है - और यह बात उपसंहार की है - कि 'नरक या पतन के तीन ही रास्ते हैं जिन्हें काम, क्रोध और लोभ कहते हैं। ये तीनों आत्मा को भी चौपट कर देते हैं। इसलिए इनसे अपना पिंड छुड़ाना जरूरी है। जहन्नुम में ले जाने वाले इन तीनों से पल्ला छूटने पर ही कल्याणकारी रास्ता सूझता और सदाचरण होता है। फिर तो हर तरह से मौज ही मौज समझिए' - ''त्रिविधं नर-नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मन:। काम: क्रोधस्तथा- लोभस्तस्मादेतत्रयं त्यजेत्॥ एतैर्विमुक्त: कौंतेय तमोद्वारेस्त्रिभिर्नर:। आचरत्यामन: श्रेयस्ततो याति परां गतिम्॥'' आखिर में कार्य-अकार्य या कर्तव्य-अकर्तव्य के जानने और तदनुसार ही काम करने का आदेश दे के यह अध्याय पूरा किया गया है।

इस तरह देखते हैं कि जिस कर्तव्याकर्तव्य के ज्ञान से ही शुरू किया था उसी से प्रकरण का अंत भी किया गया है। यह नहीं कहा गया है कि भगवान के ज्ञान, उसकी भक्ति या पूजा-पाठ को ही अपनाना चाहिए। यह कहते भी कैसे? गीता ने तो पहले ही कह दिया है और उसे आगे भी यही कहना है कि कर्तव्य का पालन ही भगवान की पूजा है। फिर उलटी बात यहाँ कैसे कही जाती? और जब सभी बातों का पर्यवसान समाज के कल्याण एवं क्षेम में ही है - जब लोकसंग्रह ही गीता का ध्येय है - तो दूसरी बात कही जाए कैसे? जब भगवान का ज्ञान, ध्यान वगैरह भी मनुष्य को ऐसे साँचे में ढालने के ही लिए है कि उसकी प्रत्येक क्रिया, हरेक साँस और हर काम संसार के लिए मंगलप्रद बन सके, तो और बातों का अवसर ही कहाँ रह जाता है? गीता ने ईश्वर-अनीश्वरवाद के झमेले को जिस तरह सुलझाया है और खुद इस गड़बड़ से जो वह बहुत ऊपर पहुँची हुई है वही उसकी इस संबंध की खूबी है।

अब जरा कर्म और धर्म की बातों को भी देखें। आमतौर से ऐसी धारणा पाई जाती है कि कर्म, क्रिया या अमल तो सभी बुरे-भले कामों को ही कहते हैं। मगर धर्म कुछ खास कर्मों या कामों का ही नाम है। धर्म के ही मानी में मजहब और रिलिजन (Religion) शब्दों का भी प्रयोग करके उनके बारे में भी यही खयाल सर्वत्र पाया जाता है। इसका परिणाम भी बुरा से बुरा होता है। जब हमने मान लिया कि सिर्फ संध्या, पूजा, नमाज, रोजा, प्रार्थना वगैरह धर्म हैं, तब तो स्वाभाविक रूप से बाकी कामों में एक प्रकार की स्वतंत्रता का अनुभव करेंगे ही। धर्मों के संबंध में तो सैकड़ों तरह के बंधन होते हैं - कब करें, कैसे करें, कितनी देर तक करें आदि-आदि। गड़बड़ होने पर नरक, दोजख आदि के भय भी माथे पर सवार रहते हैं। भगवान की रंजिश का भी सबसे बड़ा खतरा इस बात में बना रहता है। इसीलिए स्वभावत: उनकी पाबंदी ठीक-ठीक की जाती है - कम से कम पाबंदी की कोशिश तो जरूर होती है।

लेकिन बाकी कामों में? उनमें तो कोई डर-भय उस तरह का नहीं होता। हाँ, लोक-लाज या कानून-वानून का डर जरूर रहता है। मगर लोगों से छिप-छिपाके और कानून-फंदे से बच-बचाके भी काम किए जा सकते हैं, किए जाते हैं। कानून की आँख में धूल डालना चतुर खिलाड़ियों के लिए बायें हाथ का खेल है। वे तो कानून को बराबर चराते फिरते हैं। इसलिए उन्हें स्वतंत्रता तो करीब-करीब रहती ही है। क्योंकि भगवान तो यहाँ दखल देता नहीं और न धर्मराज या यमराज ही। यह तो धर्म से बाहर की चीजें हैं, जहाँ उनका अधिकार नहीं। यदि थोड़ा-बहुत मानते भी हैं कि वह दखल देंगे तो भी यह बात अधूरी ही रह जाती है। क्योंकि संध्या, नमाज की तरह सच बोलने या शराब न पीने की बात नहीं है। यदि ये चीजें धर्म में किसी प्रकार आ भी जाएँ तो भी इनका स्थान गौण है, मुख्य नहीं। देखते ही हैं कि संध्या, नमाज वगैरह की पाबंदी में जो सख्ती पाई जाती है वह सच बोलने और सूद न लेने या शराब न पीने में हर्गिज नहीं है। बड़े-बड़े धर्माधिकारी भी बड़े-बड़े कारबारों और जमींदारियों के चलाने वाले होते हैं, जहाँ झूठ बोलने और जाल-फरेब के बिना काम चलता ही नहीं। मैनेजर, प्रबंधक और कारपरदाज वगैरह के जरिए वह काम करवा के अपने पिंड को बचाने की बात केवल अपने आपको धोखा देना है - आत्मप्रवंचना है। जब कारबार उनका है, जमींदारी उनकी है तो उसके मुतल्लिक होने वाले झूठ और जाल-फरेब की जवाबदेही उन्हीं पर होगी ही। यह डूब के पानी पीना और खुदा से चोरी करना ठीक नहीं। यदि कारबार और जमींदारी के फायदे के लिए वह झूठ और जाल न हो तो बात दूसरी है। मगर यहाँ तो उन्हीं के चलाने के ही लिए ऐसा किया जाता है।

इसीलिए गीता ने न तो धर्म की श्रेणियाँ बता के मुख्य, अमुख्य या प्रधान और गौण धर्म जैसा उसका विभाग ही किया है और न कोई दूसरी ही तरकीब निकाली है। गीता की नजरों में तो धर्म और कर्म या क्रिया (अमल या काम) एक ही चीज है। जिसे हम अंग्रेजी में ऐक्शन (action) कहते हैं उसमें और धर्म में जरा भी फर्क गीता नहीं मानती। इसका मोटा दृष्टांत ले सकते हैं। हिंदू लोग चार वर्णों को मानते हुए उनके पृथक-पृथक धर्म मानते हैं। उनके सिद्धांत में वर्णधर्म एक खास चीज है। मगर चौथे अध्याय के 12, 13 श्लोकों की अजीब बात है। 13वें में तो वर्णधर्मों की ही बात है। फिर भी कृष्ण कहते हैं कि 'हमने चारों वर्णों की रचना कर्मों के विभाग के ही मुताबिक की है और ये कर्म गुणों के अनुसार बने स्वभावों के अनुकूल अलग-अलग होते हैं', - ''चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागश:।'' यहाँ धर्म की जगह कर्म ही कहा गया है। 12वें श्लोक में भी कहा है कि 'मर्त्यलोक में कर्मों की सिद्धि जल्द होती है। इसीलिए यहाँ उसी सिद्धि (इष्टसिद्धि) के लिए देवताओं का यज्ञ किया करते हैं' - ''काङ्क्षन्त: कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवता:। क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा।'' यहाँ यज्ञ को कर्म कहा है, न कि धर्म; हालाँकि यह तो पक्का धर्म है। धर्मों की सिद्धि न कह के कर्मों की सिद्धि कहने का भी यही मतलब है कि धर्म और कर्म एक ही चीज है और गीता इन दोनों में कोई भेद नहीं रखती।

इसी प्रकार अठारहवें अध्याय के 41-44 श्लोकों में भी चारों वर्णों के ही धर्मों की बात आई है। 45-46 श्लोकों में भी उसी संबंध में यह बताया गया है कि उन धर्मों के द्वारा ही भगवान की पूजा कैसे हो सकती है और इष्टसिद्धि क्योंकर होती है। चारों वर्णों के कुछ चुने-चुनाए धर्मों को गिनाया भी गया है, जो पक्के और स्वाभाविक माने जाते हैं। सारांश यह कि ये छह श्लोक वर्णों के धर्मों की जितनी सफाई के साथ कहते हैं उतनी सफाई शायद ही कहीं मिलेगी। मगर एक बार भी उनमें धर्म शब्द नहीं आया है। खूबी तो यह कि उन्हीं में कर्म शब्द पूरे आठ बार आया है। धर्म के बारे में जिनका बड़ा जोर है उन्हें इस बात से काफी धक्का लग सकता है कि जहाँ धर्म शब्द का बार-बार आना निहायत जरूरी था वहाँ उसे गीता भूल-सी गई! और अगर ऐसे ही अवसर पर धर्म की बात नहीं आती है, किंतु उसकी जगह कर्म कहके ही संतोष किया जाता है, तो फिर यह कहने की गुंजाइश रही जाती कहाँ है कि धर्म और कर्म दो चीजें हैं?

जो लोग फिर भी हठ करते रहें और ऐसा कहने का साहस करें कि यद्यपि सभी धर्म तो कर्म ही होते हैं, तथापि सभी कर्म कदापि धर्म हो नहीं सकते, इसीलिए धर्म की जगह कर्म कहके काम चलाया जा सकता है और यही बात यहाँ पाई जाती है, उनके लिए कोई भी समझदारी की बात क्या कही जाए? यों ही कभी-कभी धर्म का नाम ले लेना और हर विशेष अवसर पर बार-बार कर्म का ही जिक्र करना, जबकि धर्म का उल्लेख ज्यादा मौजूँ और उचित होता, क्या यह बात नहीं बताता कि गीता इस झमेले से हजार कोस दूर है? यदि धर्म का नाम कहीं-कहीं आ गया भी तो यों ही, न कि किसी खास अभिप्राय से, यही कथन ज्यादा युक्तियुक्त प्रतीत होता है। यह ठीक है कि एकाध जगह धर्म शब्द से ही काम निकलता देख और कर्म कहने में दिक्कत या कठिनाई समझ के गीता ने धर्मशास्त्रों के अर्थ में ही धर्म शब्द कहा है। मगर वह ज्यों का त्यों बोल दिया गया है, न कि प्रतिपादन किया गया है कि धर्म खास चीज है। जैसा कि 'स्वधर्मपि चावेक्ष्य' (2। 31) में पाया जाता है। और जब दूसरे अध्याय में योग का सिद्धांत एवं स्वरूप बताते समय, तीसरे अध्याय में यज्ञ की महत्ता दिखाते वक्त, चौथे में यज्ञ का विस्तार एवं विवरण बताते समय और अठारहवें में अपने-अपने (स्व) धर्मों के रूप में ही कैसे भगवत्पूजा होती है यह सिद्ध करते समय भी सिर्फ कर्म की ही चर्चा आती है, न कि धर्म की एक बार भी, तो गीता में प्रतिपादन किसका माना जाए? वहाँ रहस्य और सिद्धांत किसके संबंध का बताया गया माना जाए? धर्म का या कर्म का? अगर कर्म का, क्योंकि धर्म का कहने की तो कोई भी गुंजाइश हई नहीं, तो फिर अंततोगत्वा यही बात रही कि गीता ने धर्म और कर्म में कोई भी अंतर नहीं किया है। उसने कर्म के ही दार्शनिक विवेचन से संतोष करके दिखा दिया है कि असली चीज कर्म ही है।

एक बात और भी है। गीता ने बार-बार कहा है कि कर्मों से ही बंधन होता है और उसी से छुटकारा मिलने को मुक्ति कहते हैं। अर्जुन ने इसी बंधन के डर से ही तो आगा-पीछा किया था। यदि दूसरे अध्याय के 38वें श्लोक से शुरू करके देखें तो प्राय: हरेक अध्याय में बार-बार कर्म की इस ताकत का और उससे छुटकारा पाने की हिकमत का जिक्र मिलेगा। चाहे उस हिकमत को योग कहें, निर्लेपता कहें, अनासक्ति कहें, समत्व बुद्धि कहें, या इन सबों को मिलाके कहें, यह बात दूसरी है। मगर यह तो पक्की चीज है कि बार-बार यही बात शुरू से अंत तक आई है। अर्जुन की धारणा कुछ ऐसी थी कि धर्म उन कामों को ही कहते हैं जिनमें कोई भी बुराई न हो, जिनसे स्वजन-वध आदि संभव न हों, जैसा ध्यान, समाधि, पूजा आदि। उसका भी खयाल था कि जिसके करते बुराई हो, हत्या हो या इसी तरह की और बात हो वह धर्म माना जाने पर भी वस्तुगत्या अधर्म - धर्म विरोधी - ही है। युद्ध से विरक्त होने और लंबी-चौड़ी दलीलें पेश करने का उसका यही मतलब था। दूसरा मतलब हो भी क्या सकता था? इसका उत्तर भी कृष्ण ने साफ ही दे दिया कि 'सहजं कर्म कौंतेय सदोषमपि न त्यजेत्। सर्वारंभा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृता:' (18। 48), 'श्रेयान्स्वधर्मो विगुण:' (3। 35, 18। 47), - ''बुराई-भलाई तो सर्वत्र मिली हुई हैं। ऐसा काम हो नहीं सकता जिसमें बुराई न हो या भलाई न हो। इसलिए बुराई वाला होने पर भी स्वधर्म ही ठीक है। उसी को करना चाहिए।'' गीता में जो धर्म, अधर्म शब्द कहीं-कहीं आ गए हैं वह अर्जुन की इसी भ्रांत धारणा को ही लेके, और उसे ही कृष्ण ने दूर किया है।

इससे एक और भी गड़बड़ हो जाती है। ऐसी धारणा के करते धर्म और अधर्म अजीब-सी चीज बन जाते हैं। क्षत्रिय के लिए युद्ध जैसा महान धर्म भी अधर्म की कोटि में - उसी श्रेणी में - आ जाता है। यह कितनी गलत बात है! ऐसा समझना कि जो निर्दोष हो, हिंसारहित हो वही धर्म और शेष अधर्म है, कितनी नादानी है! साँस लेने एवं पलक मारने में भी तो लक्ष-लक्ष कीटाणुओं का संहार होता रहता ही है। पुराने लोगों ने भी कहा ही है कि वायुमंडल में ऐसे अनंत जीव भरे पड़े हैं जिनका संहार पलक मारने से ही हो जाता है - 'पक्ष्मणोऽपि विपातेन येषां स्यात्पर्वसंक्षय:।' जब यही बात है तो फिर साँस का क्या कहना? वह तो बराबर चलती और गरमागरम रहती है। फलत: कत्लेआम ही होता रहता है उसके चलते भी! तो क्या किया जाए? क्या पलक न मारें? साँस न लें? क्योंकि अधर्म जो हो जाएगा! और जब इस प्रकार जीवन ही अधर्म हो गया तो आगे क्या कहा जाए? धर्मशास्त्रियों ने जिस जीवनरक्षा के लिए सब कुछ कर डालने और खा-पी लेने तक की छूट दे दी है वही अधर्म? और पूजा-पाठ? माला जपो, जबान हिलाओ, चंदन रगड़ो, फूल तोड़ो, आरती करो, दीप जलाओ, भोग लगाओ और पद-पद पर अनंत निर्दोष जीवों का संहार करो। फिर भी यह कहना कि यह पूजा-पाठ धर्म है, महज नादानी है, यदि धर्म की वही परिभाषा मानी जाए जो अर्जुन के दिमाग में थी। तब तो कहीं भी किसी प्रकार गुजर नहीं और धर्म महाराज यहाँ से सदा के लिए विदाई ही लेके चले जाएँ!

इसीलिए तो कृष्ण को कस के सुनाना पड़ा कि यह तो तुम्हारी अजीब पंडिताई है - 'प्रज्ञावादांश्च भाषसे' (2। 11)। धर्म की यह परिभाषा तो जहन्नुम में भेजे जाने की चीज है, उनने ऐसा समझ के ही अध्यात्म विवेचन से ही शुरू किया और अर्जुन को ललकारा। अर्जुन की गलती भी इसमें क्या कही जाए? जब धर्म-अधर्म के बारे में इसी प्रकार की मोटी बातें कही और लिखी जाती हैं और धर्म पालन के साथ ही 'अहिंसा परमोधर्म:' की दुहाई दी जाती है, तो उसका ऐसे मौके पर घपले में पड़ जाना अनिवार्य था। दरअसल कर्म का असली रूप और उसका दार्शनिक विश्लेषण न जानने के कारण ही तो धर्म-अधर्म और हिंसा-अहिंसा का यह घपला आ खड़ा होता है। इसलिए जरूरी हो गया कि वही विश्लेषण किया जाए। गीता ने यही किया भी। इससे तो साफ हो जाता है कि धर्म-अधर्म की सर्वसाधारण धारणा निहायत ही थोथी और ऐन मौके पर खतरनाक हो जाती है। अर्जुन को जो धोखा हुआ वह उसी के चलते। इसलिए आमतौर से जिसे लोग धर्म या अधर्म मानते हैं वह बच्चों की-सी बात हो जाती है। गीता ने यह बात दिखला दी है। वह धर्म ही क्या जिसके या जिसकी सर्वसाधारण समझ के चलते ऐन मौके पर, जब कि जीवन-मरण का संग्राम उपस्थित है, गड़बड़घोटाला हो जाए? धर्म को उस समय ठीक पथ-प्रदर्शन करना चाहिए। मगर वह तो उलटी गंगा बहाने लगता है! इसलिए धर्मशास्त्रियों की बातों को ताक पर रख के उसका नए सिरे से विवेचन और विश्लेषण जरूरी हो जाता है। यही जरूरत शुरू में ही बड़ी खूबी के साथ दिखा के गीता ने उसका नया विवेचन कर्म के ही दार्शनिक विश्लेषण (Philosophical analysis) के आधार पर किया है। क्योंकि इसके बिना दूसरा रास्ता हई नहीं।

यह भी तो देखिए कि जहाँ गीता में शुरू से लेकर अंत तक का कर्म का उल्लेख सैकड़ों बार कर्म शब्द से करने के अलावे कार्य, कर्तव्य, युद्ध, यज्ञ, यत्न, योग आदि शब्दों से किया है, तहाँ धर्म शब्द मुश्किल से किसी न किसी रूप में - अधर्म, धर्म्य, साधर्म्य के रूप में भी - सिर्फ तैंतीस बार आया है। खूबी तो यह है कि गीता के पहले श्लोक का धर्म तो नाम के साथ ही लगा है। वह कोई धर्म जैसी चीज को खास तौर से कहने के लिए नहीं आया है। कुरुक्षेत्र की प्रसिद्धि धर्मक्षेत्र के नाम से उस समय थी और यही बात श्लोक में भी आ गई! अठारहवें अध्याय के 70वें श्लोक में जो 'धर्म्य' शब्द है वह भी कुछ ऐसा ही है। वह तो केवल 'संवाद' का विशेषण होने से उसके औचित्य को ही बताता है। उसका कोई खास प्रयोजन नहीं है। चौदहवें अध्याय के दूसरे श्लोक के 'साधर्म्य' का धर्म शब्द भी दूसरे ही मानी में बोला गया है, न कि कर्तव्य के अर्थ में। वह तो समानता का ही सूचक है। दूसरे अध्याय के 40वें श्लोक का धर्म शब्द भी गीता के योग के ही अर्थ में आया है, न कि धर्मशास्त्रों के धर्म के मानो में। इसी प्रकार नौवें अध्याय के 2-3 श्लोकों में जो धर्म्य और धर्म शब्द आए हैं वह ज्ञान-विज्ञान के ही लिए आए हैं, न कि अपने खास मानी में। बारहवें के 20वें श्लोक का धर्म्य शब्द भी कुछ ऐसा ही है। वह समस्त अध्याय के प्रतिपादित विषय को ही कहता है। इसी प्रकार अठारहवें अध्याय के 46वें श्लोक में जो धर्म शब्द है उसी के अर्थ में उसी श्लोक में आगे कर्म शब्द आने के कारण वह भी संकुचित अर्थ में प्रयुक्त नहीं हुआ है। उसी अध्याय के 66वें श्लोक का धर्म शब्द भी व्यापक अर्थ में ही आया है और धर्म, अधर्म तथा दूसरे कर्मों का भी वाचक है। यह बात प्रसंगवश आगे कही जाएगी और इस पर विशेष प्रकाश पड़ेगा। यह ठीक है कि उस धर्म को कर्म की जगह पर प्रयोग नहीं किया है। क्योंकि ऐसा करना असंभव था। कहने का आशय यह है कि जितना व्यापक अर्थ कर्म शब्द का है उस अर्थ में वह धर्म शब्द नहीं आया है और इसकी वजह है जो प्रसंगवश लिखी जाएगी।

इस प्रकार देखने से पता चलता है कि पाँच से लेकर सत्रह अध्याय तक कुल तेरह अध्याय में यह धर्म आया ही नहीं है। हालाँकि इन्हीं में कर्म का दार्शनिक विवेचन खूब ही हुआ है। जिस समत्वरूप योग का वर्णन दूसरे अध्याय में पाया जाता है और जो कर्मों की कुंजी है वही पाँच, छह, नौ, बारह, तेरह और चौदह अधयायों में किसी न किसी रूप में आया ही है। सोलह और सत्रह अध्याय तो गीताधर्म की दृष्टि से काफी महत्त्व रखते हैं, यह पहले कही चुके हैं और विस्तार के साथ वह बात सिद्ध की जा चुकी भी है।

अब रहे सिर्फ पहले, दूसरे, तीसरे, चौथे और अठारहवें अध्याय। इन्हीं में धर्म शब्द कुल मिला के केवल चौबीस बार अपने विशेष मानी में प्रयुक्त हुआ मालूम पड़ता है। इसमें भी खूबी यह है कि पहले अध्याय के 40वें में तीन बार और तीसरे के 35वें में ही चार बार आया है। पहले के तैंतालीसवें में, दूसरे के बत्तीस-तैंतीस में, चौथे के सातवें में और अठारहवें के एकतीस-बत्तीस श्लोकों में दो-दो बार आ जाने के कारण कुल उन्नीस बार तो सिर्फ आठ ही श्लोकों में आया है। शेष 5वें श्लोकों में 5 बार। इनमें भी पहले अध्याय के 41 तथा 44वें, दूसरे के 7वें में, चौथे के 8वें में और अठारहवें के 34वें में - इस प्रकार एक-एक बार का बँटवारा है। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि कुछी जगहों में वह पाया जाता है। इसमें भी खूबी यह है कि पहले अध्याय में सात बार और दूसरे में एक - कुल आठ - बार तो खुद अर्जुन ने ही यह शब्द कहा है। फलत: वह तो गीता के सिद्धांत के भीतर यों ही नहीं आता है। हाँ, सत्रह बार जो कृष्ण ने कहा है उसी पर कुछ भरोसा कर सकते हैं।

मजा तो यह है कि दूसरे अध्याय के 31वें तथा 33वें श्लोकों में जो कुल चार बार धर्म शब्द कृष्ण ने कहा है वह अर्जुन के ही कथनानुसार धर्मशास्त्र वाला ही है, न कि कृष्ण का खास। वहाँ तो अर्जुन की ही बात के अनुसार ही उसे माकूल करते हैं। इसी प्रकार तीसरे अध्याय के 35वें में जो चार बार आया है वह ठीक वैसा ही है जैसा कि अठारहवें अध्याय के 47वें का। क्योंकि 'श्रेयान्स्वधर्मो विगुण: परधर्मात्स्वनुष्ठितात्' यह श्लोक का आधा ज्यों का त्यों दोनों ही जगह पूर्वार्द्ध में आया है। फलत: यदि अठारहवें अध्याय में धर्म का अर्थ कर्म ही है, तो तीसरे में भी यही बात है - होनी चाहिए। यह भी बात है कि तीसरे अध्याय के शुरू से लेकर इस श्लोक के पूर्व तक कर्म की ही बात लगातार आई है। उसकी शृंखला टूटी नहीं है। इसलिए धर्म शब्द भी कर्म के ही अर्थ में प्रयुक्त हुआ है यही मानना उचित है।

इस प्रकार देखने पर तो सिर्फ चौथे अध्याय के 7-8 तथा अठारहवें के 31-32 एवं 34 श्लोकों में जो धर्म शब्द कृष्ण के मुख से निकले हैं केवल वही, मालूम पड़ता है, धर्म के विशेष या पारिभाषिक अर्थ में आए हैं। मगर यहाँ भी कुछ बातें विचारणीय हैं। चौथे अध्याय में तो धर्म का उल्लेख अवतार के ही प्रसंग में हुआ है। वहाँ कहा गया है कि जब समाज में उपद्रव होने लगता है और दुष्टों की वृद्धि हो जाती है तो अवतारों की जरूरत होती है। ताकि भले लोगों की, सत्पुरुषों की रक्षा हो सके। अब यदि इस वर्णन की मिलान सोलहवें अध्याय के असुरों के आचरणों से करें और तुलसीदास के 'जब जब होइ धर्म की हानी। बाढ़हिं असुर महा अभिमानी' वचन को भी इस सिलसिले में खयाल करें, तो पता लग जाता है कि धर्म का मतलब यहाँ समाज-हितकारी समस्त आचरणों से ही है। जिन कामों से समाज का मंगल हो वही धर्म है, ऐसा ही अभिप्राय कृष्ण का प्रतीत होता है।

बेशक, सिर्फ अठारहवें अध्याय के 31-32 तथा 34 श्लोकों में यह बात जरूर मालूम होती है कि सामान्य कर्तव्य-अकर्तव्य से अलग धर्म-अधर्म हैं। 30वें श्लोक में प्रवृत्ति-निवृत्ति शब्दों से इन्हीं धर्म और अधर्म को कहा है। इसके सिवाय जिस प्रकार वहाँ कार्याकार्य - कार्य-अकार्य - अलग बताया गया है, न कि इन्हें धर्म-अधर्म - प्रवृत्ति-निवृत्ति - के ही भीतर ले लिया है, ठीक उसी प्रकार 31वें में भी अधर्म और धर्म तथा अकार्य एवं कार्य जुदा-जुदा लिखा है। इससे साफ हो जाता है कि सामान्य कार्य और अकार्य से अलग ही धर्म एवं अधर्म हैं - ये विशेष पदार्थ हैं । मगर जब 32वें श्लोक पर विशेष ध्यान देते हैं तो यह पहेली सुलझ जाती है और पता चल जाता है कि धर्म-अधर्म शब्द भी व्यापक अर्थ में ही आए हैं। पहले - 31वें - श्लोक में आम लोगों की धारणा के ही अनुसार इन्हें अलग रखा है जरूर। मगर यह बात विवरण के ही रूप में है, यह मानना ही पड़ेगा।

बात असल यह है कि सात्त्विक, राजस और तामस बुद्धियों की पहचान इन तीन - 30 से 32 - श्लोकों में बताई गई है। पहले में कहा गया है कि प्रवृत्ति-निवृत्ति या धर्म-अधर्म तथा कर्तव्य-अकर्तव्य को ठीक-ठीक बताना सात्त्विक बुद्धि का काम है। इसी से उसकी पहचान होती है। फिर भी 31वें में कहा गया है कि इन चीजों को जो ठीक-ठीक न बताए - कभी ठीक बताए और कभी नहीं - वही राजस बुद्धि है। उसकी यही पहचान है। यहाँ तक तो ठीक है। दोनों की पहचान में धर्म (प्रवृत्ति), अधर्म (निवृत्ति) तथा कार्य-अकार्य का उल्लेख आया है। मगर जब तामस बुद्धि का प्रसंग 32वें श्लोक में आया है तो कार्य-अकार्य को छोड़ के केवल धर्म और अधर्म का ही उल्लेख है और कहा गया है कि जो अधर्म को ही धर्म माने और इस प्रकार सभी बातें उलटी ही बताए वही तामसी बुद्धि है। यदि पहला क्रम रखते तो कहते कि जो अधर्म को धर्म और अकार्य को कार्य समझे वही तामसी बुद्धि है। क्योंकि उसका काम न तो ठीक-ठीक बताना है और न कुछ गड़बड़ करना, किंतु बिलकुल ही उलटा बताना। मगर यहाँ कार्य-अकार्य को छोड़ के केवल धर्म-अधर्म का ही उल्लेख यही बताता है कि इन्हीं के भीतर कार्य-अकार्य भी आ जाते हैं और ये शब्द व्यापक अर्थ में ही आए हैं। फलत: कार्य-अकार्य का पहले दो श्लोकों में उल्लेख यों ही विवरण के ही रूप में है। 34वें श्लोक का धर्म शब्द तो प्रचलित प्रणाली के ही अनुसार धर्म, अर्थ, काम में एक को कहता है और जब पहले ही उसका अर्थ ठीक हो गया तो यहाँ दूसरा क्या होगा?

इस प्रकार यह बात निर्विवाद हो गई कि गीता ने धर्म को कर्म, काम या अमल से भिन्न नहीं मान के दोनों को एक ही माना है - धर्म ही कर्म है और कर्म ही धर्म। अर्जुन ने जो दूसरे अध्याय के 7वें श्लोक में कहा है कि 'धर्म के बारे में कोई भी निश्चय न कर सकने के कारण ही आपसे सवाल कर रहा हूँ' - ''पृच्छामि त्वां धर्मसंमूढचेता:'', उसका भी मतलब कर्तव्य, कर्म या काम से ही है। इसीलिए तो उसे जो उत्तर दिया गया है उसमें कर्म के ही स्वरूप और उसके सभी पहलुओं का विवेचन किया गया है। यही तो खूबी है कि शुरू से लेकर अंत तक जो भी विवेचन किया गया है वह कर्म का ही है, न कि धर्म का। एक भी स्थान पर धर्म का उल्लेख करके विश्लेषण या विवेचन पाया जाता है नहीं। अर्जुन के प्रश्न के उत्तर में जो कुछ कहना शुरू हुआ है वह भी मरने-मारने और युद्ध करने की ही बात लेके। इन्हीं बातों को धर्म कहके शुरू करते तो भी एक बात थी। मगर वहाँ तो सीधे कौन मारता है, कौन मरता है आदि प्रश्न ही उठाए गए हैं और उन्हीं का उत्तर दिया गया है। युद्ध करो, तैयार हो जाओ, लड़ने का निश्चय कर लो, आदि के ही रूप में बार-बार उपसंहार किया गया है, न कि धर्म करो, ये धर्म हैं, इसलिए इन्हें करो, आदि के रूप में। खूबी तो यह है कि यह सभी बातें स्वतंत्र रूप से कहके आगे 31-33 श्लोकों में यह भी बात कहते हैं कि धर्मबुद्धि से भी यही काम कर सकते हो - यह युद्ध और मरने-मारने का काम धर्म समझ के भी करना ही होगा। इससे तो साफ है कि पहले धर्म समझ के इन्हें करने पर जोर नहीं देके कर्तव्यबुद्धि या विवेकबुद्धि से ही इन्हें करने को कहा गया है।

इस प्रकार सभी कामों को धर्म के भीतर डाल देने का मतलब यह हो जाता है कि धर्म बहुत बड़ा एवं व्यापक बन जाता है और उसका सर्वजनप्रसिद्ध संकुचित रूप जाता रहता है। फलत: लोगों में जो धर्माचरण की प्रवृत्ति आमतौर से पाई जाती है उससे काफी फायदा उठाके सभी समाजोपयोगी कामों को उसी व्यापक एवं उदार बुद्धि से धर्म समझ के ही कराया जा सकता है। गीता के इस ढंग से कर्तव्य के संसार में बहुत बड़ा लाभ हो जाता है।

मगर दूसरा और असली महत्त्वपूर्ण लाभ इससे यह होता है कि धर्म के नाम पर धर्मशास्त्रों, धर्मशास्त्रियों तथा धर्माचार्यों का जो नाहक का नियंत्रण लोगों की समझ और उनके कामों पर रहा करता है वह खत्म हो जाता है। जब धर्म अत्यंत व्यापक बन जाता है, जब सभी काम उसमें आ जाते हैं तब धर्म के ठेकेदारों की गुंजाइश रही कहाँ जाती है? जब तक कोई खास चीज और कुछ चुनी-चुनाई बातें न हों तब तक उन्हें पूछे कौन? जीवन के हरेक काम में कौन किससे पूछने जाता है? किस धर्माचार्य की जरूरत इस बात के लिए होती है कि हम कैसे आगे-पीछे पाँव दें, कैसे साँस लें, कैसे खाने में मुँह चलाएँ, कैसे दाँतों से अन्न को खूब चबाएँ, कैसे कपड़े पहनें, आदि-आदि? ये बातें पूछना असंभव भी तो है। हाँ, स्वास्थ्यशास्त्रों और ऐसी ही दूसरी पोथियों की सहायता से इन्हें भले ही जान ले सकते हैं। मगर ऐसा तो नहीं होगा कि साल में एक या दो-चार गुरु और पीर या पंडित-पुरोहित इन्हीं के लिए खास तौर से आया करेंगे और 'पूजा' लिया करेंगे, ठीक जैसे एकादशी, रोजा आदि के सिलसिले में आते ही रहते हैं। तब तो रोजा, नमाज, संध्या, पूजा वगैरह भी साँस लेने आदि की ही श्रेणी में आ जाएँगे और वहाँ से भी धर्मध्वजियों की बेदखली होई जाएगी, चाहे देर से हो या सवेरे।

तीसरी बात यह होगी कि जब हरेक बात को धर्म के फंदे से निकाल के व्यावहारिक और सामाजिक दुनिया में ला देंगे तो उसके भले-बुरे पर जाँच स्वर्ग और नरक की दृष्टि से न करके देखेंगे कि इससे अपना और समाज का भौतिक लाभ क्या है, इससे सामाजिक, वैज्ञानिक या सांस्कृतिक विकास में कहाँ तक फायदा पहुँचता है, समाज के स्वास्थ्य की उन्नति इससे कहाँ तक होती है। बिना इस व्यावहारिक दृष्टि के ही तो सब गुड़ गोबर हो रहा है। नहाने में भी जब धर्म की बात घुसती है तो उससे शरीर या वस्त्रादि की स्वच्छता न देख के स्वर्ग-नरक को ही देखने लगते हैं! जैसे ऊँट की नजर हमेशा पश्चिम के रेगिस्तान की तरफ होती है, ऐसा कहा जाता है, ठीक उसी तरह हमें हर काम में ठेठ स्वर्ग, बैकुंठ या नरक ही सूझता है। इस पतन का कोई ठिकाना है! इस अंधी धर्मबुद्धि ने हमें - मानव समाज को - निरा भोंदू और बुद्धिहीन बना डाला है, मशीन करार दे दिया है! गीता का यह रास्ता इस बला से हमारा निस्तार कर देता है और हमें आदमी बना देता है।

चौथी और आखिरी बात यह होती है कि कर्म भले हैं या बुरे, इनके करते हम नरक में जाएँगे या स्वर्ग में आदि बातों और प्रश्नों का भी निर्णय जो अब तक पंडितों एवं मौलवी लोगों के हाथों में रहा है उसे गीता इस प्रकार उनसे छीन लेती और इन्हें ऐसी कसौटी पर कसती है जो सर्वत्र सुलभ हो, जिसे हम खुद हासिल कर सकते हैं, यदि चाहें। अब तक तो धर्म के नाम पर फैसला करने वाले पंडित आदि ही थे। मगर अब जब धर्म हो गया कर्म और कर्म के जाँचने की एक दूसरी ही कसौटी गीता ने तैयार कर दी, जो दूसरे के पास न होके हरेक आदमी के पास अपनी-अपनी अलग होती है, तो फिर पंडितों और मौलवियों को कौन पूछे? यह भी नहीं कि दूसरे की कसौटी - गैर की तराजू - दूसरे के काम आए। यहाँ तो अपनी-अपनी ही बात है। यहाँ 'अपनी-अपनी डफली, अपनी-अपनी गीत' है। फलत: परमुखापेक्षिता के लिए स्थान रही नहीं जाता। सोलह आना स्वावलंबन ही उसकी जगह ले लेता है। तब धर्म के नाम पर झमेले और झगड़े भी क्यों होंगे?

गीता में समता या साम्यवाद की भी बात है और उसे लेके बहुत लोग मार्क्सवादी साम्यवाद को खरी-खोटी सुनाने लगते हैं। उनके जानते मार्क्स का साम्यवाद भौतिक होने के कारण हलके दर्जे का है, तुच्छ है गीता के आध्यात्मिक साम्यवाद के मुकाबिले में। वह तो यह भी कहते हैं कि हमारा देश धर्मप्रधान एवं धर्मप्राण होने के कारण भौतिक साम्यवाद के निकट भी न जाएगा। यह तो आध्यात्मिक साम्यवाद को ही पसंद करेगा। असल में इस युग में जो साम्यवाद की हवा बह निकली है उसी से घबरा के यह बातें उसी के जवाब में कही जाती हैं। उस तरह की दूसरी चीज न रहने पर तो लोग खामख्वाह उधर ही झुकेंगे। इसीलिए गीता की यह बात लोगों के सामने ला खड़ी कर दी जाती है, ताकि स्वभावत: लोग इधर ही आकृष्ट हों और दूसरे साम्यवाद का खतरा न रह जाए। खूबी तो यह है कि जिन्हें अध्यात्मवाद से लाख कोस दूर रहना है वह भी गीता की यही बात रटते फिरते हैं! उनके स्थाई स्वार्थों को भौतिक साम्यवाद से बहुत बड़ा खतरा होने के कारण ही वे गीता का नाम लेके टट्टी की ओट से शिकार खेलते हैं। हर हालत में इस चीज पर प्रकाश डालना जरूरी है।

असल में गीता में प्राय: बीस जगह या तो सम शब्द का प्रयोग मिलता है या उसी के मानी में तुल्य जैसे शब्द का प्रयोग। दूसरे अध्यायय के 38वें तथा 48वें, चौथे के 22वें, पाँचवें के 18-19वें, छठे के 8, 9, 13, 29, 32, 33वें, नवें के 29वें, बारहवें के 13, 18वें, तेरहवें के 9, 27, 28वें, चौदहवें के 24वें तथा अठारहवें के 54वें श्लोकों में सम, समत्व या साम्य शब्द आया है। किसी-किसी श्लोक में दो बार भी आया है। चौदहवें के 24वें श्लोक में सम के साथ ही तुल्य शब्द भी आया है और 25वें में सिर्फ तुल्य शब्द ही दो बार मिलता है। इनमें केवल छठे के 13वें श्लोक वाला सम शब्द 'सीधा' (Straight) के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। इसलिए उसका साम्यवाद से कोई भी ताल्लुक नहीं है। शेष सम शब्दों या उन्हीं के अर्थ में प्रयुक्त तुल्य शब्दों का साम्यवाद से संबंध जरूर जुट जाता है। यदि असक्त, अनासक्त, परित्यागी या परित्याग आदि शब्दों को, जो सम के ही अर्थ में - उसी अभिप्राय से ही - प्रयुक्त हुए हैं, भी इसी सिलसिले में गिन लें; तब तो गीता के अंग-प्रत्यंग में यह बात पाई जाती है, यही मानना पड़ेगा। कर्म के विश्लेषण और इस समत्व या साम्यवाद का ऐसा संबंध है कि दोनों एक दूसरे के बिना रही नहीं सकते।

अब देखना है कि गीता की यह समता, उसका यह समत्व, समदर्शन या साम्यवाद है क्या चीज। जब तक उसकी असलियत और रूपरेखा का ही पता हमें न हो उसकी तुलना भौतिक साम्यवाद के साथ कर कैसे सकते हैं? तब तक हमें यह भी कैसे पता लग सकता है कि कौन भला, कौन बुरा है? यदि भला या बुरा है तो भी किस दृष्टि से, यह भी तो तभी जान सकते हैं। हरेक चीज हर दृष्टि से तो कभी भी अच्छी या बुरी होती नहीं। आखिर पदार्थों के पहलू तो होते ही हैं और उन्हें हर पहलू से अलग-अलग देखना जरूरी हो जाता है, यदि किसी और के साथ मिलान या तुलना करना हो। यही कारण है कि गीता के समदर्शन या साम्यवाद के हर पहलू पर प्रकाश डालना और विचार करना आवश्यक है।

जैसा कि पहले भी कहा गया है, गीता का साम्यवाद, समदर्शन, समत्वबुद्धि या साम्ययोग तो दिल-दिमाग की ही दशा विशेष है। दरअसल यूरोप में हीगेल आदि दार्शनिकों ने जिस विचारवाद या आइडियलिज्म (Idealism) को प्रश्रय दिया और उसका समर्थन किया है वह बहुत कुछ गीता के समदर्शन से मिलता-जुलता है। यह भी नहीं कि यह कोरी मानसिक अवस्था विशेष है जिसे ज्ञान की एक विलक्षण कोटि या दशा कह सकते हैं। निस्संदेह पाँचवें अध्याय के 18-19 - दो - श्लोकों में जो कुछ कहा है वह तो दर्शन या ज्ञानात्मक ही है। क्योंकि वहाँ साफ ही लिखा है कि पंडित लोग समदर्शी होते या सम नाम की चीज को ही देखते हैं, 'पंडिता: समदर्शिन:', 'साम्ये स्थितं मन:।' छठे अध्याय के 8-9 श्लोकों में भी 'समलोष्ठाश्मकांचन:', 'समबुद्धिर्विशिष्यते' के द्वारा कुछ ऐसा ही कहा है। हालाँकि 'समलोष्ठाश्मकांचन:' का व्यापक भाव माना जाता है जो आगे बताया जाएगा। यही बात उस अध्याय के 32-33 श्लोकों में भी है। क्योंकि 32वें में 'समं पश्यति' लिखा गया है और उसी का उल्लेख 33वें में है। यद्यपि तेरहवें अध्याय के 9वें श्लोक में यह बात इतनी स्पष्ट नहीं है और उसका दूसरा आशय भी संभव है; तथापि 27-28 दो श्लोकों में 'पश्यति' एवं 'पश्यन्' शब्दों के द्वारा उसे ज्ञान ही बताया है। बस।

इसका आशय यह है कि जिस तरह स्वाँग बनानेवाले की बाहरी वेशभूषा के रहते हुए भी समझदार आदमी उससे धोखे में नहीं पड़ता है; किंतु असली आदमी को पहचानता और देखता रहता है; ठीक यही बात यहाँ भी है। संसार के पदार्थों का जो बाहरी रूप नजर आता है उसे विवेकी या गीता का योगी एकमात्र नट, नर्त्तक या स्वाँग बनानेवाले की बाहरी वेशभूषा ही मानता है। इसलिए इन सभी बाहरी आकारों के भीतर या पीछे किसी ऐसी अखंड, एकरस, निर्विकार - सम - वस्तु को देखता है जो उसकी अपनी आत्मा या ब्रह्म ही है। उसे समस्त दृश्य भौतिक संसार उसी आत्मा या ब्रह्म की नटलीला मात्र ही बराबर दीखता है। वह तो इस नटलीला की ओर भी दृष्टि न करके उसी सम या एक रस पदार्थ को ही देखता है वह जो बाहरी परदा या नकाब है उसे वह उतार फेंकता है और परदानशीन या नकाबपोश को हू-ब-हू देखता रहता है।

नरसी मेहता एक ज्ञानी भक्त हो गए हैं। उनकी कथा बहुत प्रसिद्ध है। कहते हैं कि वह एक बार कहीं से आटा और घी माँग लाये। फिर घी को अलग किसी पात्र में रख के कुछ दूर पानी के पास आटा गूँध के रोटी पकाने लगे। जब रोटी तैयार हो गई तो सोचा कि घी लगा के भगवान को भोग लगाऊँ और यज्ञशिष्ट या प्रसाद स्वयं ग्रहण करूँ। बेशक, आजकल के नकली भक्तों की तरह ठाकुरजी की मूर्ति तो वह साथ में बाँधे फिरते न थे। वे थे तो बहुत पहुँचे हुए मस्तराम। उनके भगवान तो सभी जगह मौजूद थे। खैर, उनने रोटियाँ रख के घी की ओर पाँव बढ़ाया और उसे लेके जो उलटे पाँव लौटे तो देखा के एक कुत्ता रोटियाँ लिए भागा जा रहा है! फिर क्या था? कुत्ते के पीछे दौड़ पड़े। कुत्ता भागा जा रहा है बेतहाशा और नरसी उसके पीछे-पीछे हाथ में घी लिए आरजूमिन्नत करते हुए हाँफते-हाँफते दौड़े जा रहे हैं कि महाराज रूखी रोटियाँ गले में अटकेंगी। जरा घी तो लगा देने दीजिए! मुझे क्या मालूम कि आप इतने भूखे हैं कि घी लगाने भर की इंतजार भी बरदाश्त नहीं कर सकते। यदि मुझे ऐसा पता होता तो और सवेरे ही रोटियाँ बना लेता! अपराधा क्षमा हो! अब आगे ऐसी गलती न होगी! कृपया रुक जाइये, आदि-आदि। बहुत दौड़-धूप के बाद तब कहीं कुत्ता रुका और नरसी ने भगवान के चरण पकड़े!

नरसी को तो असल में कुत्ता नजर आता न था। कुत्ते की शकल तो बाहरी नकाब थी, ऊपरी परदा था। वह तो नकाब को फाड़ के उसके भीतर अपने भगवान को ही देखते थे। उनकी आँखें तो दूसरी चीज देख पाती न थीं। उनके लिए सर्वत्र सम ही सम था, सर्वत्र उनकी आत्मा ही आत्मा थी, ब्रह्म ही ब्रह्म था। नटलीला का परदा वह भूल चुके थे - देखते ही न थे। यदि किसी वैज्ञानिक के सामने पानी लाइये तो वह उसमें और ही कुछ देखता है। उसकी दूरदर्शी एवं भीतर घुसनेवाली - परदा फाड़ डालनेवाली आँखें उसमें सिवाय ऑक्सीजन और हाइड्रोजन (Oxygen and Hydrogen) नामक दो हवाओं की खास मात्राओं के और कुछ नहीं देखती हैं, हालाँकि सर्वसाधारण की नजरों में वह सिर्फ पानी है, दूसरा कुछ नहीं। वैज्ञानिक की भी स्थूल दृष्टि पानी देखती है, यदि उसे वह मौका दे। नहीं तो वह भी देख नहीं पाती। मगर सूक्ष्म दृष्टि - और वही यथार्थ दृष्टि है - तो उस दृश्य जल को न देख अदृश्य वायुवों को ही देखती है। यही दशा नरसी की थी। यही दशा गीता के योगी या समदर्शी की भी समझिए।

यदि नौ मन बालू के भीतर दो-चार दाने चीनी के मिला दिए जाएँ तो हमारी तेज से तेज आँखें भी उनका पता लगा न सकेंगी, चाहे हम हजार कोशिश करें। मगर चींटी? वह तो खामख्वाह ढूँढ़-ढाँढ़ के उन दानों तक पहुँची जाएगी। उसे कोई रोक नहीं सकता। समदर्शी भक्तों की भी यही दशा होती है। जिस प्रकार चींटी की लगन तथा नाक तेज और सच्ची होने के कारण ही वह चीनी के दानों तक अवश्य पहुँचती और उनसे जा मिलती है; बालू का समूह जो उन दानों और चींटी के बीच में पड़ा है उसका कुछ कर नहीं सकता; ठीक वही बात ज्ञानी एवं समदर्शी प्रेमीजनों की होती है। उनके और भगवान के बीच में खड़े ये स्थूल पदार्थ हर्गिज उन्हें रोक नहीं सकते। शायद किसी विशेष ढंग का एक्सरे (X-ray) या खुर्दबीन उन्हें प्राप्त हो जाता है। फिर तो शत्रु-मित्र, मिट्टी-पत्थर, सोना, सुख-दु:ख, मानापमान आदि सभी चीजों के भीतर उन्हें केवल सम ही सम नजर आता है। परदा हट जो गया, नकाब फट जो गई है। यही है गीता के साम्यवाद के समदर्शन का पहलू और यही है उस ज्ञान की दशाविशेष।
मगर यह तो एक पहलू हुआ। मन या बुद्धि का पदार्थों के साथ संबंध होने पर भी उनके बाहरी या भौतिक आकार एवं रूप की छाप उन पर लगने न पाए और ये इन पदार्थों के इन दृश्य आकारों एवं रूपों से अछूते रह जाएँ, यह तो समदर्शन या गीता के साम्यवाद का केवल एक पहलू हुआ। उसका दूसरा पहलू तो अभी बाकी ही है और गीता ने उस पर काफी जोर दिया है। वही तो आखिरी और असली चीज है। इस पहले पहलू का वही तो नतीजा है और यदि वही न हो तो अंततोगत्वा यह एक प्रकार से या तो बेकार हो जाता है या परिश्रम के द्वारा उस दूसरे को संपादन करने में प्रेरक एवं सहायक होता है। यही कारण है कि गीता में पहले की अपेक्षा उसी पर अधिक ध्यान दिया गया है।

बात यों होती है कि मन का भौतिक पदार्थों से संसर्ग होते ही उनकी मुहर उस पर लग जाती है, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार फोटोग्राफी में फोटोवाली पटरी या शीशे पर सामने वाले पदार्थों की। सहसा देखने से यह पता नहीं चलता कि सचमुच उस शीशे पर सामने की वस्तु की छाप लगी है; हालाँकि वह होती है जरूर। इसीलिए तो उसे स्पष्ट करने के लिए पीछे यत्न करना पड़ता है। मन या बुद्धि पर भी लगी हुई पदार्थों की छाप प्रतीत नहीं होती। क्योंकि वे तो अदृश्य हैं - अत्यंत सूक्ष्म हैं। मन या बुद्धि को देख तो सकते नहीं। उनका काम है पदार्थों की छाप या प्रतिबिंब लेके बाहर का अपना काम खत्म कर देना और भीतर लौट आना।

मगर भीतर आने पर ही तो गड़बड़ पैदा होती है। मन ने बाहर जाके पदार्थों को प्रकट कर दिया - जो चीजें अज्ञान के अंधकार में पड़ी थीं उन्हें ज्ञान के प्रकाश में ला दिया। अब उन चीजों की बारी आई। उनकी छाप के साथ जब मनीराम (मन) भीतर घुसे तो उन पदार्थों ने अब अपना तमाशा और करिश्मा दिखाना शुरू किया। जहाँ पहले भीतर शांति-सी विराज रही थी, तहाँ अब ऊधम और बेचैनी - उथल-पुथल - शुरू हो गई! मालूम होता है, जैसे बिरनी के छत्ते में किसी ने कोई चीज घुसेड़ दी और पहले जो वे भीतर चुपचाप पड़ी थीं भनभना के बाहर निकल आईं। किसी छूतवाली या संक्रामक बीमारी को लेके जब कोई किसी घर या समाज में घुसता है तो एक प्रकार का आतंक छा जाता है, चारों ओर परेशानी छा जाती है और वह छूत की बीमारी जानें कितनों को तबाह करती है। मन पर अपनी मुहर लगा के जब भौतिक पदार्थ उसी रूप में मन के साथ भीतर - शरीर में - घुसते हैं तो ठीक संक्रामक रोग की-सी बात हो जाती है और भीतर की शांति भंग हो जाती है। वह मन अंग-प्रत्यंग में अपनी उस छाप का असर डालता है। या यों कहिए कि मन के द्वारा बाहरी भौतिक पदार्थ ही ऐसा करते हैं। फलत: हृदय या दिल पूर्ण रूप से प्रभावित हो जाता है। दिल का काम तो खोद-विनोद करना या जानना है नहीं। वह तो ऊँट की पकड़ पकड़ता है। जब उस पर भौतिक पदार्थों का प्रभाव इस प्रकार हुआ तो वह उन्हें जैसे का तैसा पकड़ लेता और परेशान होता है। यदि उसमें विवेक शक्ति होती तो उनसे भाग जाता। मगर सो तो है नहीं, और जिस मन और बुद्धि में यह शक्ति है उनने तो खुद ही यह काम किया है - बाहरी पदार्थों के भीतर पहुँचाया है, या कम से कम उनके कीटाणुओं को ही। फिर हो क्या?

पहले भी कहा जा चुका है कि भौतिक पदार्थ खुद कुछ कर नहीं सकते - ये बुरा-भला कर नहीं सकते, सुख-दु:ख दे नहीं सकते। किंतु मन में जो उनका रूप बन जाता है वही सुख-दु:खादि का कारण होता है। इस बात का विशेष रूप से विवरण ऊपर की पंक्तियों से हो जाता है। जब मन पर भौतिक पदार्थों की छाप पड़ती है तो उसमें एक खास बात पाई जाती है। पहले भी कहा जा चुका है कि उदासीन या लापरवाह आदमी को ये पदार्थ बुरे-भले नहीं लगते। क्योंकि उसके मन पर इनकी मुहर लग पाती नहीं। उनका मन बेलाग जो होता है। जिनके मन में लाग होती है, जिसे लस बोलते हैं, उन्हीं की यह दशा होती है। इसी लाग को गीता ने रस कहा है 'रसवर्जं रसोऽप्यस्य' (2। 59) श्लोक में। राग-द्वेष या काम, क्रोध के नाम से भी इसी चीज को बार-बार याद किया है। यही लाग या रागद्वेष - रस - सब तूफानों का मूल है। यदि यह न हो तो सारी बला खत्म हो जाए। गीता ने इस रस को खत्म करने पर इसीलिए काफी जोर भी दिया है।

अब हालत यह होती है कि भौतिक पदार्थों के इस प्रकार भीतर पहुँचते ही मैं, मेरा, तू, तेरा, अपना-पराया, शत्रु-मित्र, हित-अहित, अहंता-ममता आदि का जमघट लग जाता है - भीतर इनका बाजार गर्म हो जाता है। जैसे मांस का टुकड़ा देखते ही, उसकी गंध पाते ही गीध, चील, कौवे आदि रक्तपिपासु पक्षियों की भीड़ लग जाती है और वे इर्द-गिर्द-मँडराने लगते हैं; ठीक वही बात यहाँ भी हो जाती है। मैं-तू, मेरा-तेरा, शत्रु-मित्र आदि जो जोड़े हैं - द्वन्द्व हैं - वे जम के एक प्रकार का आपसी युद्ध - एक तरह की कुश्ती - मचा देते हैं और कोई किसी की सुनता नहीं। ये द्वन्द्व होते हैं बड़े ही खतरनाक। ये तो फौरन ही आपस में हाथापाई शुरू कर देते हैं। पहलवानों की कुश्ती में जैसे अखाड़े की धूल उड़ जाती है इनकी कुश्ती में ठीक उसी प्रकार मनुष्य के दिल की दुर्दशा हो जाती है, एक भी फजीती बाकी नहीं रहती। फिर तो सारे तूफान शुरू होते हैं। इसी के बाद बाहरी लड़ाई-झगड़े जारी हो जाते हैं, हाय-हाय मच जाती है। बाहर के झगड़े-झमेले इसी भीतरी कुश्तम-कुश्ता के ही परिणाम हैं। नतीजा यह होता है कि मनुष्य का जीवन दु:खमय हो जाता है। क्योंकि इन भीतरी कशमकशों का न कभी अंत होता है और न बाहरी शांति मिलती है। भीतर शांति हो तब न बाहर होगी?

गीता के आध्यात्मिक साम्यवाद की आवश्यकता यहीं पर होती है। वह इसी भीतरी कशमकश और महाभारत को मिटा देता है, ताकि बाहर का भी महायुद्ध अपने आप मिट जाए। ज्योंही मन बाहरी पदार्थों की छूत भीतर लाए या लाने की कोशिश करे, त्योंही उसका दरवाजा बंद कर देना यही उस साम्यवाद का दूसरा पहलू है। इसके दोई उपाय हैं। या तो मन में भौतिक पदार्थों की छूत लगने पाए ही न, जैसा कि समदर्शन वाले पहलू के निरूपण के सिलसिले में कहा जा चुका है। तब तो सारी झंझट ही खत्म हो जाती है। और अगर लगने पाए भी, तो भीतर घुसते ही मन को ऐसी ऊँची सतह या भूमिका में पहुँचा दें कि वह अकेला पड़ जाए और कुछ करी न सके; जिस प्रकार छूतवाले को दूर के स्थान में अलग रखते हैं जब तक उसकी छूत मिट न जाए। मन को ध्यान, धारणा या चिंतन की ऐसी ऊँची एवं एकांत अट्टालिका में चढ़ा देते हैं कि वह और चीजें देख सकता ही नहीं। अगर उसे किसी चीज में फँसा दें तो दूसरी को देखेगा ही नहीं। उसका तो स्वभाव ही है एक समय एक ही में फँसना। कहते हैं कि ब्रज में गोपियों को जब ऊधव ने ज्ञान और निराकार भगवान के ध्यान का उपदेश दिया तो उनने चट उत्तर दे दिया कि मन तो एक ही है और वह चला गया है कृष्ण के साथ। फिर ध्यान किससे किया जाए? 'इक मन रह्यो सो गयो स्याम संग कौन भजै जगदीस?' यही बात यहाँ हो जाती है और सारी बला जाती रहती है।

दूसरा उपाय मन की मस्ती है, पागलपन है, नशा है। चौबीसों घंटे बेहोश बनी रहती है। जिसे प्रेम का प्याला या शौक की शराब कहा है उसी का नशा दिन-रात बना रहता है। बाहरी संसार का खयाल कभी आता ही नहीं। असल में तो यह बात होती है हृदय में, दिल में। यह मस्ती मन का काम न होके दिल की ही चीज है। मन तो बड़ा ही नीच है, लंपट है। उसे तो किसी चीज में जबर्दस्ती बाँध रखना होता है। मगर दिल तो गंगा की धारा है, बहता दरिया है जिसका जल निर्मल है। उसी में यह मस्ती आती है, यह पागलपन होता है, यह नशा रहता है और वही मन को मजबूर कर देता है कि चुपचाप बैठ जाए, नटखटी या शैतानियत न करे। इसीलिए इसे मन की भी मस्ती कहा करते हैं। खतरनाक फोड़े के चीरने-फाड़ने के समय डॉक्टर लोग मनुष्य को क्लोरोफार्म के प्रभाव से बेहोश कर देते हैं; ताकि उसे चीर-फाड़ का पता ही न चले। उसका मन कहीं जाता नहीं - किसी चीज में बँधा जाता नहीं। किंतु निश्चेष्ट और निष्क्रिय हो जाता है, उसकी सारी हरकतें बंद हो जाती हैं, जैसे मुर्दा हो गया हो। यही बात मस्ती की दशा में भी मन की होती है। जब दिल अपने रंग में आता है और प्रेम के प्याले में लिपट जाता है तो गोया मन को क्लोरोफार्म दे दिया और वह मुर्दा बन जाता है। फिर तो कुछ भी कर नहीं सकता। दिल की इसी दशा को साम्यावस्था या साम्ययोग कहते हैं। मन की छूत का ऐसी दशा में न दिल पर असर होता है और न आगे वाला तूफान चालू होता है। जब डंक का ही असर न हो तो हायतोबा, चिल्लाहट और रोने-धोने या मरने का सवाल ही कहाँ?

इस दशा में भीतर की शांति ज्यों कि त्यों अखंड बनी रह जाती है। हृदय की गंभीरता (Serenity) नहीं टूटती और कोई खलबली मचने पाती नहीं। जब बाहरी चीजों का उस पर असर होता ही नहीं तो शांतिभंग हो कैसे? चट्टान से टकरा के जैसे लहरें लौट जाती हैं; छिन्न-भिन्न हो जाती हैं, ठीक यही हालत मन के द्वारा भीतर आनेवाले भौतिक पदार्थों की होती है। वे कुछ कर पाते नहीं। फलत: अपने-पराए, शत्रु-मित्र, हानि-लाभ, बुरे-भले का द्वन्द्व भीतर हो पाता नहीं। वहाँ तो सभी चीजें एक-सी ही रह जाती हैं। जब उनका असर ही नहीं हो पाता तो क्या कहा जाए कि कैसी हैं? इसीलिए उन्हें एक-सी कहते हैं। वे खुद एक-सी बन तो जाती हैं नहीं। मगर जब उनकी विभिन्नता का, उनके भले-बुरेपन का अनुभव होता ही नहीं तो, उन्हें समान, सम या तुल्य कहने में हर्ज हई क्या? यही बात गीता ने भी कही है। और जब भीतर असर हुआ ही नहीं तो बाहरी महाभारत की तो जड़ ही कट गई। वह तो भीतरी घमासान का ही प्रतिबिंब होता है न?

दूसरे अध्याय में सुख-दु:खादि परस्पर विरोधी जोड़ों - द्वन्द्वों - को सम करने की जो बात 'सुखदु:खे समेकृत्वा' (2। 38) आदि के जरिए कही गई है और 'सिद्धयसिद्धयो: समो भूत्वा' (2। 48) में जो काम के बनने-बिगड़ने में एकरस - लापरवाह - बने रहने की बात कही गई है, वह यही मस्ती है। चौथे अध्याय के 'सम: सिद्धावसिद्धौ च' (22) में भी यही चीज पाई जाती है। छठे के 'लोहा, पत्थर, सोना को समान समझता है' - 'समलोष्ठाश्मकांचन:' (8) का भी यही अभिप्राय है। नवें में जो यह कहा है कि 'मैं तो सबके लिए समान हूँ, न मेरा शत्रु है न मित्र' - 'समोऽहंसर्वभूतेषु न मे द्वेषयोऽस्ति न प्रिय:' (29) वह भी इसी का चित्रण है। बारहवें में जो 'अहंता-ममता से शून्य, क्षमाशील और सुख-दु:ख में एकरस' - 'निर्ममो निरहंकार: सम-दु:खसुख: क्षमी' (13), कहा है तथा जो 'शत्रु-मित्र, मान-अपमान, शीत-उष्ण, सुख-दु:ख में एक-सा लापरवाह रहे और किसी चीज में चिपके नहीं' - "सम: शत्रौ च मित्रो च तथा मानापमानयो:। शीतोष्णसुखदु:खेषु सम: संगविवर्जित:" (18) कहा है, वह इसी चीज का विवरण है। चौदहवें के 24-25 श्लोकों में 'समदु:खसुख: स्वस्थ:' आदि जो कुछ कहा है वह भी यही चीज है। यहाँ जो 'स्वस्थ:' कहा है उसका अर्थ है 'अपने आपमें स्थिर रह जाना।' यह उसी मस्ती या पागलपन की दशा की ही तरफ इशारा है। अठारहवें अध्याय के 54वें श्लोक में भी इसी बात का एक स्वरूप खड़ा कर दिया है 'ब्रह्मभूत: प्रसन्नात्मा' आदि शब्दों के द्वारा। यों तो जगह-जगह यही बात कही गई है; हालाँकि सर्वत्र सम शब्द नहीं पाया जाता।

जनसाधारण को यह सुन के आश्चर्य होगा कि यह क्या बात है कि जो परले दर्जे का तत्त्वज्ञानी हो वही पागल भी हो और बाहरी सुध-बुध रखे ही न। मगर बात तो ऐसी ही है। वामदेव, जड़भरत आदि की ऐसी बातें बराबर कही जाती हैं भी, यही नहीं कि हिंदुओं के ही यहाँ यह चीज पाई जाती है, या गीता ने ही यही बात 'या निशा सर्वभूतानां' (2। 69) में कही है, या सुरेश्वराचार्य ने अपने वार्त्तिक में खुल के कह दिया है कि 'बुद्धतत्त्वस्य लोकोऽयं जड़ोन्मत्तपिशाचवत्। बुद्धतत्तवोऽपि लोकस्य जड़ोन्मत्तपिशाचवत्' - ''पहुँचे हुए तत्त्वज्ञानी की नजरों में यह सारी दुनिया जड़, पागल और पिशाच जैसी है और दुनिया की नजरों में वह भी ऐसा ही है।' किंतु प्राचीनतम ग्रीक विद्वान अरिस्टाटिल (अरस्तू) ने भी प्राय: ढाई हजार साल पूर्व यही बात अपनी पुस्तक 'जीवन की बुद्धिमत्ता' (Wisdom of life) में यों कही है :-

'Men distinguished in philosophy, politics, poetry or art appear to be all of a melancholy temperament.' (page. 19)

'By a diligent search in lunatic asylums I have found individual cases of patients who were unquestionably endowed with great talents, and whose genius distinctly appeared through their madness' (I, 247).

'जिन लोगों ने दर्शन, राजनीति, कविता या कला में विशेषज्ञता प्राप्त की है उन सबों का ही स्वभाव कुछ मनहूस जैसा रहा है।' 'पागलखानों में यत्नपूर्वक अंवेषण करने पर हमने ऐसे भी पागल पाए हैं जिनका दिमाग निस्संदेह आले दर्जे का था और पागलपन की दशा में भी उनकी चमत्कारशील प्रतिभा साफ झलकती थी।' पश्चिमी दर्शनों का इतिहास का लेखक दुरान्ती (Duranti) भी लिखता है कि 'The direct connection of madness and genius is established by the biographics of great men, such as Rousseau, Byron, Alfieri etc.'

'पागलपन और प्रतिभा का सीधा संबंध स्थापित हो जाता है यदि हम रूसो, बायरन, आलफीरी जैसे महापुरुषों की जीवनियाँ गौर से पढ़ें।'

बेशक, इस जमाने में यह बात ताज्जुब की मालूम होगी चाहे हजार पुराने दृष्टांत दिए जाएँ, या महापुरुषों के वचन उद्धृत किए जाएँ। आज तो ऐसे लोग नजर आते ही नहीं। जीते-जी सदा के लिए हमारी माया-ममता मिट जाए और हम किसी को भी शत्रु-मित्र न समझें, यह बात तो इस संसार में इस समय अचंभे की चीज जरूर है। गीता ने इस पर मुहर दी है अवश्य। मगर इससे क्या? दिमाग में भी तो आखिर बात आए। ज्यों-ज्यों सभ्यता का विकास होता जाता है, मालूम होता है, यह बात भी त्यों-त्यों दूर पड़ती और असंभव-सी होती जाती है। असल में दिन पर दिन हम इतना ज्यादा भौतिक पदार्थों में लिपटते जाते हैं कि कोई हद नहीं। इसीलिए यह बात असंभव हो गई है। मगर पुराने जमाने के समाज में माया-ममता का त्याग इतना कठिन न था। गीता ने जिस समय यह बात कही है उस समय यह बात इतनी कठिन बेशक नहीं थी। उस समय का समाज ही कुछ ऐसा था कि यह बात हो सकती थी। और तो और, यदि हम बर्बर एवं असभ्य कहे जाने वाले लोगों का प्रामाणिक इतिहास पढ़ें तो पता लग जाएगा कि उनके लिए यह बात कहीं आसान थी। उनकी सामाजिक परिस्थिति तथा रहन-सहन ही ऐसी थी कि वे आसानी से इस ओर अग्रसर हो सकते थे।

जीसुइत संप्रदायवादी शारलेवो नामक फ्रांसीसी पादरी ने एक पुस्तक लिखी है जिसका नाम है 'हिस्तोरिया द ला नूवेल फ्रांस' (Historia dela Nouvelle France)। वह अमेरिका के रक्तवर्ण आदि वासियों में घूमता और प्रचार करता था। उसने तथा लहोतन नामक विचारशील पुरुष ने अपने अनुभव एवं दूसरों को भी जानकारी के आधार पर उस पुस्तक के अनेक पृष्ठों में उन असभ्य रक्तवर्ण लोगों के बारे में लिखा है, जिसे पाल लाफार्ग ने अपनी (Evolution of Property) के 32-33 पृष्ठों में यों उद्धृत किया है:-

'The brotherly sentiments of the Redskins are doubtless in part, ascribable to the fact that the words 'mine and thine', 'those cold words;' as Saint John Chrysostomos calls them, are all unknown as yet to the savages. The protection they extend to the orphans, the widows and the infirm, the hospitality which they exercise in so admirable a manner, are, in their eyes, but a consequece of the conviction which they hold that all things should be common to all men.'

'The free thinker Lahotan saya in his 'Voyage de Lahetan II,' Savages do not distinguish between mine and thine, for it may be affirmed that what belongs to the one belongs to the other. It is only among the Christain savages, who dwell at the gates of cities, that money is in use. The other will neither handle it nor even look upon it. They call it : the serpent of the white-men. They think it strange that some should possess more than others, and that those who have most should be more highly esteened than those who have least. They neither quarrel nor fight among themselves; they neither rob nor speak ill of one another.'

'बेशक रक्तवर्ण असभ्य लोगों में जो परस्पर भ्रातृभाव पाया जाता है वह किसी हद तक इसीलिए है कि उन लोगों को अब तक 'मेरा और तेरा' का ज्ञान हई नहीं - वही 'मेरा' और 'तेरा', जिन्हें महात्मा जौन्क्रिसोस्तमो ने 'ठंडे शब्द' ऐसा कहा है। अनाथों, विधावाओं एवं कमजोरों की रक्षा वे लोग जिस तरह करते हैं और जिस प्रशंसनीय ढंग से वे लोग आगंतुकों का आदर-सत्कार करते हैं वह उनकी नजरों में इसलिए अनिवार्य और स्वाभाविक है कि उनका विश्वास है कि संसार की सभी चीजें सभी लोगों की हैं।'

'स्वतंत्र विचारक लहोतन ने अपनी 'द्वितीय लहोतन की समुद्रयात्रा' पुस्तक में लिखा है कि असभ्य लोगों में 'मेरे' और 'तेरे' का भेद होता ही नहीं। क्योंकि यह बात उनमें देखी जाती है कि जो चीज एक ही है वही दूसरे की भी है। जो असभ्य लोग क्रिस्तान हो गए हैं और हमारे शहरों के पास रहते हैं केवल उन्हीं लोगों में रुपये-पैसे का प्रचार पाया जाता है। शेष असभ्य न तो रुपया-पैसा छूते और न उनकी ओर ताकते तक हैं। उन्हें यह बात विचित्र लगती है कि कुछ लोगों के पास ज्यादा चीजें होती हैं बनिस्बत औरों के, और जिनके पास ज्यादा हैं उनकी ज्यादा इज्जत होती है बनिस्बत कम रखने वालों के। वे असभ्य न तो आपस में झगड़ते और न लड़ते हैं। वे न तो किसी की चीज चुराते और न एक दूसरे की शिकायत ही करते हैं।'

कितनी आदर्श स्थिति है! कैसी उच्च भावनाएँ हैं! खूबी तो यह है कि ये लोग निरे अपढ़ और निरक्षर हैं! यह ठीक है कि सभ्यता की हवा उन्हें लगी नहीं है। आज से डेढ़ सौ वर्ष पहले तक जिनने उनकी यह बातें खुद देखी हैं उन्हीं के ये बयान हैं, न कि हजार-दो हजार साल पहले वालों के! इसलिए जो लोग ऐसा समझते हैं कि अहंता-ममता के त्याग की बातें कोरी गप्पबाजी है उन्हें होश संभालना चाहिए। वे आँखें खोलें और देखें कि हकीकत क्या है। पुरानी पोथियों में जो बातें ऋषि-मुनियों के लिए, आदर्श एवं वांछनीय मानी गई हैं वही असभ्य लोगों में पाई जाती हैं! बेशक, इस मामले में हम सभ्यों से वे असभ्य ही भले हैं! हमने तो अपने-पराए के इस मर्ज के चलते समूचे समाज को ही नरक बना डाला है - सारे संसार को जलती भट्ठी जैसा कर दिया है!

लेकिन अब हम अपने प्रसंग में आते हैं तो देखते हैं कि गीता का जो आध्यात्मिक साम्यवाद है और जिसकी दुहाई आज बहुत ज्यादा दी जाने लगी है, वह इस युग की चीज हो नहीं सकती, वह जनसाधारण की वस्तु हो नहीं सकती। बिरले माई के लाल उसे प्राप्त कर सकते हैं। इसी कठिनता को लक्ष्य करके कठोपनिषद् में कहा गया है कि 'बहुतों को तो इसकी चर्चा सुनने का भी मौका नहीं लगता और सुनकर भी बहुतेरे इसे हासिल नहीं कर सकते - जान नहीं सकते। क्यों कि एक तो इस बात का पूरा जानकार उपदेशक ही दुर्लभ है और अगर कहीं मिला भी तो उसके उपदेश को सुनके तदनुसार प्रवीण हो जाने वाले ही असंभव होते हैं' - ''श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्य: शृण्वन्तोऽपि बहवो यं न विद्यु:। आश्चर्यो वक्ता कुशलोऽस्य लब्धाऽऽश्चर्यो ज्ञाता कुशलानुशिष्ट:'' (1। 2। 7) यही बात ज्यों की त्यों गीता ने भी कुछ और भी विशद रूप से इसकी असंभवता को दिखाते हुए यों कही है कि 'आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनमाश्चर्यवद्वदति तथैव चान्य:। आश्चर्यवच्चन मन्य: शृणोति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित्' (2। 29)।

पहले भी तो इस चीज की अव्यावहारिकता का वर्णन किया जाई चुका है। आमतौर से सांसारिक लोगों के लिए तो यह चीज पुराने युग में भी कठिनतम थी - प्राय: असंभव थी ही। मगर वर्तमान समय में तो एकदम असंभव हो चुकी है। जो लोग इसकी बार-बार चर्चा करते तथा मार्क्स के भौतिक साम्यवाद के मुकाबिले में इसी आध्यात्मिक साम्यवाद को पेश करके इसी से लोगों को संतोष करना चाहते हैं वे तो इससे और भी लाखों कोस दूर हैं। वे या तो पूँजीवादी और जमींदार हैं या उनके समर्थक और इष्ट-मित्र या संगी-साथी। क्या वे लोग सपने में भी इस चीज की प्राप्ति का खयाल कर सकते हैं, करते हैं? क्या वे मेरा-तेरा, अपना-पराया, शत्रु-मित्र, हानि-लाभ आदि से अलग होने की हिम्मत जन्म-जन्मांतर भी कर सकते हैं? क्या यह बात सच नहीं है कि उनको जो यह भय का भूत सदा सता रहा है कि कहीं भौतिक साम्यवाद के चलते उन्हें सचमुच हानि-लाभ, शत्रु-मित्र आदि से अलग हो जाना पड़े और सारी व्यक्तिगत संपत्ति से हाथ धोना पड़ जाए, उसी के चलते इस आध्यात्मिक साम्यवाद की ओट में अपनी संपत्ति और कारखाने को बचाना चाहते हैं? वे लोग बहुत दूर से घूम के आते हैं सही। मगर उनकी यह चाल जानकार लोगों में छिप नहीं सकती है। ऐसी दशा में तो यह बात उठाना निरी प्रवंचना और धोखेबाजी है। पहले वे खुद इसका अभ्यास कर लें। तब दूसरों को सिखाएँ। 'खुदरा फजीहत, दीगरे रा नसीहत' ठीक नहीं है।

मुकाबिला भी वे करते हैं किसके साथ? असंभव का संभव के साथ, अनहोनी का होनी के साथ। एक ओर जहाँ यह आध्यात्मिक साम्यवाद बहुत ऊँचा होने के कारण आम लोगों के पहुँच के बाहर की चीज है, तहाँ दूसरी ओर भौतिक साम्यवाद सर्वजनसुलभ है, अत्यंत आसान है। यदि ये भलेमानस केवल इतनी ही दया करें कि अड़ंगे लगाना छोड़ दें, तो यह चीज बात की बात में संसार व्यापी बन जाए। इसमें न तो जीते-जी मुर्दा बनने की जरूरत है और न ध्यान या समाधि की ही। यह तो हमारे आए दिन की चीज है, रोज-रोज की बात है; इसकी तरफ तो हम स्वभाव से ही झुकते हैं, यदि स्थाई स्वार्थ (Vested interests) वाले हमें बहकाएँ और फुसलाएँ न। फिर इसके साथ उसकी तुलना क्या? हाँ, जो सांसारिक सुख नहीं चाहते वह भले ही उस ओर खुशी-खुशी जाएँ। उन्हें रोकता कौन है? बल्कि इसी साम्यवाद के पूर्ण प्रचार से ही उस साम्यवाद का भी मार्ग साफ होगा, यह पहले ही कहा जा चुका है।

गीता में यज्ञ और यज्ञचक्र की भी बात आई है। यों तो हिंदुओं की पोथियों में इस बात की चर्चा भरी पड़ी है। उपनिषदों में भी यह बात कुछ निराले ढंग से ही आई है। मगर गीता का ढंग कुछ दूसरा ही है, जो ज्यादा व्यावहारिक एवं आकर्षक है। उपनिषद् रूपक के ढंग से यज्ञ और हवन का आलंकारिक वर्णन करते हैं और धर्मशास्त्र या पुराण इन्हें स्वर्ग, नरक या मुक्ति और बैकुंठ ही लिए करने की आज्ञा देते हैं। उनने यज्ञों को पूरा धार्मिक रूप दे दिया है। फिर तो स्वर्ग-नरक की बात आई जाती है और हुक्म या आज्ञा (Order or command) की भी जरूरत होई जाती है। हाँ, मनुस्मृति में 'अग्नौप्रास्ताssहुति: सम्यगादित्यमुपतिष्ठते। आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृष्टेरन्नं तत: प्रजा:' (3। 76) वचन आया है। इसमें गीता की बातों का कुछ स्थूल आभास पाया जाता है। यह श्लोक इतना तो कहता ही है कि 'यज्ञ-यागादि के समय अग्नि में जो कुछ ठीक-ठीक हवन किया जाता है वह सूर्य तक पहुँचता है, सूर्य से वृष्टि होती है, वृष्टि से अन्न होता है और अन्न से प्राणियों की उत्पत्ति तथा वृद्धि होती है।'

महाभारत के शांतिपर्व के 261वें अध्याय का ग्यारहवाँ श्लोक भी ऐसा ही है। इससे इतना तो साफ होई जाता है कि उस समय लोगों का खयाल यज्ञ के संबंध में केवल स्वर्गादि तक ही सीमित न रह के समाज की व्यवस्था और उसके भरण-पोषण तक भी गया था। लोग यह मानने लगे थे कि समाज कल्याण के लिए - प्राणियों के सीधे भरण-पोषण आदि के लिए - भी यज्ञ एक जरूरी चीज है। धर्म के रूप में यज्ञ के करने से पुण्य के जरिए लोगों को अन्न-वस्त्रादि प्राप्त होंगे इस खयाल के सिवाय यह विचार भी जड़ पकड़ चुका था कि यज्ञ से सीधे ही वृष्टि में सहायता होती है और उससे अन्नादि उत्पन्न होते हैं।

बेशक, मीमांसकों ने कारीरी नामक याग के बारे में यह भी कहा है कि उसके करने से अवर्षण मिट जाता है और वृष्टि होती है - 'कारीर्या वृष्टिकामो यजेत।' मगर आमतौर से सभी यज्ञयागों के बारे में उनका ऐसा मत है नहीं। इसीलिए मनुस्मृति और शांतिपर्व के उक्त वचन उस समय के लोगों के विचारों की प्रगति के सूचक हैं। उससे पता चलता है कि किस प्रकार सामान्य रूप से पुण्यप्राप्ति, स्वर्गप्राप्ति आदि से आगे बढ़ के क्रमश: कारीरी यज्ञ के द्वारा सामान्यत: सभी यज्ञों का उपयोग समाजहित के काम में सीधे होने लगा। उपनिषदों के समय में ऋषियों ने और पीछे दार्शनिकों ने भी जो यह स्वीकार किया कि अग्नि से जल और जल से पृथिवी के द्वारा अन्नादि उत्पन्न हुए और इस प्रकार प्राणि-सृष्टि का विकास हुआ उसका भी संबंध इस यज्ञवाली प्रक्रिया से है या नहीं और अगर है तो कितना यह कहना असंभव है। यज्ञ और अग्नि का संबंध पुराने लोग अविच्छिन्न मानते थे। इसीलिए यह खयाल स्वाभाविक है कि शायद वह बात भी इसी सिलसिले में आई हो। मगर हमें तो उतने गहरे पानी में उतरना है नहीं। हम तो गीता की ही बात देखना चाहते हैं।

इससे पहले कि हम इस यज्ञ के बारे में गीता का मंतव्य या उसकी विशेषता बताएँ यह जान लेना आवश्यक है कि गीता में कहाँ-कहाँ यज्ञ का जिक्र है और किस प्रसंग में। यों तो यज्ञ के बारे में गीता का एक रुख और भाव हम बहुत पहले बता चुके हैं और कह चुके हैं कि उसमें क्या खूबी है। मगर यहाँ उसके दूसरे ही पहलू का वर्णन करना है। इस विवेचन से पहले कही गई बात पर भी काफी प्रकाश पड़ जाएगा। गीता की यह यज्ञ वाली बात जो अपना निरालापन रखती है उसे भी हम बखूबी जान सकेंगे।

गीता में तीसरे ही अध्याय से यज्ञ की बात शुरू हो के चौथे में उसका खूब विस्तार है। पाँचवें में भी यज्ञ शब्द अंत के 29वें श्लोक में आया है। सिर्फ छठे में वह पाया नहीं जाता। फिर लगातार सात, आठ, नौ, दस, ग्यारह और बारह अधयायों में यज्ञ की बात आती है। यह ठीक है कि बारहवें में यज्ञ शब्द नहीं आता। मगर तीसरे अध्याय में 'यज्ञार्थ' (3। 9) शब्द आया है और 'अहं क्रतुरहं यज्ञ:' (9। 16) में भगवान को ही यज्ञ कहा है। 'यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि' (10। 25) में भी भगवान को ही जप यज्ञ कहा है। फिर बारहवें के 10वें श्लोक में 'सत्कर्म', तथा 'मदर्थ कर्म' शब्द आए हैं। इसीलिए उसे भी जप यज्ञ ही माना है। बीच वाले 13, 14, 15 अध्यायों में यज्ञ की चर्चा नहीं है। उसके बाद 16, 17, 18 में स्थान-स्थान पर आई है। इससे स्पष्ट है कि गीता की दृष्टि से यज्ञ की महत्ता बहुत है, और है वह व्यापक चीज। गीता की खास-खास बातों में एक यह भी है।

अब जरा उसके स्वरूप का विचार करें। सबसे पहले तीसरे अध्याय के 9-16 श्लोकों को ही लें। इन आठ श्लोकों में यज्ञ और यज्ञचक्र की बात आई है। यहाँ यज्ञ का कोई भी ब्योरा नहीं दिया गया है और न उसका विशेष विश्लेषण ही किया गया है। केवल इतना ही कहा गया है कि 'जो कर्म यज्ञ के लिए हो उससे बंधन नहीं होता है, किंतु और-और कर्मों से ही' - ''यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबंधन:'' (3। 9)। इसके बाद यज्ञ को प्राणियों के लिए जरूरी और कल्याणकारी कहके 14-16 श्लोकों में एक शृंखला ऐसी बनाई है जो चक्र की तरह गोल हो जाती है और उसके बीच में यज्ञ आ जाता है। इसी को यज्ञचक्र कह के इसे निरंतर चालू रखने पर बड़ा ही जोर दिया है। 13वें तथा 16वें श्लोकों में यज्ञ न करनेवालों की सख्त शिकायत भी की गई है। यहाँ तक कह दिया है कि जो इस चक्र को निरंतर चालू न रखे वह पतित तथा गुनहगार है और उसका जीना बेकार है!

चौथे अध्याय की यह दशा है कि उसके 23-33 श्लोकों में यज्ञ का बहुत ज्यादा ब्योरा दिया गया है। इन ग्यारह श्लोकों में जो पहला - 23वाँ - है उसमें तो वही बात कही गई है जो तीसरे के 9वें में कि 'यज्ञार्थ कर्म सोलहों आना जड़-मूल से विलीन हो जाता है। फिर बंधन में कौन डालेगा?' - ''यज्ञायाचरत: कर्म समग्रं प्रविलीयते।'' इसके बाद यज्ञों की किस्में 24वें से शुरू होके 33वें तक बताई गई हैं। बीच के 31वें में तो यहाँ तक - साफ कह दिया है कि 'जो यज्ञ नहीं करता उसका दुनियावी काम तक तो चली नहीं सकता, परलोक की बात तो दूर रहे' - ''नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्य: कुरुसत्तम।'' इससे एक तो यज्ञ की व्यापकता तथा समाजोपयोगिता सिद्ध होती है - यह बात पक्की हो जाती है कि वह समाज को कायम रखने के लिए अनिवार्य है। दूसरे यह कि पूर्व के सात श्लोकों में जिन यज्ञों को गिनाया है वह केवल नमूने की तौर पर ही हैं। इसीलिए 28वें श्लोक में गोल-गोल बात ही कही भी गई है कि - 'द्रव्यों से संबंध रखने वाले, तप-संबंधी, योग-संबंधी, ज्ञान-संबंधी और सद्ग्रंथसंबंधी अनेक यज्ञ हैं' - ''द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथाऽपरे। स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतय: संशितव्रता:।'' फिर 32वें श्लोक में भी इसकी पुष्टि कर दी गई है कि 'इस प्रकार के अनेक यज्ञ वेदादि सद्ग्रंथों में बताए गए हैं और सभी के सभी क्रियात्मक या क्रियासाध्य हैं' - ''एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे। कर्मजान्विद्धितान्सर्वान्।'' आखिर में ज्ञानयज्ञ को और यज्ञों से उत्तम कह के इस प्रसंग को पूरा किया है। फिर ज्ञान की प्राप्ति का विचार शुरू किया है।

पाँचवें अध्याय में तो एक ही बार अंतिम - 29वें श्लोक में यज्ञ शब्द आया ही है। उसमें इतना ही कहा गया है कि परमात्मा ही यज्ञों तथा तपों को स्वीकार करने वाला एवं सभी पदार्थों का बड़ों से बड़ा शासक और नियंत्रणकर्त्ता है। लेकिन यह बात भी है कि सबों का कल्याण भी वह चाहता है - 'भोक्तारं यज्ञतपसां' आदि। यह दूसरी बात है कि चौथे अध्याय में जिस प्राणायाम को यज्ञ कहा है उसी का कुछ अधिक विवरण और तरीका इस अध्याय में दिया गया है। छठे में तो प्राणायाम की ही विधि विशेष रूप से दी गई है। फलत: इस दृष्टि से तो वह भी यज्ञ प्रतिपादक ही है।

सातवें अध्याय की यह हालत है कि उसके 20 से 23 तक के चार श्लोकों में निचले दर्जे के - जघन्य - यज्ञों का वर्णन करके अंत में कह दिया है कि जो भगवान के लिए यज्ञ करता है वही सबसे अच्छा है। यह एक अजीब-सी बात है कि जिसकी मर्जी जिस चीज में हो उसकी श्रद्धा उसी में मजबूत कर दी जाती है। यह काम खुद भगवान करते हैं ऐसी बात 'तस्यतस्याचलां श्रद्धां' (21) में साफ ही कही गई है। इसका एक मतलब तो यही है कि छोटी-छोटी चीजों में एकाग्रता होने और श्रद्धा जम जाने पर मनुष्य का अपने दिल-दिमाग पर काबू होने लगता है। इसलिए मौका पड़ने पर ऊँची चीज में भी वह उसे लगा सकता है। एकाएक वैसी चीज में लगाना असंभव होता है। इसीलिए पतंजलि ने योगसूत्रों में साफ ही कहा है कि 'यथाभिमतधयानाद्वा' (1। 39)। इसके भाष्य में व्यास ने लिखा है कि 'यदेवाभिमतं तदेव ध्यायेत्। तत्र लब्धस्थितिकमन्यत्रापि स्थितिपदं लभते' - ''जिसी में मन लगे उसी का ध्यान करे। जब उसमें मन जमते-जमते स्थिर होने लगेगा तो उससे हटा के दूसरे में भी स्थिर किया जा सकता है।'' दूसरी बात यह है कि धर्म तो श्रद्धा की ही चीज है, यह पहले ही कहा जा चुका है। वह न छोटा है न बड़ा, और न ऊँचा है न नीचा। वह कैसा है यह सब कुछ निर्भर करता है इस बात पर कि उसमें हमारी श्रद्धा कैसी है, हमारे दिल-दिमाग, हमारी जबान और हमारे हाथ-पाँवों में - इन चारों में - सामंजस्य कहाँ तक है और हम सच्चे तथा ईमानदार कहाँ तक हैं। इसीलिए यह सामंजस्य पूर्ण न होने के कारण ही कमअक्ल लोगों के कर्मों को तुच्छ फलवाला कहा है 'अंतवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम्' (7। 23)। लेकिन जिनका सामंजस्य दूसरा हो गया है उनके लिए कहा है कि वे भगवान रूप ही हैं - 'मद्भक्ता यांति मामपि' (7। 23)। इस अध्याय के अंत के 30वें श्लोक में 'अधियज्ञ' के रूप में यज्ञ का नाम लेकर प्रश्न किया है कि वह क्या है, कौन है? अधियज्ञ आदि की बात हम स्वतंत्र रूप से आगे लिखेंगे।

आठवें अध्याय के तो आरंभ में ही उसी अधियज्ञ के बारे में दूसरे ही श्लोक में प्रश्न किया गया है कि वह है कौन-सा पदार्थ? फिर इसी का उत्तर चौथे श्लोक में आया है कि भगवान ही इस शरीर के भीतर अधियज्ञ हैं - 'अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर।' मगर इससे पूर्व के तीसरे श्लोक में कर्म किसे कहते हैं, पूर्व के इस प्रश्न का जो उत्तर दिया गया है कि 'पदार्थों के उत्पादन और पालन का कारण जो त्याग या विसर्जन है वही कर्म कहा जाता है' - ''भूतभावोद्भवकरो विसर्ग: कर्मसंज्ञित:'', वह भी यज्ञ का ही निरूपण है। क्योंकि जैसा कि कह चुके हैं, तीसरे अध्याय में तो वृष्टि आदि के द्वारा यज्ञ का यही काम कहा ही गया है। इसी अध्याय के अंतिम - 28वें श्लोक में भी यज्ञ शब्द आया है। मगर उसका यही मतलब है कि यज्ञ कोई उत्तम चीज है जिसका फल बहुत ही सुंदर और रमणीय होता है। इससे ज्यादा कुछ नहीं कहा गया है।

नवें अध्याय के 15-16, तथा 20-28 श्लोकों में इस यज्ञ का विस्तार पाया जाता है। 15वें में ज्ञान-यज्ञ का ही विभिन्न रूप बता के दिखाया है कि उसके द्वारा कैसे भगवान की पूजा होती है। 16वें में भगवान को ही यज्ञ करार दे के वैदिक यज्ञ के साधन घी, अग्नि आदि को भी भगवान का ही स्वरूप कह दिया है। 20-21 श्लोकों में वैदिक सोम-यागादि का क्या परिणाम होता है और स्वर्ग पहुँच के उस यज्ञ के करने वाले फिर क्योंकर कुछी दिनों बाद लौट आते तथा जन्म लेते हैं, यह बताया गया है। 22वें में पुनरपि उसी ज्ञान-यज्ञ के महत्त्व का वर्णन है। 23-25 श्लोकों में सातवें अध्याय की ही तरह दूसरे-दूसरे देवताओं के यज्ञों की बात कह के उसमें इतना और जोड़ दिया है कि वह भी भगवान की ही पूजा है; हालाँकि जैसी चाहिए वैसी नहीं है। क्योंकि उसे करने वाले यह बात तो समझ पाते नहीं कि यह भी भगवत्पूजा ही है। इसीलिए वे चूकते हैं - उनका पतन होता है। जिस चीज में मन लगाइए वहीं पहुँचिएगा - वही बनिएगा, यही तो नियम है और वे लोग तो दूसरों में - भूत-प्रेत, पितर आदि में - ही मन लगाते हैं, उसी भावना से यज्ञ या पूजन करते हैं। फिर उन्हें भगवान कैसे मिलें? यही उनका चूकना है।

इस अध्याय के 26-28 तीन श्लोकों में जो कुछ कहा गया है वह है तो यज्ञ ही। मगर है वह बहुत बड़ी चीज। कोई भी काम, जो निश्चित कर दिया गया हो, करते रहिए। बस, वही भगवत्पूजा होती है यदि इसी भावना से वह काम किया जाए, यही अमूल्य मंतव्य इन श्लोकों में कहा गया है। कर्मों के छुटकारे के लिए खुद कर्म ही किस प्रकार साबुन का काम करते हैं, यही चीज यहाँ पाई जाती है। इन श्लोकों के सिवाय पीछे के 19वें श्लोक में भी कुछ ऐसी बात कही गई है जिससे पता चलता है कि उसमें भी यज्ञ का ही निरूपण है। भगवान को तो उससे पूर्व के 16वें श्लोक में यज्ञ कहा ही है। मगर इसमें जो यह कहा गया है कि 'मैं ही वर्षा रोकता हूँ और उसे जारी भी करता हूँ' - ''अहं वर्षं निगृह्वाम्यत्सृजामि च'', उससे पता चलता है कि यज्ञ का ही उल्लेख है। क्योंकि तीसरे अध्याय में तो कही दिया है कि 'यज्ञ से ही वृष्टि होती है' - ''यज्ञाद्भवति पर्जन्य:।'' 'उत्सृजामि' शब्द का अर्थ है उत्सर्ग या छोड़ना - बाधा हटा देना। आठवें में जो विसर्ग कहा गया है वही है यह उत्सर्ग। यज्ञों से वृष्टि की बाधा हटके पानी बरसता है। नवें अध्याय के अंत के 34वें श्लोक में भी 'मद्याजी' शब्द मिलता है, जिसका अर्थ है 'मेरा - भगवान का - यज्ञ करनेवाला - भगवत्पूजा'। इसी श्लोक के प्राय: तीन चरण अठारहवें अध्याय के 65वें श्लोक में भी ज्यों के त्यों पाए जाते हैं। अर्थ भी यही है।

दसवें अध्याय के तो केवल 25वें श्लोक में जप यज्ञ की बात आई है। इसके बारे में हम भी इस प्रसंग के शुरू में ही कह चुके हैं। ग्यारहवें अध्याय के 'नवेदयज्ञाध्ययनैर्नदानै:' (48), तथा 'नदानेन नचेज्यया' (53) श्लोकों में यज्ञ और इज्या शब्द आए हैं। इज्या का वही अर्थ है जो यज्ञ का। यहाँ केवल यज्ञ का उल्लेख है। कोई खास बात नहीं है। बारहवें अध्याय के 10वें श्लोक में 'मदर्थ' या भगवान के लिए किए जाने वाले कर्मों का उल्लेख है और यज्ञार्थ कर्म की बात तो कही चुके हैं। इसीलिए वहाँ भी यज्ञ की ही बात है।

सोलहवें अध्याय में यज्ञ का जिक्र है केवल 15वें तथा 17वें श्लोकों में । यह बात बहुत अच्छी तरह ईश्वरवाद के प्रसंग में लिखी जा चुकी है। हाँ, सत्रहवें अध्याय में यज्ञ की बात बार-बार अनेक रूप में आई है। पहले और चौथे श्लोक में श्रद्धापूर्वक यज्ञादि करने और सात्त्विक यज्ञों का साधारण उल्लेख है। कोई विवरण नहीं है। हाँ, इतना कह दिया है कि कैसों की यज्ञपूजा किस प्रकार की होती है। यज्ञ के सात्त्विक आदि तीन प्रकार यजनीय और पूजनीय पदार्थों के ही हिसाब से बताए गए हैं। फिर आगे के 11-13 - तीन - श्लोकों में यज्ञ के कर्त्ता के अपने ही भावों और विचारों के अनुसार यज्ञ के वही सात्त्विक आदि तीन भेद बताए गए हैं। इसके बाद 23-25 - तीन - श्लोकों में और कुछ न कह के यज्ञादि कर्मों की त्रुटियों के पूरा करने का सीधा उपाय बताया गया है कि श्रद्धा के साथ-साथ यदि ओंतत्सत् बोल के उन्हें किया जाए तो उनमें अधूरापन रही नहीं जाता - वे सात्त्विक बन जाते हैं। यही बात 27-28 श्लोकों में भी पाई जाती है। 28वें में हुत शब्द का अर्थ यज्ञ ही है। 27वें का 'तदर्थीयकर्म' भी इसी मानी में आया है। यज्ञार्थ और तदर्थ एक ही चीज है।

अठारहवें अध्याय के 65वें के सिवाय 70वें श्लोक में भी ज्ञानयज्ञ का उल्लेख है। गीता के उपसंहार में ज्ञानयज्ञ का नाम लेना कुछ महत्त्व रखता है। पहले भी तो कही चुके हैं कि और यज्ञों से ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है। वही बात यहाँ याद हो आई है। खूबी तो यह है कि उस श्लोक में गीता के पढ़नेवाले को ही कहा है कि वही ज्ञानयज्ञ के द्वारा भगवान की पूजा करता है। इस प्रकार पठन-पाठन को ज्ञानयज्ञ के भीतर डाल के गीता ने सुंदर पथ-प्रदर्शन किया है। यज्ञ का अर्थ समझने के लिए कुंजी भी दे दी है। इस अध्याय के प्रारंभ के 3, 5, 6 श्लोकों में भी यज्ञ, दान, तप इन तीन कर्मों का बार-बार उल्लेख किया है और कहा है कि ये बुनियादी कर्म हैं। इन्हें किसी भी दशा में छोड़ नहीं सकते। इस तरह यज्ञ का महत्त्व सिद्ध कर दिया है।

इतनी दूर तक गीता के यज्ञ का सामान्य तथा विशेष विचार कर लेने के बाद अब हमें मौका मिलता है कि उसकी तह में घुस के देखें कि यह क्या चीज है। तीसरे अध्याय में जो यज्ञचक्र बताया गया है वह अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। उससे इस मामले पर काफी प्रकाश पड़ता है। इसलिए पहले उसे ही देखें कि उसकी हकीकत क्या है। वहाँ यह क्रम पाया जाता है कि कर्मों से यज्ञ का स्वरूप तैयार होता है, वह पूर्ण होता है - यज्ञ से वृष्टि होती है, वृष्टि से अन्न होता है, अन्न से भूतों यानी पदार्थों तथा प्राणियों का भरण-पोषण होता है और उनकी उत्पत्ति भी होती है। इस प्रकार जो एक शृंखला तैयार की गई है उसके एक सिरे पर भूत आ जाते हैं। भूत का असल तात्पर्य है ऐसे पदार्थों से जिनका अस्तित्व पाया जाए - यानी सत्ताधारी पदार्थमात्र। उसी शृंखला के दूसरे सिरे पर कर्म पाया जाता है, ऐसा खयाल हो सकता है। होना भी ऐसा ही चाहिए। क्योंकि कर्म का ही संबंध पदार्थ से मिलाना है और यही चीज गीता को अभिमत भी है। मगर इससे चक्र तैयार हो पाता नहीं। क्योंकि जब तक शृंखला के दोनों सिरे - छोर - मिल न जाएँ, जुट न जाएँ, चक्र होगा कैसे? चक्र का तो मतलब ही है कि शृंखला के भीतर वाले सभी पदार्थों का लगाव एक सिरे से रहे और कहीं भी वह लगाव टूटने न पाए। फलत: एक बार एक पदार्थ को शुरू कर दिया और वह चक्र खुद-ब-खुद चालू रहेगा। केवल शृंखला रहने पर और चक्र न होने पर यह बात नहीं हो सकती। तब तो बार-बार शृंखला की लड़ियों के किनारे पहुँच के नए सिरे से शुरू करने की बात आ जाएगी। मगर चक्र में किनारे की बात ही नहीं होती। सभी लड़ियाँ बीच में ही होती हैं।

यह ठीक है कि भूतों का तो कर्मों से ताल्लुक हई। भूतों में ही तो क्रिया पाई जाती और क्रिया से यज्ञ का संबंध हो के चक्र चालू रहता है। किनारे का सवाल भी अब नहीं उठता। यही सर्वजनसिद्ध बात है भी। मगर इसमें दो चीजों की कमी रह जाती है। एक तो यह बात निरी मशीन जैसी चीज हो जाती है। भूतों की क्रिया के पीछे कोई ज्ञान, दिमाग या पद्धति है, या कि यों ही वह क्रिया चालू है, जैसे घड़ी की सुइयों की क्रिया चालू रहती है? यह प्रश्न उठता है और इसका उत्तर जरूरी है। मगर इस चक्र में इसका उत्तर नहीं मिलता है। दूसरी बात यह है कि हमें तो अपने ही दिल-दिमाग के अनुसार कर्मों के करने का हक है, गीता का यह सिद्धांत बताया जा चुका है इस चक्र में यह बात भी साफ हो पाती नहीं और इसके बिना काम ठीक होता नहीं।

इसीलिए तीसरे अध्याय में उस शृंखला में दो लड़ें और भी जुटी हैं जो इस कमी की पूर्ति कर देती हैं। दोई कमियाँ थीं और दो लड़ें जुट गईं। वहाँ कहा गया है कि अक्षर से ब्रह्म और ब्रह्म से कर्म पैदा होता है। कर्म का तो यज्ञ के द्वारा उस शृंखला में लगाव हई। मगर प्रश्न यह होता है कि चक्र बनता है कैसे? अक्षर से शुरू करके भूतों पर खात्मा हो जाने पर मिलान तो होती नहीं। भूत और अक्षर तो दो जुदी चीजें हैं न? यह भी नहीं कि जैसे भूतों से कर्म बनते हों - उनके ही द्वारा कर्म होते हों - वैसे ही भूतों से अक्षर होता हो या बनता हो। फलत: भारी अड़चन आ जाती है। दोनों कमियों की पूर्ति कैसे हो गई यह बात तो अलग ही है - इसका भी पता नहीं चलता।

इस पहेली को सुलझाने के लिए हमें ब्रह्म और अक्षर को पहले जान लेना होगा कि ये दोनों हैं क्या। पहले ही ब्रह्म को लें। गीता में ब्रह्म शब्द तीन अर्थों में आया है। यों तो ब्रह्म शब्द का अर्थ है बृहत या बड़ा - बहुत बड़ा, सबसे बड़ा। आमतौर से ब्रह्म कहते हैं परमात्मा या भगवान को ही। उसे इसीलिए समंब्रह्म, परंब्रह्म या परब्रह्म और अक्षरब्रह्म भी कहा करते हैं। ब्रह्म शब्द गीता में कुल मिला के प्राय: तिरपन बार आया है। अध्याय और श्लोक जिनमें यह शब्द मिलता है इस तरह हैं - (2। 72), (3। 15), (4। 24, 25, 31, 32), (5। 16, 10, 19, 20, 21, 24, 25, 26), (6। 14, 28, 38, 44), (7। 29), (8। 1, 3, 11, 13, 16, 17, 24), (10। 12), (11। 15, 37), (13। 4, 12), (14। 3, 4, 26, 27), (17। 14, 23, 24), (18। 42, 50, 53, 54)। किसी-किसी श्लोक में कई-कई बार आने के कारण 50 बार से ज्यादा हो जाता है।

मगर यदि पूर्वा पर विचार किया जाए तो पता चलेगा कि पाँच ही अर्थों में यह शब्द प्रयुक्त हुआ है। परमात्मा के अर्थ में तो बार-बार आया है और सबसे ज्यादा आया है। ब्राह्मण जाति के अर्थ में केवल एक बार अठारहवें अध्याय के 42वें श्लोक में पाया जाता है। यों तो इसी ब्रह्म शब्द से बना ब्राह्मण शब्द कई बार आया है। प्रकृति या माया के अर्थ में चौदहवें अध्याय के 3, 4 श्लोकों में पाया जाता है। असल में उसके साथ महत शब्द लगा है और उसका अर्थ है महान या महत्तत्त्व। प्रकृति से जिस तत्त्व की उत्पत्ति वेदांत और सांख्यदर्शनों में मानी जाती है उसे ही महान, महत या महत्तत्त्व कहते हैं। तेरहवें अध्याय के 5वें श्लोक में जिसे बुद्धि कहा है वह यही महत है। यह है समष्टि या व्यापक बुद्धि, न कि जीवों की जुदा-जुदा। वहाँ जिसे अव्यक्त कहा है वही है प्रकृति और चौदहवें में उसी को ब्रह्म कहा है। सातवें अध्याय के चौथे श्लोक में भी उसे बुद्धि और अव्यक्त को अहंकार कह दिया है। वहाँ मन का अर्थ है अहंकार और अहंकार का प्रकृति अर्थ है। चौदहवें में महत शब्द के संबंध से ब्रह्म का अर्थ प्रकृति हो जाता है। प्रकृति से ही तो विस्तार या सृष्टि का पसारा शुरू होता है और सबसे पहले समष्टि बुद्धि पैदा होती है। इसीलिए प्रकृति का विशेषण महत दे दिया है। महत्तत्त्व भी तो प्रकृति से जुदा नहीं है, जैसे मिट्टी से घड़ा।

ब्रह्म शब्द का चौथा अर्थ है हिरण्यगर्भ या ब्रह्मा। उसी को अव्यक्त भी कहा है। आठवें अध्याय के 16, 17 श्लोकों में ब्रह्मा के ही अर्थ में ब्रह्म शब्द और अठारहवें में अव्यक्त शब्द आया है। ग्यारहवें अध्याय के 15वें में भी ब्रह्म शब्द का ब्रह्मा ही अर्थ है। छठे के 14वें तथा सत्रहवें अध्याय के 14वें श्लोक में ब्रह्मचारी एवं ब्रह्मचर्यवाला ब्रह्म शब्द वेद के ही अर्थ में सर्वत्र आता है और वहाँ भी आया है। चौथे के 'ब्रह्मणोमुखे' का ब्रह्म शब्द भी वेद का ही वाचक है। इसी प्रकार छठे अध्याय के 44वें श्लोक में जो ब्रह्म शब्द है वह भी वेदार्थक ही है। उसके पूर्व में 'शब्द' शब्द लग जाने से दूसरे अर्थ की गुंजाइश वहाँ रही नहीं जाती। तीसरे अध्याय में जो यज्ञचक्र के सिलसिले में ब्रह्म शब्द आया है वह भी वेद का ही वाचक है। शेष ब्रह्म शब्द परब्रह्म या परमात्मा के ही अर्थ में आए हैं। शायद ही कहीं परमात्मा के सिवाय उक्त शेष चार अर्थों में किसी में आए हों।

असल में तो ब्रह्म शब्द के तीन ही मुख्य अर्थ गीता में पाए जाते हैं और ये हैं वेद, परमात्मा, प्रकृति। यह भी कही चुके हैं कि आमतौर से ब्रह्म का अर्थ परमात्मा ही होता है। शेष अर्थ या तो प्रसंग से जाने जाते हैं, या किसी विशेषण के फलस्वरूप। दृष्टांत के लिए प्रकृति के अर्थ में ब्रह्म शब्द का प्रयोग होने के समय प्रसंग तो हई। पर, उसी के साथ महत विशेषण भी जुटा है। यही बात वेद के अर्थ में भी है। शब्द ब्रह्म की बात अभी कही गई है। 'ब्रह्मणोमुखे' में जो ब्रह्म का अर्थ वेद होता है वह प्रसंगवश ही समझा जाता है। यज्ञों का विस्तार वेदों में ही है। उसे ही वेद का मुख कह दिया है। मुख है प्रधान अंग। इसीलिए मुख और मुख्य शब्द प्रधानार्थक हैं। वेदों के प्रधान अंशों में यज्ञों का ही विस्तार पाया जाता भी है। जिन लोगों ने यहाँ 'ब्रह्मणोमुखे' में ब्रह्म का अर्थ परमात्मा किया है उन्हें क्या कहा जाए ? यज्ञों का विस्तार वेदों में ही तो है। भगवान के मुख में विस्तार है, यह अजीब बात है। हमें आश्चर्य तो तब और होता है जब वही लोग 'त्रिविद्या मां सोमपा:' (9। 20), तथा 'त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना:' (9। 21), में खुद स्वीकार करते हैं कि त्रयी या तीनों वेदों में यज्ञयागादि का ही विशेष वर्णन है। फिर यहाँ वही अर्थ क्यों नहीं किया जाए? तीसरे अध्याय में भी ब्रह्म का विशेषण सर्वगत है। गम् धातु संस्कृत में ज्ञान के अर्थ भी प्रयुक्त होती है। इसीलिए अवगत शब्द का अर्थ है जाना हुआ। इस प्रकार सर्वगत शब्द का अर्थ है सब चीजों को जनाने या बतानेवाला। खुद वेद शब्द का अर्थ है ज्ञान। ज्ञान से ही तो सब चीजें प्रकाशित होती हैं या जानी जाती हैं। इसीलिए यहाँ अर्थ हो जाता है कि सभी बातों को अवगत कराने वाले वेदों से ही कर्म आते हैं, पैदा होते हैं या जाने जाते हैं। वेद का तो काम केवल बताना ही है न?

यह तो सभी वेदज्ञ जानते हैं कि यज्ञयागादि सभी प्रकार के कर्मों पर बहुत ज्यादा जोर वेदों ने दिया है। मीमांसा दर्शन उन्हीं वेद वाक्यों के आधार पर कर्मों का विस्तृत विवेचन करता है। श्रौत तथा स्मार्त्त सूत्रग्रंथ इन्हीं वैदिक कर्मों की विधियाँ बताते हैं। यहाँ तक कि यजुर्वेद के अंतिम - चालीसवें - अध्याय के दूसरे मंत्र में साफ ही कह दिया है कि 'कर्मों को करते रह के ही इस दुनिया में सौ साल जीने की इच्छा करे; क्योंकि मनुष्य में कर्मों का लेप न हो - वे मनुष्य को बंधन में न डालें - इसका दूसरा उपाय हई नहीं' - ''कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समा:। एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे॥'' यह तो कही चुके हैं कि गीता ने भी कर्मों को ही उनके बंधन के धोने का साबुन बताया है। उसने इसकी तरकीब भी सुझाई है।

परंतु दरअसल ब्रह्म के दोई भेद किए गए हैं। मुंडक उपनिषद् के प्रथम खंड में ही जिसे परा एवं अपरा विद्या के रूप में 'द्वे विद्ये वेदितव्ये' कहा है, उसी चीज को सफाई के साथ महाभारत के शांतिपर्व के (231-6। 269-1) दो श्लोकों में, जो हू-ब-हू एक ही हैं, कह दिया है कि 'ब्रह्म तो दोई हैं - पर तथा अपर या शब्द ब्रह्म और परब्रह्म। जो शब्दब्रह्म में प्रवीण हो जाता है वही परब्रह्म को जान पाता है' - ''द्वे ब्रह्मणी वेदितव्ये शब्द ब्रह्म परं च यत्। शब्दब्रह्मणि निष्णात: परं ब्रह्माधिगच्छति॥'' इन्हीं दो में से शब्द-ब्रह्म को गीता के तृतीय अध्याय में सर्वगत ब्रह्म और पर-ब्रह्म को अक्षर कहा है। आठवें (8। 3) में उसे ही अक्षरब्रह्म और परमब्रह्म भी कहा है। और भी स्थान-स्थान पर यही बात पाई जाती है।

इस प्रकार सर्वगत वेद से यदि कर्मों की जानकारी होती है तो यह शंका कि कर्मों के पीछे ज्ञान और दिमाग है या नहीं, अपने आप मिट जाती है। वेद तो ज्ञान को कहते ही हैं। इसलिए मानना पड़ता है कि यज्ञयागादि कर्म घड़ी की सुई की चाल जैसे न हो के ज्ञानपूर्वक होते हैं। इनकी व्यवस्था ही ऐसी है। इसीलिए तो जवाबदेही भी करने वालों पर आती है। अब सिर्फ दूसरी शंका रह जाती है कि लोगों को समझ-बूझ के करने की बात है या नहीं। कहीं ऐसा तो नहीं कि किसी की प्रेरणा से विवश हो के ही कर्म करने पड़ते हैं। इसका उत्तर 'ब्रह्म अक्षर से पैदा हुआ' - "ब्रह्माक्षर समुद्भवम्" पद देते हैं। श्वेताश्वर उपनिषद् के अंतिम - छठे - अध्याय में एक मंत्र आता है कि 'जो परमात्मा सबसे पहले ब्रह्मा को पैदा करके उसे वेदों का ज्ञान कराता है' - ''यो ब्रह्माण विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोत तस्मै'' (6। 18)। जगह-जगह वैदिक ग्रंथों में यही बात पाई जाती है। मनु आदि ने भी यही लिखा है। ब्राह्मण ग्रंथों में भी बार-बार यही कहा गया है। इससे यह बात तो निर्विवाद है कि अविनाशी या अक्षरब्रह्म से वेद पैदा हुए। या यों कहिए कि उसने ही वेद बनाए। और जब ऐसा नहीं कह के कि परमात्मा ने कर्म बनाए, यह कहा है कि उसने वेद बनाए, तो स्पष्ट है कि हम वेदों को पढ़ के जानकारी हासिल करें और कर्मों को समझ-बूझ के करें। अगर यह कह दिया होता कि परमात्मा ने कर्म ही बनाए, तो यही खयाल होता है कि कर्म करने की उसकी आज्ञा या मर्जी है। उसमें सोचने-विचारने का प्रश्न है नहीं।

तब सवाल यह होता है कि चक्र कैसे बनेगा? भूतों का अक्षर ब्रह्म से कौन-सा संबंध है? जब तक या तो भूतों से अक्षरब्रह्म की उत्पत्ति न मानी जाए, या दोनों की एकता स्वीकार न की जाए तब तक शृंखला के दोनों छोर पृथक-पृथक रहेंगे। वे मिलेंगे हर्गिज नहीं। मगर इन दोनों में एक भी संभव नहीं। भूतों में तो सभी पदार्थ आ जाते हैं, चाहे जड़ हों या चेतन। फिर सबकी एकता ब्रह्म के साथ होगी कैसे? उनमें ब्रह्म की उत्पत्ति तो कोई भी नहीं मानता। तब यह गुत्थी सुलझे कैसे? यहाँ हमें फिर उपनिषदों की ओर देखना पड़ता है। तभी यह गाँठ सुलझेगी। गीता तो उपनिषद् हई। सभी अध्यायों के अंत में ऐसा ही कहा गया भी है।

बृहदारण्यक उपनिषद् के चतुर्थ अध्याय के पाँचवें ब्राह्मण के 11वें मंत्र में याज्ञवल्क्य एवं मैत्रेयी के संवाद के सिलसिले में याज्ञवल्क्य ने मैत्रेयी से कहा है कि 'यथाद्रैधाग्नेरभ्याहितस्य पृथग्धूमा विनिश्चिरन्त्येवं वा अरेऽस्य महतो भूतस्य नि:श्वसितमेतदृग्वेदो यजुर्वेद: सामवेदोऽथर्वांगिरस इतिहास: पुराणं विद्या उपनिषद: श्लोका: सूत्राण्यनुव्याख्यानिव्याख्यानीष्टं हुतमाशितं पायितमयं च लोक: परश्च लोक: सर्वाणि च भूतान्स्यैवैतानि सर्वाणि नि:श्वसितानि।' इसका आशय यह है कि 'जिस तरह गीले ईंधन से अग्नि का संबंध होने पर उससे चारों ओर धुआँ फैलता है, ठीक उसी तरह इस महान भूत की साँस के रूप में ही ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, इतिहास, पुराण, कला, उपनिषद, श्लोक, सूत्र, व्याख्यान, व्याख्यानों के व्याख्यान, हवन के पदार्थ, यज्ञ के भोज्य तथा पेय पदार्थ, यह लोक-परलोक, सभी भूत चारों ओर फैले हैं।'

यहाँ कई बातें हैं। एक तो वेदादि जितनी ज्ञान की राशियाँ हैं उनका केंद्र परमात्मा ही माना गया है। दूसरे सृष्टि के सभी पदार्थों का पसारा उसी से बताया गया है। तीसरे भूतों को भी उसी की साँस की तरह कहा गया है। यानी भूत उससे जुदा नहीं है। चौथी बात यह है और यही सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है कि उस परमात्मा को महाभूत कहा गया है। आगे के 14-15 मंत्रों में उसी को अविनाशी आत्मा कहा है, जिसका नाश कभी नहीं होता, जो पकड़ा जा सकता नहीं, जो गलता-पचता नहीं, जो सटता नहीं, जिसे व्यथा नहीं होती और जो घटता नहीं तथा सभी को जानता है - 'अविनाशी वा अरेऽयमात्माऽनुच्छित्तिधर्मा। अगृह्यो नहि गृह्यतेऽशीर्यो नहि शीर्यतेऽसंगो नहि सज्जतेऽसितो न व्यथते न रिष्यते विज्ञातारमरेकेन विजानीयात्।'

भूतों का महाभूत के साथ संबंध तो बताई दिया है कि भूत उसी महाभूत के रूप हैं। सिर्फ व्यष्टि और समष्टि का विभेद है। मगर है वह सबों की आत्मा ही। समष्टि होने के कारण ही उसे महाभूत कह दिया है। वह ज्ञान का आगार है। इसीलिए तो सबों की समझ का प्रश्न हल हो जाता है। जबर्दस्ती कोई कुछ नहीं करता। जबर्दस्ती या प्रेरणा का सवाल यहाँ हई नहीं। सभी विवेक से काम लेकर जिसे उचित समझें उसे करने को स्वतंत्र हैं। व्यष्टि और समष्टि का ताल्लुक होने से अक्षर का भूतों के साथ लगाव भी होई गया। दोनों तो एक ही ठहरे। इस प्रकार चक्र पूरा हो गया। इसी यज्ञचक्र के जारी रखने पर जोर दिया गया है।

इसमें कर्म न कह के यज्ञ कहने या इसे यज्ञचक्र बताने में खूबी यही है कि लोग यज्ञ की ओर आसानी से आकृष्ट हो जाते हैं। लोगों के दिल-दिमाग में उसका महत्त्व भरा पड़ा जो है। यह बात कर्म के संबंध में नहीं है, हालाँकि कर्मों को यज्ञ से अलग नहीं कर सकते। कर्मों से ही यज्ञ संपन्न होता है। फिर भी उसे ऊँचा स्थान मिला है। यह बात भी है कि यज्ञ के भीतर आत्मा, ईश्वर और ज्ञान भी आ जाते हैं। मगर कर्म कहने से इनका ग्रहण हो नहीं सकता है। यज्ञ को इतना व्यापक बना दिया है कि उसके भीतर सभी चीजें आ जाती हैं। समाज की वृद्धि, रक्षा और प्रगति के लिए जो कुछ भी किया जाए वह यज्ञ के भीतर आ जाता है। आत्मा को नीचे गिरने से रोकना यह बहुत बड़ा यज्ञ है। पतन से उसे बचाना आवश्यक है। सत्रहवें अध्याय के छठे श्लोक में जो आत्मा-परमात्मा के कृश करने की बात कही गई है या घसीटने की - खींचने की - उसका भी मतलब नीचे गिराने-गिरने या पतन से ही है। यह बात आसुरी कामों से होती है। इसीलिए उनकी निंदा और यज्ञ की प्रशंसा की गई है। देखिए न, दुनियावी बातों में ऐसे लोग अपनी एवं ईश्वर की कितनी झूठी कसमें खाते हैं और इस प्रकार अपने आपको तथा ईश्वर को भी कितना नीचे घसीट लाते हैं!

जैसे भूत का अर्थ है सत्ताधारी, ठीक उसी प्रकार अन्न का अर्थ है जिसे खाया-पिया जाए या जो औरों को खा-पी जाए - 'अद्यतेऽत्ति वा भूतानीत्यन्नम्।' वृष्टि या पानी की सहायता से जो भी चीजें तैयार हों या शुद्ध हों सभी अन्न के भीतर आ जाती हैं। वैदिक यज्ञादि से या वैज्ञानिक रीति से जो वृष्टि कराई जाए, नहर आदि के जरिए या कुएँ से पानी वहाँ पहुँचाया जाए जहाँ जरूरत हो, वृक्षादि की वृद्धि के जरिए वृष्टि को उत्तेजना दी जाए - क्योंकि यह मानी हुई बात है कि जंगलों की वृद्धि से पानी ज्यादा बरसता है और काट देने पर कम - या दूसरा भी जो तरीका अख्तियार किया जाए और जितनी भी वैज्ञानिक प्रक्रियाएँ सिखाई-पढ़ाई जाएँ सभी यज्ञ के भीतर आ जाती हैं। औषधियों के जरिए, स्वच्छता का खूब प्रसार करके या जैसे हो जल की शुद्धि के सभी उपाय यज्ञ ही हैं। फिर आगे जो कुछ भी जल के प्रभाव से हमारे काम के लिए - समाज के लाभ के लिए - किया जाए, बनाया जाए, - फिर चाहे वह शुद्ध हवा हो, खाद्य पदार्थ हों, जमीन हो, घर हों या दूसरी ही चीजें - सभी अन्न के भीतर आ जाती हैं। ज्ञान, ध्यान, समाधि के जरिए जो शक्ति पैदा होती है उससे क्या नहीं होता। योगसिद्धियों का पूरा वर्णन योगसूत्रों में है। इसलिए यह सब कुछ यज्ञ ही है। जो भी काम आत्मा, समाज तथा पदार्थों की सर्वांगीण उन्नति के लिए जरूरी हो उससे चूकना पाप है। यही गीता का उपदेश है, यही यज्ञचक्र का रहस्य है।

अब हमें जरा सातवें अध्याय के अंत और आठवें के शुरू में कहे गए गीता के अध्यात्म, अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ का भी विचार कर लेना चाहिए। गीता में ये बातें पढ़ के सर्वसाधारण की मनोवृत्ति कुछ अजीब हो जाती है। ये शब्द कुछ ऐसे नए और निराले मालूम पड़ते हैं जैसे विदेशी हों। असल में यज्ञ, भूत, दैव, आत्मा शब्द या इनके अर्थ तो समझ में आते हैं। इसीलिए इनके संबंध में किसी को कभी गड़बड़ी मालूम नहीं होती। मगर अध्यात्म आदि शब्द एकदम नए मालूम पड़ते हैं। इसीलिए कुछ ठीक जँचते नहीं। यही कारण है कि ये बातें पहेली जैसी मालूम पड़ती हैं। ऐसा लगता है कि ये किसी और ही दुनिया की चीजें हैं।

एक बात और भी है। छांदोग्य आदि उपनिषदों में अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैव या आधिदैवत शब्द तो पाए जाते हैं। इसलिए जो उपनिषदों का मंथन करते और उनका अर्थ समझते हैं वह इन शब्दों के अर्थ गीता में भी समझने की कोशिश कर सकते हैं, करते हैं। इनके अर्थ भी वे लोग जैसे-तैसे समझ पाते हैं। मगर अधियज्ञ बिलकुल ही नया है। यह तो उपनिषदों में भी पाया जाता है नहीं। इसलिए न सिर्फ यह अकेला एक पहेली बन जाता है, बल्कि अपने साथ अध्यात्म आदि को भी वैसी ही चीज बना डालता है। जब हम अधियज्ञ का ठीक-ठीक आशय समझ नहीं पाते तो खयाल होता है कि हो न हो, अध्यात्म आदि भी कुछ इसी तरह की अलौकिक चीजें हैं। आठवें अध्याय के 3-4 श्लोकों में जो इनके अर्थ बताए गए हैं उनसे तो यह उलझन सुलझने के बजाए और भी बढ़ जाती है। जिस प्रकार कहते हैं कि 'मघवा मूल और विडौजा टीका'। यानी मघवा शब्द का अर्थ किसी ने विडौजा किया सही। मगर उससे सुननेवालों को कुछ पता ही न लगा। वे तो और भी परेशानी में पड़ गए कि यह विडौजा कौन-सी बला है। मघवा में तो मघ शब्द था जो माघ जैसा लगता था। मगर विडौजा तो एकदम अनजान ही है। ठीक यही बात यहाँ हो जाती है। ये शब्द तो कुछ समझ में आते भी हैं, कुछ परिचित जैसे लगते हैं। मगर इनके जो अर्थ बताए गए हैं वे? वे तो ठीक विडौजा जैसे हैं और समझ में आते ही नहीं।

बेशक यह दिक्कत है। इसलिए भीतर से पता लगाना होगा कि बात क्या है। एतदर्थ हमें उपनिषदों से ही कुंजी मिलेगी। मगर वह कुंजी क्या है यह जानने के पहले यह तो जान लेना ही होगा कि अधियज्ञ गीता की अपनी चीज है। गीता में नवीनता तो हई। फिर यहाँ भी क्यों न हो ? गीता ने यज्ञ को जो महत्त्व दिया है और उसके नए रूप के साथ जो इसकी नई उपयोगिता उसने सुझाई है उसी के चलते अध्यात्म आदि तीन के साथ यहाँ अधियज्ञ का आ जाना जरूरी था। एक बात यह भी है कि यज्ञ तो भगवत्पूजा की ही बात है। गीता की नजरों में यज्ञ का प्रधान प्रयोजन है समाज कल्याण के द्वारा आत्मकल्याण और आत्मज्ञान। गीता का यज्ञ चौबीस घंटा चलता रहता है यह भी कही चुके हैं। इसलिए गीता ने आत्मज्ञान के ही सिलसिले में यहाँ अधियज्ञ शब्द को लिख के शरीर के भीतर ही यह जानना-जनाना चाहा है कि इस शरीर में अधियज्ञ कौन है? बाहर देवताओं को या तीर्थ और मंदिर में भगवान को ढूँढ़ने के बजाए शरीर के भीतर ही यज्ञ-पूजा मान के गीता ने उसी को तीर्थ तथा मंदिर करार दे दिया है और कह दिया है कि वहीं आत्मा-परमात्मा की ढूँढ़ो। बाहर भटकना बेकार है। प्रश्न और उत्तर दोनों में ही जो 'इस शरीर में' - 'अत्र देहेऽस्मिन्' कहा गया है उसका यही रहस्य है।

इस संबंध में एक बात और भी जान लेना चाहिए। अगस्त कोन्त (Auguste Comte) नामक फ्रांसीसी दार्शनिक ने तथा और भी पश्चिमी दार्शनिकों ने किसी चीज के और खासकर समाज और सृष्टि के विवेचन के तीन तरीके माने हैं, जिन्हें पॉजिटिव (Positive) थियोलौजिकल (Theological) और मेटाफिजिकल (Metaphysical) नाम दिया गया है। मेटाफिजिक्स अध्यात्मशास्त्र को कहते हैं, जिसमें आत्मा-परमात्मा का विवेचन होता है और थियोलौजी कहते हैं, धर्मशास्त्र को, जिसमें स्वर्ग, नरक तथा दिव्यशक्ति-संपन्न लोगों का, जिन्हें देवता कहते हैं, वर्णन और महत्त्व पाया जाता है। पॉजिटिव का अर्थ है निश्चित रूप से प्रतिपादित या सिद्ध किया हुआ, बताया हुआ। कोन्त के मत से किसी पदार्थ को दैवी या आध्यात्मिक कहना ठीक नहीं है। वह इन बातों को बेवकूफी समझता है। उसके मत से कोई चीज स्वाभाविक (Natural) भी नहीं कहा जा सकती। ऐसा कहना अपने आपके अज्ञान का सबूत देना है। किंतु हरेक दृश्य पदार्थों का जो कुछ ज्ञान होता है वही हमें पदार्थों के स्वरूपों को बता सकता है और उसी के जरिए हम किसी वस्तु के बारे में निर्णय करते हैं कि कैसी है, क्या है आदि। बेशक, यह ज्ञान आपेक्षिक होता है - देश, काल, परिस्थिति और पूर्व जानकारी की अपेक्षा करके ही यह ज्ञान होता है, न कि सर्वथा स्वतंत्र। इसी ज्ञान के द्वारा उसके पदार्थों का विश्लेषण करके जो कुछ स्थिर किया जाता है वही पॉजिटिव है, असल है, वस्तुतत्त्व है। इसी प्रणाली को लोगों ने आधिभौतिक विवेचन की प्रणाली कहा है। इसे ही मैटिरियलिस्टिक मेथड (Materialistic method) भी कहते हैं। शेष दो को क्रमश: आधिदैवत एवं आध्यात्मिक विवेचन प्रणाली कहते हैं।

आधिदैवत प्रणाली में दिव्य शक्तियों की सत्ता स्वीकार करके ही आगे बढ़ते हैं। उसमें मानते हैं कि ऐसी अलौकिक ताकतें हैं जो संसार के बहुत से कामों को चलाती हैं। बिजली का गिरना, चंद्र-सूर्य आदि का भ्रमण तथा निश्चित समय पर अपने स्थान पर पहुँच जाना, जिससे ऋतुओं का परिवर्तन होता है, आदि बातें ऐसे लोग उस दैवी-शक्ति के ही प्रभाव से मानते हैं। ये बातें मानवीय शक्ति के बाहर की हैं। हमारी तो वहाँ पहुँच हई नहीं। सूर्य से निरंतर ताप निकल रहा है। फिर भी वह ठंडा नहीं होता! ऐसा करने वाली कोई दिव्य-शक्ति ही मानी जाती है। हम किसी चीज को कितना भी गर्म करें। फिर भी खुद बात की बात में वह ठंडी हो जाती है। मगर सूर्य क्यों ठंडा नहीं होता? उसमें ताप कहाँ से आया और बराबर आता ही क्यों कहाँ से रहता है? ऐसे प्रश्नों का उत्तर वे लोग यही देते हैं संसार का काम चलाने के लिए वह ताप और प्रकाश अनिवार्य होने के कारण संसार का निर्माण करने वाली वह दैवी-शक्ति ही यह सारी व्यवस्था कर रही है। इसी प्रकार प्राणियों के शरीरों की रचना वगैरह को भी ले सकते हैं। जाने कितनी बूँदें वीर्य की यों ही गिर जाती हैं और पता नहीं चलता कि क्या हुईं । मगर देखिए उसी की एक ही बूँद स्त्री के गर्भ में जाने से साढ़े तीन हाथ का मोटा-ताजा, विद्वान और कलाकार मनुष्य के रूप में तैयार हो जाता है सिंह, हाथी आदि जंतु बन जाते हैं! यह तो इंद्रजाल ही मालूम होता है! मगर है यह काम किसी अदृश्य हाथ या दिव्य शक्ति का ही। इसलिए उसकी ही पूजा-आराधना करें तो मानव-समाज का कल्याण हो। वह यदि जरा-सी भी नजर फेर दे तो हम क्या से क्या हो जाएँ। शक्ति का भंडार ही तो वह देवता आखिर है न? जिस प्रकार आधिभौतिकवादी जड़-पदार्थों की पूजा करते हैं या यों कहिए कि इन्हीं के अध्ययन में दिमाग खर्चना ठीक मानते हैं, ठीक वैसे ही आधिदैवतवादी देवताओं के ही ध्यान, अंवेषण आदि को कर्तव्य समझते हैं।

आध्यात्मिक पक्ष इन दोनों को ही स्वीकार न करके यही मानता है कि हर चीज की अपनी हस्ती होती है, सत्ता होती है, अपना अस्तित्व होता है। वही उसकी अपनी है, स्व है, आत्मा है। उसे हटा लो, अलग कर दो। फिर देखो कि वह चीज कहाँ चली गई, लापता हो गई! मगर जब तक उसकी आत्मा मौजूद है, सत्ता कायम है तब तक उसमें कितनी ताकतें हैं! बारूद या डिनामाइट से पहाड़ों को फाड़ देते हैं। बिजली के क्या-क्या करामाती काम नहीं होते! आग क्या नहीं कर डालती! दिमागदार वैज्ञानिक क्या-क्या अनोखे आविष्कार करते हैं! हाथी पहाड़ जैसा जानवर कितना बोझ ढो लेता है! सिंह कितनी बहादुरी करता है! मनुष्यों की हिम्मत और वीरता का क्या कहना! मगर ये सब बातें तभी तक होती हैं जब तक इन चीजों की हस्ती है, सत्ता है, आत्मा है। उसे हटा दो, सत्ता मिटा दो। फिर कुछ न देखोगे। अतएव यह आत्मा ही असल चीज है, इसी की सारी करामात है। इसका हटना या मिटना यही है कि हम इसे देख नहीं पाते। यह हमसे ओझल हो जाती है। इसका नाश तो कभी होता नहीं, हो सकता नहीं। आखिर नाश की भी तो अपनी आत्मा है, सत्ता है, हस्ती है। फिर तो नाश होने का अर्थ ही है आत्मा का रहना। यह भी नहीं कि वह आत्मा जुदा-जुदा है। वह तो सबों में - सभी पदार्थों में - एक ही है। उसे जुदा करे कौन? जब एक ही रूप, एक ही काम, एक ही हालत ठहरी, तो विभिन्नता का प्रश्न ही कहाँ उठता है? जो विभिन्नता मालूम पड़ती है वह बनावटी है, झूठी है, धोखा है, माया है। यह ठीक है कि शरीरों में ज्ञान के साधन होने से चेतना प्रतीत होती है। मगर पत्थर में यह बात नहीं। लेकिन आत्मा का इससे क्या? आग सर्वत्र है। मगर रगड़ दो तो बाहर आ जाए। नहीं तो नहीं! ज्ञान को प्रकट करने के लिए इंद्रियाँ आग के लिए रगड़ने के समान ही हैं। इस तरह आध्यात्मिक पक्षवाले सर्वत्र आत्मा को ही देखते हैं, ढूँढ़ते हैं। उसे ही परमात्मा मानते हैं।

कुछ लोगों का खयाल है कि इन्हीं आधिभौतिक, आदिदैवत एवं आध्यात्मिक - तीनों - पक्षों का जिक्र गीता में किया गया है। उनके मत से गीता का यही कहना है कि हमें इन सभी पक्षों को जानना चाहिए। जिन्हें मुक्ति लेना है और जन्म-मरण से छुटकारा पाना है उन्हें इन सभी पक्षों का मंथन करना ही होगा। वे खामख्वाह इन सबों का मंथन करते हैं। सातवें अध्याय के अंत के जिन दो श्लोकों में ये बातें कही गई हैं और इसीलिए आठवें के शुरू में इनके बारे में पूछने का मौका अर्जुन को मिल गया है, उनमें पहले यानी 29वें श्लोक में तो उनके मत से कुछ ऐसा ही लिखा भी गया है। वह श्लोक यों है, 'जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये। ते ब्रह्म तद्विदु: कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम्॥' इसका अर्थ यह है कि 'जो लोग भगवान का आश्रय लेकर जन्म, मरणादि से छुटकारा पाने की कोशिश करते हैं वे उस ब्रह्म को पूरा-पूरा जान लेते हैं, सभी कर्मों को जान जाते हैं और अध्यात्म आदि को भी जानते हैं।' इससे वे लोग अपना खयाल सही साबित करते हैं।

मगर बात दरअसल ऐसी है नहीं। वस्तुओं के विवेचन के उक्त तीन तरीके हैं सही। इन्हें लोग अपनी-अपनी रुचि एवं प्रवृत्ति के अनुसार ही अपनाते भी हैं। मगर यहाँ उन तरीकों तथा प्रणालियों से मतलब हर्गिज है नहीं। यदि इन श्लोकों से पहले के सिर्फ सातवें अध्याय के ही श्लोकों पर गौर किया जाए तो साफ मालूम हो जाता है कि आत्मा-परमात्मा की एकता के ज्ञान का ही वह प्रसंग है। इसीलिए वही बात किसी न किसी रूप में कई प्रकार से कही गई है। 16-19 श्लोकों में तो भक्तों के चार भेदों को गिना के ज्ञानी को ही चौथा माना है और कहा है कि 'ज्ञानी तो मेरी - भगवान की - आत्मा ही है' - ''ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्'' (7। 18)। इसकी वजह भी बताते हैं कि 'वह तो हमसे - परमात्मा से - बढ़ के किसी को मानता ही नहीं और हमीं में डूब जाता है' - ''आस्थित: सहि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम्'' (7। 18) लेकिन इसके बाद ही जो यह कहा है कि 'संसार में जो कुछ है वह सबका सब वासुदेव - परमात्मा - ही है, ऐसा जो समझता है, वह तो अत्यंत दुर्लभ महात्मा है' - ''वासुदेव: सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभ:'' (7। 19), वह तो बाकी बातों को हवा में मिला देता है। उससे तो स्पष्ट हो जाता है कि यही एक ही चीज दरअसल जानने की है।

इतना ही नहीं। इसके आगे 20-27 श्लोकों में उन लोगों की काफी निंदा भी की गई है जो दूसरे देवताओं या पदार्थों की ओर झुकते हैं। उनकी समझ घपले में पड़ी हुई बताई गई है, 'हृतज्ञाना:' (7। 20)। 'इसीलिए तुच्छ एवं विनाशशील फलों को ही वे लोग प्राप्त कर पाते हैं।' - ''अंतवत्तु फलं तेषां'' (7। 23)। भौतिक दृष्टिवालों के बारे में तो यहाँ तक कह दिया है कि हमारे असली रूप को न जान के ही ऐसे बुद्धिहीन लोग स्थूल रूप में ही हमें देखते हैं -'अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धय:' (7। 24)। आगे के तीन श्लोकों में इसी बात का स्पष्टीकरण हुआ है। अंत में तो यहाँ तक कह दिया है कि रागद्वेष के चलते जो अपने-पराए और भले-बुरे की गलत धारणा हो जाती है उसी का यह नतीजा है कि लोग इधर-उधर इस सृष्टि के भौतिक पदार्थों में भटकते फिरते हैं - 'इच्छाद्वेष समुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत। सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यांति परंतप' (7। 27)। इसके विपरीत जिन सत्कर्मियों में यह रागद्वेषादि ऐब नहीं हैं वे अपने-पराए आदि के झमेले में न पड़ के पक्के निश्चय एवं दृढ़संकल्प के साथ केवल हमीं - परमात्मा - में रम जाते हैं - 'येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्। ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढ़व्रता:' (7। 28)। इसी के बाद वे श्लोक आए हैं। तब कैसे कहा जाए कि उनमें आधिभौतिक आदि विवेचनों पर जोर दिया गया है या ऐसे विवेचनों की जानकारी अवश्य प्राप्तव्य बताई गई है?

इसके सिवाय उक्त तीन बातों के अलावा ब्रह्म और कर्म की जानकारी की भी तो बात वही लिखी है। शंका भी इन दोनों ही के बारे में की गई है। उत्तर भी दिया गया है। भला अधियज्ञ को तो उन्हीं तीनों के साथ जैसे-तैसे जोड़ के वे लोग पार हो जाते हैं। मगर मरने के समय भगवान की जानकारी कैसे होती है, यह भी तो एक प्रश्न है। पता नहीं वे लोग इसे किस पक्ष में डालते हैं ऐसा तो कोई पुराना पक्ष है नहीं। और अधियज्ञवाला पक्ष तो बिलकुल ही नया है। फिर पुरानों के साथ इसका मेल कैसे होता है? खूबी तो यह है कि उनने 'अधिदेह' नाम का एक दूसरा भी पक्ष यहीं पर खड़ा कर दिया है और यह ऐसा है कि 'न भूतो न भविष्यति।' यदि वे लोग यह समझ पाते कि अध्यात्म शब्द में जो आत्मा शब्द है वह देह के ही मानी में है और जहाँ-तहाँ यह शब्द छांदोग्य, बृहदारण्यक आदि उपनिषदों या और जगह आया है इसी मानी में आया है, तो शायद अधिदेह की बात बोलने की हिम्मत ही न करते। ज्यादा तो नहीं, लेकिन हमारा उनसे यही अनुरोध है कि छांदोग्य के पहले अध्याय का दूसरा, खंड बृहदारण्यक के पहले अध्याय के पाँचवें ब्राह्मण का 21वाँ मंत्र तथा कौषीत की उपनिषद् के चौथे अध्याय के 9-17 मंत्रों को गौर से पढ़ जाएँ। तब उन्हें पता लगेगा कि अध्यात्म में जो आत्मा शब्द है वह शरीर का ही वाचक है या नहीं।

लेकिन जब कर्म, ब्रह्म और मरण काल का ब्रह्मज्ञान किसी पुराने पक्ष की चीज नहीं है तो फिर अध्यात्म वगैरह को ही क्यों पुराने पक्ष में घसीटा जाए? और इन पक्षों को जानने से लाभ ही क्या? किसी विश्वविद्यालय की न तो परीक्षा ही देनी है और न कोई उपाधि ही लेनी है। कोई पुस्तक भी नहीं लिखनी है कि पांडित्य का प्रदर्शन किया जाएगा या खंडन-मंडन ही होगा, जिसके लिए इन अनेक पक्षों की जानकारी जरूरी हो जाती है। यहाँ तो ब्रह्मज्ञान और मोक्ष का ही सवाल है। सो भी मरणकाल की जानकारी की बात उठा के यह भी जनाया है कि विशेष रूप से मरण समय के लिए जरूरी बातें यहाँ बता दी गई हैं। यही कारण है कि चार श्लोकों में ये बातें खत्म करके पाँचवें के ही 'अंतकाले च' आदि शब्दों से शुरू करके उसी अंतकाल या मरण समय की ही बातें अंत तक लिखी गई हैं। तरीका भी बताया गया है कि किस प्रकार उस समय आत्मा और ब्रह्म का साक्षात्कार होता है। मरने पर लोग किन-किन रास्तों से हो के जाते हैं यह बात भी अंत में कही गई है। ऐसी हालत में आधिभौतिक आदि मतवादों का तो यहाँ अवसर ही नहीं है। इसीलिए मानना पड़ता है कि इन बखेड़ों से यहाँ कोई भी मतलब नहीं है।

असल बात यह है कि प्राचीन समय में कुछ ऐसी प्रणाली थी कि हम क्या हैं, यह संसार क्या है और हमारा इसके साथ संबंध क्या है, इन्हीं तीन प्रश्नों को लेकर जो अनेक दर्शनों की विचारधाराएँ हुई थीं और आत्मा-परमात्मा आदि का पता लगा था, या यों कहिए कि इनकी कल्पना की गई थी, उन्हीं में एक व्यावहारिक या अमली धारा ऐसी भी थी कि उसके माननेवाले निरंतर चिंतन में लगे रहते थे। उनकी बात कोई शास्त्रीय-विवेचन की पद्धति न थी। वे तो खुद दिन-रात सोचने-विचारने एवं ध्यान में ही लगे रहते थे। इसीलिए हमने उनकी धारा या प्रणाली को अमली और व्यावहारिक (Practical) कहा है। इस प्रणाली के सैद्धांतिक पहलू पर लिखने-पढ़ने या विवाद करने वाले भी लोग होंगे ही। मगर हमारा उनसे मतलब नहीं है और न गीता का ही है। गीता में तो अमली बात का वह प्रसंग ही है। वही बात वहाँ चल रही है। आगे भी मरण समय की बात आ जाने के कारण अमली या व्यावहारिक चीज की ही आवश्यकता हो जाती है। मरणकाल में कोरे दार्शनिकवादों से सिवाय हानि के कुछ मिलने-जुलनेवाला तो है नहीं।

ऐसे लोगों ने दृश्य - बाहरी - संसार को पहले दो भागों में बाँटा। पहले भाग में रखा अपने शरीर को। अपने शरीर से अर्थ है चिंतन करनेवालों के शरीर से। फिर भी इस प्रकार सभी जीवधारियों के शरीर, या कम से कम मनुष्यों के शरीर इस विभाग में आ जाते हैं। क्योंकि सोचने-विचारने का मौका तो सभी के लिए है। हालाँकि एक आदमी के लिए दूसरों के भी शरीर वैसे ही हैं जैसे अन्न, वस्त्र, पृथिवी, वृक्ष आदि पदार्थ। शरीर के अतिरिक्त शेष पदार्थों को भूत या भौतिक माना गया। पीछे इन भौतिक पदार्थों के दो विभाग कर दिए गए। एक तो ऐसों का जिनमें कोई खास चमत्कार नहीं पाया जाता। इनमें आ गए वृक्ष, पर्वत, नदी, समुद्र, पृथिवी आदि। दूसरा हुआ उन पदार्थों का जिनमें चमत्कार पाया गया। इनमें आए चंद्र, सूर्य, विद्युत आदि। इस प्रकार शरीर, पृथिवी आदि सूर्य प्रभृति, इन तीन विभागों में दृश्य संसार को बाँट दिया गया। शुरू में तो शरीर के सिवाय आत्मा, स्व, या निज नाम की और चीज का पता था नहीं। इसलिए शरीर को ही आत्मा भी कहते थे। पृथिवी आदि स्थूल पदार्थों को, जिनमें चमत्कार या दिव्य-शक्ति नहीं देखी गई, भूत कहने लगे। भूत का अर्थ है ठोस। इन्हें छू के इनका ठोसपन जान सकते थे। मगर जो आदमी की पहुँच के बाहर के सूर्य, चंद्र, विद्युत्, आदि पदार्थ थे उन्हें देवता, देव या दिव्य कहते थे। इनके ठोसपन का पता तो लगा सकते न थे। ये चीजें आकाश में ही नजर आती हैं। इसलिए आकाश को भी दिव् या द्यु कहते थे। वह ठोस भी तो नहीं है। जिस स्वर्ग नामक स्थान में इन दिव्य पदार्थों का निवास माना गया वह भी दिव् या द्यु कहा जाने लगा।

इस प्रकार आत्म या आत्मा, भूत और देव या देवता इन - तीन - विभागों के हो जाने के बाद सोचने-विचारने, चिंतन या ध्यान की प्रक्रिया आगे बढ़ी। आगे चल के शरीर के विश्लेषण करने पर इंद्रिय प्राण, बुद्धि आदि को शरीर से स्वतंत्र स्वीकार करना पड़ा। भौतिक शरीर को छोड़ देने के बाद भी इंद्रिय, प्राणादि रहते हैं। तभी तो जन्म, मरण, पुनर्जन्म आदि की बात मानी जाती है। यदि ये अलग न होते तो कौन जाता, कौन आता और किसका जन्म बार-बार होता? फलत: आत्मा या शरीर में रहने के कारण ही इंद्रियादि को अध्यात्म कहा गया। उपनिषदों में यही बात रह-रह के लिखी पाई जाती है। पाणिनीय व्याकरण के अव्ययीभाव समास के नियमानुसार यही अर्थ भी अध्यात्म शब्द का है कि आत्मा में रहने वाला। 'अधि' को अव्यय कहते हैं। उसी का आत्म शब्द के साथ समास हो के अध्यात्म बना है। फिर कालांतर में जब अंवेषण और भी आगे बढ़ा तो शरीर, इंद्रियादि से अलग आत्मा नामक एक अजर-अमर पदार्थ की कल्पना हुई। उसकी भी जानकारी तो शरीर में ही होती है। उसे भी इसीलिए अध्यात्म कह दिया। उसी आत्मा को जब परमात्मा मान लिया और इसका विवेचन भी किया गया तो सभी विवेचनों को अध्यात्मशास्त्र, आध्यात्मिकशास्त्र या आध्यात्मिक विवेचन नाम दिया गया।

इसी प्रकार भौतिक पदार्थों या भूतों का भी विश्लेषण एवं विवेचन किया गया और उनमें जो रूप, रस, गंध आदि खूबियाँ या विशेषताएँ पाई गईं उन्हें अधिभूत कहा गया। वे भूतों में ही जो पाई गईं। कुछ अंवेषणकर्त्ता यहीं टिक गए और आगे न बढ़े। दूसरे लोग आगे बढ़े और इन भूतों में भी सत्ता, अस्तित्व आदि जैसी चीजों का पता लगाया। इनके बारे में हमने पहले ही बहुत कुछ कहा है। इसी प्रकार देव या देवता कहे जाने जानेवालों की भी जाँच-पड़ताल होती रही। भूतों के अंवेषण होने पर जिन पदार्थों को अधिभूत कहा गया उनके संबंध के विवेक, विचार और मंथन आदि को ही आधिभौतिक नाम दिया गया। इसी तरह देवों या देवताओं में जो भी विभूति, खूबी, चमक, आभा वगैरह जान पड़ी उसे अधिदेव, अधिदैव या अधिदैवत नाम दिया गया। तत्संबंधी चिंतन, ध्यान या विवेचन भी आधिदैवत, आधिदैव या आधिदैविक कहा जाने लगा। पीछे तो लोगों ने अधिभूत और अधिदैव को एक में मिला के सबों के भीतर एक अंतर्यामी पदार्थ को मान लिया, जो सबों को चलाता है, कायम रखता है, व्यवस्थित रखता है। उसी अंतर्यामी को ब्रह्म या परमात्मा कहने लगे। सबसे बड़ा होने के कारण ही उसे ब्रह्म कहना शुरू किया। शरीर के भीतरवाली आत्मा को व्यष्टि मान के ब्रह्म को परमात्मा, बड़ी आत्मा या समष्टि आत्मा कहने की रीति चल पड़ी।

ऊपर हमने जो कुछ लिखा है वह शुरू से लेकर आज तक की स्थिति का संक्षिप्त वर्णन है। शुरू से ही यह हालत तो थी नहीं। यह परिस्थिति तो क्रमिक विकास होते-होते पैदा हो गई है। जब स्वतंत्र रूप से लोगों का चिंतन चलता था तो कोई अध्यात्म-विमर्श में लगे थे, कोई अधिदैव-विचार में और कोई अधिभूत-विवेचन में। यह तो संभव न था कि सभी लोग सभी बातें सोच सकें। तब तो सभी बातें अधूरी ही रह जातीं। कोई भी पूरी न हो पाती, अंत तक पहुँच पाती नहीं। और ज्ञान की वृद्धि के लिए वह अधूरापन सर्वथा अवांछनीय है, त्याज्य है। यही कारण है कि अलग-अलग सोचने वाले अपने-अपने कामों में लीन थे। यही कारण है कि जब तक सब लोग गोष्ठी या परस्पर विमर्श नहीं कर लेते थे तब तक अनेक स्वतंत्र निश्चयों पर पहुँचते थे। यह बात स्वाभाविक थी। श्वेताश्वतर उपनिषद् के पहले ही दो मंत्रों 'ब्रह्मवादिनो वदन्ति, किं कारणं ब्रह्म कुत: स्म जाता:' आदि, तथा 'काल: स्वभावो नियतिर्यदृच्छा' आदि में यही मतभेद और विचारभेद बताया गया है। साथ ही सभी सोचने वालों को ब्रह्मवादी ही कहा है, न कि किसी को भी कमबेश। उसी के छठे अध्याय के पहले मंत्र में भी इसी प्रकार के विचार-विभेद का उल्लेख 'स्वभावमेके कवयो वदन्ति' आदि के द्वारा किया है। वहाँ सबों को कवि या सूक्ष्मदर्शी कहा है। छांदोग्य के छठे अध्याय के दूसरे खंड के पहले ही मंत्र में 'सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् तद्धैक आहुरसदेवेदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्' आदि के जरिए यही विचार विभिन्नता बताई गई है और अगले 'कुतस्तु खलु' मंत्र में इसी का खंडन-मंडन लिखा गया है। फलत: विभिन्न विचारों के प्रवाह होने जरूरी थे।

वैसी हालत में जो परम कल्याण या मोक्ष की आकांक्षा रखता हो उसके दिल में यह बात स्वभावत: उठ सकती है कि कहीं धोखा और गड़बड़ न हो जाए; कहीं ऐसा रास्ता न पकड़ लें कि या तो भटक जाएँ या परेशानी में पड़ जाएँ; कहीं ऐसे मार्ग में न पड़ें जो अंत तक पहुँचने वाला न हो के मुख्य मार्ग से जुटने वाली पगडंडी या छोटी-मोटी सड़क हो; राजमार्ग के अलावा कहीं दूसरे ही मार्ग के पथिक न बन जाएँ; कहीं ऐसा न हो कि मार्ग तो सही हो, मगर उसके लिए जरूरी सामान संपादन करने वाले उपाय या रास्ते छूट जाएँ और सारा मामला अंत में खटाई में पड़ जाए। जो सभी विचारपद्धतियों एवं चिंतनमार्गों को बखूबी नहीं जानते और न उनके लक्ष्य स्थानों का ही पता रखते हैं उनके भीतर ऐसी जिज्ञासा का पैदा होना अनिवार्य है। जिन्हें सभी विचार प्रवाहों का समन्वय या एकीकरण विदित न हो और जो यह समझ सके न हों कि पुष्पदंत के शब्दों में रुचि या प्रवृत्ति के अनुसार अनेक मार्गों को पकड़ने वाले अंत में एक ही लक्ष्य तक - परमात्मा तक - पहुँचते हैं - 'रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथ जुषाम्, नृणामे को गम्यवत्वमसि पयसामर्णव इव,' वे तो घबरा के सवाल करेंगे ही कि 'परमात्मा का ध्यान तो हम करेंगे सही, लेकिन अध्यात्म, अधिदैव, अधिभूत का क्या होगा? उनकी जानकारी हमें कैसे होगी? यदि न हो तो कोई हानि तो नहीं?'

सबसे बड़ी बात यह है कि उस काम में फँस जाने पर कर्मों से तो अलग हो जाना ही होगा। यह तो संभव नहीं कि ध्यान और समाधि भी करें और कर्मों को भी पूरा करें। ऐसी दशा में संसार का एवं समाज का कल्याण कहीं गड़बड़ी में न पड़ जाए यह खयाल भी परेशान करेगा ही। उनका यह काम ऐसे मंगलकारी कर्मों के भीतर तो शायद ही आए। कम से कम इसके बारे में उन्हें संदेह तो होगा ही। फिर काम कैसे चलेगा? और अगर जानकार लोग ही समाज के लिए मंगलकारी कामों को छोड़ के अपने ही मतलब में - अपनी ही मुक्ति के साधन में - फँस जाएँ, तो फिर संसार की तो खुदा ही खैर करे। तब तो संसार पथदर्शन के बिना चौपट ही हो जाएगा। इसके अतिरिक्त यज्ञवाला प्रश्न भी उन्हें परेशान करेगा। जब पहले ही कहा जा चुका है कि 'यज्ञों के बिना तो यहीं खैरियत नहीं होती, परलोक का तो कुछ कहना ही नहीं' - ''नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्य: कुरुसत्तम'' (4। 31), तो काम कैसे चलेगा? तब तो सब खत्म ही समझिए। यज्ञ के ही बारे में एक बात और भी उठ सकती है। यदि कहा जाए कि यज्ञ तो व्यापक चीज है। अतएव ध्यान और समाधि के समय भी होता ही रहता है, तो सवाल होता है कि यज्ञ में असल लक्ष्य, असल ध्येय कौन है जिसे संतुष्ट किया जाए? कहीं वह कोई दूसरा तो नहीं है। ज्ञान, ध्यान तो शरीर के भीतर ही होता है और यह यदि यज्ञचक्र में आ गया तब तो अच्छी बात है। तब तो बीमारी, दुर्बलता, अशक्ति और मरणावस्था में भी यह हो सकता है। इसलिए तब खासतौर से यह जानना जरूरी हो जाता है कि शरीर के भीतर जब यज्ञ होता है तो उससे किसकी तृप्ति होती है, कौन संतुष्ट होता है? कहीं नास्तिकों की तरह खाओ-पिओ, मौज करो की बात तो नहीं होती और केवल अपना ही संतोष तो नहीं होता? असल में उस यज्ञ से परमात्मा तक पहुँचते हैं या नहीं यही प्रश्न है। इसीलिए देह के भीतर ही अधियज्ञ को जानने की उत्कंठा हुई है। क्योंकि सबसे महत्त्वपूर्ण चीज यही है और सबसे सुलभ भी। मगर यदि इससे इंद्रियादि की ही पुष्टि हुई तो सारा गुड़ गोबर हो जाएगा। इसीलिए सभी प्रश्न किए गए हैं। यह ठीक है कि सातवें अध्याय के अंत में कृष्ण ने कह दिया है कि वह ज्ञान सर्वांगपूर्ण है - इसमें कोई कमी नहीं है; क्योंकि अधिभूत आदि को भी ऐसा पुरुष बखूबी जानता है। लेकिन जब तक अर्जुन को पता न लग जाए कि आखिर ये अधिभूत आदि हैं क्या, तब तक संतोष हो तो कैसे? इसलिए आठवें के शुरू में उसने यही पूछा है, यही प्रश्न किए हैं।

उनके उत्तर भी ठीक वैसे ही हैं जिनसे पूछने वाले को पूरा संतोष हो जाए। मरने के समय भगवान को जानने की जो उत्कंठा दिखाई गई थी उसका संबंध अधियज्ञ से ही है। इसीलिए उसे उसके बाद ही रखा है और उसका उत्तर शेष समूचे अध्याय में दिया गया है। क्योंकि सब प्रश्नों का मतलब चौपट हो जाए, यदि वह बात न हो सके। अर्जुन को यह भी खयाल था कि कृष्ण कहीं अपने आपकी ही भक्ति की बात न करते हों, और इस प्रकार ब्रह्मज्ञान से नाता ही न रह जाने पर कल्याण में बाधा न पड़ जाए। इसीलिए अर्जुन ने पूछा कि आखिर वह ब्रह्म क्या है? आपसे या ईश्वर से अलग है या एक ही चीज? उसका यह भी खयाल था कि कहीं ब्रह्म या परमात्मा भी वैसा ही चंदरोजा न हो जैसी यह दुनिया। तब तो मुक्ति का यत्न ही बेकार हो जाएगा। हिरण्यगर्भ को भी तो ब्रह्मा या ब्रह्म कहते हैं और उसका नाश माना जाता है। यही कारण है कि उस ब्रह्मा से पृथक परम अक्षर या अविनाशी ब्रह्म का निरूपण आगे किया गया है। वहाँ बताया गया है कि क्यों ब्रह्मा का नाश होता है और कैसे, लेकिन अक्षर ब्रह्म का क्यों नहीं?

उत्तर से सभी बातों की पूरी सफाई हो जाती है। परम अक्षर को ब्रह्म कहा है। असल में पंदरहवें अध्याय के 'द्वाविमौ पुरुषौ लोके' (16) श्लोक में जीव को भी अक्षर कहा है। इसीलिए परम आत्मा - परमात्मा - की ही तरह यहाँ परम अक्षर कहने से परमात्मा का ही बोध होता है। नहीं तो गड़बड़ होती।

अध्यात्म को स्वभाव कहा है। ब्रह्म के बाद स्वभाव शब्द आने से इसमें स्व का अर्थ वही ब्रह्म ही है। उसी का भाव या स्वरूप स्वभाव कहा जाता है। अर्थात अध्यात्म, जीव या आत्मा ब्रह्म का ही रूप है। गीता में स्वभाव शब्द कई जगह आया है। अठारहवें अध्याय के 41-44 श्लोकों में कई बार यह शब्द प्रकृति या गुणों के अनुसार दिल-दिमाग की बनावट के ही अर्थ में आया है। उसी अध्याय के 60वें श्लोक वाले का भी वही अर्थ है। पाँचवें अध्याय के 'न कर्त्तृव्यं' (14) श्लोक में जो स्वभाव है उसका अर्थ है सांसारिक पदार्थों या सृष्टि का नियम। मगर जैसे अठारहवें अध्याय के स्वभाव शब्द में स्व का अर्थ है गुण और तदनुसार रचना, उसी तरह पाँचवें अध्याय में स्व का अर्थ है इसके पहले के सांसारिक पदार्थ, जिनका जिक्र उसी श्लोक में हैं। सातवें अध्याय के ही 20वें श्लोक में जो भाव शब्द है उसका अर्थ है पदार्थ या हस्ती-अस्तित्व। ठीक उसी प्रकार इस श्लोक में भी स्वभाव का अर्थ हो जाता है ब्रह्म का भाव, अस्तित्व या रूप। दूसरा अर्थ ठीक नहीं होगा।

कम का जो स्वरूप बताया गया है वह भी व्यापक है। 'भूतभावोद्भवकरो विसर्ग:' यही उसका स्वरूप है। इसका अर्थ है जिससे पदार्थों का अस्तित्व, वृद्धि या उत्पत्ति हो उस त्याग, जुदाई या पार्थक्य को कर्म कहते हैं। यहाँ विसर्ग शब्द और सातवें के 27वें का सर्ग शब्द मिलते-जुलते हैं। संस्कृत के धातुपाठ में जो धातुओं का अर्थ लिखा गया है वहाँ सृज धातु का विसर्ग ही अर्थ लिखा है। पहले कह चुके हैं कि 'तपाम्यमहं वर्षं' (9। 19) श्लोक में उत्सृजामिका जो उत्सर्ग अर्थ है वही विसर्ग का भी है। दोनों में सृज धातु ही है। वर्णमाला में आखिर अक्षर जो स्वरगणना में पाया जाता है उसे भी विसर्ग एवं विसर्जनीय कहते हैं। ब्राह्मणग्रंथों में 'वैसर्जन होम' आता है। वहाँ भी विसर्जन का अर्थ है समाप्ति या खात्मा, या छोड़ देना। स्वरों का अंत होने के कारण ही विसर्ग आखिरी स्वरवर्ण है। वहाँ भी उस सिलसिले का अंत है। मल-मूत्रादि के त्याग या वीर्यपात को भी विसर्ग कहते हैं। सारांश यह है कि जिस चीज के छोड़ने, अलग करने, पूरा करने, प्रयोग करने, त्यागने से सृष्टि की उत्पत्ति, रक्षा, वृद्धि आदि हो सके वही कर्म है। इस प्रकार इस व्यापक अर्थ में ज्ञान, ध्यान, समाधि वगैरह का भी समावेश हो जाता है और इस तरह प्रश्नकर्त्ता का शक जाता रहता है। यह कम कल्याणकारी चीजें नहीं हैं। गीता का कर्म कोई पारिभाषिक या खास ढंग की चीज नहीं है, यही आशय है।

'अधिभूतं क्षरोभाव:' का अर्थ है कि पदार्थों का जो क्षर स्वरूप है, या यों कहिए कि उनकी विनाशिता है वही अधिभूत है। भाव शब्द तीन बार इतनी ही दूर में आ गया है और तीनों का एक ही अर्थ है सत्ता, अस्तित्व या रूप। पहले कह चुके हैं कि आखिर दृश्यजगत या भौतिक पदार्थों में जो विनाशिता है वह तो अजर-अमर है। यदि वह ऐसी न हो और सदा रहने वाली न हो तो पदार्थ ही अविनाशी बन जाएँ। इसीलिए वही उनका असली रूप है, स्व है, आत्मा है। आत्मा को तो गीता ने बार-बार अविनाशी कहा है। इस संबंध में बृहदारण्यक का वचन भी पहले ही लिखा जा चुका है। इस प्रकार अधिभूत भी आत्मा या परमात्मा से जुदा नहीं है। मगर उसे जिस ढंग से कहा है उसमें सुंदर दार्शनिकता पाई जाती है। इसी अध्याय के 20वें श्लोक में भाव शब्द जिस अर्थ में आया है वही अर्थ यहाँ भी है - पदार्थों का असल मूल वही है जिसे आत्मा या परमात्मा कहते हैं।

'पुरुषश्चाधिदैवतम्' का अर्थ है कि 'पुरुष ही अधिदैवत है।' गीता के 'द्वाविमौ पुरुषौ' श्लोक की बात कह चुके हैं। उसमें पुरुष आता है। उसी में 'क्षर: सर्वाणि भूतानि' भी लिखा है, जिससे अधिभूत का अर्थ साफ होता है। मगर प्रकृति तथा जीव दोनों को ही पुरुष कहा गया है, यह बात याद रखने की है। उससे आगे के 17वें श्लोक में 'उत्तम: पुरुष:' शब्दों में परमात्मा को उत्तम पुरुष या दोनों से ही पृथक बताया है और 18वें में उसी को पुरुषोत्तम भी कहा है। इससे सिद्ध हो जाता है कि आधिदैवत भी वही परमात्मा या पुरुष है और है वह सभी का स्वरूप 'वासुदेव: सर्वम्।'

अंत में 'अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे' के द्वारा यह कह दिया है कि मैं - परमात्मा - ही सभी शरीरों के भीतर अधियज्ञ हूँ। जो दिन-रात, श्वास-प्रश्वास, खानपान, निद्रा, बोलचाल, विचार, ध्यान आदि के रूप में 'यत् करोऽषि यदश्नासि' (9। 27) के अनुसार अखंड यज्ञ जारी है उससे भगवान की ही पूजा हो रही है, यही इसका आशय है। यह पूजा सुलभ और सुकर है। फलत: चिंता का अवसर रही नहीं जाता।

सातवें अध्याय के अंतिम - 29, 30 - श्लोकों में जो कुछ कहा है वह भी हमारे पूर्व के बताए इसी अर्थ का पोषक है। उन दोनों श्लोकों का पूरा विचार किया जाए तो यही अभिप्राय व्यक्त होता है कि जन्म-मरण आदि के संकटों से छुटकारा सदा के लिए पा जाने के विचार से जो लोग भगवान में ही रमते और यही काम करते हैं वह उस पूर्ण ब्रह्म को भी जानते हैं, अध्यात्म को भी और सभी कर्मों को भी। अधिभूत, अधिदैव तथा अधियज्ञ के रूप में भी भगवान को वही जानते हैं। इसीलिए पूर्ण योगी होने के कारण मरण समय में भी परमात्मा को साक्षात जान लेते हैं। दूसरे शब्दों में इसका आशय यह है कि जो लोग अधिभूत, अधिदैव, अधियज्ञ, अध्यात्म, ब्रह्म और कर्म को जानते हैं वही परमात्मा को अंत में भी जानते हैं। वही जरामरण - जन्ममरण - से छुटकारा पाने का यत्न भी ठीक-ठीक करते हैं। हर हालत में जानने से ही मतलब है; न कि शास्त्री य पद्धति एवं वादविवाद से। ये सभी एक ही चीज हैं यह इससे साफ हो जाता है। 'एकै साधे सब सधै' भी चरितार्थ हो जाता है। इसलिए भगवान में रमनेवाले के लिए चिंता की कोई गुंजाइश रह जाती नहीं।

एक ही बात और कहके इस लंबे विवेचन को पूरा करेंगे। जिस सातवें अध्याय में अध्यात्म आदि आए हैं और आठवें तक चले गए हैं उसके शुरू का ही श्लोक ऐसा है, 'ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषत:। यज्ज्ञात्वा नेह भूयोन्यज्ज्ञातव्यम विशिष्यते' (7। 2)। इसका भाव यह है कि 'हम तुम्हें ज्ञान-विज्ञान दोनों ही बताएँगे, सो भी पूरा-पूरा। उसके बाद तो कुछ जानना बाकी रही नहीं जाएगा।' इससे यह स्पष्ट होता है कि आगे जो कुछ कहा गया है वह ज्ञान और विज्ञान के ही सिलसिले में विस्तार के साथ आया है। ज्ञान और विज्ञान की बात यहीं से शुरू हो के सत्रहवें अध्याय के अंत तक पाई जाती है। अठारहवें में भी बहुत कुछ वही है। सातवें अध्याय का तो नाम ही है ज्ञान-विज्ञान योग। नवें अध्याय के पहले श्लोक में भी 'ज्ञानं विज्ञानसहितं' आया ही है। इस पर आगे और भी लिखेंगे। लेकिन ज्ञान-विज्ञान की बात चालू है यह तो मानना ही होगा। उसी प्रसंग से अध्यात्म आदि आए हैं यह भी निर्विवाद है।

और यह ज्ञान एवं विज्ञान है क्या चीज? ज्ञान तो है जानकारी या अनुभव और उसमें जब विशेषता या खूबी आ जाए तो वह हुआ विज्ञान। किसी ने हमें कह दिया या हमने कहीं पढ़ लिया कि सफेद और पीले रंगों को मिला के लाल तैयार करते हैं। यही हुआ लाल रंग के बारे में ज्ञान। इसे सामान्य जानकारी भी कह सकते हैं। मगर जब हमने खुद दोनों रंगों को मिला के लाल रंग तैयार कर लिया और उसकी पूरी जानकारी हासिल कर ली, तो वही हो गया विज्ञान। दूसरा दृष्टांत लीजिए। कहीं पढ़ लिया या जान लिया कि हाइड्रोजन और ऑक्सीजन नामक हवाओं को विभिन्न अनुपात में मिलाने से ही जल तैयार हो जाता है। यह ज्ञान हुआ। और जब किसी प्रयोगशाला में जा के हमने इसका प्रयोग खुद करके देख लिया या दूसरों से प्रयोग करा लिया तो वही विज्ञान हुआ। विज्ञान से वस्तु के रगरेशे की जानकारी हो जाती है।

प्रकृत में भी यही बात है। यों ही आत्मा-परमात्मा या जीव-ब्रह्म और संसार की बात कह देने से काम नहीं चलता। वह बात दिल में बैठ पाती नहीं। यदि बैठाना है तो उसका प्रयोग करके देखना होगा - यह देखना होगा कि किस पदार्थ से कौन कैसे बनता है, रहता है, खत्म होता है। यदि परमात्मा ही सब कुछ है तो कैसे, इसका विश्लेषण करना होगा। जब तक ब्योरेवार सभी चीजों को अलग-अलग करके न देखेंगे तब तक हमारा ज्ञान पक्का न होगा, विज्ञान न होगा, दिल में बैठेगा नहीं। फलत: उससे कल्याण न होगा। इसीलिए अध्यात्म, अधिभूत आदि विभिन्न रूपों में आत्मा या परमात्मा का जानना जरूरी हो जाता है और इसीलिए उसका उल्लेख आया है। बिना इसके जिज्ञासुओं को संतोष कैसे हो?

इसीलिए सातवें के आखिरी - 30वें - श्लोक का जो लोग ऐसा अर्थ करते हैं कि भगवान के ज्ञान के साथ ही अधिभूत आदि का पृथक ज्ञान होना चाहिए, यही गीता की मंशा है, वह भूलते हैं। वहाँ तो सबों को परमात्म स्वरूप ही - 'वासुदेव: सर्वमिति' - जानना है। ब्रह्म तथा अधियज्ञ को तो परमात्म-रूप साफ ही कहा है। जीव - अध्यात्म - भी तो वही है। हाँ, कर्म शायद अलग हो। मगर वह तो व्यापक है। फलत: अंततोगत्वा वह भी जुदा नहीं है।

गीता की अपनी निजी बातों पर ही अब तक प्रकाश डाला गया है। मगर गीता में कुछ ऐसी बातें भी पाई जाती हैं, जो उसकी खास अपनी न होने पर भी उनके वर्णन में विशेषता है, अपनापन है, गीता की छाप लगी है। वे बातें तो हैं दार्शनिक। उन पर दर्शनों ने खूब माथापच्ची की है, वाद-विवाद किया है। गीता ने उनका उल्लेख अपने मतलब से ही किया है। लेकिन खूबी उसमें यही है कि उन पर उसने अपना रंग चढ़ा दिया है, उन्हें अपना जामा पहना दिया है। गीता की निरूपणशैली पौराणिक है। इसके बारे में आगे विशेष लिखा जाएगा। फलत: इसमें पौराणिक बातों का आ जाना अनिवार्य था। हालाँकि ज्यादा बातें इस तरह की नहीं आई हैं। एक तो कुछ ऐसी हैं जिन्हें ज्यों की त्यों लिख दिया है। इसे दार्शनिक भाषा में अनुवाद कहते हैं। वैसा ही लिखने का प्रयोजन कुछ और ही होता है। जब तक वे बातें लिखी न जाएँ आगे का मतलब सिद्ध हो पाता नहीं। इसलिए गीता ने ऐसी बातों का उपयोग अपने लिए इस तरह कर लिया है कि उनके चलते उसके उपदेश का प्रसंग खड़ा हो गया है।

मगर ऐसी भी एकाध पौराणिक बातें आई हैं जिन्हें उसने सिद्धांत के तौर पर, या यों कहिए कि एक प्रकार से अनुमोदन के ढंग पर लिखा है। वे केवल अनुवाद नहीं हैं। उनमें कुछ विशेषता है, कुछ तथ्य है। ऐसी ही एक बात अवतारवाद की है। चौथे अध्‍याय के 5-10 श्लोकों में यह बात आई है और बहुत ही सुंदर ढंग से आई है। यह यों ही कह नहीं दी गई है। लेकिन गीता की खूबी यही है कि उस पर उसने दार्शनिक रंग चढ़ा दिया है। यदि हम उन कुल छह श्लोकों पर गौर करें तो साफ मालूम हो जाता है कि पुराणों का अवतार वाला सिद्धांत दार्शनिक साँचे में ढाल दिया गया है। फलत: वह हो जाता है बुद्धिग्राह्म। यदि ऐसा न होता, तो विद्वान और तर्क-वितर्क करने वाले पंडित लोग उसे कभी स्वीकार नहीं कर सकते। मजा तो यह है कि दार्शनिक साँचे में ढालने पर भी वह रूखापन, वह वाद-विवाद की कटुता आने नहीं पाई है जो दार्शनिक रीतियों में पाई जाती है। सूखे तर्कों और नीरस दलीलों की ही तो भरमार वहाँ होती है। वहाँ सरसता का क्या काम? दार्शनिक तो केवल वस्तुतत्त्व के ही खोजने में परेशान रहते हैं। उन्हें फुरसत कहाँ कि नीरसता और सरसता देखें?

हम उसी चीज पर यहाँ विशेष प्रकाश डालने चले हैं। लेकिन उस अवतारवाद की जड़ में कर्मवाद है और है यह दार्शनिकों की चीज। गीता ने उसी को ले लिया है इसलिए जब तक कर्मवाद का विवेचन नहीं कर लिया जाता, अवतारवाद का रहस्य समझ में आ सकता नहीं। यही कारण है कि हम पहले कर्मवाद की ही बात उठाते हैं। यह कर्म का सिद्धांत किसी न किसी रूप में अन्य देशों के भी बहुतेरे दार्शनिकों ने - पुरानों ने और नयों ने भी - माना है। यह दूसरी बात है कि उनने खुल के ऐसा न लिखा हो। उनके अपने लिखने के तरीके भी तो निराले ही थे और सोचने के भी। इसीलिए उनने यह बात निराले ही ढंग से - अपने ही ढंग से - मानी या लिखी है। मगर हमारे देश के तो आस्तिक-नास्तिक सभी दार्शनिकों ने यह कर्मवाद स्वीकार किया है, सिवाय चार्वाक के। न्याय, सांख्य आदि दर्शनों के अलावे जैन, बौद्ध, पाशुपत आदि ने भी इसे साफ स्वीकार किया है। यह बात तो पहले ही कही जा चुकी है कि गीता ने भी कर्मवाद को माना है। मगर वह पौराणिक ढंग के कर्मवाद को स्वीकार न करके दार्शनिक कर्मवाद को ही मानती है, यह भी बताया जा चुका है। गीता के और और स्थानों में भी यह बात पाई जाती है। अठारहवें अध्‍याय के 'दैव चैवात्र पंचमम्' (18। 14) में यही बात 'दैव' शब्द से कही गई है, यह भी कह चुके हैं। चौथे अध्‍याय के 'जन्म कर्म च मे दिव्यम्' (4। 9) में दैव की जगह दिव्य शब्द आया है। मगर बात वही है। दोनों शब्दों का अर्थ भी एक ही है। दिव् शब्द से ही दिव्य या दैव शब्द बनते भी हैं। यों तो उसके 7, 8 - दो - श्लोकों में जो कुछ कहा गया है वह कर्मवाद के ही आधार पर कहा जा सकता है। दूसरे ढंग से वह कभी भी युक्तिसंगत होई नहीं सकता।

हाँ, तो आइए जरा इस कर्मवाद की दार्शनिक तह में पहले घुसें और देखें कि इसकी हकीकत क्या है। हम पहले कह चुके हैं कि पदार्थों में बराबर परिवर्तन जारी है। फलत: कुछी दिनों बाद चीजें बदल के एकदम नई बन जाती है। यद्यपि हमें ऐसा पता नहीं चलता और न हम यही समझ पाते हैं कि सचमुच कोई चीज बदल चुकी है। इस बात में वैज्ञानिकों की भी सम्मति दी जा चुकी है। गीता ने भी यह बात शुरू में ही 'देहिनोऽस्मिन्' (2। 13) में स्वीकार की है। हमने वहीं पर इस परिवर्तन के दृष्टांत के रूप में किसी कोठी या बरतन में बंद करके रखे गए चावल का दृष्टांत भी दिया है और बताया है कि किस तरह नया चावल कुछ दिनों में बदल के बिलकुल ही दूसरा बन जाता है। यहाँ भी हम फिर उसी दृष्टांत को लेंगे। हालाँकि जो कुछ विचार अब करेंगे वह दूसरे ढंग से, दूसरे पहलू से होगा। मगर इसे समझने के लिए वहाँ लिखी सभी बातें स्मरण कर लेने की हैं। दुबारा लिखना व्यर्थ है। वैज्ञानिक की प्रयोगशाला की भी जो बात वहाँ लिखी है, खयाल कर लेने की है।

जब हम देखते हैं कि प्रतिक्षण, प्रति सेकंड हरेक पदार्थ से अनंत परमाणु निकलते और उनकी जगह नए-नए आ धमकते हैं तो हमें आश्चर्यचकित हो जाना पड़ता है। इसलिए प्रयोगशाला में बैठ के ही यह बात सोचने की है। क्योंकि दूसरे ढंग से इस पर आमतौर से लोगों को विश्वास होई नहीं सकता। लोगों के दिमाग में यह बात समाई नहीं सकती कि प्रतिक्षण हरेक पदार्थ के भीतर से असंख्य परमाणु निकलते और भागते रहते हैं और उनकी जगह ले लेते हैं नए-नए बाहर से आ के। विज्ञान के प्रताप से यह बात अब लोगों के दिमाग में आसानी से आ जाती है। मगर पुराने जमाने में जब ये वैज्ञानिक यंत्र कहीं थे नहीं और न ये प्रयोगशालाएँ थीं तब हमारे दार्शनिक विद्वानों ने ये बातें कैसे सोच निकालीं यह एक पहेली ही है। फिर भी इसमें तो कोई शक हई नहीं - यह तो सर्वमान्य बात है - कि उनने ये बातें सोची थीं, ढूँढ़ निकाली थीं। इन्हीं के अंवेषण, पर्यवेक्षण और सोच-विचार ने उन्हें अगत्या कर्मवाद के सिद्धांत तक पहुँचाया और उसे मानने को मजबूर किया। या यों कहिए कि इन्हीं को ढूँढ़ते-ढूँढ़ते उनने कर्मवाद का सिद्धांत ढूँढ़ निकाला।

हमारे नैयायिक दार्शनिकों का एक पुराना सिद्धांत है कि एक ही स्थान में दो द्रव्यों का समावेश नहीं होता। पार्थिव, जलीय आदि सभी पदार्थों को उनने द्रव्य नाम दिया है। रूप, रस आदि गुणों में कोई भी जिन पदार्थों में पाए जाएँ उन्हीं को उनने द्रव्य कहा है। वे यह भी मानते आए हैं कि कई द्रव्यों के संयोग से नया द्रव्य तैयार होता है। दृष्टांत के लिए कई सूतों के परस्पर जुट जाने से कपड़ा बनता है। सूत भी द्रव्य हैं और कपड़ा भी। फर्क यही है कि सूत अवयव हैं और कपड़ा अवयवी। सूतों के भी जो रेशे होते हैं उन्हीं से सूत तैयार होते हैं। फलत: रेशों की अपेक्षा सूत हुआ अवयवी और रेशे हो गए अवयव। रेशों के भी अवयव होते हैं और उन अवयवों के भी अवयव। इस प्रकार अवयवों की धारा - परंपरा - चलती है। उधर कपड़े को भी काट-छाँट के और जोड़-जाड़के कुर्त्ता, कोट वगैरह बनाते हैं। वहाँ पर कपड़ा अवयव हो जाता है और कोट, कुर्त्ते अवयवी। जितने नए सूत जुटते जाते हैं उतना ही लंबा कपड़ा होता जाता है - नया-नया कपड़ा बनता जाता है। उधर अवयवों के भी अवयव करते-करते कहीं न कहीं रुक जाना जरूरी होता है, जहाँ से यह काम शुरू हुआ है। क्योंकि अगर कहीं रुकें न और हर अवयव के अवयव करते जाएँ तो पता ही नहीं लगता कि आखिर अवयवी का बनना कब और कहाँ से शुरू हुआ। इसीलिए जहाँ जाके रुक जाएँ उसी को नैयायिकों ने परमाणु कहा है। परमाणु (Atom) का अर्थ ही सबसे छोटा, छोटे से छोटा - जिससे छोटा हो न सके। परमाणुवाद के बारे में और भी दलीलें हैं। मगर हमें यहाँ उनमें नहीं पड़ना है। उन पर कुछ प्रकाश आगे डाला गया है। गुणवाद के प्रकरण में।

इस प्रकार परमाणुओं के जुटने - संजोग - से चीजें बनती रहती हैं। अब मान लें कि कुछ परमाणुओं ने मिल के एक चीज बनाई। लेकिन, जैसा कि कह चुके हैं कि पुराने परमाणुओं का निकलना और नयों का जुटना जारी है, जब कुछ और भी परमाणु पुरानों के साथ, जिनने आपसे में मिल के कोई चीज बनाई थी, आ जुटे तो अब जो चीज बनेगी वह तो दूसरी ही होगी। पहली तो यह होगी नहीं। क्योंकि पहली में तो नए परमाणु थे नहीं। इसी प्रकार कुछ सूतों को जुटाकर कपड़ा बना। मगर सूत तो जुटते ही रहते हैं। इसलिए नए सूतों को पुरानों के साथ जुटने पर कपड़ा भी बनता ही जाएगा। हाँ, यह नया होगा, न कि वही पहले ही वाला। क्योंकि पहले तो ये नए सूत जुटे न थे। यही हालत सर्वत्र जारी रहती है। अब यहीं पर नैयायिकों की वह बात आती है कि एक ही स्थान में दो द्रव्यों का समावेश नहीं हो सकता है।

चाहे परमाणुओं वाली बात में या सूतों वाली। हम हर हालत में देखेंगे कि नए-नए कपड़े या नई-नई चीजें बनती जाती हैं। मगर सवाल तो यह होता है कि जिन सूतों से पहला कपड़ा बना है उन्हीं के साथ कुछ दूसरों के जुटने से दूसरा और तीसरा बनता है। यह बात चाहे जैसे भी देखें, यह तो मानना ही होगा कि पहले कि जिन सूतों से पहला कपड़ा बना और उन्हीं में उसका समावेश है, अंटाव है। उन्हीं में दूसरा भी बनता है और उसके बाद वाले कपड़े भी बनते हैं; हालाँकि दूसरे-तीसरे आदि का अंटाव कुछ नए सूतों में भी रहता है। मगर पहले सूतों में भी तो रहता ही है। पीछे वाले कपड़े पहले वाले सूतों के बिलकुल ही बाहर तो चले जाते नहीं। ऐसी हालत में उन्हीं सूतों में कई कपड़े कैसे अंटेंगे, यही तो पहेली है। कपड़े तो द्रव्य हैं। और द्रव्य तो जगह घेर लेते हैं। इसी से नैयायिक कहते हैं कि एक ही स्थान में एक से ज्यादा द्रव्यों का अंटाव या समावेश नहीं हो सकता।

तब सवाल होता है कि यदि एक ही कपड़ा उनमें रहेगा तो साफ ही है कि जोई पीछे या नया बनेगा, तैयार होगा, तैयार होता जाएगा वही सभी - नए पुराने - सूतों में समाविष्ट होगा। फलत: पहले वाले हट जाएँगे, नष्ट हो जाएँगे, खत्म हो जाएँगे। जैसे-जैसे नए सिरे से कपड़ा बनता जाएगा तैसे-तैसे पहले बने कपड़े नष्ट होते जाएँगे। इस प्रकार के सभी पदार्थों में यही प्रक्रिया जारी रहती है - पहलेवालों के नाश का यह सिलसिला जारी रहता है। दूसरा उपाय है नहीं - दूसरा चारा है नहीं। बात तो कुछ अजीब और बेढंगी-सी मालूम पड़ती है। मगर हमें इस दुनिया में कितनी ही बेढंगी बात माननी ही पड़ती है। जब बुद्धि और तर्क की कसौटी पर कसते हैं तो जो बातें खरी उतरें उनके मानने में उज्र क्या है? किसी जमाने में सूर्य स्थिर है और पृथिवी चलती है; इस बात के कहनेवालों को बड़ी आफतें झेलनी पड़ीं। मगर गणित और हिसाब-किताब की मजबूरी जो थी। वे लोग करते क्या? नतीजा यह हुआ कि आज आमतौर से वही बात मानी जाने लगी है।

पहले विज्ञान का यह विकास न होने के कारण लोगों को इसमें झिझक हुई। मगर आज तो विज्ञान ने ही बता दिया है कि जरूर ही पुराने वस्त्र, पुराने चावल, पुराने पदार्थ नष्ट हो जाते हैं और नए पैदा हो जाते हैं। भला कपड़े के बारे में तो नैयायिक दार्शनिक यह भी कहते थे कि साफ ही नए सूत जुटे हैं। देखने वाले देखते भी थे। मगर कोठी में बंद चावलों में कौन देखता है कि चावलों के नए परमाणु जुटते और पुराने भागते जाते हैं। पुराने सूतों की ही सूरत-शक्ल के नए सूत कपड़े में जुटते हैं। मगर चावलों के पुराने परमाणुओं में जो स्वाद या रस होता है उसी स्वाद और रस के नए परमाणुओं को आते और पुरानों की जगह लेते कौन देखता है? चावल का स्वाद दस साल के बाद बदल के गेहूँ का तो हो जाता नहीं। उसमें स्वाद, रस वगैरह चावल का ही रहता है। इससे मानना पड़ेगा कि जो नए परमाणु आए वे चावल के ही स्वाद और रस के थे। बात तो यह भी कम अजीब और बेढंगी-सी है नहीं। इसीलिए नैयायिकों की बात अब समझ में आ जाती है - आ सकती है। चावलों के ही परमाणुओं का - वैसे ही स्वाद, रस, रूप-रेखाओं का - खजाना किसने कहाँ जमा कर रखा है जो बराबर आते-जाते हैं? यह नहीं कि चावलों की ही बात हो। गेहूँ, चने, मटर आदि की भी तो यही बात है। पशु, पक्षी, मनुष्य, खाक, पत्थर सबों की यही हालत है। सबों में अपनी ही जाति के परमाणु आ मिलते हैं! फलत: यह तो मानना ही पड़ेगा कि सबों का अलग कोष, खजाना (Stock) कहीं पड़ा है। मगर पता नहीं कहाँ, कैसे पड़ा है। यही तो पहेली है। बरतन या कोठी के मुँह तो ऐसे बंद हैं कि जरा भी हवा आ-जा न सके। मगर ये अनंत परमाणु बराबर आते-जाते रहते हैं! यही तो माया है, जादू है!

यहाँ तक तो हमने इस पहेली की उधेड़-बुन दार्शनिक ढंग से की। मगर सवाल हो सकता है कि इसका कर्मवाद से ताल्लुक क्या है? ताल्लुक है और जरूर है। इसीलिए तो जरा विस्तार से हमने यह बात लिखी है। नहीं तो आगे की बात समझ में नहीं आती। बात यह है कि अनंत परमाणुओं का आना-जाना और पुरानी की जगह नई चीज का बन जाना एक पहेली है यह तो मान चुके। अब जरा सोचें कि आखिर यह होता है क्यों और कैसे? पुराने चावलों की जगह नए क्यों बने? वैसे ही परमाणु क्यों आए और उतने ही ही क्यों आए जितने निकले? यदि कमीबेशी भी हुई तो बहुत ही कम। गेहूँ में चावल के और चावल में गेहूँ के क्यों नहीं आ गए? गाय में भैंस के और भैंस में गाय के क्यों न घुसे? आदमी में पशु के तथा पशु में आदमी के क्यों न प्रवेश पा सके? मर्द में औरत के और औरत में मर्द के क्यों न चले आए? वृक्षों में पत्थर के और पत्थरों में वृक्षों के क्यों न जुटे? मूर्खों में पंडितों के तथा पंडितों में निरक्षरों के क्यों न लिपटे? ऐसे प्रश्न तो हजार-लाख हो सकते हैं, होते हैं।

इन परमाणुओं का वर्गीकरण कहाँ कैसे किया गया है? यदि काम कौन करता है? जिसमें जरा भी गड़बड़ी न हो, किंतु सभी ठीक-ठीक अपनी-अपनी जगह जाएँ-आएँ यह पक्का प्रबंध क्यों, किसने, कैसे किया? इसमें कभी गड़बड़ न हो इस बात का क्या प्रबंध है और कैसा है? परमाणुओं के कोष में कमी-बेशी हो तो उसकी पूर्ति कैसे हो? यदि यह माना जाए कि हरेक पदार्थ से निकलने वाले परमाणु अपने सजातियों के ही कोष में जा मिलते हैं, तो प्रश्न होता है कि ऐसा क्यों होता है और उन्हें कौन, कहाँ, कैसे ले जाता है? साथ ही यह भी प्रश्न होता है कि निकलने वाले परमाणुओं की जो हालत होती है वह तो कुछ निराली होती है, न कि कोष में रहनेवालों की ही जैसी। ऐसी दशा में उनके मिलने से वह कोष खिचड़ी बन जाएगा या नहीं? नए चावल का भात भारी होता है और मीठा ज्यादा होता है, बनिस्बत पुराने चावलों के। इसलिए यह तो मानना ही होगा कि चावल के भी परमाणु सबके-सब एक ही तरह के नहीं होते। ऐसी हालत में चावल के परमाणुओं के भी कई प्रकार के कोष मानने ही होंगे। अब यदि यह कहें कि नए चावलों के परमाणु पुनरपि वैसे ही नए चावलों में जा मिलेंगे और जब तक जाकर मिल जाते नहीं तब तक कहीं शांत पड़े रहेंगे, तो सवाल होता है कि यह बारीक देखभाल कौन करता है और क्यों? ठीक समय पर वैसे ही चावलों में उन्हें कहाँ, कैसे पहुँचाया जाएगा यह व्यवस्था भी कैसे होती है? यह तो ऐसा लगता है कि कोई सर्वशक्तिशाली और सर्वव्यापक देखने वाला चारों ओर आँखें फाड़ के हर चीज को बारीकी से देखता हो और ठीक समय पर सारी व्यवस्था करता हो। यह कैसी बात है, यह प्रश्न स्वाभाविक है? यह कौन है? क्यों है? कैसे है? ये प्रश्न भी होते हैं। उसके हाथ बँधे हैं या स्वतंत्र हैं? यदि बँधे हैं तो किससे? और तब वह सारे काम ठीक-ठीक करेगा कैसे? यदि स्वतंत्र हैं तो भी वही बात आती है कि सारे काम नियमित रूप से क्यों होते हैं? कहीं-कहीं मनजानी घरजानी क्यों नहीं चलती?

चावलों को ही ले के और भी बातें उठती हैं। माना कि चावलों से असंख्य परमाणु निकलते रहते हैं। तो फिर जरूरत क्या है कि उनकी जगह खाली न रहे और दूसरे परमाणु खामख्वाह आ के जम जाएँ? धीरे-धीरे चावल पतले पड़ जाएँ तो हर्ज क्या? खिर घुनों के खा जाने से तो ऐसा होई जाता है। कपूर के परमाणु निकलते हैं और उनमें नए आते नहीं। इसीलिए वह जल्द खत्म हो जाता है। वही बात चावलों में भी क्यों नहीं होती? यदि कहा जाए कि चावलवाला मर जो जाएगा, तो प्रश्न होता है कि आग लगने या चोरी होने पर क्या वह भूखों नहीं मर जाता जब चावल लुट जाते या जल जाते हैं? और कपूर वाले पर भी यही दलील क्यों न लागू हो? चावल जलने पर या लुट जाने पर जो होता है वही बात यों भी क्यों नहीं हो? किसी समय चावलों के परमाणु ज्यादा निकल जाएँ और वह गल-सड़ जाए और किसी समय नहीं, ऐसा क्यों होता है? इसी तरह के हजारों सवाल उठ खड़े होते हैं यदि हम इन पदार्थों के खोद-विनोद और अंवेषण में पड़ जाएँ। हमने तो यहाँ थोड़े से प्रश्न नमूने के तौर पर ही दिए हैं।

इसी खोद-विनोद, इसी जाँच-पड़ताल, इसी अंवेषण के सिलसिले में इन जैसे प्रश्नों के उत्तर ढूँढ़ते-ढूँढ़ते हमारे प्राचीन दार्शनिकों को विवश हो के ईश्वर और कर्मवाद की शरण लेनी पड़ी, यह सिद्धांत स्थिर करना पड़ा। मनुष्य अपनी पहुँच के अनुसार ही कल्पना करता है। हम तो देखते हैं कि नियमित व्यवस्था बुद्धिपूर्वक ही होती है। बिना समझ और ज्ञान के यह बात हो पाती नहीं। और अगर कभी घड़ी या दूसरे यंत्रों को नियमित काम करते देखते हैं तो उसी के साथ यह भी देखते हैं कि उनके मूल में कोई बुद्धि है जिसने उन्हें तैयार करके चालू किया है। वही उनके बिगड़ जाने पर पुनरपि उन्हें ठीक कर देती है। जड़ पदार्थों में तो यह शक्ति नहीं होती कि अपनी भूल या गड़बड़ देखें, त्रुटि का पता लगाएँ और उसे सँभालें। इसके बाद हम बाकी दुनिया में भी ऐसी ही व्यापक या समष्टि बुद्धि की कल्पना करते हैं, क्योंकि हम सभी मिल-मिला के भी बहुत से कामों को नहीं कर सकते। वे हमारी ताकत के बाहर के हैं। दृष्टांत के लिए चावल वगैरह के बारे में जो बातें पूछी गई हैं उन्हीं को ले सकते हैं। वे हमारी पहुँच के बाहर की बातें हैं। जिन्हें हम देख पाते नहीं उनकी व्यवस्था क्या करें? और अगर थोड़ी देर के लिए मान भी लें कि हमीं सब लोग उन्हें करते हैं, कर लेते हैं, कर सकते हैं, तो भी हम सबों के कामों की मिलान (Co-ordination) तो होनी ही चाहिए न । नहीं तो फिर वही गड़बड़ होगी। अब इस मिलान का करने वाला कोई एक तो होगा ही जो सब कुछ बखूबी जानता हो।

जो लोग इन प्रश्नों के संबंध में प्रकृति, नैसर्गिक-नियम, शाश्वत विधान (Nature, Natural Law, Eternal Law) आदि कह के बातें टाल देते हैं वे शब्दांतर से अपनी अनभिज्ञता मान लेते हैं। हमारा काम है गुप्त रहस्यों का पता लगाना, प्रकृति के - संसार के - नियमों को ढूँढ़ निकालना। दिमाग, अक्ल, बुद्धि का दूसरा काम है भी नहीं। इन बातों से किनाराकशी करना भी हमारा काम नहीं है। कोई समय था जब कहा जाता था कि योगियों का आकाश में यों ही चला जाना असंभव है, दूर देश का समाचार जान लेना गैरमुमकिन है। पक्षी उड़ते हैं तो उड़ें। उनकी तो प्रकृति ही ऐसी है। मगर आदमी के लिए यह बात असंभव है। अपेक्षाकृत कुछ कम-बेश दूरी पर हमारी आवाज दूसरों को भले ही सुनाई दे। मगर हजारों मील दूर कैसे सुनाई देगी? शब्द का स्वभाव ऐसा नहीं है, आदि-आदि। मगर अंवेषण और विज्ञान ने सब कुछ संभव और सही बता दिया - करके दिखा दिया! फलत: स्वभाव की बात जाती रही। मामूली-सी बात में भी तर्क-दलील करते-करते जब हम थक जाएँ और उत्तर न दे सकें, तो क्यों न स्वभाव या प्रकृति की शरण ले के पार हो जाएँ? तब हम भी क्यों न कह दें कि यही प्रकृति का नियम है, नित्य नियम है? बात तो एक ही है। ज्यादा बुद्धिवाले कुछ ज्यादा दूर तक जा के प्रकृति की शरण लेते हैं। मगर हम कम अक्लवाले जरा नजदीक में ही और यह कैसे पता चला कि यह प्रकृति का नियम है, नित्य नियम है? प्रकृति क्या चीज है? नियम क्या चीज है? किसे नियम कहें और किसे नहीं? पहले तो कहा जाता था कि पृथिवी स्थिर है और सूर्य चलता है। क्यों? यही नित्य नियम है यही उत्तर मिलता था। अब उलटी बात हो गई इसीलिए प्रकृति, नेचर, प्राकृतिक नियमों की बात करना दूसरे शब्दों में अपने अज्ञान, अपनी संकुचित समझ, अपनी अविकसित बुद्धि को कबूल करना है। यह बात पुराने दार्शनिक नहीं करते थे। और जब जड़ नियमों को मानते ही हैं, तो फिर चेतन ईश्वर को ही क्यों न मानें? अंधे से तो आँखवाला ही ठीक है न? नहीं तो फिर भी अड़चन आ सकती है।

इसीलिए उनने उस व्यापक हाथ, शक्ति या पुरुष को स्वीकार किया, या यों कहिए कि ढूँढ़ निकाला। उसके बिना इस संसार का काम उन्हें चलता नहीं दीखा। इसीलिए उसे पुरुष कहा, पुरुष का अर्थ ही है जो सर्वत्र पूर्ण या व्यापक हो। यदि उसमें अविद्या, भले-बुरे कर्म, सुख-दु:ख, राग-द्वेष या भले-बुरे संस्कार मनुष्यों जैसे ही रहे तो फिर वही गड़बड़ होगी। पुरुष तो जीवों को भी कहते हैं। आत्माएँ भी तो व्यापक हैं। इसीलिए उसे निराला पुरुष माना और पतंजलि ने योगसूत्रों में साफ ही कह दिया कि 'क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्ट: पुरुषविशेष ईश्वर:' (1। 24) इसका अर्थ यही है कि अविद्या आदि से वह सर्वथा रहित है। इसीलिए उसे रत्‍ती-रत्‍ती चीजों का जानकार होना चाहिए। नहीं तो फिर भी दिक्कत होगी और संसार की व्यवस्था ठीक हो न सकेगी। उसका ज्ञान ऐसा हो कि उसकी कोई सीमा न हो - वह भूत, भविष्य, वर्तमान सभी काल के सभी पदार्थों को जान सके। इसीलिए पतंजलि ने कहा कि 'तत्र निरतिशयं सर्वज्ञबीजम्' (1। 25)। अगर वह मरे-जिए, कभी रहे कभी न रहे तो भी वही दिक्कत हो। इसलिए कह दिया कि वह समय की सीमा से बाहर है - नित्य है, अजर-अमर है। जितने जानकार, विद्वान, दार्शनिक और तत्त्वज्ञ अब तक हो चुके उसके सामने सब फीके हैं - तुच्छ हैं। क्योंकि देशकाल से सीमित तो सभी ठहरे और वह ठहरा इससे बाहर। इसीलिए वह सबों का दादागुरु है - 'पूर्वेषामपि गुरु: कालेनानवच्छेदात्' (1। 26)



कर्मवाद

मगर इतने से भी काम चलता न दीखा। यदि ऐसा ईश्वर हो कि जो चाहे सोई करे तो उस पर स्वेच्छाचारिता (Autocracy) का आरोप आसानी से लग सकता है। सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापक होने के कारण उसकी स्वेच्छाचारिता बड़ी ही खतरनाक सिद्ध होगी। जिस व्यवस्था और नियमितता के लिए हम उसे स्वीकार करते हैं या उसका लोहा मानते हैं, वही न रह पाएगी। क्योंकि उसकी स्वतंत्रता ही कैसी यदि उस पर बंधन लगा रहा? वह स्वतंत्र ही कैसा यदि उसने किसी बात की परवाह की? यदि उस पर कोई भी अंकुश रहे, चाहे वह कैसा भी क्यों न हो, तो वह परतंत्र ही माना जाएगा। यह प्रश्न मामूली नहीं है। यह एक बहुत बड़ी चीज है। जब हम किसी बात को बुद्धि और तर्क की तराजू पर तौलते हैं, तो हमें उसके नतीजों के लिए तैयार रहना ही होगा। यह दार्शनिक बात है। कोई खेल, गप्प या कहानी तो है नहीं। इस प्रकार के ईश्वर को मानने पर क्या होगा यह बात आँखें खोल के देखने की है। पुराने महापुरुषों ने - दार्शनिकों ने - इसे देखा भी ठीक-ठीक। वे इस पहेली को सुलझाने में सफल भी हुए, चाहे संसार उसे गलत माने या सही। और हमारी सभी बातें सदा ध्रुव सत्य हैं यह दावा तो समझदार लोग करते ही नहीं। ज्ञान का ठीका तो किसी ने लिया है नहीं। तब हमारे दार्शनिक ऐसी गलती क्यों करते? उन्हें जो सूझा उसे उनने कहा दिया।

इस दिक्कत से बचने के ही लिए उनने कर्मवाद की शरण ली। असल में यह बात भी उनने अपने अनुभव और आँखों देखी के ही अनुसार तय की। उनने सोचा कि प्रतिदिन जो कुछ भी बुरा-भला होता है वह कामों के ही अनुसार होता है। चाहे खेती-बारी लें या रोजगार-व्यापार, पढ़ना-लिखना, पारितोषिक, दंड और हिंसा-प्रतिहिंसा के काम। सर्वत्र एक ही बात पाई जाती है। जैसे करते हैं वैसा पाते हैं। जैसा बोते हैं वैसा काटते हैं। गाय पालते हैं तो दूध दुहते हैं। साँप पाल के जहर का खतरा उठाते हैं। सिंह पाल के मौत का। जान मारी तो जान देनी पड़ी। पढ़ा तो पास किया। न पढ़ा तो फेल रहे। अच्छे काम में इनाम मिला और बुरे में जेल या बदनामी हाथ आई। असल में यदि कामों के अनुसार परिणाम की व्यवस्था न हो तो संसार में अंधेरखाता ही मच जाए। जब इससे उलटा किया जाता है तो बदनामी और शिकायत होती है, पक्षपात का आरोप होता है। यदि इसमें भी गड़बड़ होती है तो वह काम के नियम का दोष न हो के लोगों की कमजोरी और नादानी से ही होती है। अगर काम के अनुसार फल का नियम न हो तो कोई कुछ करे ही न। पढ़ने में दिमाग खपानेवाला फेल हो जाए और निठल्ला बैठा पास हो। खेती करनेवाले को गल्ला न मिले और बैठे-ठाले की कोठी भरे। ऐसा भी होता है कि एक के काम का परिणाम वंशपरंपरा को भी भुगतना पड़ता है। यदि अपनी नादानी से कोई पागल हो जाए तो वंश में भी उसका फल बच्चों और उनके बच्चों तक पहुँचता है। ऐसी ही दूसरी भी बीमारियाँ हैं। एक के किए का फल सारा वंश, गाँव या देश भी भुगतता है।

इस प्रकार एक तो कर्म ही सारी व्यवस्था के करने वाले सिद्ध हुए। दूसरे उनके दो विभाग भी हो गए। एक का ताल्लुक उसी व्यक्ति से होता है जो उसे करे। यह हुआ व्यष्टि कर्म। दूसरे का संबंध समाज, देश या पुश्त-दरपुश्त से होता है। यही है समष्टि कर्म। ऐसा भी होता है कि हरेक आदमी अपने काम से अपनी जरूरत पूरी कर लेता है। नदी से पानी ला के प्यास बुझा ली। मिहनत से पढ़ के पास कर लिया। बेशक इसमें विवाद की गुंजाइश है कि कौन व्यक्तिगत या व्यष्टि कर्म है और समष्टि। मगर इसमें तो शक नहीं कि व्यष्टि कर्म है। जहर खा लिया और मर गए। हाँ, समष्टि कर्म में एक से ज्यादा लोग शरीक होते हैं। कुआँ अकेले कौन खोदे? खेती एक आदमी कर नहीं सकता। घर-बार सभी मिल के उठाते हैं। समष्टि कर्म यही हैं। सभी मिलके करते और फल भी सभी भोगते हैं। कभी-कभी एक का किया भी अनेक भुगतते हैं। फलत: वह भी समष्टि कर्म ही हुआ।

बस, तत्त्वदर्शियों ने इस सृष्टि का यही सिद्धांत सभी बातों में लागू कर दिया। उनने माना कि जन्म-मरण, सुख-दु:ख, बीमारी, आराम वगैरह सभी के मूल में या तो व्यष्टि या समष्टि कर्म हैं। उनने सभी की स्वतंत्रता मर्यादित कर दी। चावलों या पदार्थों के परमाणुओं के आने-जाने से लेकर सारे संसार के बनाने-बिगाड़ने या प्रबंध का काम ईश्वर के जिम्मे हुआ और सभी पदार्थ उसके अधीन हो गए। ईश्वर भी जीवों के कर्मों के अनुसार ही व्यवस्था करेगा। यह नहीं कि अपने मन से किसी को कोढ़ी बना दिया तो किसी को दिव्य; किसी को राजा तो किसी को रंक; किसी को लूटने वाला तो किसी को लुटानेवाला। जीवों के कर्मों के अनुसार ही वह सब व्यवस्था करता है। जैसे भले-बुरे कर्म हैं वैसी ही हालत है, व्यवस्था है। कही चुके हैं कि बहुतेरे कर्म पुश्त-दर-पुश्त तक चलते हैं। इसीलिए इस शरीर में किए कर्मों में जिनका फल भुगताना शेष रहा उन्हीं के अनुसर अगले जन्म में व्यवस्था की गई। जैसे भले-बुरे कर्म थे वैसी ही भली-बुरी हालत में सभी लोग लाए गए। इस तरह ईश्वर पर भी कर्मों का नियंत्रण हो गया। फिर मनमानी घरजानी क्यों होगी? तब वह निरंकुश या स्वेच्छाचारी क्यों होगा? कर्म भी खुद कुछ कर नहीं सकते। वह भी किसी चेतन या जानकार के सहारे ही अपना फल देते हैं। वे खुद जड़ या अंधे जो ठहरे। इस तरह उन पर भी ईश्वर का अंकुश या नियंत्रण रहा - वे भी उसके अधीन रहे। सारांश यह है कि सभी को सबकी अपेक्षा है। इसीलिए गड़बड़ नहीं हो पाती। किसी का भी हाथ सोलह आना खुला नहीं कि खुल के खेले।



कर्मों के भेद और उनके काम

यह तो पहले ही कह चुके हैं कि जब कर्म अपना फल देते हैं तो उस फल की सामग्री को जुटाकर ही। कर्मों का कोई दूसरा तरीका फल देने का नहीं है। एकाएक आकाश से कोई चीज वे टपका नहीं देते। अगर जाड़े में आराम मिलना है तो घर, वस्त्र आदि के ही रूप में कर्मों के फल मिलेंगे। इन्हीं कर्मों के तीन दल प्रकारांतर से किए गए हैं। एक तो वे जिनका फल भोगा जा रहा हो। इन्हें प्रारब्ध कहते हैं। प्रारब्ध का अर्थ ही है कि जिनने अपना फल देना प्रारंभ कर दिया। लेकिन बहुत से कर्म बचे-बचाए रह जाते हैं। सबों का नतीजा बराबर भुगता जाए यह संभव नहीं। इसलिए बचे-बचायों का जो कोष होता है उसे संचित कर्म कहते हैं। संचित के मानी हैं जमा किए गए या बचे-बचाए। इसी कोष में सभी कर्म जमा होते रहते हैं। इनमें जिनकी दौर शुरू हो गई, जिनने फल देना शुरू कर दिया वही प्रारब्ध कहे गए। इन दोनों के अलावे क्रियमाण कर्म हैं जो आगे किए जाएँगे और संचित कोष में जमा होंगे। असल में तो कर्मों के संचित और प्रारब्ध यही दो भेद हैं। क्रियमाण भी संचित में ही आ जाते हैं। यों तो प्रारब्ध भी संचित ही हैं। मगर दोनों का फर्क बता चुके हैं। यही है संक्षेप में कर्मों की बात।

अब जरा इनका प्रयोग सृष्टि की व्यवस्था में कर देखें। पृथिवी के बनने में समष्टि कर्म कारण हैं। क्योंकि इससे सबों का ताल्लुक है - सबों को सुख-दु:ख इससे मिलता है। यही बात है सूर्य, मेघ, जल, हवा आदि के बारे में भी। हरेक के व्यक्तिगत सुख-दु:ख अपने व्यष्टि कर्म के ही फल हैं। अपने-अपने शरीरादि को एक तरह से व्यष्टि कर्म का फल कह सकते हैं। मगर जहाँ तक एक के शरीर का दूसरे को सुख-दु:ख पहुँचाने से ताल्लुक है वहाँ तक वह समष्टि कर्म का ही फल माना जा सकता है। यही समष्टि और व्यष्टि कर्म चावल वगैरह में भी व्यवस्था करते हैं। जिस किसान ने चावल पैदा करके उन्हें कोठी में बंद किया है उसके चावलों से उसे आराम पहुँचना है। ऐसा करने वाले उसके व्यष्टि या समष्टि कर्म हैं जो पूर्व जन्म के कमाये हुए हैं। यदि चावलों के परमाणु निकलते ही जाएँ और आएँ नहीं, तो किसान दिवालिया हो जाएगा। फिर आराम उसे कैसे होगा? इसलिए उसी के कर्मों से यह व्यवस्था हो गई कि नए परमाणु आते गए और चावल कीमती बन गया। यदि पुराने नहीं जाते और नए नहीं आते तो यह बात न हो पाती। परमाणुओं का कोष भी कर्मों के अनुसार बनता है, बना रहता है। ईश्वर उसका नियंत्रण करता है। जब बुरे कर्मों की दौर आई तो घुन खा गए, चावल सड़ गए। या और कुछ हो गया। उनमें अच्छे परमाणु आ के मिले भी नहीं। यही तरीका सर्वत्र जारी है, ऐसा प्राचीन दार्शनिकों ने माना है। यों तो कर्मों के और भी अनेक भेद हैं। ऐसे भी कर्म होते हैं जिनका काम है केवल कुछ दूसरे कर्मों को खत्म (Negative) कर देना। ऐसे भी होते हैं जो अकेले ही कई कर्मों के बराबर फल देते हैं। मगर इतने लंबे पँवारे से हमें क्या मतलब? योगसूत्रों के भाष्य और दूसरे दर्शनों को पढ़ के ये बातें जानी जा सकती हैं।



अवतारवाद

इतने लंबे विवरण के बाद अब मौका आता है कि हम अवतारवाद के संबंध में इन कर्मों को लगा के देखें कि कर्मवाद वहाँ किस प्रकार लागू होता है। यह तो कही चुके हैं कि समष्टि कर्मों के फलस्वरूप पृथिवी आदि पदार्थ बनते हैं जिनका ताल्लुक एक-दो से न हो के समुदाय से है, समाज से है, मानव-संसार से है। सभी पदार्थों से है। यदि यह ढूँढ़ने लगें कि पृथिवी को किस व्यक्ति के कर्म ने तैयार किया-कराया, तो यह हमारी भूल होगी। एक से तो उसका संबंध है नहीं। पृथिवी के चलते हजारों-लाखों को सुख-दु:ख भोगना है, गल्ला पैदा करना है, घर बनाना है, कपड़ा तैयार करना है - होना है। उससे तलवारें, भाले, तोपें, गोले, लाठियाँ बन के जाने कितने मरें-मारेंगे। फिर एक के कर्म का क्या सवाल? पृथिवी आदि पदार्थ एक के कर्म से क्यों बनेंगे?

जरा यही बात अवतारों के विषय में भी लगा देखें। आखिर अवतारों का काम क्या है? उनसे होता क्या है? उनकी भली-बुरी उपयोगिता है क्या? गीता कहती है कि 'भले लोगों की रक्षा, बुरों के नाश और धर्म - सत्कर्मों, पुण्य-कार्यों, समाज-हितकारी कामों-की मजबूती एवं प्रचार के लिए बार-बार - समय-समय पर - अवतार होते हैं', - "परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दृष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगेयुगे" (4। 8)। अवतार के पहले की भी समाज की दशा यों कही गई है, 'जब-जब धर्म - सत्कर्मों - का खात्मा या अत्यंत ह्वास हो जाता है और अधर्म - बुरे कर्मों - की वृद्धि हो जाती है तभी-तभी भगवान खुद आते हैं' - "यदायदाहि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्" (4। 7)। इन श्लोकों में जो 'यदा यदा' - जब-जब - तथा' युगे-युगे' - समय-समय पर - कहा है उसका तात्पर्य यही है कि ऐसी ही परिस्थिति के साथ अवतार का ताल्लुक है। जिस प्रकार खेती-बारी के लिए जमीन और सींचने के लिए पानी की जरूरत है, साँस के लिए जैसे हवा जरूरी है; ठीक वैसे ही ऐसी परिस्थिति आ जाने पर उसका समुचित सामना करने, उसके प्रतिकार के लिए अवतार जरूरी है। पृथिवी, जल, वायु आदि का काम जिस प्रकार दूसरों से नहीं हो सकता है - जिस तरह पृथिवी आदि के बिना काम चल नहीं सकता - ठीक उसी तरह अवतार का काम और तरह से, दूसरों से चल नहीं सकता - उसके बिना काम हो नहीं सकता। इससे साफ हो जाता है कि जिस प्रकार पृथिवी आदि पदार्थ बनते हैं, पैदा होते हैं लोगों के समष्टि कर्मों के ही करते उन्हीं के फलस्वरूप, ठीक वैसे ही अवतार होते हैं लोगों के समष्टि कर्मों के ही फलस्वरुप उन्हीं के करते। अब यही देखना है कि यह बात होती है कैसे।

इसमें विशेष दिक्कत की तो कोई बात है नहीं। राम, कृष्ण आदि अवतारों के शरीरों से भले लोगों को - साधु-महात्माओं, देवताओं, तपस्वियों, सदाचारियों और भोलीभाली जनता को - तो बेशक आराम पहुँचता है, शांति मिलती है, उनकी चिंता और परेशानी मिटती है, उनके कर्मों में आसानी होती, सहायता पहुँचती है और वे निर्द्वन्द्व विचरते रहते हैं। जैसा कि खुद कृष्ण ने ही कहा है कि 'लोक-संग्रह या लोगों के पथदर्शन के खयाल से भी तो कर्म करना ही चाहिए' - "लोक-संग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्त्तुमर्हसि" (3। 20)। उनने यह भी साफ ही कह दिया है कि 'मेरे अपने लिए तो कुछ भी करना-धरना शेष नहीं है, क्योंकि मुझे कोई चीज हासिल करनी जो नहीं है। फिर भी कर्म तो मुस्तैदी से करता रहता ही हूँ क्योंकि यदि ऐसा न करूँ तो सब लोग मेरी ही देखा-देखी कर्मों को छोड़ बैठेंगे। नतीजा यह होगा कि सारी गड़बड़ पैदा हो जाएगी। फिर तो अव्यवस्था होने के कारण लोग चौपट ही हो जाएँगे' - "न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन'', आदि (3। 22-26)। इसके अनुसार तो सभी को अच्छे से अच्छा पथ दर्शन एवं नेतृत्व मिलता है, जिससे सभी बातों की मर्यादा चल पड़ती है और समाज मजबूती के साथ उन्नति के पथ में अग्रसर होता है। इस तरह जितनों का कल्याण होता है उतनों का सत्कर्म या उनके पूर्व जन्म के अच्छे कामों का ही यह फल माना जाना चाहिए। यदि वे आराम पाते और निर्बाध आगे बढ़ते हैं तो इसमें दूसरों की कमाई, प्रारब्ध या पूर्व जन्मार्जित कर्मों की कोई बात आती ही नहीं। जिन्हें सुख मिलता है, सुविधाएँ मिलती हैं उनके अपने ही कर्मों के ये फल हैं, यही मानना होगा।

दूसरी ओर ऐसे लोग भी होते हैं जिन्हें मिटाने के लिए अवतारों के शरीर होते हैं। जिनकी शैतानियतें मिटानी हैं, जिन्हें तबाह-बर्बाद करना है अवतारों के करते जितनों को आठ-आठ आँसू रोने पड़ते हैं, जो खुद और जिनके सगे-संबंधी भी चौपट होते हैं, रो-रो मरते हैं, जिनकी भीषण से भीषण यंत्रणाएँ होती हैं, जिनकी स्वेच्छाचारिता बंद हो जाती और निरंकुशता एवं स्वच्छंदता पर पाले पड़ जाते हैं, उनकी यह दशा होती है यद्यपि अवतारों के शरीरों से ही, उनके कामों से ही। फिर भी इसका कारण उन्हीं दुराचारियों, दुष्कृत - दुष्ट - लोगों के अपने ही बुरे कर्म मानने होंगे। यदि किसी की लाठी से सिर फूटा या तलवार से गला काटा तो यह ठीक है कि सिर फूटने एवं गला कटने का प्रत्यक्ष कारण लाठी या तलवार है। मगर ऐसे कारणों के संपादन करने वाले वे दुष्कर्म माने जाते हैं जो पहले या पूर्वजन्म में ऐसे लोगों ने किए थे जिनके सिर फूटे या गले कटे। यह तो कर्मों का मोटा-मोटी हिसाब माना ही जाता है। इसलिए अवतारों के शरीरों के निर्माण में भी इन दुष्ट जनों के ही बुरे कर्म कारण हैं। पहले कही चुके हैं कि यदि किसी के शरीर से दूसरों को कष्ट या आराम पहुँचे तो उनके भी भले-बुरे कर्म उस शरीर के कारण होते हैं। शरीरवाले के कर्म तो होते ही हैं। फलत: जिस प्रकार साधारण शरीर के निर्माण में समष्टि कर्म कारण बनते हैं। उसी तरह अवतारों के शरीरों के निर्माण में भी।

एक बात और भी जान लेने की है। यह जरूरी नहीं कि पूर्व जन्म के ही भले-बुरे कर्म वर्तमान जन्म के सुख-दु:खों के कारण हों। इसी देह के अच्छे या गंदे काम भी कारण बन सकते हैं, बन जाते हैं। बासी या पुराने ही कर्म ऐसा करें यह कोई नियम नहीं है। सब कुछ निर्भर करता है कर्मों की शक्ति पर, उनकी ताकत पर, उनकी भयंकरता या उत्तमता पर। इसीलिए नीतिकारों ने माना है कि 'तीन साल, तीन महीने, तीन पखवारे या तीन दिनों में भी जबर्दस्त कर्मों के भले-बुरे फल यहीं मिल जाते हैं' - "त्रिभिर्वर्षैस्त्रिभिर्मासैस्त्रिभि: पक्षैस्त्रिभिर्दिनै:। अत्युत्कटै: पुण्यपापैरिहैव फलमश्नुते।" इसीलिए तो यह भी कहा जाता है कि 'इस हाथ दे, उस हाथ ले।' इसलिए दुष्ट जनों के जिन भयंकर कुकर्मों के करते हाहाकार मच जाता है, बहुत संभव है कि अवतारों के कारण वही हों या वह भी हों। इसी प्रकार महान पुरुषों के तप और सदाचरण भी, जो उन पापी जनों से त्राण पाने के लिए किए जाते हैं, अवतारों के कारण बन जाते हैं, बन सकते हैं। मीमांसकों ने जानें कितने ही ऐसे कर्म माने हैं जिनके फल जल्दी ही मिलते हैं।

इस प्रकार समष्टि कर्मों के चलते ही पृथिवी आदि की ही तरह अवतारों के शरीर बनते हैं यह बात समझ में आ जाती है। जो लोग ऐसा सोचते हों कि हमारे भले-बुरे समष्टि कर्म भगवान को नहीं खींच सकते; क्योंकि वह तो सबके ऊपर माना जाता है, उनके लिए तो पहले ही कहा जा चुका है कि कर्मों के अनुसार ही तो भगवान को चलना पड़ता है। उसे भी कर्म की अधीनता एक अर्थ में स्वीकार करनी ही पड़ती है। यदि लोगों के कर्मों के अनुसार उसे हजार परेशानी उठानी पड़ती हो, दौड़-धूप और चिंता, फिक्र करनी पड़ती हो, तो यह तो मामूली-सी बात ठहरी। जब लोगों ने ऐसा भी माना है कि भक्तजन भगवान को नचाते हैं, तो फिर अवतार बनना क्या बड़ी बात है? जिनके कर्मों के करते पूर्व बताए ढंग से परमाणुओं की क्रियाएँ, दौड़धूप और चावल पेड़, मनुष्य के शरीर आदि बनना-बिगड़ना निरंतर जारी है, अवतारों के शरीर भी उन्हीं की क्रियाओं के भीतर क्यों न आ जाएँ, उन्हीं से तैयार क्यों न हो जाएँ? आखिर ये सारी चीजें होती ही हैं संसार का काम चलाने के ही लिए न? फिर यदि अवतारों के बिना कोई काम रुकता हो या न चल सकता हो, तो उनके शरीर भी वैसे कामों के ही लिए क्यों न बन जाएँगे?

यह ठीक है कि जितनी चीजें बनती हैं सभी अनिवार्य आवश्यकताओं और जरूरतों के ही चलते। प्रकृति या संसार के भीतर व्यर्थ और फिजूल पदार्थों की गुंजाइश हई नहीं। बल्कि प्रकृति तो ऐसी चीजों की दुश्मन है। इसीलिए उन्हें जल्द मिटा देती है। वैसी ही आवश्यकताओं के चलते अवतार भी होते हैं। यही कारण है कि आवश्यकताओं की पूर्ति होते ही अवतारों का काम पूरा हो जाता है और उनके शरीर खत्म हो जाते हैं। किन्हीं का काम कुछ देर से होता है और किन्हीं का जल्द। कहते हैं कि नृसिंह के बिना हिरण्यकशिपु को कोई मार नहीं सकता था। कहानी तो ऐसी है कि उसने अपने लिए ऐसा ही सामान कर लिया था। यही वजह है कि भगवान को नृसिंह बनना और उसे मार के फौरन विलीन हो जाना पड़ा। पीछे नृसिंह का शरीर रह न सका। यही बात राम, कृष्ण आदि के बारे में भी है। जो जो काम उनने किए, जो पथदर्शन उनसे हुए वे औरों से हों नहीं सकते थे। मगर उन कामों के लिए कुछ ज्यादा समय चाहता था। इसीलिए वे लोग देर तक रहे। हमारा मतलब यहाँ पौराणिक आख्यानों पर मुहर लगाने या उन्हें अक्षरश: सही बताने से नहीं है। हमें तो यहीं दिखाना है कि अवतारों के लिए दार्शनिक युक्ति के अनुसार जो परिस्थिति चाहिए वह संभव है या नहीं।

यह बात भी अब साफ होई चुकी कि अवतारों के शरीरों में भगवान को खिंच आना ही पड़ता है। अवतार शब्द का तो अर्थ ही है। उतरना या खिंच आना अगर संसार में बुरे-भले कर्म माया-ममताशून्य जनों तक को अपनी ओर खींच सकते हैं और उनमें दया या रोष पैदा करवा के हजारों कठिनतम काम उनसे करवा सकते हैं, तो फिर भगवान का खिंच जाना कोई आश्चर्य नहीं है यदि बाँसुरी का स्वर मृग या साँप को खींच सकता है, उन्हें मुग्धा एवं बेताब कर सकता है; यदि बछड़े की आवाज गाय को बहुत दूर से खींच सकती है; यदि किसी प्रेमी का प्रेम हजारों कोस से किसी को घसीट सकता है, तो सृष्टि की जरूरत या लोगों के भले-बुरे कर्म तथा प्रेम और द्वेष भगवान को उस शरीर में क्यों नहीं खींच लेंगे। न्याय और वैशेषिक दर्शनों ने तो स्पष्ट कहा है कि लोगों के कर्मों से ही परमाणुओं में क्रिया जारी होती है और वे आपस में खिंच के मिलते-मिलते महाकाय पृथिवी, समुद्र आदि बना डालते हैं। फिर प्रलय के समय उलटी क्रिया होने से अलग होते-होते वही सबको मिटा देते हैं। ऐसी दशा में उन्हीं कर्मों से भगवान के शरीर क्यों न बन जाएँ? उनमें वह खिंच जाए क्यों नहीं?

अब एक ही सवाल और रह जाता है। कहा जा सकता है कि शरीर बन जाने पर तो भगवान की भी वही हालत हो जाएगी जो साधारण जीवों की। वही तकलीफ-आराम, वही माया-ममता और वही हैरानी-परेशानी होगी ही। इसका उत्तर गीता ने चौथे अध्‍याय में ही दे दिया है। वहाँ लिखा है कि, 'अविनाशी एवं जन्मशून्य होते हुए और सभी पदार्थों का शासक रहते हुए भी मैं अपनी माया के बल से शरीर धारण करता हूँ। मगर अपने स्वभाव को कायम रखता हूँ जिससे माया मुझ पर अपना असर नहीं जमा पाती' - "अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्। प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया" (4। 6)। माया कहने और अपने स्वभाव को कायम रखने की बात बोलने का मतलब यह है कि एक तो भगवान का शरीर साधारण लोगों जैसा देखने पर भी वैसा नहीं है; किंतु मायामय और नटलीला जैसा है। नट की कला की कितनी ही बातें असाधारण होती हैं। वे देखने में चाहे जो लगें; मगर उनकी हकीकत कुछ और ही होती है। देखने वाले चकाचौंध में पड़ के और का और समझ बैठते हैं। यही बात अवतारों के भी शरीरों की हैं। दूसरी बात यह है कि साधारण लोगों की तरह माया-ममता में वे दबते नहीं। उनका अपना स्वभाव, अपना ज्ञान, अपनी अनासक्ति और अपना बेलागपन बराबर कायम रहता है। खानपान आदि सारी क्रियाएँ उस शरीर के लिए आवश्यक होने के कारण ही होती हैं जरूर। मगर उनमें वे अवतार लिपटते नहीं, चिपकते नहीं। वे इन सब बातों से बहुत ऊपर रहते हैं।

यह भी जान लेना जरूरी है कि गीता में इस माया को दैवी या अलौकिक शक्तिवाली कहा है, जिसमें हजारों गुण, खूबियाँ या करिश्मे होते हैं - 'दैवीह्येषा गुणमयी मममाया' (7। 14)। इसीलिए उस माया के चलते जो शरीर बनेगा उसमें मामूली नटों के करिश्मों से हजार गुने अधिक करिश्मे होंगे - चमत्कार होंगे। वह तो महान इंद्रजाल होगा। इसी के साथ-साथ यह भी बात है कि जिस तरह कर्मों की व्यवस्था बता के भगवान के शरीर बनने की रीति कही जा चुकी है। वह असाधारण है, गैरमामूली है। इसीलिए जो निराले, अलौकिक काम अवतार करते हैं वह औरों में पाए नहीं जाते, पाए जा नहीं सकते। यह तो सारी प्रणाली ही अलौकिक है, निराले कर्मों का खेल है, भगवान की लीला है। भगवान भी दिव्य हैं, निराले हैं। उनकी माया भी वैसी ही है। अनोखे कर्मों से ही उनके शरीर बनते हैं, न कि मामूली कर्मों से। इसीलिए गीता ने कह दिया है कि इन सारी निराली बातों को जो ठीक-ठीक समझता है, भगवान के दिव्य जन्म एवं दिव्य कर्म को जो बखूबी जान जाता है, मरने के बाद वह पुनरपि जन्म नहीं ले के भगवान ही बन जाता है - 'जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वत:। त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन' (4। 9)।

`अवतारों के संबंध में गीता की बातें सामान्य रूप से बताई जा चुकीं। अब एक खास बात कहके यह प्रसंग पूरा करना है। हमने जो परमाणुओं के जुटने से पृथिवी आदि के बनने और अलग होने से उनके नष्ट हो जाने तथा प्रलय के आ जाने की बात कह दी है उससे यह तो पता लगी गया कि प्रलय और कुछ चीज नहीं है, सिवाय इसके कि वह कर्मों के, और इसीलिए सभी पदार्थों के जो उस समय रह जाते हैं, विराम का समय है, विश्राम का काल है। संसार में विश्राम का भी नियम पाया जाता है। इसीलिए कर्मवाद के माननेवालों ने कर्मों के सिलसिले में ही उसे माना है। इसीलिए वे प्रलय को कर्मों का विश्राम काल और सृष्टि को उनके काम या फल देने का समय मानते हैं।

इसी नियम के अनुसार जब-जब जहाँ-जहाँ समष्टि कर्मों की प्रेरणा से अवतारों की आवश्यकता अनिवार्य हो जाती है तब-तब तहाँ-तहाँ अवतार पाए जाते हैं, होते हैं। किसी खास देश या खास समय में ही अवतारों का मानना भारी भूल है। गीता को यह बात मान्य नहीं है। इसीलिए अवतार के प्रकरण में सिर्फ 'जब-जब, या समय-समय पर' 'यदायदाहि', 'युगे-युगे' (4। 7-8) यही कहा है। वहाँ किसी देश या मुल्क की बात पाई नहीं जाती है। पुराण-इतिहासों में भी सिर्फ भूलोक या मर्त्त्यलोक ही कहा है और यही बात प्रधान है। यदि कहीं एकाध जगह भारतवर्ष आया है तो वह या तो यों ही आ गया है दृष्टांत के रूप में, या अवतार विशेष के सिलसिले में ही, जो भारतवर्ष में ही हुए हैं। मगर दरअसल देश या मुल्क का कोई नियम नहीं है। मानव-समाज के ही कल्याण के लिए अवतार होते हैं और वह समाज सभी देशों में है। इसलिए यहूदी, इस्लाम या ईसाई धर्मों में जिन महापुरुषों या प्रमुख आचार्यों की बात आती है, जो धर्म संस्थापक माने जाते हैं, उन्हें अवतार मानने में गीता को कोई उज्र नहीं है। गीता के अनुसार तो वे सबके-सब अवतार हईं। यों तो 'यद्यद्विभूतिमत्' (10। 41) में सभी प्रकार के विलक्षण पुरुषों या पदार्थों को भगवान की ही विभूति आम-तौर से माना है।

इस प्रकार हमने देखा कि यदि ईश्वर या कर्मवाद की शरण ली गई है तो सिर्फ सृष्टि के कामों को पूरी तौर से चलाने के लिए। मालूम होता है कि इनके बिना कोई स्थान खाली था, गैप - gap - था। उसी की पूर्ति के लिए इन्हें माना गया। मगर पीछे हमारा पतन ऐसा हो गया कि हम अपना सारा यत्न छोड़ के इन्हीं भगवान और भाग्य - कर्म - के भरोसे बैठने लगे! यही बात अब तक जारी है।



5. गुणवाद और अद्वैतवाद

कर्मवाद एवं अवतारवाद की ही तरह गीता में गुणवाद तथा अद्वैतवाद की भी बात आई है। इनके संबंध में भी गीता का वर्णन अत्यंत सरस, विलक्षण एवं हृदयग्राही है। यों तो यह बात भी गीता की अपनी नहीं है। गुणवाद दरअसल वेदांत, सांख्य और योगदर्शनों की चीज है। ये तीनों ही दर्शन इस सिद्धांत को मानते हैं कि सत्त्व, रज और तम इन तीन ही गुणों का पसारा, परिणाम या विकास यह समूचा संसार है - यह सारी भौतिक दुनिया है। इसी तरह अद्वैतवाद भी वेदांत दर्शन का मौलिक सिद्धांत है। वह समस्त दर्शन इसी अद्वैतवाद के प्रतिपादन में ही तैयार हुआ है। वेदांत ने गुणवाद को भी अद्वैतवाद की पुष्टि में ही लगाया है - उसने उसी का प्रतिपादन किया है। फिर ये दोनों ही चीजें गीता की निजी होंगी कैसी? लेकिन इनके वर्णन, विश्लेषण, विवेचन और निरूपण का जो गीता का ढंग है वही उसका अपना है, निराला है। यही कारण है कि गीता ने इन पर भी अपनी छाप आखिर लगाई दी है।



परमाणुवाद और आरंभवाद

असल में प्राचीन दार्शनिकों में और अर्वाचीनों में भी, फिर चाहे वह किसी देश के हों, सृष्टि के संबंध में दो मत हैं - तो दल हैं। एक दल है न्याय और वैशेषिक का, या यों कहिए कि गौतम और कणाद का। जैमिनि भी उन्हीं के साथ किसी हद तक जाते हैं। असल में उनका मीमांसादर्शन तो प्रलय जैसी चीज मानता नहीं। मगर न्याय तथा वैशेषिक उसे मानते हैं। इसीलिए कुछ अंतर पड़ जाता है। असल में गौतम और कणाद दोई ने इसे अपना मंतव्य माना है। दूसरे लोग सिर्फ उनका साथ देते हैं। इसी पक्ष को परमाणुवाद ( Atomic Theory) कहते हैं। यह बात पाश्चात्य देशों में भी पहले मान्य थी। मगर अब विज्ञान के विकास ने इसे अमान्य बना दिया। इसी मत को आरंभवाद (Theory of creation) भी कहते हैं। इस पक्ष ने परमाणुओं को नित्य माना है। हरेक पदार्थ के टुकड़े करते-करते जहाँ रुक जाएँ या यों समझिए कि जिस टुकड़े का फिर टुकड़ा न हो सके, जिसे अविभाज्य अवयव (Absolute or indivisible particle) कह सकते हैं उसी का नाम परमाणु (Atom) है। उसे जब छिन्न-भिन्न कर सकते ही नहीं तो उसका नाश कैसे होगा? इसीलिए वह अविनाशी - नित्य - माना गया है।

परमाणु के मानने में उनका मूल तर्क यही है कि यदि हर चीज के टुकड़ों के टुकड़े होते ही चले जाएँ और कहीं रुक न जाएँ - कोई टुकड़ा अंत में ऐसा न मान लें जिसका खंड होई न सके - तो हरेक स्थूल पदार्थ के अनंत टुकड़े, अवयव या खंड हो जाएँगे। चाहे राई को लें या पहाड़ को; जब खंड करना शुरू करेंगे तो राई के भी असंख्य खंड होंगे - इतने होंगे जिनकी गिनती नहीं हो सकती, और पर्वत के भी असंख्य ही होंगे। वैसी हालत में राई छोटी क्यों और पर्वत बड़ा क्यों? यह प्रश्न स्वाभाविक है। अवयवों की संख्या है, तो दोनों की अपरिमित है, असंख्य है, अनंत है। इसीलिए बराबर है, एक-सी है। फिर छुटाई, बड़ाई कैसे हुई? इसीलिए उनने कहा कि जब कहीं, किसी भाग पर, रुकेंगे और उस भाग के भाग न हो सकेंगे, तो अवयवों की गिनती सीमित हो जाएगी, परिमित हो जाएगी। फलत: राई के कम और पर्वत के ज्यादा टुकड़े होंगे। इसीलिए राई छोटी हो गई और पर्वत बड़ा हो गया। उसी सबसे छोटे अवयव को परमाणु कहा है। परमाणुओं के जुटने से ही सभी चीजें बनीं।



गुणवाद और विकासवाद

दूसरा दल गुणवादियों का है। उनके गुणवाद को परिणामवाद या विकासवाद (Evolution Theory) भी कहते हैं। इसे वही तीन दर्शन - वेदांत, सांख्य तथा योग - मानते हैं। इनके आचार्य हैं क्रमश: व्यास, कपिल और पतंजलि। ये लोग परमाणुओं की सत्ता स्वीकार न करके तीन गुणों को ही मूल कारण मानते हैं। इन्हें परमाणुओं से इनकार नहीं। मगर ये उन्हें अविभाज्य नहीं मानते हैं। इनका कहना यही है कि कोई भी भौतिक पदार्थ अविभाज्य नहीं हो सकता है। विज्ञान ने भी इसे सिद्ध कर दिया है कि जिसे परमाणु कहते हैं उसके भी टुकड़े होते हैं। परमाणुवाद के मानने में जो मुख्य दलील दी गई है उसका उत्तर गुणवादी आसानी से देते हैं। वे तो यही कहते हैं कि पर्वत के टुकड़े करते-करते एक दशा ऐसी जरूर आ जाएगी जब सभी टुकड़े राई जैसे ही हो जाएँगे। उनकी संख्या भी निश्चित होगी, फिर चाहे जितनी ही लंबी हो। अब आगे जो टुकड़े हरेक राई जैसे टुकड़े के होंगे वह अनंत - असंख्य - होंगे। नतीजा यह होगा कि इन अनंत टुकड़ों से हरेक राई या राई जैसी ही लंबी-चौड़ी चीज तैयार होगी, जिसकी संख्या निश्चित होगी। अब यहीं से एक ओर राई रह जाएगी अकेली और दूसरी ओर उसी जैसे टुकड़ों को, जिनकी संख्या निश्चित है, मिला के पर्वत बना लेंगे। इसीलिए वह बड़ा भी हो जाएगा। फिर परमाणु का क्या सवाल? गीता में परमाणुवाद की गंध भी नहीं है - चर्चा भी नहीं है, यह विचित्र बात है।

इसीलिए परमाणुवाद और तन्मूलक आरंभवाद की जगह उनने गुणवाद और तन्मूलक परिणामवाद या विकासवाद स्थिर किया। उनने अंवेषण करके पता लगाया कि देखने में चाहे पृथिवी, जल आदि पदार्थ भिन्न हों; मगर उनका विश्लेषण (Analysis) करने पर अंत में सबों में तीन ही चीजें, तीन ही तत्त्व, तीन ही मूल पदार्थ पाए जाएँगे, पाए जाते हैं। इन तीनों को उनने सत्त्व, रजस और तमस नाम दिया। आमतौर से इन्हें सत्त्व, रज, तम कहते हैं। इन्हीं का सर्वत्र अखंड राज्य है - सर्वत्र बोलबाला है। चाहे स्थूल पदार्थ अन्न, जल, वायु, अग्नि आदि को लें, या क्रिया, ज्ञान, प्रयत्न, धैर्य आदि सूक्ष्म पदार्थों को लें। सबों में यही तीन गुण पाए जाते हैं। इसीलिए गीता ने साफ ही कह दिया है कि 'आकाश, पाताल, मर्त्त्यलोक में - संसार भर में - ऐसा एक भी सत्ताधारी पदार्थ नहीं है जो इन तीन गुणों से अछूता हो, अलग हो' - "न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु व पुन:। सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभि: स्यात्त्रिभिर्गुणै:" (18। 40)। यों तो अठारहवें अध्‍याय के 7वें से लेकर 44 तक के श्लोकों में विशेष रूप से कर्म, धैर्य, ज्ञान, सुख, दु:खादि सभी चीजों का विश्लेषण करके उन्हें त्रिगुणात्मक सिद्ध किया है। सत्रहवें अध्याय के शुरू के 22 श्लोकों में भी दूसरी अनेक चीजों का ऐसा ही विश्लेषण किया गया है। गीता में और जगह भी गुणों की बात पाई जाती है। चौदहवें अध्‍याय में यही बात है। वह तो सारा अध्‍याय गुणनिरूपण का ही है। मगर वहाँ गुणों का सामान्य वर्णन है। इसका महत्त्व आगे बताएँगे।

यहाँ पर आरंभवाद और परिणामवाद या विकासवाद के मौलिक भेदों को भी समझ लेना चाहिए। तभी आगे बढ़ना ठीक होगा। आरंभवाद में यही माना जाता है कि परमाणुओं के संयोग या जोड़ से ही पदार्थों के बनने का काम शुरू होता है - आरंभ होता है। वे ही पदार्थों का आरंभ या श्रीगणेश करते हैं। वे इस तरह एक नई चीज तैयार करते हैं जैसे सूत कपड़ा बनाते हैं। जो काम सूतों से नहीं हो सकता है वह तन ढँकने का काम कपड़ा करता है। यही उसका नवीनपन है। मगर परिणामवाद या विकासवाद में तो किसी के जुटने, मिलने या संयुक्त होने का प्रश्न ही नहीं होता। वहाँ पहले से बनी चीज ही दूसरे रूप में परिणत हो जाती है, विकसित हो जाती है। जैसे दूध ही दही के रूप में परिणत हो जाता है। इस मत में तीनों गुण ही सभी भौतिक पदार्थों के रूप में परिणत हो जाते हैं। कैसे हो जाते हैं यह कहना कठिन है, असंभव है। मगर हो जाते हैं यह तो ठोस सत्य है। जब परमाणुओं को निरवयव मानते हैं, तो फिर उनका संयोग होगा भी कैसे? संयोग तो दो पदार्थों के अवयवों का ही होता है न? जब हम हाथ से लोटा पकड़ते हैं तो हाथ के कुछ भाग या अवयव लोटे के कुछ हिस्सों के साथ मिलते हैं। मगर निरवयव चीजें कैसे परस्पर मिलेंगी? इसीलिए आरंभवाद को मानने से इनकार कर दिया गया। क्योंकि इस मत के मानने से दार्शनिक ढंग से पदार्थों का निर्माण सिद्ध किया जा सकना असंभव जँचा।



गुण और प्रधान

सत्त्व, रज, तम को गुण नाम क्यों दिया गया यह भी मजेदार बात है। जब यही सृष्टि के मूल में है तब तो यही प्रधान ठहरे, मुख्य ठहरे, असल ठहरे, अग्रणी ठहरे। लेकिन इन्हें गुण कहते हैं! गुण या गौण का अर्थ है अप्रधान, जो मुख्य न हो, अग्रणी न हो। और प्रधान किसे कहा है? प्रकृति को, जो इन तीनों गुणों के मिल जाने से बन जाती है। जब ये तीनों गुण अपनी विषमता छोड़ के सम रूप से मिल जाते हैं, जब इनकी साम्यावस्था हो जाती है तो उसे ही प्रकृति और प्रधान कहते हैं; हालाँकि वह पीछे की चीज होने से गुण या गौण ठहरी। साम्यावस्था ही प्रलय की अवस्था है। उस दशा में सृष्टि का काम कुछ भी नहीं हो पाता - सब कुछ खत्म हो जाता है।

यद्यपि चौदहवें अध्‍याय के 5वें से 25वें तक के श्लोकों में इन गुणों की बात विशेष रूप से कही गई है, तथापि 5-18 तक के 14 श्लोकों के पढ़ने से, अभी जो शंका उठी है, उसका उत्तर मिल जाता है। दूसरी भी बातें विदित हो जाती हैं। इसीलिए इस अध्‍याय का विशेष महत्त्व हमने माना है। इन्हें गुण क्यों कहते हैं, इस संबंध में पाँचवाँ श्लोक खास महत्त्व रखता है। मगर उसका अर्थ करने या और भी विचार करने के पूर्व हमें सृष्टि की एक बात जान लेने की है जो उससे पहले के 3, 4 श्लोकों में कही गई है। हम तो हमेशा सृष्टि के ही संबंध में सोचते हैं कि यह कैसे बनी, इसका विकास या पसारा कैसे हुआ। दर्शनों का श्रीगणेश तो इसी बात को लेके होता ही है, यह पहले ही कहा जा चुका है। प्रलय या सृष्टि न रहने की दशा को तो हम पहले सोचते नहीं। वह तो हमारे सामने की चीज है नहीं। विचार के ही सिलसिले में जब उसकी बात पीछे आ जाती है, तो उस पर भी सोचते हैं। मगर उस दशा में भी वह महज ख्‍याली और दिमागी चीज होती है। वह सामने की या ठोस वस्तु तो होती नहीं। फिर पहले उधर खयाल जाए तो कैसे ?

एक बात और है। सृष्टि का अर्थ ही है अनेकता, विभिन्नता (Diversity, Heterogeniety)। इसी विभिन्नता को लेके हम शुरू करते हैं और अंवेषण चालू होता है। प्रलय तो इससे उलटी चीज है। उसमें तो एकता और अभिन्नता है, एकरूपता और समता (Uniformily & Homogeneity) है। जैसा कि गीता ने चौदहवें अध्‍याय के 6-18 श्लोकों में बताया है, गुणों में तो परस्परविरोध है - वे ऐसे हैं कि एक दूसरे को खा जाएँ। यदि हम तीनों के प्रतिनिधि के रूप में पित्त, वात और कफ को मान लें तो इनकी बात कुछ समझ में आ जाए। क्रमश: सत्त्व, रज, तम की जगह स्थूल शरीर में पित्त, वात, कफ माने जाते भी हैं। पित्तादि में सत्त्वादि की ही यों भी प्रधानता रहती है। सत्त्व में प्रकाश, उजाला, हल्कापन आदि माने जाते हैं। पित्त में भी यही चीजें हैं। पित्त आग या गर्म है। और उसी में ये बातें होती हैं। रज में क्रिया होती है और वायु तो सतत क्रियाशील है। तम भारी है और कफ भी जकड़ने वाली चीज है। शरीर के लिए जैसे पित्तादि तीनों की जरूरत है, वैसे ही संसार के लिए सत्त्वादि की आवश्यकता है। हाँ, पित्त आदि की मात्रा निश्चित रहे तो ठीक हो, नहीं तो गड़बड़, बेचैनी, बीमारी हो। यही बात सत्त्वादि की भी है। उनकी भी निश्चित मात्रा है और जहाँ वह बिगड़ी कि गड़बड़ शुरू हुई। जैसे शरीर में एक समय एक ही पित्त या वायु या कफ प्रधान हो के रहता है, वैसी ही बात इन गुणों की भी है। एक समय एक ही प्रधान रहेगा; बाकी उसी के मातहत। यही बात गीता ने 'रजस्तमश्चाभिभूय' (14। 10) श्लोक में साफ कही है।

इन गुणों का परस्पर विरोध तो मानते ही हैं। वायु, कफ, पित्त की भी यही बात है। मगर जरा और भी देख लें। ज्ञान के लिए, हल्केपन के लिए और प्रकाश के लिए क्रिया नहीं चाहिए, भारीपन नहीं चाहिए। ज्यादा हलचल से प्रकाश रुक जाता है, ज्ञान नहीं हो पाता, मन की एकाग्रता नहीं हो पाती। भारीपन से या तो नींद आती है या बेचैनी होती है। ज्ञान है सत्त्व का काम। हल्कापन और प्रकाश भी उसी का काम है। उसकी विरोधी क्रिया है रज का काम और भारीपन है तम का। साफ ही देखते हैं कि ज्ञान होने से मन उसमें लगे तो क्रिया रुक जाए। निद्रा या भारीपन भी जाता रहे। हल्कापन उसका विरोधी जो है। भारीपन हो तो सारी चीजें दब के रह जाएँ, नींद आ जाए और क्रिया न हो सके। ज्ञान की तो बात ही मत पूछिए। 6 से 9 तथा 11 से 18 तक के श्लोकों में इसी बात का सुंदर विवरण है।

मगर खूबी यह है कि इन तीनों का आपस में समझौता है कि हम लोग मिल के रहेंगे; नहीं तो किसी की खैर नहीं! राजनीति में आज तो धर्मों और देशों का परस्पर विरोध है वह तो इनके सामने फीका पड़ जाता है - वह इनके विरोध के सामने कुछ नहीं है। मगर चाहे हमारी नादानी से धर्मविरोध और राजनीति का विरोध मिटे या न मिटे, भाई-भाई की लड़ाई खत्म हो या न हो। मगर इनने तो पारस्परिक विरोध मिटा लिया है, समझौता (Pact) कर लिया है। इन्हें दुनिया में सिर ऊँचा करके रहना जो है। और हमें? हमें तो गैरों के जूते सहने और गुलामी करनी है न? फिर हमारा मेल कैसे हो? हाँ, तो इनने यह समझौता कर लिया है कि एक वक्त में हममें एक ही प्रधान होगा, नेता होगा, मुखिया होगा; बाकी दो उसी के साथ, उसी के अनुकूल चलेंगे, उसी की मदद करेंगे, बावजूद इसके कि ये दोनों ही उसके सख्त दुश्मन हैं! फिर मौके पर जरूरत के अनुसार हममें दूसरा प्रधान तथा लीडर होगा और पहला उस जगह से हटेगा। उस समय भी बाकी दो उसी प्रधान के सहायक होंगे। आवश्यकतानुसार उसे हटा के जब तीसरा मुखिया बनेगा तो बाकी दो उसके ही सहायक और साथी बनेंगे। यही है इन तीनों का अलिखित समझौता (Convention)। पूर्वोक्त दसवें श्लोक का यही अभिप्राय है।

यहीं पर इन्हें गुण कहने का एक कारण मिल जाता है। जैसा कि अभी कहा गया है, सृष्टि के रहते हुए इन तीन में दो या अधिकांश हमेशा एक के पीछे रहते हैं, उसी के सहायक और मददगार होते हैं; यहाँ तक कि अपना स्वभाव छोड़ के उसके विपरीत उसकी मदद करते हैं, जैसे बलपूर्वक किसी गुलाम से कोई काम कराया जाए। फर्क यही है कि इनके लिए बल प्रयोग नहीं है। दूरअंदेशी से खुद ही ये वैसा करते हैं। और इनमें जो एक कभी प्रधान होता है वही पीछे अप्रधान बन जाता है। इस प्रकार देखते हैं कि ये तीनों गुण सृष्टि के मूल कारण होते हुए यद्यपि प्रधान कहे जाने योग्य हैं, तथापि इनकी असली खूबी है दूसरों के अनुयायी बनना, उनकी सहायता करना, उनके अनुकूल होना। सृष्टि की दृष्टि से इनकी यह खूबी जरूरी है भी। इसी विशेषता के खयाल से, इसी ओर खयाल आकृष्ट करने के ही लिए इन्हें गुण कहा है। दसवें श्लोक से यही पता चलता है।

अब जरा दूसरा पहलू देखिए। यदि 5-9 श्लोकों को देखें तो पता चलता है कि ये तीनों ही गुण बाँधने का काम करते हैं। कोई ज्ञान, सुख आदि में मनुष्य को लिप्त करके, लिपटा के उन्हीं चीजों से उसे बाँध देते हैं; क्योंकि किसी चीज की ज्यादती ही ऐब है, बंधन है, तो कोई क्रिया और लोभ आदि में फँसा देते हैं। यह नहीं हुआ, वह नहीं हुआ, यह काम शेष है, वह बाकी है इसी हाय-हाय में जिंदगी गुजरती है। जिस प्रकार सत्त्व गुण, ज्ञान आदि में फँसा के बाँध देता है, उसी प्रकार रज क्रिया और लोभ आदि में। जाल में फँसाने का काम करने में ज्ञान सुख, क्रिया, लोभ चारे की जगह प्रयुक्त होते हैं। तम का तो फँसाना काम प्रसिद्ध ही है। वह तो हमेशा का ही बदनाम है। मगर जो उससे अच्छा रज है और जो महान माने जानेवाला सत्त्व है वह भी फँसाने में किसी से पीछे नहीं है! 'छोटी बहू तो छोटी, बड़ी बहू शुभानल्ला !' और यह तो जानते ही हैं कि फाँसने और बाँधने का काम रस्सी करती है। फिर चाहे वह सूत की बारीक या मोटी हो, या, और चीज की हो। संस्कृत में रस्सी को गुण कहते हैं। इसी का अपभ्रंश हो के गोन शब्द हो गया। नाव खींचने की रस्सी को गोन कहते हैं। फलत: फँसाने और बाँधने की ताकत इन गुणों में होने के ही कारण इन्हें गुण कहा है; ताकि लोग इनसे सजग रहें। 5-9 श्लोकों से यह स्पष्ट है। 5वें के उत्तरार्द्ध में तो एक ही साथ तीनों को बाँधनेवाले कह दिया है - 'निबध्नन्ति महाबाहो।' इसीलिए अर्जुन को कहा गया है कि इन गुणों से ऊपर जाओ - 'निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन' (2। 45)। इसी चौदहवें अध्‍याय में भी कहा है कि इन गुणों से अलग ब्रह्मात्मा को जानने वाले की मुक्ति होती है - 'गुणेभ्यश्च परं वेत्ति' (14। 19), तथा इन गुणों से ऊपर उठने पर ही मनुष्य ब्रह्मरूप हो जाता है - 'स गुणान्समतीयैतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते' (14। 26)।

गुणों में यह परस्पर विरोध और मिल के काम करने की - दोनों - बात योगसूत्र - 'परिणामतापसंस्कारदु:खैर्गुणवृत्तिविरोधाच्च दु:खमेव सर्वं विवेकिन:' (2। 15) - में और इसके भाष्य में भी अत्यंत विशद रूप से बताई गई है। वहीं पर यह भी कह दिया है कि तीनों गुण परस्पर मिल के ही हर चीज पैदा करते हैं। इसीलिए तो सभी पदार्थों में तीनों ही गुण पाए जाते हैं। ईश्वरकृष्ण ने सांख्यकारिकाओं में भी 'सत्त्वं लघु प्रकाशकमिष्टमुपष्टम्भकं चलं च रज:। गुरु वर्णकमेव तम: प्रदीवच्चार्थतो वृत्ति:' (13) के द्वारा इन तीनों गुणों को परस्पर विरोधी बता के बाद में तीनों के मिल के काम करने का बहुत ही सुंदर दृष्टांत दिया है। इनके परस्पर मिलने का कारण भी बताया है। वह कहता है कि जिस प्रकार दीपक में तेल, बत्‍ती और तेज या अग्नि तीनों ही परस्पर विरोधी हैं तथापि तीनों को मिलाए बिना रोशनी होई नहीं सकती। आग बत्‍ती और तेल दोनों को ही खत्म करने वाली है। तेल ज्यादा दे दिया जाए जलना बंद हो जाए, बुझ जाए। बत्‍ती को भी भिगो के विकृत बना देता है। बत्ती भी तेल को सोखती है अगर सख्त बत्‍ती या कपड़े का बंडल डाल दें तो चिराग बुझ जाए। मगर प्रयोजनवश तीनों को हिसाब से रख के काम चलाते हैं। इस तरह परस्पर मेल से ही दीपक जलता है। इसी प्रकार संसार के कामों के चलाने और गुणों के अपने स्वतंत्र अस्तित्व के ही लिए तीनों का मिल के काम करना जरूरी हो जाता है।



तीनों गुणों की जरूरत

अब हमें एक ही बात का विचार करना शेष है जिसका सृष्टि से ही ताल्लुक है। बाद में प्रलय की बात कह के आगे बढ़ेंगे। सृष्टि की रचना कैसे होती है यह बात तो प्रलय के ही निरूपण में आगे आएगी। अभी तो हमें यह देखना है कि इन तीनों परस्पर विरोधी गुणों की क्या जरूरत है। क्या सचमुच ही इन तीनों की आवश्यकता है, यह प्रश्न होता है। उत्तर में 'हाँ' कहना ही पड़ता है। यह कैसे है यह बात और ये तीनों एक दूसरे की मदद कैसे करते हैं यह भी एक ही साथ मालूम हो जाएगी। यदि सिर्फ सत्त्व रहे तो हम ज्ञान, प्रकाश तथा सुख से ऊब जाएँगे। एक ही चीज का निरंतर होना (Monotony) ही तो ऊबने का प्रधान कारण है। इसीलिए तो परिवर्तन जरूरी होता है। ज्ञान के मारे न नींद, न खाना-पीना, न और कुछ होगा। प्रकाश में चकाचौंध हो जाएगी। हलका हो के यह संसार कहाँ उड़ जाएगा कौन कहे? यदि सिर्फ तम हो तो भी दबते-दबते कहाँ जाएगा पता नहीं। निरंतर नींद, भारीपन, जड़ता, अँधेरा, अज्ञान कौन बरदाश्त करेगा? पत्थर की दशा भी उससे अच्छी होगी। संसार का कोई काम होगा ही नहीं। इसलिए यदि सत्त्व और तम दोनों को ही मानें तो दोनों एक दूसरे को दबा के खत्म या बेकार (neutralised) कर देंगे। फलत: दो में एक का भी काम न होगा। इसीलिए रज आ के दोनों में क्रिया पैदा करता है, दोनों को चलाता है; ताकि दोनों सारी ताकत से आपस में भिड़ न सकें। न दोनों जमेंगे, स्थिर होंगे और न जम के लड़ेंगे। फिर एक दूसरे को बेकार कैसे बनाएँगे? यदि रज ही रहे और बराबर क्रिया होती रहे तो भी वही बेचैनी! सारी दुनिया जल्द घिस जाए, मिट जाए। इसलिए तम उसे दबा के बीच-बीच में क्रिया को रोकता है। सत्त्व क्रिया का पथ-प्रदर्शन करता है प्रकाश और ज्ञान दे के। मगर जब तम प्रकाश को रोक देता है तो ज्ञान के अभाव में भी क्रिया रुकती है। ज्ञान और क्रिया के बिना कुछ होई नहीं सकता। अत्यंत हलकी चीज स्थिर हो सकती ही नहीं। फिर उसमें ज्ञान या क्रिया हो कैसे? उसे वजनी बनाने के लिए भी तो तमोगुण चाहिए ही इस प्रकार तीनों की जरूरत और परस्पर सहायता स्पष्ट सिद्ध है।



सृष्टि और प्रलय

रह गई सृष्टि की प्रारंभिक दशा तथा प्रलय की बात। जब सृष्टि का विचार करने लगे तो अंत में यह बात उठी कि जब ये चीजें न थीं तो क्या था? आखिर न रहने पर ही तो बनने का सवाल पैदा होता है। यह भी बात है कि जब ये गुण परस्पर विरोधी हैं तो यदि ये कभी स्वतंत्र बन जाएँ और एक दूसरे की न सुनें, तब क्या होगा? यह निरी खयाली बात तो है नहीं। इनके प्रतिनिधि कफ, वायु, पित्त जब स्वतंत्र हो जाते और एक दूसरे की नहीं सुनते तो त्रिदोष और सन्निपात होता है और मौत आती है। वही जो कभी एक दूसरे के अनुयायी थे, आज आजाद हो गए! यही बात गुणों में हो तो? और जब विश्राम का नियम संसार में लागू है तो ये भी तो विश्राम करेंगे ही, फिर चाहे देर से करें या जल्द करें। उस समय क्या हालत होगी और ये किस तरह रहेंगे? और जब विश्राम का समय पूरा होगा तब कैसे, क्या होगा? इसी ढंग के सवाल उठाने पर सृष्टि तथा प्रलय की बात आ जाती है।

दार्शनिकों ने इन प्रश्नों पर बहुत ही उधेड़-बुन करके जवाब दिया कि जब तक ये गुण ऐसे के ऐसे ही रहेंगे तब तक इनका काम जारी रहेगा ही, तब तक तो चूहा बिल खोदता ही रहेगा। इनका स्वभाव ही जो यह ठहरा। इसीलिए, और कभी तन जाने पर भी, तीनों आजाद हो जाएँगे, समान हो जाएँगे। फिर तो कोई काम हो न सकेगा। बिना विषमता के, बिना एक दूसरे की मातहती के तो सृष्टि का काम चल सकता है नहीं और यहाँ तो 'नाई की बारात में सब ठाकुर ही ठाकुर ठहरे।' फलत: आजादी या साम्यावस्था में ही विश्राम होगा और यह सारा पसारा रुका रहेगा। क्योंकि 'रहे बाँस न बाजे बाँसुरी।' उसी साम्यावस्था को प्रलय कहते हैं, प्रकृति कहते हैं और प्रधान भी कहते हैं। ये गुण उसी हालत में जाते और फिर वहीं से लौटते हैं। इनका यह चरखा रह-रह के चालू रहता है। उससे आगे तो इनकी पहुँच है नहीं। वही इनकी अंतिम दशा है। इसीलिए उसे प्रधान कहते हैं। प्रधान कहते हैं उसे जो सबके अंत में हो, आखिर में हो। उसी प्रधान की अपेक्षा इनको गुण कहते हैं। क्योंकि इनकी आखिरी कृति वही है जिसे ये बनाते हैं अपनी प्रधानता, मुख्यता को गँवा के। जब इनकी क्रिया रही ही नहीं तो तने भले ही हों और आजाद भले ही रहें, फिर भी इनका पता कहाँ रहता है? वही प्रधान फिर इन्हीं गुणों के द्वारा अपना विस्तार करती है, सारा पसारा फैलाती है। इसी से उसे प्रकृति कहते हैं। प्रकृति का अर्थ ही है कि जो खूब करे, ज्यादा फैले-फैलाए।

कागज काटने के लिए जो मशीन (Cutting machine) आजकल बनी है। उसकी एक खूबी यह है कि हैंडिल - चलाने वाला भाग - पकड़ के मशीन चलाते रहिए और उसकी तेज धार कागज तक पहुँच के उसे काट देगी। फिर ऊपर वापस भी चली जाएगी। चलाने वाले का काम बराबर एक ही तरह चलता रहेगा। वह जरा भी इधर-उधर या उलट-फेर न करेगा। मगर उसी चलाने की क्रिया - कर्म - के - फलस्वरूप तेज धार ऊपर से नीचे उतर के काटेगी और फिर ऊपर लौट जाएगी। जितनी देर तक चलाते रहिए यही आना-जाना जारी रहेगा। सृष्टि और प्रलय की भी यही हालत है। हमारे काम, कर्म (actions) ही सब कुछ करते हैं। उन्हीं के करते कभी सृष्टि और कभी प्रलय होती है। ये दोनों चीजें परस्पर विरोधी हैं, जैसे मशीन की धार का नीचे आना और ऊपर जाना। मगर उन्हीं - एक ही - कर्मों के फलस्वरूप ये दोनों ही होती हैं। कभी भी जीवों को विश्राम मिल जाता हैं जिसे प्रलय कहते हैं। गीता ने उसी को 'कल्पक्षय' (9। 7) भी कहा है। उसे भूतसंप्लव भी कहते हैं। फिर कभी सृष्टि का काम चालू हो जाता है। प्रलय शब्द भी गीता (14। 2) में आया ही है।

यद्यपि यह खयाल हो सकता हैं कि सबों की दशा तो एक-सी नहीं हैं। सभी के कर्मों, कर्मफलभोगों तथा अन्य बातों में भी कोई समानता तो है नहीं। यहाँ तो 'अपनी-अपनी डफली, अपनी-अपनी गीत,' है। यहाँ तो 'मुंडे-मुंडे मतिर्भिन्ना तुंडे-तुंडे सरस्वती।' फिर यह कैसे संभव है कि सभी जीव किसी समय विश्राम में चले जाए और प्रलय हो जाए? यदि गीता ने ऐसा माना है और अगर दर्शनों ने भी इसे स्वीकार किया है तो इससे क्या? सभी का कार्य-विराम एक ही साथ हो, यह क्या बात? संसार कोई एक कारखाना या एक ही कंपनी के अनेक कारखानों का समूह तो है नहीं, कि निश्चित समय पर काम से छुट्टी मिल जाए, या काम बंद हो जाया करे। यहाँ तो साफ ही उलटी बात देखी जाती है। तब कल्पक्षय की बात कैसे मानी जाए? प्रलय क्यों मानी जाए?

बात तो है कुछ पेचीदगी से भरी जरूर। मगर असंभव नहीं है। ऐसी बातें दुनिया में होती रहती हैं। यों तो रात में विराम और दिन में काम की बात आमतौर से सर्वत्र है। यह तो सभी के लिए है। मगर जहाँ दिन-रात बड़े होते हैं, जैसे उत्तर ध्रुव के आस-पास, वहाँ भी और नहीं तो छह मास का दिन एवं उतनी ही लंबी रात तो होती ही है। प्रकृति की ओर से जब तूफान आता है, बर्फीली आँधियाँ चलती हैं तब तो सभी को एक ही साथ काम बंद कर देना ही पड़ता है। मगर इन सभी को न भी मानें और अगर इनमें भी कोई गड़बड़ सूझे तो भी तो यह बात देखी जाती हैं कि किसी गोल घेरे या रास्ते पर चक्कर लगाने वाले यद्यपि भिन्न-भिन्न चालों वाले होते हैं, फिर भी ऐसा मौका आता है कि कभी न कभी सभी एक साथ मिल जाते हैं। फिर फौरन आगे-पीछे हो जाते हैं। यों तो आमतौर से आगे-पीछे चलते ही रहते हैं। मगर चक्कर लगाते-लगाते बहुत चक्करों के बाद देर या सवेर एक बार तो सभी इकट्ठे हो जाते हैं। फिर आगे-पीछे होके चलते-चलते उतनी ही देर बाद दूसरी-तीसरी बार भी एकत्र हो जाते हैं। यही सिलसिला चलता रहता है। बस, यही हालत प्रलय या कल्पक्षय की मानिए। इसीलिए हिसाब लगा के एक निश्चित समय के ही अंतर पर इसका बारंबार होना गीता ने भी माना है। इस प्रलय को गीता ने रात भी कहा है (8। 17-19 में)।

हाँ, तो उस प्रलय की दशा से सृष्टि का श्रीगणेश कैसे होता है यह बात भी जरा देखें। गीता के (7। 4-6), (8। 17-19), (9। 7-10), (13। 5) तथा (14। 3-5) में यह बात खास तौर से लिखी गई है। यों छिटपुट एकाध बात प्रसंग से कह देने का तो कुछ कहना ही नहीं। आठ और नौ अध्यायों में कुछ ज्यादा प्रकाश डाला गया है। जीवों के कर्मों की मजबूरी से उन्हें बार-बार जनमना-मरना पड़ता है। प्रलय के बाद भी यही चीज चालू रहती है, यही गोलमोल बातें वहाँ कही गई हैं। बेशक, चौदहवें अध्‍याय में सृष्टि के श्रीगणेश की खास बात कही गई है और बताया गया है कि यह किस तरह होती है। मगर इसे जब हम सातवें और तेरहवें अध्‍याय के वर्णन से मिला के तीनों का अर्थ एक साथ करते हैं और चौदहवें के समूचे गुण-वर्णन को भी उसी के साथ ध्‍यान में रखते हैं तभी इस बात पर पूरा प्रकाश पड़ता है। चौदहवें अध्याय के 5वें श्लोक में कहा गया है कि 'तीनों गुण प्रकृति से निकलते हैं' - "गुणा: प्रकृतिसम्भवा:।" निकलने का अर्थ तो कही चुके हैं कि साम्यावस्था छोड़ के अपनी विषम अवस्था में - अपनी असली सूरत में - आते हैं; न कि पैदा होते हैं। कैसे बाहर आते हैं यही बात उससे पहले के दो श्लोकों में माँ के पेट से बच्चे के बाहर आने का दृष्टांत देकर बताई गई है। उसी का विशेष विवरण सातवें एवं तेरहवें अध्‍याय में दिया गया है।

यह तो पहले ही कह चुके हैं कि प्रधान या प्रकृति तो साम्यावस्था है, एकरसता है, अविभिन्नता (homogeneity) है। उसके विपरीत उस अवस्था को भंग करके ही सृष्टि होती है जिसमें अनेकता और विभिन्नता (heterogeneity and diversity) है। यह चीज कैसे होती है, इनकी प्रक्रिया या क्रम क्या है, इस पर भी दार्शनिकों ने सोच के जो कुछ तय किया है वही बात उन दोनों अध्यायों में पाई जाती है। उसमें भी सातवें में बहुत कुछ कमी रह गई है। उसकी पूर्ति तेरहवें में हो जाती है। हाँ, कुछ ब्योरे की बातें वहाँ नहीं कही गई हैं, या एकाध में कुछ फर्क भी मालूम पड़ता है। मगर वह कोई खास चीज नहीं है। असल बातें ठीक-ठीक मिल जाती हैं। ब्योरा कहाँ तक गिनाया जा सकता है? ब्योरे में तो जानें कितनी ही बातें होती हैं। अगर उनमें कुछ छूटें तो फर्क तो मालूम होगा ही।

सांख्यदर्शन की एक कारिका है 'मूलप्रकृतिरविकृतिर्महदाद्या: प्रकृति-विकृतय: सप्त। षोडशकस्तुविकारो न प्रकृतिर्न विकृति: पुरुष:' (3)। इसका आशय यह है कि 'सृष्टि की जड़ में प्रकृति है। वह किसी से भी पैदा नहीं होती। हाँ, उससे महान, अहंकार और आकाश, वायु, तेज, जल, पृथिवी के सूक्ष्म स्वरूप - जिन्हें पंचतन्मात्रा कहते हैं - यही सात पदार्थ पैदा होते हैं। फिर उनसे दूसरी चीजें पैदा होती हैं। इसीलिए इन्हें प्रकृति-विकृत नाम से पुकारते हैं। वे दूसरी चीजें हैं सोलह - पाँच कर्म - इंद्रिय, पाँच ज्ञान - इंद्रिय, पाँच महाभूत और अंत:करण। ये सोलहों विकृति कहाते हैं। पुरुष या जीव तो न प्रकृति है और न विकृति।' यद्यपि इस कारिका में महान आदि सातों या शेष सोलह का भी नाम नहीं दिया है; तथापि एक और कारिका 'प्रकृतेर्महाँस्ततोऽहंकारस्तमाद् गणश्च षोडशक:' (16) आदि में सभी को गिना दिया है और सातों का क्रम भी बताया है कि पहले महान, तब अहंकार, तब पाँच तन्मात्राएँ। आगे का भी क्रम दे दिया गया है। मगर आगे बढ़ने के पहले इन बातों का थोड़ा स्पष्टीकरण जरूरी है।

सांख्यदर्शन ने जीव या पुरुष को तो सबसे निराला कहा है। वह न तो किसी से पैदा होता है और न किसी को पैदा करता है। वह न प्रकृति है, न विकृति। प्रकृति कहते हैं कारण को और विकृति कहते हैं कार्य को। वह दो में एक भी नहीं हैं। रह गए संसार के पदार्थ। सो इन्हें तीन दलों में बाँटा है। पहली है मूल प्रकृति या प्रधान। गीता ने इसी को प्रकृति या महद्ब्रह्म के अलावे भूतप्रकृति भी भूत प्रकृतिमोक्षं च (13। 34) में कहा है। अपरा भी कहा है जैसा कि आगे लिखा है। इससे पंचभूत पैदा होते हैं। इसी से इसे भूतप्रकृति कहा है। यह किसी से पैदा तो होती नहीं; मगर खुद पैदा करती है - यह किसी का कार्य नहीं है। इसीलिए इसे अविकृति भी कहा है। दूसरे दल में महान आदि सात आ जाते हैं। इन्हें प्रकृति-विकृति कहा है। ये खुद तो आगे के सोलह पदार्थों को पैदा करते हैं। इसीलिए प्रकृति या कारण कहाए। मूल प्रकृति से ही ये पैदा होने की वजह से विकृति भी कहे गए। अब इनसे जो सोलह पदार्थ पैदा हुए वह विकृति कहे जाते हैं। क्योंकि वे इनसे पैदा होने के कारण ही कार्य या विकृति हो गए। मगर उनसे दूसरी चीजें बनती हैं नहीं। दस इंद्रियों या पाँच प्राणों से अन्य पदार्थ पैदा तो होते नहीं। अंत:करण या बुद्धि से भी नहीं पैदा होते। चक्षु आदि बाहरी इंद्रियाँ हैं और बुद्धि या मन भीतर की। इसीलिए उसे अंत:करण कहते हैं। करण नाम हैं इंद्रिय का। अंत: का अर्थ है भीतरी। गीता ने पुरुष को मिला के यह चार विभाग नहीं किया है। किंतु सभी को - चारों को - ही प्रकृति कह के जीव या पुरुष को परा या ऊँचे दर्जे की और शेष तीन को अपरा या नीचे दर्जे की प्रकृति 'अपरेयमितस्त्वन्यां' (7। 5) आदि में कहा है।

दोनों में यह दो या चार भेदों का होना कोई खास बात नहीं है। मगर पुरुष को भी प्रकृति कहना जरूर निराला है। क्योंकि सांख्य ने साफ ही कहा है कि वह प्रकृति नहीं है। असल में गीता वेदांत दर्शन को ही मानती है, न कि सांख्य को। इसीलिए सांख्य को जो बातें वेदांत से मिलती हैं उन्हें तो माने लेती हैं। लेकिन जो नहीं मिलती हैं वहाँ स्वतंत्र बात कहती हैं। वेदांत ने तो माना ही है कि पुरुष या भगवान ने ही पहले सोचा; पीछे संसार बनाया। वेदांतदर्शन के दूसरे सूत्र 'जन्माद्यस्य यत:' में साफ ही माना है कि भगवान से ही आकाशादि पदार्थों का जन्म होता है। इसलिए वही कारण है। यदि वह कारण न होता तो उसे सिद्ध करना असंभव था। उसकी तब जरूरत ही क्या थी? वेदांत ने जीव को भगवान का रूप ही माना है और दोनों को ही पुरुष कहा है। हाँ, व्यष्टि और समष्टि के भेद के हिसाब से पर पुरुष एवं अपर पुरुष या पुरुष तथा पुरुषोत्तम यही दो नाम उसने जीव और ईश्वर को अलग-अलग दिए हैं। गीता ने भी 'उत्तम: पुरुषस्त्वन्य:' (15। 17) में यही कहा है। इसीलिए 'मम योनि:' (14। 3-4) आदि में पुरुष को ही सृष्टि का पिता और प्रधान या प्रकृति को माता कहा है। गीता सृष्टि-रचना को अंधे का खेल नहीं मानती। किंतु सोच-समझ के बनाई चीज (Planned creation) मानती है।



सृष्टि का क्रम

सोचने-समझने का यह मतलब नहीं कि चलना-फिरना, उठना-बैठना, खेती-गिरस्ती आदि हरेक कामों को हरेक आदमियों के बारे में पहले से ही तय कर लिया था। यह तो भाग्यवाद (Fatalism) तथा 'ईश्वर ने जो तय कर दिया वही होगा' (determinism) वाली बात है। फलत: इसमें करने वालों की जवाबदेही जाती रहती है। वह तो मशीन की तरह ईश्वर की मर्जी पूरा करने वाले मान लिए जाते हैं। फिर उन पर जवाबदेही किसी भी काम की क्यों हो और वे पुण्य-पाप के भागी क्यों बनें? मशीन की तो यह बात होती नहीं और इस काम में वे ठहरे मशीन ही। सोचने-समझने का सिर्फ यही आशय है कि मूलस्वरूप कौन-कौन पदार्थ कैसे बनें कि यह सृष्टि चालू हो, इसका काम चले, यही बात उसने सोची और इसी के अनुसार सृष्टि बनाई। यह तो हमारा काम है कि हममें हरेक आदमी खुद भला-बुरा सोच के अपना रोज का काम करता रहे। इसीलिए तो हमें बुद्धि दी गई है। उसे देकर ही तो ईश्वर जवाबदेही से हट गया और उसने हम पर अपने कामों की जवाबदेही लाद दी।

अब जरा यह देखें कि ईश्वर के सोचने और तदनुसार सृष्टि बनाने के मानी क्या हैं। वह हमारे जैसा देहधारी तो है नहीं कि इसी प्रकार सोचे-विचारेगा। यह तो कही चुके हैं कि प्रलय में प्रधान या प्रकृति समान थी, एक रूप थी। उसमें अनेकता और विभिन्नता लाने के लिए सबसे पहले क्रिया होना जरूरी है। क्योंकि क्रिया से ही अनेकता और विभिन्नता होती हैं। मिट्टी का एक धोंधा है। क्रिया के करते ही उसे अनेक टुकड़ों में कर देते या उससे अनेक बरतन तैयार कर लेते हैं। मगर क्रिया के पहले जानकारी या ज्ञान जरूरी है। यह तो हम कही चुके हैं कि सोच-विचार के यह सृष्टि बनी है। एक बात यह है कि यदि फिजूल और बेकार चीजें न बनानी हों, साथ ही सृष्टि की सभी जरूरतें पूरी करनी हों तो जो कुछ भी किया जाए वह सोच-विचार के ही होना चाहिए। कुम्हार सोच-साच के ही बरतन बनाता है। किसान खेती इसी तरह करता है। नहीं तो अंधेरखाता ही हो जाए और घड़े की जगह हांडी तथा गेहूँ की जगह मटर की खेती हो जाए। यही कारण हैं कि सांख्य ने ईश्वर को न मान के भी सृष्टि के शुरू में यह सोचना-समझना या ज्ञान माना है। मगर ज्ञान तो जड़ प्रकृति में होगा नहीं और जीव का काम सांख्य के मत से सृष्टि करना है नहीं। इसीलिए वेदांत ने और गीता ने भी सृष्टि के मूल में ईश्वर को माना है। वह है भी परम-आत्मा या श्रेष्ठ-आत्मा।

वह ज्ञान होगा भी हम लोगों के ज्ञान जैसा कुछ बातों का ही नहीं, छोटा या हल्का-सा ही नहीं। वह तो सारी सृष्टि के संबंध का होगा, व्यापक और बड़े से बड़ा होगा। इसीलिए उसे महत्त्व या महान कहा है। उसके बाद जो क्रिया होगी उसी को अहम या अहंकार कहा है। यह हम लोगों का अहंकार नहीं हो के सृष्टि के मूल की क्रिया है। समष्टि या व्यापक ज्ञान की ही तरह यह भी व्यापक या समष्टि क्रिया है। नींद के बाद जब ज्ञान होता है तो उसके बाद पहले अहम या मैं और मेरा होने के बाद ही दूसरी क्रिया होती है, और प्रलय तो नींद ही है न ? इसीलिए उसके बाद की समष्टि क्रिया को अहंकार नाम दिया गया है। इस अहंकार या क्रिया के बाद प्रकृति की समता खत्म हो के विभिन्नता आती है। और आकाश, वायु, तेज (प्रकाश), जल, पृथिवी इन पाँचों की सूक्ष्म या अदृश्य मूर्त्तियाँ (शक्लें) बनती हैं। इन्हीं से आगे सृष्टि का सारा पसारा होता है।

इन पाँच सूक्ष्म पदार्थों या भूतों के भी, जिन्हें तन्मात्रा भी कहते हैं, वही तीन गुण होते हैं, जैसा कि कह चुके हैं। उनमें पाँचों के सात्त्विक अंशों या सत्त्व गुणों से क्रमश: श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, रसना, घ्राण ये पाँच ज्ञानेंद्रियाँ बनती हैं, जिनसे शब्दादि पदार्थों के ज्ञान होते हैं। ज्ञान पैदा करने के ही कारण ये ज्ञानेंद्रियाँ कहाती हैं। उन्हीं पाँचों के जो राजस भाग या रजोगुण हैं उनसे ही क्रमश: वाक, पाणि (हाथ), पाँव, मूत्रेन्द्रिय, मलेन्द्रिय ये पाँच कर्मेंद्रियाँ बनती हैं। इन पाँचों से ज्ञान न हो के कर्म या काम ही होते हैं। फलत: ये कर्मेंद्रियाँ कही गईं। और इन पाँचों के रजोगुणों को मिला के पाँच प्राण-प्राण, अपान, व्यान, समान, उदान -बने। ये पाँचों के रजोगुणों के सम्मिलित होने पर ही बनते हैं। उसी तरह, पाँचों के सत्त्वगुणों को सम्मिलित करके भीतरी ज्ञानेंद्रिय या अंत:करण बनता है, जिसे कभी एक, कभी दो - मन और बुद्धि - और कभी चार - मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार - भी कहते हैं। उसके ये चार भेद चार कामों के ही चलते होते हैं, जैसे पाँच काम करने से ही एक ही प्राण पाँच प्रकार का हो गया। हमें यह न भूलना होगा कि जब हम सत्त्व या रजोगुण की बात करते हैं तो यह मतलब नहीं होता है कि खाली वही गुण रहते हैं। यह तो असंभव है। गुण तो तीनों ही हमेशा मिले रहते हैं। इसीलिए इन्हें एक दूसरे से चिपके हुए - 'अन्योन्यमिथुनवृत्तय:' - सांख्य कारिका (12) में लिखा है। इसलिए सत्त्व कहने का यही अर्थ है कि उसकी प्रधानता रहती है। इसी प्रकार रज का भी अर्थ है। रजोगुण-प्रधान अंश। दोनों में हरेक के साथ बाकी गुण भी रहते हैं सही; मगर अप्रधान रूप में।

अब बचे पाँचों तन्मात्राओं के तम:प्रधान अंश जिन्हें तमोंऽश या तमोगुण भी कहते हैं। उन्हीं से ये स्थूल पाँच महाभूत - आकाश आदि - बने। जो पहले सूक्ष्य थे, दीखते न थे, जिनका ग्रहण या ज्ञान होना असंभव था, वही अब स्थूल हो गए। जैसे अदृश्य हवाओं -ऑक्सीजन तथा हाइड्रोजन - को विभिन्न मात्राओं में मिला के दृश्यजल तैयार कहते हैं; ठीक वैसे ही इन सूक्ष्म पाँचों तन्मात्राओं के तम प्रधान अंशों को परस्पर विभिन्न मात्रा में मिला के स्थूल भूतों को बनाया गया। इसी मिलाने को पंचीकरण कहते हैं। पंचीकरण शब्द का अर्थ है कि जो पाँचों भूत अकेले-अकेले थे - एक-एक थे। उन्हीं में चार दूसरों के भी थोड़े-थोड़े अंश आ मिले और वे पाँच हो गए, या यों कहिए कि वे पाँच-पाँच की खिचड़ी या सम्मिश्रण बन गए। दूसरे चार के थोड़े-थोड़े अंश मिलाने पर भी अपना-अपना अंश। ज्यादा रहा ही। हरेक में आधा अपना रहा और आधे में शेष चार के बराबर अंश तो इसीलिए अपने आधे भाग के करते ही हरेक भूत अलग-अलग रहे। नहीं तो पाँचों में कोई भी एक दूसरे से अलग हो नहीं पाता। फलत: यह हालत हो गई कि पृथिवी में आधा अपना भाग रहा और आधे में शेष जल आदि चार रहे। यानी समूची पृथिवी का आधा वह खुद रही और बाकी आधे में शेष चारों बराबर-बराबर रहे। इस तरह समूची में इन प्रत्येक का आठवाँ भाग रहा। इसीलिए उसे पृथिवी कहते ही रहे। जल आदि की भी यही बात समझी जानी चाहिए।

यह ठीक हैं कि इस विवरण में सांख्य और वेदांत में थोड़ा-सा भेद है। पाँच प्राणों को सांख्यवाले पाँच कर्मेंद्रियों से जुदा नहीं मानते। इसलिए उनके मत से पाँच तन्मात्रा, दस इंद्रियाँ और अंत:करण यही सोलह पदार्थ अहंकार के बाद बने। उनके मत में पाँच तन्मात्रा की ही जगह पाँच महाभूत हैं। क्योंकि तन्मात्राओं के तामसी अंशों को ही मिलाने से ये पाँच भूत हुए। इसीलिए वे तन्मात्राओं और भूतों को अलग-अलग नहीं मानते। महाभूतों के बनने के बाद तन्मात्राएँ तो रह जाती भी नहीं। उनके सात्त्विक तथा राजस भागों से ज्ञानेंद्रियाँ, कर्मेंद्रियाँ, प्राण और अंत:करण बने। बचे-बचाए तामस अंश से, महाभूत। बाकी संसार तो इन्हीं महाभूतों का ही पसारा या विकास है, परिणाम हैं, रूपांतर है, करिश्मा है। इस प्रकार उनके ये सोलह तत्त्व या विकार सिद्ध होते हैं। वेदांतियों ने पाँच कर्मेंद्रिय, पाँच ज्ञानेंद्रियों, मन और बुद्धि ये दो अंत:करण - और कभी-कभी मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार ये चार अंत:करण - मान के सत्रह या उन्नीस पदार्थ मान लिए। पाँच भूतों को मिला लेने पर वे चौबीस हो गए। महान तथा अहंकार को जोड़ने पर छब्बीस और प्रकृति को ले के सत्ताईस हो गए। सांख्य के मत से तेईस रहे। मगर यह तो कोई खास बात है नहीं। यह ब्योरे की चीज है। ये पदार्थ तो सभी - दोनों ही - मानते ही हैं।

एक बात और। हम पहले कह चुके हैं कि गीता के मत से गुण प्रकृति से निकले हैं, बने हैं। मगर हमने अभी-अभी जो कहा है उससे तो गुणों के बजाए बुद्धि, ज्ञान या महत्त्व, अहंकार और पंचतन्मात्राएँ - यही चीजें - प्रकृति से निकली हैं। भले ही यह चीजें गुणमय ही हों। मगर गुणों का निकलना न कह के इन्हीं का निकलना कहने का मतलब क्या है? बात तो सही है। गुणों का बाहर आना सीधे नहीं कहा गया है। लेकिन ज्ञान या महत्त्व है क्या चीज, यदि सत्त्वगुण नहीं है? ज्ञान तो सत्त्व का ही रूप है न? उसी प्रकार अहंकार है क्या यदि रजोगुण या क्रिया है नहीं? अहंकार को तो समष्टि क्रिया ही कहा है और क्रिया रजोगुण का ही रूप है न? अब रह गए पंचभूत जिन्हें तन्मात्रा कहते हैं। वह तो तम के ही रूप हैं। आगे जब पंचीकरण के द्वारा वे दृश्य और स्थूल बनते हैं तब तो उन्हें तम का रूप कहते ही हैं। फिर पहले भी क्यों न कहें? यह ठीक है कि तम के साथ भी सत्त्व और रज तो रहेंगे ही, जैसे इनके इनके साथ तम भी रहता ही है। इसीलिए तो पंचतन्मात्राओं के सत्त्व-अंश से ज्ञानेंद्रियाँ और रज-अंश से कर्मेंद्रियाँ बनती हैं। इसलिए यह तो निर्विवाद है कि 'गुणा: प्रकृति सम्भवा:' - प्रकृति से गुण ही बाहर होते हैं।

चौदहवें अध्‍याय के 3-4 श्लोकों में जो गर्भाधान की बात कही गई है उसका मतलब भी अब स्पष्ट हो जाता है। गर्भाधान के बाद ही गर्भाशय में क्रिया पैदा हो के संतान का स्वरूप धीरे-धीरे तैयार होता है। उसके पहले उसमें बच्चे का नाम भी नहीं पाया जाता। ठीक उसी तरह महान या समष्टि ज्ञानरूप चिंतन, संकल्प या सोच-विचार के बाद ही प्रकति के भीतर अहंकार या समष्टि क्रिया पैदा हो के पंचतन्मात्रादि की रचना होती है। जब तक भगवान के इस समष्टि ज्ञान का संबंध प्रकृति से नहीं होता, जब तक वह खयाल नहीं करता, तब तक प्रकृति में कोई भी क्रिया - मंथन - पैदा नहीं होती जिससे सृष्टि का प्रसार हो सके। प्रकृति की शांति, समता या एकरसता - घोर गंभीरता - भंग होती है अहंकार रूप मंथन क्रिया ही से और वह पैदा होती है। महत्तत्त्व, महान या समष्टि ज्ञान के बाद ही। इसी को उपनिषदों में ईक्षण या संकल्प कहा है, जैसा कि छांदोग्य में 'तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेय' (6। 2। 3)। 'प्रजायेय' शब्द का अर्थ हैं कि प्रजा या वंश पैदा करें। इससे गर्भाधान की बात सिद्ध हो जाती है। गीता ने भी यही कहा है। गीता में गर्भाधान के बाद 'संभव:' और 'मूर्त्तय:' लिखने का मतलब भी ठीक ही है। स्वरूप ही तैयार होते हैं, पैदा होते हैं, आकृतियाँ बनती हैं।

हमने जो प्रकृति, महान अहंकार, पंचतन्मात्रा आदि की बात कही है उसका मतलब अब साफ हो गया। यहाँ सचमुच ही बच्चे या फल की तरह पैदा होने का सवाल तो है नहीं। प्रकृति तो पहले से ही होती है। महान का उसी से पीछे संबंध होता है। इसीलिए प्रकृति के बाद ही उसका स्थान होने से प्रकृति से उसकी उत्पत्ति अकसर लिखी मिलती है। महान के बाद ही आता हैं अहंकार। इसीलिए वह महान से पैदा होने वाला माना जाता है; हालाँकि वह प्रकृति की ही क्रिया है। उसके बाद पंचतन्मात्राएँ प्रकृति से ही बनती हैं। मगर कहते हैं कि अहंकार से तन्मात्राएँ पैदा हुईं। यह तो कही चुके हैं कि ये तन्मात्राएँ महाभूतों के सूक्ष्म रूप हैं। इसीलिए इन्हें भूत और महाभूत भी कहा करते हैं।

तेरहवें अध्‍याय के 'महाभूतान्यहंकारो बुद्धिरव्यक्तमेव च। इंद्रियाणि दशैकं च पंच चेंद्रियगोचरा:' (13। 5) का अर्थ यह है कि पाँच महाभूत (तन्मात्राएँ), अहंकार, समष्टि बुद्धि (महान), अव्यक्त या प्रकृति (प्रधान), ग्यारह इंद्रियाँ - दस बाहरी और एक अंत:करण - और इंद्रियों के पाँच विषय, यही क्षेत्र के भीतर आते हैं, क्षेत्र कहे जाते हैं। क्षेत्र का अर्थ है शरीर। मगर यहाँ समष्टि शरीर या सृष्टि की बुनियादी - शुरूवाली - चीज से मतलब है। इस श्लोक में वही बातें हैं जिनका वर्णन अभी-अभी किया है। श्लोक के पूर्वार्द्ध में तन्मात्राओं से ही शुरू करके उलटे ढंग से प्रकृति तक पहुँचे हैं। मगर ठीक क्रम समझने में प्रकृति से ही शुरू करना होगा। श्लोक में क्रम से तात्पर्य नहीं हैं। वहाँ तो कौन-कौन से पदार्थ क्षेत्र के अंतर्गत हैं, यही बात दिखानी है। इसीलिए उत्तरार्द्ध में ग्यारह इंद्रियाँ आई हैं। नहीं तो उलटे क्रम में इंद्रियों से ही शुरू करते। इंद्रियों के बाद जो उनके पाँच विषय लिखे हैं उनका कोई संबंध सृष्टिक्रम से या उसके मूल पदार्थों से नहीं है। पाँच तन्मात्रा, महान आदि के अलावे क्षेत्र के अंतर्गत जो विषय, राग, द्वेष आदि अनेक चीजें आगे गिनाई गई हैं उन्ही में ये पाँच विषय भी हैं।

सातवें अध्‍याय में इंद्रियों का नाम न लेकर शेष पदार्थों का उल्लेख 'भूमिरापोनलो वायु: खं मनो बुद्धिरेव च। अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा' (7। 4) श्लोक में आया है। जैसा कि पहले कहा गया है, यह अपरा या नीचेवाली प्रकृति का आठ भेद या प्रसार बताया गया है। तेरहवें अध्‍याय के 'महाभूतानि' की जगह यहाँ पाँचों भूतों का नाम ही ले लिया है 'भूमि, जल, अनल (तेज), वायु और आकाश (ख)।' मगर उत्तरार्द्ध में जो 'मनो बुद्धिरेव च अहंकार:' शब्दों में मान, बुद्धि और अहंकार का नाम लिया है उसके समझने में थोड़ी दिक्कत है। जिस क्रम से तेरहवें अध्‍याय में नीचे से ही शुरू किया है, उसी क्रम से यहाँ भी नीचे से ही शुरू है, यह तो साफ है। मगर पृथिवी जल, तेज, वायु और आकाश के बाद तो क्रम है अहंकार, महान और प्रकृति का। इसलिए मन, बुद्धि, अहंकार का अर्थ क्रमश: अहंकार, महान, और प्रकृति ही करना होगा। दूसरा चारा है नहीं। इसमें बुद्धि का अर्थ महान तो ठीक ही है। वे दोनों तो एक ही अर्थवाले है। हाँ मन का अर्थ अहंकार और अहंकार का प्रकृति करने में जरा उलट-फेर हो जाता है। लेकिन किया जाए क्या? इस प्रकार गुणवाद और सृष्टि का क्रम तथा उसकी प्रणाली आदि बातें संक्षेप में स्पष्ट हो गईं। गीता के मत का इस संबंध में स्पष्टीकरण भी हो गया। इससे उसके समझने में आसानी भी होगी।



अद्वैतवाद

अब अद्वैतवाद की कुछ बातें भी जान लेने की हैं। गीता का क्या खयाल इस संबंध में है यही बात समझनी है। हालाँकि जब वेदांत के ही अनुकूल चलना गीता के बारे में कह चुके, तो एक प्रकार से उसका अर्थ तो मालूम भी हो गया। फिर भी गीता के वचनों को उद्धृत करके ही यह बात कहने में मजा भी आएगा और लोग मान भी सकेंगे। अद्वैतवाद का अभिप्राय क्या है, वह भी तो कुछ न कुछ कहना ही होगा। क्योंकि सभी लोग आम तौर से क्या जानने गए कि यह क्या बला है?

हमने पहले यह कहा है कि गौतम और कणाद तथा अर्वाचीन दार्शनिक डाल्टन के परमाणुवाद और तन्मूलक आरंभवाद की जगह सांख्य, योग एवं वेदांत तथा अर्वाचीन दार्शनिक डारविन की तरह गीता भी गुणवान तथा तन्मूलक परिणामवाद या विकासवाद को ही मानती है। इस पर प्रश्न हो सकता है कि क्या वेदांत और सांख्य का परिणामवाद एक ही है? या दोनों में कुछ अंतर है? कहने का आशय यह है कि जब दोनों के मौलिक सिद्धांत दो हैं। तो सृष्टि के संबंध में भी दोनों में कुछ तो अंतर होगा ही। और जब वेदांत का मंतव्य अद्वैतवाद है तब वह परिणाम वाद को पूरा-पूरा कैसे मान सकता है? क्योंकि ऐसा होने पर तो गुणों को मान के अनेक पदार्थ स्वीकार करने ही होंगे। फिर एक ही चेतन पदार्थ - आत्मा या ब्रह्म - को स्वीकार करने का वेदांत का सिद्धांत कैसे रह सकेगा? यदि सभी गुणों को और उनसे होने वाले पदार्थों को प्रकृति से जुदा न भी मानें - क्योंकि सभी तो प्रकृति के ही प्रसार या परिणाम ही माने जाते हैं - और इस प्रकार जड़ पदार्थों की एकता या अद्वैत (Monism) मान भी लें, जिसे जड़ाद्वैत (Material monism) कहते हैं; साथ ही आत्मा एवं ब्रह्म की एकता के द्वारा चेतनाद्वैत (Spiritual monism) भी मान लें, तो भी जड़ और चेतन ये दो तो रही जाएँगे। फिर तो द्वित्व या द्वैत - दो - होने से द्वैतवाद ही होगा, न कि अद्वैतवाद। वह तो तभी होगा जब द्वित्व - दो चीज - न हो। अद्वैत का तो अर्थ ही है द्वैत या दो का न होना।

असल में वेदांत का अद्वैतवाद परिणाम और विवर्त्तवाद को मानता है। अद्वैतवाद को विकासवाद या परिणामवाद से विरोध नहीं है, यदि उसकी जड़ में विवर्त्तवाद हो। इसका मतलब यह है कि अद्वैतवादी मानते हैं कि यह दृश्य जगत ब्रह्म या परमात्मा, जिसे ही आत्मा भी कहते हैं, में आरोपित है, कल्पित है; यह कोई वास्तविक वस्तु है नहीं। इसकी कल्पना, इसका आरोप ब्रह्म में उसी तरह किया गया है जैसे रस्सी में साँप की कल्पना अँधरे में हो जाती है। या यों कहिए कि नींद की दशा में मनुष्य अपना ही सिर कटता देखता है, या कलकत्ता, दिल्ली आदि की सफर करता है। यह आरोप ही तो है, कल्पना ही तो है। इसी को अभास भी कहते हैं। किसी पदार्थ में एक दूसरे पदार्थ की झूठी कल्पना करने को ही अभास कहते हैं। रस्सी में साँप तो है नहीं। मगर उसी की कल्पना अँधरे में करते और डर के भागते हैं। सोने के समय अपना सिर तो कटता नहीं फिर भी कटता नजर आता है। बिस्तर पर घर में पड़े हैं। फिर कलकत्ता या दिल्ली कैसे चले गए? मगर साफ ही मालूम होता है कि वहाँ गए हैं भर पेट खा के पलंग पर सोए हैं। मगर सपना देखते हैं कि भूखों दर-दर मारे फिरते हैं! सुंदर वस्त्र पहने सोए हैं। मगर नंगे या चिथड़े लपेटे जाने कहाँ-कहाँ भटकते मालूम होते हैं! यही अध्यास है। इसी को आरोप, कल्पना आदि नाम देते हैं। इसे भ्रम या भ्रांति भी कहते हैं। मिथ्या ज्ञान और मिथ्या कल्पना भी इसको ही कहा है। अद्वैतवादी कहते हैं कि ब्रह्म में इस समूचे संसार का - स्वर्ग-नरकादि सभी के साथ - अभास है, आरोप है। जैसे सपने में सिर कटना, भूखों चिथड़े लपेटे मारे फिरना आदि सभी बातें मिथ्या हैं, झूठी हैं; ठीक वैसे ही यह समूचे संसार-का नजारा झूठा ही ब्रह्म में दीख रहा है। इसमें तथ्य का लेश भी नहीं है। यह सरासर झूठा है। असत्य है। केवल ब्रह्म या आत्मा ही सत्य है। ब्रह्म और आत्मा तो एक ही के दो नाम हैं - 'ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैवनापर:।'



स्वप्न और मिथ्यात्ववाद

जो लोग इन बातों में अच्छी तरह प्रवेश नहीं कर पाते वह चटपट कह बैठते हैं कि सपने की बात तो साफ ही झूठी है। उसमें तो शक की गुंजाइश है नहीं। उसे तो कोई भी सच कहने को तैयार नहीं है। मगर संसार को तो सभी सत्य कहते हैं। सभी यहाँ की बातों को सच्ची मानते हैं। एक भी इन्हें मिथ्या कहने को तैयार नहीं। इसके सिवाय सपने का संसार केवल दोई-चार मिनट या घंटे-आध घंटे की ही चीज है, उतनी ही देर की खेल है - यह तो निर्विवाद है। सपने का समय होता ही आखिर कितना लंबा? मगर हमारा यह संसार तो लंबी मुद्दतवाला है, हजारों-लाखों वर्ष कायम रहता है। यहाँ तक कि सृष्टि और प्रलय के सिलसिले में वेदांती भी ऐसा ही कहते हैं कि प्रलय बहुत दिनों बाद होती है और लंबी मुद्दत के बाद ही पुनरपि सृष्टि का कारबार शुरू होता है। गीता (8। 17। 19) के वचनों से भी यही बात सिद्ध होती है। फिर सपने के साथ इसकी तुलना कैसी? यह तो वही हुआ कि 'कहाँ राजा भोज, और कहाँ भोजवा तेली!"

मगर ऐसे लोग जरा भूलते हैं। सपने की बातें झूठी हैं, झूठी मानी जाती हैं सही। मगर कब? सपने के ही समय या जगने पर? जरा सोचें और उत्तर तो दें? इस अपने संसार को थोड़ी देर के लिए भूल के सपने में जा बैठें और देखें कि क्या सपने के भी समय वहाँ की देखी-सुनी चीजें झूठी मानी जाती हैं। विचारने पर साफ उत्तर मिलेगा कि नहीं। उस समय तो वह एकदम सच्ची और पक्की लगती हैं। उनकी झुठाई का तो वहाँ खयाल भी नहीं होता। इस बात का सवाल उठना तो दूर रहे। हाँ, जगने पर वे जरूर मिथ्या प्रतीत होती हैं। ठीक उसी प्रकार इस जाग्रत संसार की भी चीजें अभी तो जरूर सत्य प्रतीत होती हैं। इसमें तो कोई शक है नहीं। मगर सपने में भी क्या ये सच्ची ही लगती हैं? क्या सपने में ये सच्ची होती हैं, बनी रहती हैं? यदि कोई हाँ कहे, तो उससे पूछा जाए कि भरपेट खा के सोने पर सपने में भूखे दर-दर मारे क्यों फिरते हैं? पेट तो भरा ही है और वह यदि सच्चा है, तो सपने में भूखे होने की क्या बात? तो क्या भूखे होने में कोई भी शक उस समय रहता है? इसी प्रकार कपड़े पहने सोए हैं। महल या मकान में ही बिस्तर है भी। ऐसी दशा में सपने में नंगे या चिथड़े लपेटे दर-दर खाक छानने की बात क्यों मालूम होती है? क्या इससे यह नहीं सिद्ध होता कि जैसे सपने की चीजें जागने पर नहीं रह जाती हैं, ठीक उसी तरह जाग्रत की चीजें भी सपने में नहीं रह जाती हैं? जैसे सपने की अपेक्षा यह संसार जाग्रत है, तैसे ही इसकी अपेक्षा सपने का ही संसार जाग्रत है और यही सपने का है। दोनों में जरा भी फर्क नहीं है।

सपने की बात थोड़ी देर रहती है और यहाँ की हजारों साल, यह बात भी वैसी ही है। यहाँ भी वैसा ही सवाल उठता है कि क्या सपने में भी वहाँ की चीजें थोड़ी ही देर को मालूम पड़ती हैं? या वहाँ भी सालों और युग गुजरते मालूम पड़ते हैं? सपने में किसे खयाल होता है कि यह दस ही पाँच मिनट का तमाशा है? वहाँ तो जानें कहाँ-कहाँ जाते, हफ्तों, महीनों, सालों गुजरते, सारा इंतजाम करते दीखते हैं, ठीक जैसे यहाँ कर रहे हैं। हाँ, जागने पर वह चंद मिनट की चीज जरूर मालूम होती है। तो सोने पर इस संसार का भी तो यही हाल होता है। इसका भी कहाँ पता रहता है? अगर ऐसा ही विचार करने का मौका वहाँ भी आए तो ठीक ऐसी ही दलीलें देते मालूम होते हैं कि वह तो चंद ही मिनटों का तमाशा है! उस समय यह जाग्रत वाला संसार ही चंद मिनटों की चीज नजर आती है और सपने की ही दुनिया स्थाई प्रतीत होती है! इसलिए यह भी तर्क बेमानी है। इसलिए भुसुण्डी ने अपने सपने या भ्रम के बारे में कहा था कि 'उभय घरी मँह कौतुक देखा।' हालाँकि तुलसीदास ने उनका ही बयान दिया है कि उस समय मालूम होता था कि कितने युग गुजर गए। गौड़ पादाचार्य ने माण्डूक्य उपनिषद की कारिकाओं में दोनों की हर तरह से समानता तर्क-दलील से सिद्ध की है और बहुत ही सुंदर विवेचन के बाद उपसंहार कर दिया है कि 'मनीषी लोग स्वप्न और जाग्रत को एक-सा ही मानते हैं। क्योंकि दोनों की हरेक बातें बराबर हैं और यह बिलकुल ही साफ बात हैं' - "स्वप्नजागरिते स्थाने ह्येकमाहुर्मनीषिण:। भेदानां हि समत्वेन प्रसिद्धेनैव हेतुना।"



अनिर्वचनीयतावाद

संसार के संबंध के इस मंतव्य को मिथ्यात्ववाद और अनिर्वचनीयतावाद भी कहते हैं। अनिर्वचनीयता का अर्थ है कि इन चीजों का निर्वचन या निरूपण होना असंभव है। इनकी सत्यता तो सिद्ध हो ही नहीं सकती। यदि इनको अत्यंत निर्मूल मानें और कहें कि ये अत्यंत असत्य हैं, जैसे आदमी की सींग न कभी हुई, न है और न होगी, तो यह भी ठीक नहीं। क्योंकि सींग तो कभी दीखती नहीं। मगर ये तो प्रत्यक्ष ही दीखते हैं। इसलिए मनुष्य की सींग जैसे तो नहीं ही हैं। यदि इन्हें सत्य और असत्य का मिश्रण मानें, तो यह और भी बुरा है। क्योंकि परस्पर विरोधी चीजों का मिश्रण असंभव है। फलत: मानना ही पड़ता है कि इनके बारे में कुछ भी कहा नहीं जा सकता है - ये अनिर्वचनीय हैं। मगर यह सही है कि ये मिथ्या हैं। मिथ्या का मतलब ही यही है कि मालूम तो हो कि कुछ है; मगर ढूँढ़ने पर इसका पता ही न लगे। यह विचार कुछ नया और निराला प्रतीत होता है सही। मगर रेखागणित में जो बिंदु का लक्षण बताया गया है कि उसमें लंबाई-चौड़ाई कुछ भी होती नहीं, या रेखा के बारे में जो कहा गया है कि उसमें केवल लंबाई होती है, चौड़ाई नहीं, क्या यह अक्ल में आने की चीज है? जिसमें लंबाई-चौड़ाई कुछ भी न हो या जो सिर्फ लंबाई रखता हो ऐसा पदार्थ दिमाग में कैसे घुसेगा? फिर भी उसे मानते ही हैं।

यह ठीक है कि काम चलाने के लिए - केवल वाद-विवाद और विचार के लिए - वेदांत ने तीन प्रकार के पदार्थ माने हैं। एक तो सदा रहने वाला, वस्तुतत्त्व या परमार्थ पदार्थ, जिसे ब्रह्म कहिए या आत्मा कहिए। इसीलिए ब्रह्म या आत्मा की हस्ती, उसके अस्तित्व या उसकी सत्ता को परमार्थ सत्ता भी कहते हैं। दूसरे हैं सपने या भ्रम के पदार्थ, जैसे रस्सी में साँप, सीप में चाँदी या सपने का सिर कटना। ये जब तक प्रतीत होते हैं तभी तक रहते हैं। प्रतीत या ज्ञान को ही प्रतिभास भी कहते हैं। इसीलिए ये पदार्थ प्रातिभासिक हैं और इनकी सत्ता है प्रातिभासिक सत्ता। तीसरे हैं हमारे इस जाग्रत संसार के पृथिवी आदि पदार्थ, जिनसे हमारा व्यवहार चलता है, काम निकलता है। सपने के साँप का जहर तो नहीं चढ़ता। मगर इस साँप का चढ़ता है। यही है व्यवहार या काम-काज का चलना। ये चीजें कामचलाऊ हैं, व्यावहारिक हैं। इसलिए इनकी सत्ता को व्यावहारिक सत्ता कहते हैं। इस तरह तीन प्रकार के पदार्थ और उनकी तीन सत्ताएँ हो जाती हैं।



प्रातिभासिक सत्ता

मगर दर हकीकत व्यावहारिक तथा प्रातिभासिक पदार्थ दो नहीं हैं। दोनों ही बराबर ही हैं। यह तो हम सभी सिद्ध कर चुके हैं। दोनों की सत्ता में रत्‍तीभर भी अंतर है नहीं। इसलिए दो ही पदार्थ - परमार्थिक एवं प्रातिभासिक - माने जाने योग्य हैं। और दो ही सत्ताएँ भी। लेकिन हम लिखने-पढ़ने और वाद-विवाद में जाग्रत तथा स्वप्न को दो मान के उनकी चीजों को भी दो ढंग की मानते हैं। यों कहिए कि जाग्रत को सत्य मान के सपने को मिथ्या मानते हैं। जाग्रत की चीजें हमारे खयाल में सही और सपने की झूठी हैं। इसीलिए खामख्वाह दोनों की दो सत्ता भी मान बैठते हैं। लेकिन वेदांती तो जाग्रत को सत्य मान सकता नहीं। इसीलिए लोगों के संतोष के लिए उसने व्यावहारिक और प्रातिभासिक ये दो भेद कर दिए। इस प्रकार काम भी चलाया। विचार करने या लिखने-पढ़ने में आसानी भी हो गई। आखिर अद्वैतवादी वेदांती भी जाग्रत और स्वप्न की बात उठा के और स्वप्न का दृष्टांत दे के लोगों को समझाएगा कैसे, यदि दोनों को दो तरह के मान के ही शुरू न करे?



मायावाद

जो लोग ज्यादा समझदार हैं वह वेदांत के उक्त जगत-मिथ्यात्व के सिद्धांत पर जिसे अध्यासवाद और मायावाद भी कहते हैं, दूसरे प्रकार से आक्षेप करते हैं। उनका कहना है कि यदि यह जगत भ्रममूलक है और इसीलिए यदि इसे भगवान की माया का ही पसारा मानते हैं, क्योंकि माया कहिए, भूल या भ्रम कहिए, बात तो एक ही है, तो वह माया रहती है कहाँ? वह भ्रम होता है किसे? जिस प्रकार हमें नींद आने से सपने में भ्रम होता है और उलटी बातें देख पाते हैं, उसी तरह यहाँ नींद की जगह यह माया किसे सुला के या भ्रम में डाल के जगत का दृश्य खड़ा करती है और किसके सामने? वहाँ तो सोनेवाले हमीं लोग हैं। मगर यहाँ? यहाँ यह माया की नींद किस पर सवार है? यहाँ कौन सपना देख रहा है? आखिर सोनेवाले को ही तो सपने नजर आते हैं। निर्विकार ब्रह्म या आत्मा में ही माया का मानना तो ऐसा ही है जैसा यह कहना कि समुद्र में आग लगी है या सूर्य पूर्व से पच्छिम निकलता है। यह तो उलटी बात है, असंभव चीज है। ब्रह्म या आत्मा और उसी में माया? निर्विकार में विकार? यदि ऐसा मानें भी तो सवाल है कि ऐसा हुआ क्यों?

उनका दूसरा सवाल यह है कि माना कि यह दृश्य जगत मिथ्या है, कल्पित है। मगर इसकी बुनियाद तो कहीं होगी ही। तभी तो ब्रह्म में या आत्मा में यह नजर आता है, आरोपित है, अध्यस्त है, ऐसा माना जाएगा। जब कहीं असली साँप पड़ा है तभी तो रस्सी में उसका आरोप होता है, कल्पना होती है। जब हमारा सिर सही साबित है तभी तो सपने में कटता नजर आता है। जब कोई भूखा-नंगा दर-दर सचमुच घूमता रहता है तभी तो हम अपने आपको सपने में वैसा देखते हैं। ऐसा तो कभी नहीं होता कि जो वस्तु कहीं हो ही न, उसी की कल्पना की जाए, उसी का आरोप किया जाए कल्पित वस्तु की भी कहीं तो वस्तु सत्ता होती ही है। नहीं तो कल्पना या भ्रम हो ही नहीं सकता। इसलिए इस संसार को कल्पित या मिथ्या मान लेने पर भी कहीं न कहीं इसे वस्तुगत्या मानना ही होगा, कहीं न कहीं इसकी वस्तुस्थिति स्वीकार करनी ही होगी। ऐसी दशा में मायावाद बेकार हो जाता है। क्योंकि आखिर सच्चा संसार भी तो मानना ही पड़ जाता है। फिर अध्यासवाद की क्या जरूरत है?

लेकिन यदि हम इनकी तह में घुसें तो ये दोनों शंकाएँ भी कुछ ज्यादा कीमत नहीं रखती हैं, ऐसा मालूम हो जाता है। यह ठीक है कि यह नींद, यह माया निर्विकार आत्मा या ब्रह्म में ही है और उसी के चलते यह सारी खुराफात है। दृश्य जगत का सपना वही निर्लेप ब्रह्म ही तो देखता है। खूबी तो यह है कि यह सब कुछ देखने पर भी, यह खुराफात होने पर भी वह निर्लेप का निर्लेप ही है। मरुस्थल में सूर्य की किरणों में पानी का भ्रम या कल्पना हो जाने पर भी जैसे मरुभूमि उससे भीग नहीं जाती, या साँप की कल्पना होने पर भी रस्सी में जहर नहीं आ जाता, ठीक यही बात यहाँ है। सपने में सिर कटने पर भी गरदन तो हमारी ज्यों की त्यों ही रहती है - वह निर्विकार ही रहती है। यही तो माया की महिमा है। इसलिए तो गीता ने उसे 'दैवी' (7। 14) कहा है। इसका तो मतलब ही कि इसमें निराली करामातें हैं। यह ऐसा काम करती है कि अचंभा होता है। ब्रह्म या आत्मा में ही सारे जगत की रचना यह कर डालती है जरूर। मगर आत्मा का दरअसल कुछ बनता-बिगड़ता नहीं।

हाँ यह सवाल हो सकता है कि आखिर उसमें यह माया पिशाची लगी कब और कैसे? हमें नींद आने या भ्रम होने की तो हजार वजहें हैं। हमारा ज्ञान संकुचित है, हम भूलें करते हैं, चीजों से लिपटते हैं, खराबियाँ रखते हैं। मगर वह तो ऐसा है नहीं। वह तो ज्ञान रूप ही माना जाता है, सो भी अखंड ज्ञानरूप, जो कभी जरा भी इधर-उधर न हो। वह निर्लेप और निर्विकार है। वह भूलें तो इसीलिए कर सकता ही नहीं। फिर उसी में यह छछूँदर माया? यह अनहोनी कैसे हुई? यह बात तो दिमाग में आती नहीं कि वह क्यों हुई, कैसे हुई, कब हुई? कोई वजह तो इसकी नजर आती ही नहीं।



अनादिता का सिद्धांत

यही कारण है कि ब्रह्म में माया का संबंध अनादि मानते हैं। इस संबंध का ऐसा श्रीगणेश यदि कभी माना जाए तो यह सवाल हो सकता है कि ऐसा क्यों हुआ? मगर इसका श्रीगणेश, इसकी इब्तदा, इसका आरंभ (beginning) तो मानते ही नहीं। इसे तो अनादि कहते हैं। अनादि का तो मतलब ही है कि जिसकी आदि, जिसका श्रीगणेश हुआ न हो। फिर तो सारी शंकाओं की बुनियाद ही चली गई। संसार में अनादि चीजें तो हईं। यह कोई नई या निराली कल्पना केवल माया के ही बारे में तो है नहीं। यदि किसी से पूछा जाए कि आम का वृक्ष पहले-पहल हुआ या उसकी गुठली हुई? पहले वृक्ष हुआ या बीज? तो क्या उत्तर मिलेगा? दो में एक भी नहीं कह के यही कहना पड़ेगा कि बीज और वृक्ष की परंपरा अनादि है। अक्ल में तो यह बात आती नहीं कि पहले बीज कहें या वृक्ष; क्योंकि वृक्ष कहने पर फौरन सवाल होगा कि वह तो बीज से ही होता है। इसलिए उससे पहले बीज जरूर रहा होगा। और अगर पहले बीज ही मानें, तो फौरन ही वृक्ष की बात आ जाएगी। क्योंकि बीज तो वृक्ष से ही होता है। कब, क्या हुआ यह देखनेवाले हम तो थे नहीं। हमें तो अभी जो चीजें हैं उन्हीं को देख के इनके पहले क्या था यही ढूँढ़ना है और यही बात हम करते भी हैं। मगर ऐसा करने में कहीं ठिकाना नहीं लगता और पीछे बढ़ते ही चले जाते हैं। यही तो है अनादिता की बात। इसी प्रकार जगत और ब्रह्म के संबंध में माया की कल्पना करने में भी हमें अनादिता की शरण लेनी ही पड़ती है। हमारे लिए कोई चारा है नहीं। दूसरी चीज मानने या दूसरा रास्ता पकड़ने में हम आफत में पड़ जाएँगे और निकल न सकेंगे। हमें तो वर्तमान को देख के पीछे की बातें सोचनी हैं, उनकी कल्पना करनी है, जिससे वर्तमान काम चल सके, निभ सके। जो चाहें मान सकते नहीं। यही तो हमारी परेशानी है, यही तो हमारी सीमा (Limitation) है। किया क्या जाए? इसीलिए मीमांसादर्शन के श्लोकवार्त्तिक में कुमारिल को कहना पड़ा कि हम तो सिर्फ इतना ही कर सकते हैं कि दुनिया की वर्तमान व्यवस्था के बारे में यदि कोई शक-शुबहा हो तो तर्कदलील से उसे दूर करके अड़चन हटा दें। हम ऐसा तो हर्गिज कर नहीं सकते कि बेसिर-पैर की बातें मान के वर्तमान व्यवस्था के प्रतिकूल जाएँ - 'सिद्धानुगममात्रं हि कर्त्तुं युक्तं परीक्षकै:। न सर्वलोकसिद्धस्य लक्षणेन निवर्त्तनम' (1। 1। 4। 133)।



निर्विकार में विकार

इसीलिए निर्विकार में विकार या माया का संबंध साफ ही है। इसमें झमेले की तो गुंजाइश हई नहीं। सारा संसार जब उसी में है तो फिर माया का क्या कहना? हमें तो यही जानना है कि वह निर्लेप है या नहीं। विचार से तो सिद्ध भी हो जाता है कि वह सचमुच निर्लेप है। नहीं तो भरपेट खा के सोने पर भूखा क्यों नजर आता? खाना तो पेट में मौजूद ही है न? इसका तो एक ही उत्तर है कि पेट में खाना भले ही हो, मगर आत्मा तो उससे निर्लेप है। वह उससे चिपके, उसे अपना माने तब न? जगने पर ऐसा मालूम पड़ता था कि अपना मानती है। मगर सोने पर साफ पता लग गया कि वह तो निराली है, मौजी है। उसे इन खुराफातों से क्या काम? वह तो लीला करती है, नाटक करती है। इसलिए जब चाहा छोड़ के अलग हो गई और निर्लेप का निर्लेप है। सपने में भी एक को छोड़ के दूसरे पर और फिर तीसरे पर जाती है और अंत में सबको खत्म करती है। वहाँ कुछ नहीं होने पर भी सब कुछ बना के बच्चों के घरौंदे की तरह फिर चौपट कर देती है। असंग जो रही। उसे न किसी मदद की जरूरत है और न सूर्य-चाँद या चिराग की ही। वह तो खुद सब कुछ कर लेती है। वह तो स्वयं प्रकाश रूप ही है। बृहदारण्यक उपनिषद के चौथे अध्‍याय के तीसरे ब्राह्मण में यह वर्णन इतना सरस है कि कुछ कहा नहीं जाता। वह पढ़ने ही लायक है। वहाँ कहते हैं कि -

'स यत्र प्रस्वपित्यस्य लोकस्य सर्वावतोमात्रामुपादाय स्वयं विहत्य स्वयं निर्माय स्वेन भासा स्वेन ज्योतिषा प्रस्वपित्यत्रायं पुरुष: स्वयं ज्योतिर्भवति ।9। न तत्र रथा न रथयोगा न पन्थानो भवन्त्यथ रथान्नथयोगान्पथ: सृजते, न तत्रानन्दा मुद: प्रमुदो भवन्त्यथानन्दान्मुद: प्रमुद: सृजते, न तत्र वेशान्ता: पुष्करिण्य: स्रवंत्योभवन्त्यथवेशान्तान् पुष्करिणी: स्रवन्ती: सृजते सहि कर्त्ता ।10। स वा एष एतस्मिन्सम्प्रसादे रत्वा चरित्वा दृष्ट्वैव पुण्यं च पापं च पुन: प्रतिन्यायं प्रतियोन्या-द्रवति स्वप्नायेव सय त्तत्र किंचित्पश्यत्यनन्वागतस्तेन भवत्यसंगोह्ययं पुरुष: (15)।'

अब केवल दूसरी शंका रह जाती है कि जब तक कहीं असल चीज न हो तब तक दूसरी जगह उसकी मिथ्या कल्पना हो नहीं सकती। इसीलिए कहीं न कहीं संसार को भी सत्य मानना ही होगा। इसका तो उत्तर आसान है। दूसरी जगह उस चीज का ज्ञान होना जरूरी है। तभी और जगह उसकी मिथ्या कल्पना हो सकती है। बस, इतने से ही काम चल जाता है। जहाँ उसका ज्ञान हुआ है वहाँ वह चीज सच्ची है या मिथ्या, इसकी तो कोई जरूरत है नहीं। कल्पना की जगह वही चीज प्रतीत होती है, यही देखते हैं। न कि उसको सारी बातें प्रतीत होती हैं, या उसकी सत्यता और मिथ्यापन भी प्रतीत होता है। यदि किसी ने बनावटी, इंद्रजाल का या इसी तरह का साँप, फल या फूल देख लिया; उससे पहले उसे इन चीजों की कहीं भी जानकारी न रही हो; उसी के साथ यह भी मालूम हो जाए कि ये चीजें मिथ्या हैं, सच्ची नहीं; तो क्या कहीं उनका भ्रम होने पर यह भी बात भ्रम के साथ ही मालूम हो जाएगी कि ये मिथ्या हैं, बनावटी हैं? यदि ऐसा ज्ञान हो जाए तो फिर भ्रम कैसा? ऐसी जानकारी तो भ्रम हटने पर ही होती है। यह तो कही नहीं सकते कि झूठी चीजें ही जिनने देखी हैं न कि सच्ची भी, उन्हें भ्रम हो ही नहीं सकता। भ्रम होता है अपनी सामग्री के करते और यदि वह सामग्री जुट जाए तो सच्ची-झूठी चीज के करते वह रुक नहीं सकता। इसलिए जिस चीज का भ्रम हो उसका अन्यत्र सत्य होना जरूरी नहीं है; किंतु उसकी जानकारी ही असल चीज है। जानकारी बिना सत्य वस्तु का भी कहीं भ्रम नहीं होता है। जानें ही नहीं, तो दूसरी जगह उसकी कल्पना कैसे होगी? इसी प्रकार इस संसार का भी कहीं अन्यत्र सत्य होना जरूरी नहीं है। किंतु किसी एक स्थान पर भ्रम से ही यह बना है। उसी की कल्पना दूसरी जगह और इसी तरह आगे भी होती रहती है। एक बार जिसकी कल्पना आत्मा में हो गई उसी की बार-बार होती रहती है। यह कल्पित ही संसार अनादिकाल से चला आ रहा है।

मगर हमें इन दार्शनिक विवादों में न पड़ के केवल अद्वैतवाद का सिद्धांत मोटा-मोटी बता देना है और यह काम हमने कर दिया। यहीं पर यह भी जान लेना होगा कि जहाँ एक बार इस दृश्य जगह का अध्यास या आरोप आत्मा या ब्रह्म में हो गया कि विवर्त्तवाद का काम हो गया। चेतन ब्रह्म में इस जड़ जगत के आरोप को ही विवर्त्तवाद कहते हैं। जहाँ तक इस दृश्यजगत का ब्रह्म से ताल्लुक है वहीं तक विवर्त्तवाद है। मगर इस जगत की चीजों के बनने-बिगड़ने का जो विस्तार या ब्योरा है वह तो गुणवाद के आधार पर विकासवाद के सिद्धांत के अनुसार ही होता है। विवर्त्तवाद ने इन्हें मिथ्या सिद्ध कर दिया। अब परिणाम या विकासवाद से कोई हानि नहीं। क्योंकि इससे इन पदार्थों की सत्यता तो हो सकती नहीं। विवर्त्तवाद ने इनकी जड़ ही खत्म जो कर दी है। उसके न मानने पर ही यह खतरा था, द्वैतवाद आ जाने की गुंजाइश थी। बस, इतने के ही लिए विवर्त्तवाद आ गया और काम हो गया।



गीता , न्याय और परमाणुवाद

आश्चर्य की बात कहिए या कुछ भी मानिए; मगर यह सही है कि गीता में गौतम और कणाद का परमाणुवाद पाया नहीं जाता। इसकी कहीं चर्चा तक नहीं है और न गौतम या कणाद की ही। विपरीत इसके गुणकीर्त्तन और गुणवाद तो भरा पड़ा है, जैसा कि पहले बताया जा चुका है। इतना ही नहीं। जिन योग, सांख्य या वेदांतदर्शनों ने इसे मान्य किया है उनका भी उल्लेख है और उनके आचार्यों का भी। यह ठीक है कि योगदर्शन के प्रर्वतक पतंजलि का जिक्र नहीं है। मगर योग की विस्तृत चर्चा पाँच, छह, आठ और अठारह अध्यायों में खूब आई है। यों तो प्रकारांतर से यह बात और अध्यायों में भी मन के निरोध या आत्मसंयम के नाम से बार-बार आई ही है। पतंजलि से इसी बात को 'योगश्चित्तवृत्ति निरोध:' (1। 2) तथा 'अध्यास वैराग्याभ्यां तन्निरोध:' (2। 12) आदि सूत्रों में साफ ही कहा है। गीता के छठे अध्‍याय में मालूम होता है, यह दूसरा सूत्र ही जैसे उद्धृत कर दिया गया हो 'अध्यासेन तु कौंतेय वैराग्येण च गृह्यते' (6। 35)। चौथे अध्‍याय के 'आत्मसंयमयोगाग्नौ' (4। 27) में तो साफ ही मन के संयम को ही योग कहा है। और स्थानों में भी यही बात है। पाँचवें अध्याय के 27, 28 श्लोकों में, छठे अध्याय के 10-26 श्लोकों में तथा आठवें अध्याय के 12, 13 श्लोकों में तो साफ ही योग के प्राणायाम की बात लिखी गई है। अठारहवें के 51-53 श्लोकों में भी जिस ध्‍यानयोग की बात आई है, उसी का उल्लेख पतंजलि ने 'यथाभिमतध्यानाद्वा' (1।35) 'यमनियमासन प्राणायाम प्रत्याहार ध्‍यानधारणासमाधयोऽष्टावंगानि' (2 ।29) तथा 'तत्र प्रत्ययैकतानता ध्‍यानम्' (3। 2) सूत्रों में किया है।

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वेदांत , सांख्य और गीता

सांख्य और वेदांत का तथा उनके प्रर्वतक आचार्यों का भी तो नाम आया ही है। सांख्य के प्रर्वतक कपिल का उल्लेख 'कपिलोमुनि:' (10। 26) में तथा वेदांत के आचार्य व्यास का 'मुनीनामप्यहं व्यास:' (10। 37) में आया है। पहले कपिल का और पीछे व्यास का। इन दर्शनों का क्रम भी यही माना जाता है। इसी प्रकार 'वेदांतकृद्वेदविदेव चाहम्' (15। 15) में वेदांत का और 'सांख्य कृतान्ते प्रोक्तानि' (18। 13) तथा 'प्रोच्यते गुणसंख्याने' (18। 19) में सांख्यदर्शन का उल्लेख है। कृतांत और सिद्धांत शब्दों का एक ही अर्थ है। इसलिए 'सांख्ये कृतान्ते' का अर्थ है 'सांख्यसिद्धांत में।' सांख्यवादी भी तो आत्मा को अकर्त्ता, केवल तथा निर्विकार मानते हैं और यही बात यहाँ लिखी गई है। इसी प्रकार गुणसंख्यान शब्द का अर्थ है गुणों का वर्णन जहाँ पाया जाए। सांख्य शब्द का भी तो अर्थ है गिनना, वर्णन करना। सांख्य ने तो गुणों का ही ब्योरा ज्यादातर बताया है। इसीलिए उसे गुणसंख्यानशास्त्र भी कह दिया है। शेष सांख्य और योग शब्द ज्ञान आदि के ही अर्थ में गीता में आए हैं।



गीता में मायावाद

यह ठीक है कि मायावाद की साफ चर्चा गीता में नहीं आती। मगर माया का और उसके भ्रम में डालने आदि कामों को बार-बार जिक्र उसमें आया ही है। 'सम्भवाम्यात्ममायया' (4। 6) 'दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया' (7। 14), 'माययापहृतज्ञाना' (7। 15), 'योगमाया समावृत:' (7। 25), 'यंत्ररूढानि मायया' (18। 61) में जिस प्रकार माया का उल्लेख है, जैसा चौदहवें अध्याय में प्रकृति का वर्णन आया है, 'मयाध्यक्षेण प्रकृति:' (9। 0) में जिस तरह प्रकृति का नाम लिया है, तेरहवें अध्‍याय के 'भूतप्रकृतिमोक्षं च' (13। 34) आदि श्लोकों में बार-बार प्रकृति का उल्लेख जिस प्रसंग में आया है तथा 'महाभूतान्यहंकारो बुद्धिरव्यक्तमेव च' (13। 5) में जो अव्यक्त शब्द है ये सभी माया के ही अर्थ में आ के वेदांत के मायावाद के ही समर्थक हैं तेरहवें अध्‍याय के शुरू में जो क्षेत्रज्ञ का बार-बार जिक्र आया है और 'एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्' (13। 6) में क्षेत्र का उसके घास-पात - विकार - के साथ जो वर्णन आलंकारिक ढंग से किया गया है वह भी इसी चीज का समर्थक है। क्षेत्र तो खेत को कहते हैं और जैसे खेतिहर खेत के घास-पात को साफ करके ही सफल खेती कर सकता है, ठीक उसी प्रकार यह क्षेत्रज्ञ - आत्मा - रूपी खेतिहर भी रागद्वेष आदि घास-पत्तों को निर्मूल करके ही अपने कल्याण का उत्पादन इस खेत - शरीर - में कर सकता है, यही बात वहाँ कही गई है। मगर वहाँ समष्टि शरीर या माया को ही क्षेत्र कहने का तात्पर्य है। व्यष्टि शरीर तो उसके भीतर आई जाते हैं। शुरू में जो महाभूत, अहंकार आदि का उल्लेख है वह इसी बात का सूचक है।



ब्रह्मज्ञान और लोकसंग्रह

जहाँ तक गीता का ताल्लुक इस मिथ्यात्व के सिद्धांत से और तन्मूलक अद्वैतवाद से है उसे बताने के पहले यह ज्ञान लेना जरूरी है कि संसार को मिथ्या मानने के बाद अद्वैतवाद एवं अद्वैततत्त्व के ज्ञान का व्यवहार में कैसा रूप होता है। क्योंकि गीता तो केवल एकांत में बैठ के समाधि लगानेवालों के लिए है नहीं। वह तो व्यावहारिक संसार का पारमार्थिक दुनिया के साथ मेल स्थापित करती है। उसकी नजर में तो अद्वैतब्रह्म के ज्ञान के बाद संसार के व्यवहारों में खामख्वाह रोक होती नहीं। यह ठीक है कि कुछ लोगों की मनोवृत्ति बहुत ऊँचे चढ़ जाने से वे संसार के व्यवहार से अलग हो जाते हैं। मगर ऐसे लोग होते हैं कम ही। ज्यादा तो ऐसे ही होते हैं जो लोकसंग्रह का काम करते रहते ही हैं। गीता की इसी दृष्टि का मेल अद्वैतवाद से होता है। इसीलिए पहले उस अद्वैतवाद का इस दृष्टि से जरा विचार कर लेना जरूरी है।

असल में ब्रह्म ही सत्य है, जगत मिथ्या है और आत्मा ब्रह्मरूप ही है, उससे पृथक नहीं है, इस दृष्टि के, इस विचार के दो रूप हो सकते हैं। या यों कहिए कि इस विचार को दो प्रकार से प्रकाशित किया जा सकता है। रस्सी में साँप का भ्रम होने के बाद जब चिराग आने या नजदीक जाने पर वह दूर हो जाता तथा साँप मिथ्या मालूम पड़ता है, तो इस बात को प्रकाशित करते हुए या तो कहते हैं कि यह तो रस्सी ही है, या साँप-वाँप कुछ भी नहीं है। यदि दोनों को मिला के भी बोलें तो यही कहेंगे कि वह तो रस्सी ही है और कुछ नहीं, या रस्सी के अलावे साँप-वाँप कुछ नहीं है। इन दोनों कथनों में और कुछ बात नहीं है, सिवाय इसके कि पहले कथन में विधिपक्ष (Positive side) पर विशेष जोर है, वही मुख्य चीज है। उसमें निषेध पक्ष (Negative side) अर्थ-सिद्ध है। उस पर जोर नहीं है। यदि वह बात बोलते भी हैं तो विधिपक्ष की मजबूती के ही लिए। विपरीत इसके दूसरे कथन में निषेध पक्ष पर ही जोर है, वही प्रधान बात है। यहाँ विधिपक्ष पर जोर न दे के उसे निषेध की दृढ़ता के ही लिए कहते हैं।

ठीक इसी तरह संसार के बारे में भी अद्वैत पक्ष को ले के कह सकते हैं कि यह तो ब्रह्म ही है और कुछ नहीं, या ब्रह्म के अलावे यह जगत कुछ चीज नहीं है। यहाँ भी पहले कथन में ब्रह्म की ही प्रधानता और उसकी जगद्रूपता ही विवक्षित है - उसी पर जोर है। जगत का निषेध तो अर्थ-सिद्ध हो जाता है जो उसी ब्रह्मरूपता को दृढ़ करता है। दूसरे कथन में जगत का निषेध ही असल चीज है। विधिपक्ष उसी को पुष्ट करता है। इसी तरह आत्मा ब्रह्म रूप ही है, उससे जुदा नहीं है ऐसा कहने में भी विधि और निषेधपक्ष आ जाते हैं। ब्रह्मरूप कहना विधिपक्ष है और आत्मा से अलग ब्रह्म नहीं है यह निषेधपक्ष। बात तो वही है। मगर कहने और जोर देने में फर्क है और गीता के लिए वह बड़े ही काम की चीज है। गीता इस फर्क पर पूर्ण दृष्टि रख के चलती है। दरअसल यदि पूछा जाए तो गीता ने निषेधपक्ष को एक प्रकार से भुला दिया है। उसने उस पर जोर न दे के विधिपक्ष पर ही जोर दिया है और इसकी वजह है।



असीम प्रेम का मार्ग

कर्म का मार्ग तो निषेध का रास्ता है नहीं। वह तो विधि का ही मार्ग है और गीताकर्म से ही शुरू करके अकर्म या कर्मत्याग पर - संन्यास पर - पहुँचती है। उसके संन्यास की परख, उसकी जाँच कर्म से ही होती है। गीता में कर्म शुरू करके ही संन्यास को आगे हासिल करते और उसे पक्का बनाते हैं। ऐसी हालत में निषेधपक्ष उसके किस काम का है? सो भी पहले ही? वह तो अंत में खुद-ब-खुद आ ही जाता है। यदि उसका अवसर आए। वह खामख्वाह आए ही यह हठ भी तो गीता में नहीं है। जब ब्रह्म को अपनी आत्मा का ही रूप मानते हैं तो अपना होने से कितना अलौकिक प्रेम उसमें होता है! दो रहने से तो फिर भी जुदाई रही गई यद्यपि वह उतनी दु:खद नहीं है। इसीलिए प्रेम में - उसके साक्षात प्रकट करने में, प्रकट होने में - कमी तो रही जाती है, बाधा तो रही जाती है। दो के बीच में वह बँट जाता जो है - कभी इधर तो कभी उधर। यदि एक ओर पूरा जाए तो दूसरी ओर खाली! यदि इधर आए तो वह सूना! दोनों की चिंता में कहीं जम पाता नहीं । किसी एक को छोड़ना भी असंभव है। यह बँटवारे की पहेली बड़ी बीहड़ है, पेचीदा है। मगर है जरूर।

देशकोश, गाँव, परिवार, घर, स्‍त्री, पुत्र, शरीर, इंद्रियाँ, आत्मा वगैरह को देखें तो पता चलता है कि जो चीज अपने आपसे जितनी ही दूर पड़ती है उसमें प्रेम की कमी उतनी ही होती है। दूर तक पहुँचने में समय और दिक्कत तो होती है और ताँता भी तो रहना ही चाहिए। नहीं तो स्रोत ही टूट जाए, सूख जाए और अपने आप से ही अलग हो जाएँ। इसीलिए ज्यों-ज्यों नजदीक आइए, दिक्कत कम होती जाती है और ताँता टूटने या स्रोत सूखने का डर कम होता जाता है। मगर फिर भी रहता है कुछ न कुछ जरूर। इसीलिए जब ऐसा मौका आ जाए कि देश और गाँव में एक ही को रख सकते हैं तो आमतौर से देश को छोड़ देते हैं और गाँव को ही रख लेते हैं। प्रेम की कमी-बेशी का यही सबूत है। इसी तरह हटते-हटते पुत्र, शरीर और इंद्रियों तक चले जाते हैं। मगर आत्मा की मौज या आनंद में उसके मजा में किरकिरी डालने पर, या कम से कम ऐसा मालूम होने पर कि शरीर या इंद्रियों के करते आत्मा का - अपना - मजा किरकिरा हो रहा है, आत्महत्या - शरीर का नाश - या इंद्रियों का नाश तक कर डालते हैं! क्यों? इसीलिए न, कि आत्मा तो अपने से आप ही है। अपने से अत्यंत नजदीक है? यही बात याज्ञवल्क्य ने मैत्रेयी से बृहदारण्यक में कही है और सभी के साथ के प्रेमों को परस्पर मुकाबिला करके अंत में आत्मा में होने वाले प्रेम को सबसे बड़ा - सबसे बढ़ के - यों ठहराया है - 'नवा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय सर्व प्रियं भवति' (4। 5। 6)।



प्रेम और अद्वैतवाद

यदि ब्रह्म या परमात्मा में असली प्रेम करना है जो सोलह आना हो और निर्बाध हो, अखंड हो, एकरस हो, निरंतर हो, अविच्छिन्न हो, तो आत्मा और ब्रह्म के बीच का भेद मिटाना ही होगा - उसे जरा भी न रहने देकर दोनों को एक करना ही होगा। यदि सच्ची भक्ति चाहते हैं तो दोनों को - आशिक और माशूक को - एक करना ही होगा। यही असली भक्ति है और यही असली अद्वैतज्ञान भी है। इसीलिए गीता ने भक्तों के चार भेद गिनाते हुए अद्वैतज्ञानी को भी न सिर्फ भक्त कहा है, किंतु भगवान की अपनी आत्मा ही कह दिया है - अपना रूप ही कह दिया है, - 'ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्' (7। 18)। जरा सुनिए, गीता क्या कहती है। क्योंकि पूरी बात न सुनने में मजा नहीं आएगा। गीता का कहना है कि, 'चार प्रकार के सुकृती - पुण्यात्मा - लोग मुझमें - भगवान में - मन लगाते, प्रेम करते हैं, वे हैं दुखिया या कष्ट में पड़े हुए, ज्ञान की इच्छावाले, धन-संपत्ति चाहने वाले और ज्ञानी। इन चारों में ज्ञानी तो बराबर ही मुझी में लगा रहता है। कारण, उसकी नजरों में तो दूसरा कोई हई नहीं। इसीलिए वह सभी से श्रेष्ठ है। क्योंकि वह मेरा अत्यंत प्यारा है और मैं भी उसका वैसा ही हूँ। यों तो सभी अच्छे ही हैं; मगर ज्ञानी तो मेरी आत्मा ही है न? मुझसे बढ़ के किसी और पदार्थ को वह समझता ही नहीं। इसीलिए निरंतर मुझी में लगा हुआ मस्त रहता है' - "चतुर्विधा भजन्ते मां जना: सुकृतिनोऽर्जुन। आर्त्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी न भरतर्षभ। तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते। प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रिय: उदारा: सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्। आस्थित: सहियुक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम्" (7। 16-18)



ज्ञान और अनन्य भक्ति

इस प्रकार हमने देखा कि जिस भक्ति के नाम पर बहुत चिल्लाहट और नाच-कूद मचाई जाती है और जिसे ज्ञान से जुदा माना जाता है वह तो घटिया चीज है। असल भक्ति तो अद्वैत भावना, 'अहं ब्रह्मास्मि' - मैं ही ब्रह्म हूँ - यह ज्ञान ही है। इसीलिए 'अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जना: पर्युपासते। तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्' (9। 22) में यही कहा गया है कि 'भगवान को अपना स्वरूप - अपनी आत्मा - ही समझ के जो उसमें लीन होते हैं, रम जाते हैं तथा बाहरी बातों की सुध-बुध नहीं रखते, उनकी रक्षा और शरीर यात्रा का काम खुद भगवान करते हैं।' यहाँ अनन्य शब्द का अर्थ है भगवान को अपने से अलग नहीं मानने वाले। इसीलिए अगले श्लोक 'येऽप्यन्य देवताभक्ता:' (9। 23) में अपने से भिन्न देवता या आराध्यदेव की भक्ति का फल दूसरा ही कहा गया है। 'अनन्यचेता: सततं यो मां स्मरति नित्यश:। तस्याहं सुलभ: पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिन:' (8। 14) में भी यही बात कही गई है कि 'जो भगवान को अपनी आत्मा ही समझ के उसी में प्रेम लगाता है उसे भगवान सुलभ हैं - कहीं अन्यत्र ढूँढ़े जाने की चीज है नहीं।' यदि असल और सर्वोत्तम भक्ति ज्ञान रूप नहीं ''भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वत:। ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्' (18। 55) श्लोक में क्यों कहते कि 'उस भक्ति से ही मुझे बखूबी जान लेता है और उसके बाद ही मेरा रूप बन जाता है।' जानना तो ज्ञान से होता है, न कि दूसरी चीज से। इससे पूर्व के श्लोक 'ब्रह्मभूत: प्रसन्नात्मा' आदि में उसे ब्रह्मरूप कह के समदर्शन का ही वर्णन किया है। समदर्शन तो ज्ञान ही है यह पहले ही कहा गया है। यहाँ उसी समदर्शन को भक्ति कहा है। इस संबंध में और बातें आगे लिखी हैं।

इससे इतना सिद्ध हो गया कि जब ब्रह्म हमीं हैं ऐसा अनुभव करते हैं, तो प्रेम के प्रवाह के लिए पूरा स्थान मिलता है और उसका अबाध स्रोत उमड़ पड़ता है। क्योंकि वह प्रवाह जहाँ जा के स्थिर होगा वह वस्तु मालूम हो गई। मगर निषेधात्मक मनोवृत्ति होने पर ब्रह्म हमसे अलग या दूसरी चीज नहीं है, ऐसी भावना होगी। फलत: इसमें प्रेम-प्रवाह के लिए वह गुंजाइश नहीं रह जाती है। मालूम होता है, जैसे मरुभूमि की अपार बालुका-राशि में सरस्वती की धारा विलुप्त हो जाती है और समुद्र तक पहुँच पाती नहीं, ठीक वैसे ही, इस निषेधात्मक बालुका-राशि में प्रेम की धारा लापता हो जाती और लक्ष्य को पा सकती है नहीं। यही कारण है कि विधि-भावना ही गीता में मानी गई है। भक्ति की महत्ता भी इसी मानी में है।



सर्वत्र हमीं हम और लोकसंग्रह

अब जरा जगत के बारे में भी देखें। यहाँ भी यह जगत तो ब्रह्म ही है ऐसा विधिरूप ज्ञान ही गीता को मान्य है। क्योंकि इसमें हमारे कर्मों के लिए, लोकसंग्रह के लिए पूरी गुंजाइश रहती है। निषेध में यह बात नहीं रहती। मालूम पड़ता है कि निठल्ले जैसा बैठने की बात आ जाती है। आज जो वेदांत के अद्वैतवाद में इस निषेध पक्ष या संसार के मिथ्यात्व के ही पहलू पर जोर देने के कारण लोगों में अकर्मण्यता आ गई है वह गीताधर्म और गीता के इस महान मार्ग के छोड़ देने का ही परिणाम है। वेदांत के नाम पर आज प्रचलित महान पतन की यही वजह है। जब कोई विधानात्मक चीज हई नहीं, तो फिर कुछ भी करने-धरने की जरूरत ही क्या है? फलत: वेदांतवाद एवं अद्वैतवाद को इस पतन के गंभीर गर्त्त से निकालने के लिए जगत के मिथ्यात्व पर जोर देने वाले निषेधात्मक पक्ष की ओर दृष्टि न करके हमें 'जगत ब्रह्म ही है, हमारी आत्मा ही है' इस विधानात्मक पक्ष की ओर ही दृष्टि देना जरूरी है। इससे यही होगा कि हम चारों ओर अपनी ही आत्मा को देख के उसके कल्याणार्थ ठीक वैसे ही उतावले हो पड़ेंगे, दौड़ पड़ेंगे जैसे अपने पाँवों में फोड़ा-फुंसी होने, खुद भूख-प्यास लगने या अपने पेट में दर्द होने पर उतावले और बेचैन हो के प्रतीकार में लग जाते हैं। और जरा भी विलंब या आलस्य, अपना या गैरों का, बरदाश्त कर नहीं सकते।

गीता इसी दृष्टि पर जोर देती हुई कहती है कि 'बहुत जन्मों में लगातार यत्न करके, यह जो कुछ देखा-सुना जाता है सब भगवान ही है, ऐसा ज्ञान जिसे प्राप्त हो जाए वही इस संसार में अत्यंत दुर्लभ महात्मा है' - "बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते। वासुदेव: सर्वमिति स महत्मा सुदुर्लभ:" (7। 19)। ऐसा अद्वैत तत्त्वज्ञानी दूसरे के सुख-दु:ख को अपने में ही अनुभव करता है। यदि किसी को भी एक लाठी मारो तो उसकी चोट उसे ही लगती है। इसीलिए उसका हृदय द्रवीभूत हो के दत्तचित्तता के साथ लोकसंग्रह में उसे दिन-रात लग जाने को विवश कर देता है। इस बात का कितना मार्मिक वर्णन गीता के छठे अध्‍याय के ये श्लोक करते हैं, 'सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि। ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शन:। यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति। तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति। सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थित:। सर्वथा वर्त्तमानोऽपि स योगी मयि वर्त्तते। आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन। सुखं वा यदि वा दु:खं स योगी परमोमत:' (6। 29-32)।

इनका आशय यह है कि 'जिसका मन सब तरफ से हट के आत्मा - ब्रह्म - में लीन हो गया है और जो सर्वत्र समदर्शी है (समदर्शन का पूरा विवेचन पहले किया गया है) वह अपने आपको सभी पदार्थों में और पदार्थों को अपने आप में ही देखता है। इस प्रकार जो भगवान को भी सर्वत्र - सभी पदार्थों में - देखता है और पदार्थों को भगवान में, वह न तो भगवान - ब्रह्म - से जरा भी जुदा हो सकता है और न भगवान ही उससे जुदा हो सकता है - दोनों एक ही जो हो गए - जो योगी सभी पदार्थों में रहने वाले - पदार्थों के रग-रग में रमने वाले - एक हो भगवान को अपने से जुदा नहीं देखता, वह चाहे किसी भी हालत में रहे, फिर भी परमात्मा में ही रमा हुआ रहता है। जो योगी किसी भी प्राणी या पदार्थ के दु:ख-दु:ख को अपना ही समझता है, अनुभव करता है, वही सर्वोत्तम है।' इसी ज्ञान के बारे में पुनरपि गीता कहती है कि 'उसे हासिल करके फिर इस प्रकार भूल-भुलैया में हर्गिज न पड़ोगे। तब हालत यह होगी कि संसार के सभी पदार्थों को अपने आप में देखोगे और मुझमें भी - अर्थात तुममें, हममें - परमात्मा में - और इस जगत में कोई विभिन्नता रहेगी ही नहीं - सभी एक ही बन जाएँगे' - "यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पांडव। येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि" (4। 25)।

हमने शुरू में ही कर्मों के भेदों के निरूपण के प्रसंग में बता दिया है कि आगे बढ़ते-बढ़ते सभी भौतिक पदार्थों और परमात्मा के साथ आत्मा की तन्मयता कैसे हो जाती है। वही बात गीता बार-बार कहती है। इसीलिए जो प्रत्येक शरीर में आत्मा को जुदा-जुदा मानते हैं वह तो गीता से अनंत दूरी पर है। उनसे और गीताधर्म से कोई ताल्लुक है नहीं। सबकी एकता - एकरसता - के पहले सभी शरीरों की आत्मा की एकता तो अनिवार्य है। ऐसी बुद्धि और भावना सबसे पहले होनी चाहिए। यहीं से तो गीता का श्रीगणेश होता है। इसीलिए 'अंतवंत इमे देहानित्यस्योक्ता शरीरिण:' (2। 18) आदि श्लोकों में अनके शरीरों में रहने वाले शरीरी - आत्मा - को एक ही कहा है। जहाँ 'देहा:' यह बहुवचन दिया है, तहाँ 'शरीरिण:' एकवचन ही रखा है। आगे भी यही बात है। 'क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत' (13। 2) में भी सभी क्षेत्रों में - शरीरों में - एक ही क्षेत्रज्ञ - शरीरी - को कह के साफ सुना दिया है कि शरीर और शरीरी - आत्मा - भगवान के ही स्वरूप हैं। 'मयि ते तेषु चाप्यहम्' (9। 29) में भी यही बात कही गई है कि भक्तजनों में भगवान हैं और भगवान में भक्तजन हैं -अर्थात दोनों एक हैं। 'अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते' (12। 6) में भी दोनों की अभिन्नता - एकता - ही कही गई है। ऐसे ज्ञानियों की हालत यह होती है कि न तो उनसे किसी को उद्वेग या जरा-सी भी दिक्कत मालूम होती है और न उन्हें दूसरों से। यही बात 'यस्मान्नोद्विजते लोक:' (12। 15) में कही गई है। यही है ज्ञानी जनों की पहचान। 'मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी' (13। 10) में इसी अद्वैततत्त्वज्ञान को अव्यभिचारिणी भक्ति नाम दिया है। 'मां च योऽव्यभिचारेण' (14। 26) में इसे ही अव्यभिचारी भक्ति योग भी कहा है।

6. अपर्याप्तं तदस्माकम्

गीता के प्रथमाध्‍याय के 'अपर्याप्तं तदस्माकम्' (1। 10) श्लोक के अर्थ में बहुत मतभेद हैं। इसके शब्दों और उनके अर्थों की मनमानी खींचतान की गई है। अत: स्पष्टीकरण जरूरी है। संक्षेप में दो खयाल के लोग इस संबंध में पाए जाते हैं। एक तो वह हैं जो मानते हैं कि दुर्योधन अपनी फौज को कमजोर या नाकाफी कहे, इसकी कोई वजह नहीं थी। इसके उलटे काफी और अपरिमित कहने के कई प्रमाण वे लोग पेश करते हैं। पहली बात यह है कि खुद दुर्योधन ने उद्योगपर्व (54। 60-70) में अपनी सेना की सब तरह से तारीफ करके कहा था कि जीत मेरी ही होगी। दूसरी यह कि उसने गीता में जो श्लोक कहे हैं प्राय: इसी तरह के श्लोक उसके मुँह से गीता के बाद ही भीष्मपर्व (51। 4-6) में पुनरपि द्रोणाचार्य के ही सामने निकले हैं। तीसरी यह कि यह बयान अपने सैनिकों को प्रोत्साहित करने के ही लिए तो किया गया है। फिर इसमें अपनी ही कमजोरी की बात कैसे आएगी? तब तो उलटा ही प्रभाव होगा न? और स्वयं दुर्योधन ही इतनी बड़ी भूल करे, यह कब संभव है? जो लोग ऐसा खयाल करते हैं कि दुर्योधन डर के मारे ही ऐसा कह रहा था, वह भूलते हैं। क्योंकि महाभारत की लंबी पोथी में कहीं भी उसके भयभीत होने का जिक्र है नहीं। विपरीत इसके भीष्मपर्व (19। 5 तथा 21। 1) से पता चलता है कि दुर्योधन की ग्यारह अक्षौहिणी के मुकाबिले में अपनी केवल सात ही अक्षौहणी सेना देख के युधिष्ठिर को ही खिन्नता हुई थी।

इसीलिए इस खयाल के लोग इस श्लोक के पर्याप्त और अपर्याप्त शब्दों का आमतौर से प्रचलित अर्थ काफी और नाकाफी मानने में दिक्कत एवं ऊपरवाली अड़चनें देख के इनका दूसरा ही अर्थ मर्यादित या परिमित और अमर्यादित या अपरिमित करते हैं। इन अर्थों में भी दिक्कत जरूर है। क्योंकि ये प्रचलित नहीं हैं। मगर ऊपर लिखी दिक्कतों की अपेक्षा यह दिक्कत कोई चीज नहीं है। ऐसी परिस्थितियों में ही तो शब्दों के दूसरे-दूसरे अर्थ माने जाते हैं जो आमतौर से अप्रसिद्ध होते हैं। इसीलिए शब्दों को पतंजलि ने महाभाष्य में बार-बार कामधेनु कहा है : 'शब्दा: कामधेनव:'। क्योंकि संकट के समय या मौके पर जैसा चाहिए इनसे अर्थ (प्रयोजन) प्राप्त कर लीजिए। यही है पहले खयालवालों की स्थिति।

मगर दूसरे खयाल वाले शब्दों के प्रचलित और आमतौर से मालूम अर्थों को छोड़ने के लिए यहाँ तैयार नहीं हैं। इस संबंध में जो दलीलें पहले खयाल वाले देते हैं उनके विचार से वे सभी लचर हैं। शब्दों के अर्थों के बारे में मीमांसादर्शन में जो यह नियम माना गया है कि शब्द से आमतौर से मालूम होने वाले सीधे अर्थ को ही लेना चाहिए उसे छोड़ने का कारण कोई भी यहाँ है नहीं। बेशक दुर्योधन भयभीत था और इसके लिए दूर न जा के इसी श्लोक में प्रमाण रखा हुआ है। श्लोक के पूर्वार्द्ध में 'अपर्याप्तं' के बाद ही 'तत्' शब्द हैं जिसके आगे 'अस्माकं' है। इसी तरह उत्तरार्द्ध में 'पर्याप्तं तु' के बाद 'इदम्' है जिसके बाद 'एतेषां' आया है। 'तत्' का अर्थ है वह या जो सामने न हो। जो पदार्थ केवल दिमाग में हो और सामने न हो साधारणतया उसी को बताने के लिए 'तत्' आता है। इसके उलटा जो चीज सामने हो उसी का वाचक 'इदम्' है।

अब जरा मजा तो देखिए कि खुद अपनी ही फौज में खड़ा हो के दुर्योधन द्रोणाचार्य से बातें कर रहा है और अपने खास-खास योद्धाओं के नाम उसने अभी-अभी गिना के यह श्लोक कहा है - यह बात कही है। पांडव-सेना की बात पहले कह के अपनी फौज की पीछे बोला है और फौरन ही उसी के बाद 'अपर्याप्तं' आया है। ऐसी हालत में तो हर तरह से अपनी ही सेना सामने है और पांडवों की हर तरह से दूर है। यों भी दूर खड़ी है और उसकी चर्चा भी पहले हो चुकी है। फिर भी उसी को सामने और प्रत्यक्ष कहता है। 'इदम्' कहता है और अपनी को परोक्ष और दूर की। क्यों? इसीलिए न, कि उसके भीतर आतंक छाया है, उसे डर और घबराहट है और भूत की तरह पांडवों की सेना उसकी छाती पर जैसे सवार है? इसी घबराहट में अपनी फौज जैसे भूली-सी हो। आँखों के सामने और दिल-दिमाग पर तो पांडवों की फौज ही नाचती है। फिर कहे तो क्या कहे? अपनी फौज और अपनी शेखी तो भूल-सी गई है! यह बात इतनी साफ है कि कुछ पूछिए मत।

दूसरी बात है 'भीष्माभिरक्षितं' और 'भीमाभिरक्षितं' शब्दों की। यह तो सभी को मालूम था ही और दुर्योधन भी अच्छी तरह जानता था कि जहाँ भीम एक तरफा और आँख मूँद के लड़नेवाले हैं, वहाँ भीष्म दो नाव पर चढ़नेवाले और सोच-विचार के लड़नेवाले हैं। इसमें कई बातें हैं। महाभारत पढ़ने वाले जानते हैं कि कर्ण और भीष्म में तनातनी थी जिसके चलते कर्ण ने कह दिया था कि जब तक भीष्म जिंदा हैं मैं युद्ध से अलग रहूँगा। इसीलिए तो गीता के बाद वाले पहले ही अध्‍याय में लिखा है कि युधिष्ठिर ने उसे अपनी ओर मिलाने की बड़ी कोशिश की थी। फिर भी न आया यह बात दूसरी है। मगर वही वैर बता के वह उसे फोड़ना चाहते थे। अगर नहीं फूटा तो इससे पता लगता है कि वह दुर्योधन का पक्का आदमी था। मगर पक्का तो सेनारक्षक हो नहीं और दुभाषिया हो सेनापति, यह क्या कमजोरी की बात नहीं है? इसी से तो दुर्योधन को डर था। मगर भीम के बारे में कोई ऐसी बात न थी।

वह यह भी जानता था कि शिखंडी से भीष्म को खतरा है। इसीलिए इस श्लोक के बाद के श्लोक में ही दुर्योधन सभी से कहता है कि आप लोग सबके-सब सिर्फ भीष्म को ही बचाएँ - "भीष्ममेवाभिरक्षंतु भवंत: सर्व एव हिं।" लेकिन यह भी क्या अजीब बात है कि जो ही है सेनापति और सेना का रक्षक हो उसी की रक्षा के लिए शेष सभी को आदेश दिया जाए कि आप लोग 'केवल भीष्म' - 'भीष्ममेव' - की रक्षा करें! मालूम होता है, दूसरा कोई भी इससे जरूरी काम न था। मगर जिस फौज के सेनापति के ही बारे में यह बात हो वह फौज क्या जीतेगी ख़ाक? ऐसा कहीं नहीं देखा-सुना कि फौज के सभी प्रमुख योद्धा केवल सेनापति की ही रक्षा करें। मगर भीम के बारे में तो यह बात न थी। उन्हें कुछ सोचना-विचारना थोड़े ही था कि किस पर अस्त्र चलाएँ किस पर नहीं। इस मामले में तो वे ऐसे थे कि मीनमेख करना जानते ही न थे। बल्कि मीनमेख से चिढ़ते थे। वे तो युधिष्ठिर को कोसा करते थे कि आपको बुद्धि की बदहजमी और धर्म की बीमारी लगी है, जिससे रह-रह के मीनमेख निकाला करते हैं।

महाभारत में गीता के बादवाले अध्‍याय में ही यह बात लिखी है कि भीष्म ने साफ ही कह दिया कि युधिष्ठिर, जाओ, जीत तुम्हारी ही होगी। उनने यह भी कहा था कि क्या करूँ मजबूरी है इसीलिए लड़ुँगा तो दुर्योधन की ही ओर से, हालाँकि पक्ष तुम्हारा ही न्याययुक्त है। इसीलिए तुम्हारे सामने दबना पड़ता है और सिर उठा नहीं सकता। क्या ऐसे ही 'आ फँसे' वाले सेनापति से जीत हो सकती थी? और क्या इतनी बात भी दुर्योधन समझता न था? खूबी तो यह है कि न सिर्फ भीष्म, किंतु द्रोण, कृप और शल्य भी इसी ढंग के थे और यह बात उसे ज्ञात न थी यह कहने की हिम्मत किसे है? विपरीत इसके भीम अपने पक्ष के लिए मर-मिटने वाला था, उचित-अनुचित सब कुछ कर सकता था। इसीलिए तो दुर्योधन की कमर के नीचे उसने गदा मारी जो पुराने समय के नियमों के विरुद्ध काम था और इसीलिए अपने चेले दुर्योधन की कमर टूटने पर बलराम बिगड़ खड़े भी हुए थे कि भीम ने अनुचित काम किया। मगर भीम को इसकी क्या परवाह थी?

जरा यह भी तो देखिए कि जहाँ स्वयं दुर्योधन ने शत्रुओं की सेना और उसके सेनानायकों का वर्णन पूरे चार (3 से 7) श्लोकों में किया है, तहाँ अपनी सेनावालों का सिर्फ एक (8) ही श्लोक में करके अगले (9वें) में केवल इतने से ही संतोष कर लिया है कि और भी बहुतेरे हैं जो मेरे लिए मर-मिटेंगे! आखिर बात क्या है? यह 'प्रथमग्रासे मक्षिकाभक्षणम्' कैसा? अपने ही लोगों का कीर्त्तन इतना संक्षिप्त? इसमें भी खूबी यह कि जिनके नाम गिनाए हैं उनमें एकाध को छोड़ सभी दो तरफे हैं, और विकर्ण तो साफ ही युधिष्ठिर की ओर जा मिला था, यह गीता के बादवाले ही अध्‍याय में लिखा है। शत्रु पक्ष के वर्णन में भी यह बात है कि द्रुपदपुत्र की बड़ी तारीफ की है। कहता है कि आपका ही चेला है। बड़ा काइयाँ है और वही है सेना को सजा के नाके पर खड़ी करने वाला। सभी को भीम और अर्जुन के समान ही युद्ध के बहादुर भी कह दिया है 'भीमार्जुन समायुधि'। अंत में सभी को यह भी कह दिया कि महारथी ही हैं - 'सर्व एव महारथा:'। क्या ये एक बातें भी अपनों के बारे में उसने कही हैं? और अगर कोई यह कहने की हिम्मत करे कि शत्रुओं की यह बड़ाई तो सिर्फ अपने लोगों को उत्तेजित करने के ही लिए है, तो यही बात 'अपर्याप्तं' श्लोक के बारे में भी क्यों नहीं लागू होती? दरअसल तो उसके दिल पर पांडवों का आतंक छाया हुआ था। फिर वैसा कहता क्यों नहीं?

एक बात और देखिए। उसके कह चुकने पर 'तस्य संजनयन्हर्षं' इस बारहवें श्लोक में यह कहा गया है कि दुर्योधन के भीतर बखूबी हर्ष पैदा करने के लिए भीष्म ने शंख बजाया। जरा गौर कीजिए कि 'उसके हर्ष को बढ़ाने के लिए' कहने के बजाए यह कहा गया है कि 'उसका हर्ष पैदा करने के लिए' - 'हर्षं संजनयन्'। जन धातु का अर्थ पैदा करना ही होता है न कि बढ़ाना। जो चीज पहले से न हो उसी को तो पैदा करते हैं। जो पहले से ही हो उसे तो केवल बढ़ा सकते है। इसी से पता लग जाता है कि दुर्योधन के भीतर हर्ष का नाम भी न था। इसीलिए भीष्म ने उसे पैदा करने की कोशिश की। 'जनयन्' के पहले जो 'सम्' दिया गया है उससे यह भी प्रकट होता है कि काफी मनहूसी थी जिसे हटा के खुशी लाने में भीष्म को अधिक यत्न करना पड़ा।

यह भी तो विचित्र बात है कि वह बातें तो करता है द्रोण से। मगर वह तो कुछ बोलते या करते नहीं। किंतु उसे खुश करने का काम भीष्म करते हैं जिनके पास वह गया तक नहीं! वह जानता था कि उनके पास जाना या कुछ भी कहना बेकार है। वह तो सुनेंगे नहीं। उलटे रंज हो गए तो और भी बुरा होगा। इसीलिए सेनापति होते हुए भी उन्हें छोड़ के द्रोण के पास दुर्योधन इसीलिए गया कि खतरे से सजग कर दिया जाए। उचित तो सेनापति के ही पास जाना था। यही तरीका भी है। मगर न गया। इससे भीष्म को भी पता चल गया कि मेरी ओर से उसे शक है। इसी से भीतर ही भीतर नाखुश है। उसी नाखुशी को दूर करने के लिए उनने बिना कहे-सुने शंख बजाया। नहीं तो एक प्रकार के इस अकांड तांडव का प्रयोजन था ही क्या? जोर से सिंहगर्जन करना और खूब तेज शंख बजाना अपनी सफाई ही तो थी।

द्रोण के पास जाने में दुर्योधन का और भी मतलब था। युद्धविद्या के आचार्य तो वही थे। इसलिए आगे लड़ाई की सफलता और भीष्मादि की रक्षा का ठीक उपाय वही बता सकते थे। यह काम जितनी खूबी के साथ वह कर सकते थे दूसरा कोई भी कर न सकता था शत्रुओं की सारी कला और खूबियों को वही जानते थे। उन्हें जरा उत्तेजित भी करना था। जिन्हें सिखा-पढ़ा के उनने तैयार किया वही अब उन्हीं से निपटने को तैयार हैं! जिस धृष्टद्युम्न को रणविद्या दी उसी ने आप ही के खिलाफ व्यूह रचना की है! कृतघ्नता की हद हो गई! इसीलिए जो 'तव शिष्येण' यह विशेषण उसने 'द्रुपद पुत्रेण' के साथ लगाया है उसके दोनों ही मानी हैं। एक तो यह कि सजग रहिए, वह काफी होशियार है। क्योंकि आपका ही सिखाया-पढ़ाया है। दूसरा यह कि चेला हो के गुरु के ही खिलाफ लड़ने की पूरी तैयारी में है, यह उसकी शोखी देखिए।

यह दलील, कि उत्तेजित करने और जोश बढ़ाने के बजाए डराने वाली कमजोरी की बात कैसे कहेगा, क्योंकि तब तो सभी लोग डर जाएँगे ही और सारा गुड़ ही गोबर हो जाएगा, भी निस्सार है। वह तो सिर्फ द्रोण से ही बातें कर रहा था। बाकी लोगों को क्या मालूम कि क्या बातें हो रही हैं? फिर उनके डरने का सवाल आता ही कहाँ से है? और द्रोण से भी सारी हकीकत और असलियत छिपाई जाए, यह कौन-सी बुद्धिमानी थी? वही तो दिक्कतों और खतरों का रास्ता सुझा सकते थे। आखिर दुर्योधन और किससे दिल की बातें कहता? द्रोणाचार्य इस बात का डंका पीटने तो जाते न थे कि सभी के दिल दहलने की नौबत आ जाती। और जब आगे 'सघोषोधार्त्तराष्ट्राणां' (19) श्लोक में साफ ही कह दिया है कि पांडवों की शंखध्वनियों से दुर्योधन के दलवालों का कलेजा दहल गया, जो फिर वही बात चाहे एक मिनट आगे हुई या पीछे, इसमें खास ढंग का ऐतराज क्या हो सकता है? जब भीष्मपर्व के पहले ही अध्‍याय के 18-19 श्लोकों में यही बात लिखी जा चुकी है कि केवल कृष्ण और अर्जुन के शंखों की ही आवाज से दुर्योधन की सेना के लोग ऐसे भयभीत हो गए जैसे सिंह के गर्जन से हिरण काँप उठते हैं, इसीलिए हालत यहाँ तक हो गई कि सभी की पाखाना-पेशाब तक उतर आई, तो फिर यहाँ दुर्योधन की बातों से दहलने का क्या प्रश्न?

अब रही यह दलील कि उद्योगपर्व में दुर्योधन ने स्वयं अपनी सेना की बड़ाई करके विजय का विश्वास जाहिर किया था यह भी वैसी ही है। यों प्रशंसा के पुल बाँधना और मनोराज्य के महल बनाना दूसरी चीज है। उसे कौन रोके। उसमें बाधा भी क्या है। मगर जब ऊँट पहाड़ पर चढ़ता है तो उसका बलबलाना बंद हो जाता है। ऊँचाई कैसी है इसका मजा भी मिलता है। यही बात हमेशा होती है जब ठोस चीजों और परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। अर्जुन ने भी तो बहुत दिनों से जान-बूझ के लड़ाई की तैयारी की थी और जब कभी युधिष्ठिर जरा भी आगा-पीछा करते तो घबरा जाते थे और उन्हें कुछ सुना भी देते थे। मगर मैदाने जंग में जब सभी चीजें सामने आईं और ठोस परिस्थिति चट्टान की तरह आ डँटी तो घबरा के धर्मशास्त्र की पोथियों के पन्ने उलटने लगे। क्या उन्हें पहले मालूम न था कि युद्ध में गुरुजनों और कुल का संहार होगा? फिर यह रोना पसारने की वजह क्या थी सिवाय इसके कि पहले ठोस चीजें सामने न थीं, केवल दिमा