Saturday, 28 February 2015

बाबा नागार्जुन मुझ पर बम की तरह फट पड़े/जयप्रकाश त्रिपाठी

मुझे नहीं मालूम था कि उस दिन बाबा नागार्जुन लूजमोशन से लस्त-पस्त से हो रहे थे। अस्सी के दशक में जयपुर (राजस्थान) में प्रगतिशील लेखक सम्मेलन का वह दूसरा दिन था। बड़े भाई शिवमूर्ति (कथाकार) के साथ मैं भी वहां जा पहुंचा था। मुझे अपनी पड़ी थी। वहां जाने से कुछ रोज पहले ही कमला सांकृत्यायन द्वारा संपादित महापंडित राहुल सांकृत्यायन पर पुस्तक पढ़ चुका था, जिसमें उनके जीवन के कई अछूते प्रसंग उदघाटित थे। उस पुस्तक से ही पता चला था कि कमला सांकृत्यायन मसूरी की हैप्पी वैली में उन दिनो रहती थीं। मुझे बस इसी जानकारी को पुख्ता कर लेना था ताकि किसी तरह वहां पहुंच कर कम से कम एक बार उनसे मिल सकूं। जिज्ञासा इसलिए भी बेतरह जोर मार रही थी कि छात्र जीवन में राहुल जी के गांव के ही मेरे कक्षाध्यापक थे पारसनाथ पांडेय। राहुलजी का गांव मेरे गांव से तीन-चार कोस की दूरी पर था। पारसनाथ पांडेय ने राहुल जी के बारे में ढेर सारे ऐसे संस्मण सुनाते रहे थे, जो किताबों में नहीं हैं। कभी समय मिला तो विस्तार से लिखना चाहूंगा।
तो उस दिन जयपुर में जिस धर्मशालानुमा ठिकाने पर बाबा नागार्जुन आदि ठहरे थे, बगल के कमरे में महाकवि त्रिलोचन के साथ बातचीत का अवसर मिल गया। अन्य बातों के साथ मैंने अपनी जोर मारती हैप्पी वाली जिज्ञासा भी त्रिलोचन जी के सामने व्यक्त कर दी। उन्होंने पहले तो इधर उधर देखा कि कोई सुन न ले, फिर बड़ी सावधानी से मेरे कान में कूक दिया कि बाबा को पकड़ लो, उन्हें सब मालूम है। हिदायत भी दे गये कि डरना मत, साफ साफ पूछ लेना। त्रिलोचन जी के इस अप्रत्याशित सहयोग राज भी मुझे बाद में पता चल गया था, जिसे यहां लिखना ठीक न होगा।
खैर, त्रिलोचन जी के कहे अनुसार मैंने उस कमरे के दरवाजे पर निगाह गड़ा दी, जिसमें बाबा नागार्जुन ठहरे हुए थे। एक मिनट बाद बाद वह जोर जोर से कुछ बड़बड़ाते हुए सफेद गमछा पहने कमरे से बाहर बरामदे में आ गये। मैं तेजी से लपका और तपाक से बाबा से पूछ बैठा- 'क्या कमला जी हैप्पी वैली में ही रहती हैं?' बाबा ने प्रतिप्रश्न कर दिया - 'कौन कमला?' मैंने कहा- कमला सांकृत्यायनजी।
इसके बाद तो बाबा बम की तरह फट पड़े मुझ पर। 'मैं नहीं जानता किसी कमला-समला को, और तुम कौन हो, कहां से आये हो। चलो हटो इधर से...।'  और बाबा पुनः कमरे में लौट कर बाथरूम में चले गये। मैं हक्काबक्का अपना-सा मुंह लिए उस कमरे में घुस गया, जिसमें त्रिलोचन जी कुछ लोगों के साथ हंसी-ठट्ठा कर रहे थे। मुझे खिन्नमना देखते ही अनभिज्ञ-से फिर बातों में मशगूल हो लिये। मैं भी ताड़ गया। ठान लिया, अब त्रिलोचनजी से नागार्जुन की नाराजगी का रहस्य जानकर ही रहूंगा। वहीं बगल में बैठ गया मौके की ताक में। दो-तीन मिनट बाद त्रिलोचन जी उठ कर जाने लगे। मैं भी पीछे पीछे हो लिया। बाहर निकलते ही उन्हे अकेला पाकर जब उन्हें मैंने बाबा की खीझ की बात बतायी तो वह जोर जोर से हंसने लगे। मैं कभी उनके चेहरे, कभी उनके (पेट पर) पैबंद लगे कुर्ते को देखकर 'नरभसाने'(शरद जोशी से क्षमा सहित) लगा। फिर त्रिलोचन जी सविस्तार बताया कि बाबा नाराज क्यों हो गये थे। (लेकिन मैं नहीं बता सकता, क्योंकि बात बड़ी ऐसी-वैसी है)...... 

Friday, 27 February 2015

अगला पड़ाव इलाहाबाद : 10 मई 2015



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Wednesday, 25 February 2015

दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में धन-मीडिया बनाम जन-मीडिया पर व्याख्यान : सात

बुक स्टॉल पर 'मीडिया हूं मैं' और 'क्लास रिपोर्टर' के साथ इवेंट मैनेजर प्रमोद कुमार चौरसिया

दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में धन-मीडिया बनाम जन-मीडिया पर व्याख्यान : सात

सम्बोधित करते प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट इरफान

दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में धन-मीडिया बनाम जन-मीडिया पर व्याख्यान : छह

सम्बोधित करते 'राज्यसभा टीवी' के वरिष्ठ पत्रकार अरविंद कुमार सिंह

दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में धन-मीडिया बनाम जन-मीडिया पर व्याख्यान : पांच

सम्बोधित करतीं जेएनयू के प्रोफेसर, प्रसिद्ध साहित्यकार एवं आलोचक प्रो.निर्मला वर्मा

दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में धन-मीडिया बनाम जन-मीडिया पर व्याख्यान : चार

सम्बोधित करते कथाकार एवं हंस के पूर्व संपादक संजीव

दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में धन-मीडिया बनाम जन-मीडिया पर व्याख्यान : तीन

मंचासीन प्रो.निर्मला वर्मा, कथाकार संजीव, गार्गी कालेज दिल्ली के मीडिया एचओडी श्रीनिवास त्यागी एवं आनंद प्रधान

दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में धन-मीडिया बनाम जन-मीडिया पर व्याख्यान : दो

सम्बोधित करते आईआईएमसी के प्रोफेसर आनंद प्रधान

दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में धन-मीडिया बनाम जन-मीडिया पर व्याख्यान : एक

सम्बोधित करते 'आजतक' के एंकर एवं वरिष्ठ पत्रकार पुण्यप्रसून बाजपेयी

इलाहाबाद में मीडिया पर व्याख्यान एवं प्रकाशनोत्सव- छह

'मीडिया हूं मैं' पर सम्बोधित करते प्रभाशंकर

इलाहाबाद में मीडिया पर व्याख्यान एवं प्रकाशनोत्सव- पांच

'मीडिया हूं मैं' पर सम्बोधित करते रविनंदन सिंह

इलाहाबाद में मीडिया पर व्याख्यान एवं प्रकाशनोत्सव- चार

'मीडिया हूं मैं' पर सम्बोधित करते वरिष्ठ पत्रकार मुनेश्वर मिश्रा

इलाहाबाद में मीडिया पर व्याख्यान एवं प्रकाशनोत्सव- तीन

'मीडिया हूं मैं' और 'क्लास रिपोर्टर' का विमोचन करते रवींद्र कालिया, ममता कालिया आदि..

इलाहाबाद में मीडिया पर व्याख्यान एवं प्रकाशनोत्सव- दो


'मीडिया हूं मैं' पर सम्बोधित करते साहित्यकार रवींद्र कालिया

इलाहाबाद में मीडिया पर व्याख्यान एवं प्रकाशनोत्सव


Tuesday, 24 February 2015

अन्ना के हर आंदोलन में 'वो' गहरा राज क्यों?

भूमि अधिग्रहण बिल के खिलाफ समाजसेवी अन्ना हजारे का जंतर मंतर पर अनशन तल्ख तेवर दिखा रहा है। मोदी सरकार के किसान विरोधी कदम से नाराज अन्ना हजारे भूमि अधिग्रहण कानून में किए गए बदलावों से नाखुश हैं।
क्या एक सरकारी अधिकारी की उस टिप्पणी में सचमुच कोई हकीकत छिपी है कि अन्ना किन्ही अंतरराष्ट्रीय ताकतों के हाथों में खेल रहे हैं? अन्ना के हर आंदोलन में एक गहरा राज छिपा रहता है। एक सवाल सीधे उनसे बनता है कि क्या वो उन भूमिहीन किसानों और उन मजदूरों के लिए भी वह कोई आंदोलन छेड़ना चाहेंगे, जो 'देसी और विश्व-पूंजी' की साझा सहमतियों से दमन की चक्की में बेरोक-टोक पीसे जा रहे हैं? क्या वो कोई ऐसा आंदोलन भी छेड़ना चाहेंगे, जो सारी बीमारियों की जड़ आर्थिक विषमता के खिलाफ हो...शायद कभी नहीं, कभी नहीं, कभी नहीं, ...क्योंकि ...????? चौधरी चरण सिंह और महेंद्र सिंह टिकैत भी सिर्फ धनी किसानों की लड़ाइयां लड़ते रहे हैं। गरीब और भूमिहीन किसान-मजदूरों के लिए उनके सीने में कभी दर्द नहीं उठा। अन्ना भी आज उसी राह पर हैं। वह जन लोकपाल विधेयक, भूमि अधिग्रहण कानून की तो बात करते हैं लेकिन पूंजीवादी-साम्राज्यवादी ताकतों की असली कारस्तानियों पर मौन साधे रहते हैं। यही हकीकत उनके पुराने शागिर्द एवं दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की भी है।
अन्ना का कहना है कि भूमि अधिग्रहण बिल में बदलावों से किसानों से सरकार उनका हक छीन रही है। अन्ना ने बदलावों को उद्योगपतियों के लिए फायदेमंद बताया है। अन्ना ने कहा है कि अगर किसानों को न्याय नहीं मिला तो चार महीने बाद वो रामलीला मैदान से जेल भरो आंदोलन शुरू करेंगे। सरकार ने नारा दिया था कि अच्छे दिन आने वाले हैं, तो वो अच्छे दिन कब आएंगे। क्या ये अच्छे दिन सिर्फ बड़े बिल्डर्स के लिए आने वाले हैं। अध्यादेश उद्योगपतियों के लिए है। इतना अन्याय तो अंग्रेजों ने भी नहीं किया।
अन्ना की मांग है कि सरकार इस अध्यादेश को वापस ले। वास्तविक रुप में ऐसे अध्यादेश को जारी करने की कोई जरुरत नहीं थी। फिर भी सरकार ने अध्यादेश लाते हुए किसानों की सहमति बिना भूमि अधिग्रहण करने का निर्णय लिया है। 70 प्रतिशत किसानों की सहमति को निकाला गया है। यह सबसे बडा धोखा है क्योंकि, इससे ग्रामसभा के अधिकार को बाधित किया गया है।
नरेंद्र मोदी सरकार के भूमि अधिग्रहण क़ानून में बदलाव का विरोध इस समय पूरे देश की जुबान पर है। सरकार बगले झांक रही है और बंदरघुड़कियां भी कि वह अन्ना की बात नहीं मानेगी। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2013 में भूमि अधिग्रहण क़ानून में बदलाव को मंज़ूरी दी गई थी। वर्ष 2013 क़ानून के पास होने तक भूमि अधिग्रहण का काम मुख्यत: 1894 में बने क़ानून के दायरे में होता था। मनमोहन सरकार ने मोटे तौर पर उसके तीन प्रावधानों में बदलाव कर दिए थे। ये भूमि अधिग्रहण की सूरत में समाज पर इसके असर, लोगों की सहमति और मुआवज़े से संबंधित थे। ये जबरन ज़मीन लिए जाने की स्थिति को रोकने में मददगार था। सोशल इंपैक्ट असेसमेंट की मदद से ये बात सामने आ सकती थी कि किसी क्षेत्र में सरकार के ज़रिये भूमि लिए जाने से समाज पर इसका क्या प्रभाव हो सकता है। ये इसलिए लागू किया गया था कि इससे ये बात सामने आ सकती थी कि इससे लोगों के ज़िंदगी और रहन-सहन पर क्या असर पड़ सकता है क्योंकि कई बार कई ऐसे लोग होते हैं जो ज़मीन के बड़े हिस्से के मालिक होते हैं लेकिन कई ऐसे होते हैं जिनके पास भूमि के छोटे टुकड़े मौजूद होते हैं।
सोशल इंपैक्ट असेसमेंट ये बात सामने ला सकता था कि पूरी अधिग्रहण प्रक्रिया का समाज पर क्या असर पड़ेगा। इसके लिए आम सुनवाई की व्यवस्था पुराने क़ानून में थी। 2013 के क़ानून में एक प्रावधान रखा गया था लोगों सहमति का। सरकार और निजी कंपनियों के साझा प्रोजेक्ट में प्रभावित ज़मीन मालिकों में से 80 फ़ीसद की सहमती ज़रूरी थी। पूरे तौर पर सरकारी परियोजनाओं के लिए ये 70 प्रतिशत था। नए क़ानून में इसे ख़त्म कर दिया गया है। वित्त मंत्री अरूण जेटली के मुताबिक रक्षा, ग्रामीण बिजली, ग़रीबों के लिए घर और औद्योगिक कॉरीडोर जैसी परियोजनाओं में 80 फ़ीसद लोगों के सहमिति की आवश्यकता नहीं होगी। संशोधन में मुआवज़े की दर को पहले जैसा ही रखा गया है।
एक मीडिया रिपोर्ट में कहा गया है - ''बीजेपी सरकार को लगता है कि अन्ना हजारे ऐसी अंतरराष्ट्रीय ताकतों के हाथों में खेल रहे हैं जो भारत को अविकसित रखना चाहते हैं। एक सरकारी अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि अन्ना के साथ मेधा पाटेकर जैसे लोगों का होना दिखाता है कि अन्ना ऐसी ताकतों के हाथों में खेल रहे हैं जो भारत को अविकसित रखना चाहती हैं। मेधा पाटेकर ने नर्मदा बांध का भी विरोध किया था। सरकार में मौजूद सूत्र ने कहा कि ये लोग पर्यावरण के नाम पर विभिन्न योजनाओं की राह में रोड़ा अटकाना चाहते हैं। एक बीजेपी नेता ने कहा कि अन्ना आज जिस जगह बैठे धरना दे रहे हैं, वह भी कभी किसी किसान की रही होगी। इस नेता ने पूछा, 'क्या अन्ना इन सवालों के जवाब देंगे कि क्या किसानों को स्कूल और अस्पताल नहीं चाहिए? क्या उसकी फसल को बाजार तक पहुंचाना नहीं है और क्या ऐसा बिना जमीन लिए किया जा सकता है? क्या सरकार सड़कें बनाने के लिए जमीन बना सकती है?' सरकार का कहना है कि लैंड बिल के बारे में कई तरह के भ्रम फैलाए जा रहे हैं, मसलन मुआवजे का प्रावधान एनडीए सरकार ने छेड़ा भी नहीं है, यह वही है जो पिछली सरकार के बनाए कानून में था। बीजेपी का आरोप है कि 2013 का कानून यूपीए ने किसानों के फायदे के लिए नहीं बल्कि वोट पाने के लिए बनाया था, इसीलिए कांग्रेस सरकारों ने भी उसके खिलाफ आवाज उठाई थी। महाराष्ट्र सरकार ने 2013 के कानून पर सवाल उठाते हुए केंद्र सरकार को पत्र लिखा था।'' 

हिंदी पत्रिकाओं की सूची

जो रचनाकार एवं पाठक मित्र डॉ. ज़ाकिर अली 'रजनीश' के 'मेरी दुनिया मेरे सपने' नामक समग्र रचना संसार से परिचित-सुपरिचित नहीं हों, उन्हें इस - me.scientificworld.in पते पर कुछ समय निकालकर अवश्य पहुंचना चाहिए। हिंदी पत्रिकाओं की ये सूची मैंने क्षमा सहित इसी पते प्राप्त की है। ये अत्यंत उपयोगी हैं। इस दृष्टि से इसे यहां प्रसारित कर पा रहा हूं कि ये सरलता से मित्र परिवार की पहुंच में आ सकें।  डॉ. ज़ाकिर अली 'रजनीश' हिन्दी के एक चर्चित लेखक, बाल साहित्यकार, विज्ञान कथाकार, ब्लॉगर एवं पटकथाकार के रूप में जाने जाते हैं। उनकी रचनाएं हिन्दी की सभी प्रमुख पत्र-प‍त्र‍िकाओं में प्रकाशि‍त हो चुकी हैं। विभिन्न विधाओं के अन्तर्गत उन्होंने प्रभूत मात्राओं में लेखन कार्य किया है, जो 5 दर्जन से अधिक पुस्तकों के रूप में प्रकाश‍ित है। वे देश-विदेश के अनेकानेक पुरस्कारों एवं सम्मानों से समादृत हैं तथा विभ‍िन्न संदर्भ ग्रन्थों में सम्मान के साथ उनका उल्लेख किया गया है।
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ऑनलाइन हिन्‍दी साहित्यिक पत्रिकाएं
(Online Hindi Literature Magazines)
Aha Zindagi
अहा जिंदगी, मासिक
अर्गला  मासिक पत्रिका (Argalaa Magazine)
210, झेलम हॉस्टल, जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, नई दिल्ली-110067
अहा जिंदगी मासिक पत्रिका (Aha Zindagi Magazine)
6, द्वारिका सदन, प्रेस कॉम्‍प्‍लेक्‍स, एम0पी0 नगर, भोपाल-462011,
aha zindagi magazine in hindi, aha zindagi hindi magazine online,
आधारशिला मासिक पत्रिका (Adharshila Magazine)
सं.-दिवाकर भट्ट, बड़ी मुखानी, हल्‍द्वानी, नैनीताल- 263139, उत्‍तराखंड, ईमेल- adharshila.patrika@gmail.com
आह्वान द्वैमासिक पत्रिका (Ahwan Magazine)
बी-100, मुकुन्द विहार, करावल नगर, दिल्ली. ईमेल-ahwan@ahwanmag.com
ओशो टाइम्स (Osho Times Magazine)
ओशो इंटरनैशनल, 304, पार्क एवन्यू साउथ, स्वीट 608, न्यूयॉर्क, ऐन वाई 100010, ईमेल: osho-int@osho.com
कथाक्रम त्रै. पत्रिका (Katha Kram Magazine)
'स्‍वप्निका', डी-107, महानगर विस्‍तार, लखनऊ-226006, ईमेल- kathakrama@gmail.com
कथादेश मासिक पत्रिका (Kathadesh Magazine)
सहयात्रा प्रकाशन प्रा. लि., सी-52, जेड-3, दिलशाद गार्डेन, दिल्‍ली-110095
कथाबिम्‍ब (Katha Bimb Magazine)
ए-10 बसेरा, ऑफ दिन-क्वारी रोड, देवनार, मुंबई - 400088
कादम्बिनी मासिक पत्रिका (Kadambini Magazine) kadambini hindi magazine,
18-20, कस्‍तूरबा गांधी मार्ग, नई दिल्‍ली-110001, ईमेल-kadambini@livehindustan.com
गर्भनाल मासिक पत्रिका (Garbhnal Magazine)
DXE-23, मिनाल रेसीडेंसी, जे.के. रोड, भोपाल-462023, ईमेल-garbhanal@ymail.com
तद्भव अनियतकालीन साहित्यिक पत्रिका (Tadbhav Magazine)
सं.-अखिलेश, 18/271, इंदिरा नगर, लखनऊ-226016
दृष्टिपात मासिक पत्रिका (Drishtipat Magazine)
जे.एफ., 8/9, हरमू आवासीय कालोनी, रांची-834002, ईमेल- drishtipathindi@gmail.com
नवनीत मासिक पत्रिका (Navneet Magazine)
भारतीय विद्या भवन (Bhartiya Vidya Bhavan), 20, म0 मुंशी रोड, मुम्‍बई-400007, ईमेल- navneet.hindi@gmail.com
पहल त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका (Pahel Magazine)
101, रामनगर, आधारताल, जबलपुर-482004 (मoप्रo)
परिकल्‍पना समय मासिक पत्रिका (Parikalpana Samay Magazine)
सं.-रवींद्र प्रभात, एन-1/107, सेक्‍टर एन-1, संगम होटल के पीछे, अलीगंज, लखनऊ-226022, ईमेल- parikalpana.samay@gmail.com
प्रगतिशील वसुधा द्वैमासिक साहित्यिक पत्रिका (Pragatishil Vasudha Magazine)
मायाराम सुरजन स्मृति भवन, शास्त्री नागर, पी एंड ती चौराहा, भोपाल- 462003
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संपादक सरन घई, विश्व हिन्दी संस्थान (Vishva Hindi Sansthan), 49 Maple Valley St, Brampton, Ontario, L6P 2E8, Canada, ईमेल- vishvahindi@gmail.com
पाखी मासिक साहित्यिक पत्रिका (Pakhi Magazine)
बी-107, सेक्टर-63, नोएडा, गौतमबुद्ध नगर-201303, उ.प्र., ईमेल- pakhi@pakhi.in
मधुमती मासिक साहित्यिक पत्रिका (Madhumati Magazine)
Hans Hindi Masik Patrika
हंस, मासिक पत्रिका
राजस्‍थान साहित्‍य अकादमी (Rajasthan Sahitya Academy), सेक्‍टर-4, हिरण मगरी, उदयपुर-313002, ईमेल- sahityaacademy@yahoo.in
योजना मासिक पत्रिका (Yojana Hindi Magazine)
योजना भवन, संसद मार्ग, नई दिल्‍ली-110001, ईमेल-yojanahindi@gmail.com
लमही त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका (Lamhi Magazine)
सं.-विजय राय, 3/343, विवेक खण्‍ड, गोमती नगर, लखनऊ-226010 उ.प्र., ईमेल-vijairai.lamahi@gmail.com
लोक संघर्ष मासिक पत्रिका (Lok Shangharsha Magazine)
सं.-रणधीर सिंह सुमन,  निकट डीवीएस स्‍कूल, लखपेड़ाबाग, बारबंकी-225001, उ.प्र.,  ईमेल-loksangharsha@gmail.com
वर्तमान साहित्‍य मासिक (Vartman Sahitya Magazine)
यतेन्‍द्र सागर, प्रथम तल, 1-2, मुकुंद नगर, हापुड़ रोड, गाजियाबाद-201001, ईमेल-info@vartmansahitya.com
वसुधा अंतर्राष्ट्रीय हिंदी पत्रिका (Vasudha International Magazine)
Sneh Thakore, 16 Revlis Crescent, Toronto, Ontario, M1V 1E9,  Canada, E-mail- sneh.thakore@rogers.com
विश्वा अंतर्राष्ट्रीय हिंदी पत्रिका (Vishwa International Magazine)
International Hindi Association (अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी समिति),  3477 Hunting Run Road, Medina, OH 44256, USA, E-mail- vishwa@hindi.org
वागर्थ साहित्यिक पत्रिका (Vagarth Magazine), vagarth hindi magazine
भारतीय भाषा परिषद (Bahartiya Bhasha Parishad), 36 ए, शेक्‍सपियर सरणी, कलकत्‍ता-700017
संस्‍कृति अर्धवाषिक पत्रिका (Sanskriti Magazine)
केन्‍द्रीय सचिवालय ग्रंथागार, द्वितीय तल, शास्‍त्री भवन, डॉ. राजेन्‍द्र प्रसाद मार्ग, नई दिल्‍ली-110001, ईमेल- editorsanskriti@gmail.com
साहित्‍य अम़ृत मासिक साहित्यिक पत्रिका (Sahitya Amrit Magazine)
4/19, आसफ अली रोड, नई दिल्‍ली-110002, ईमेल- sahityaamrit@gmail.com
स्रवंति द्विभाषी साहित्यिक मासिक (Srawanti Magazine)
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा (Dakshin Bharat Hindi Prachar Sabha-Andhra), खैरताबाद, हैदराबाद-500004, ईमेल- neerajagkonda@gmail.com
शैक्षणि‍क संदर्भ द्वैमासिक पत्रिका (Saikchhanik Sandarbh Magazine)
ई-10, शंकर नगर, बी.डी.ए. कालोनी, शिवाजी नगर, भोपाल-2671017
शिक्षा विमर्श  द्वैमासिक पत्रिका (Sikchha Vimarsh Magazine)
दिगंतर शिक्षा एवं खेलकूद समिति (Digantar Shiksha Evam Khelkud Samiti), टोडी रमजानीपुरा, खो नगोरियां रोड, जगतपुरा, जयपुर-302017, ईमेल- shikshavimarsh@gmail.com
हरिगंधा मासिक पत्रिका (Harigandha Magazine)
हरियाणा ग्रन्‍थ अकादमी (Haryana Sahitya Akademi), पी-16, सेक्‍टर-14, पंचकूला-134113, ईमेल- hrgnthakd@gmail.com
हंस मासिक पत्रिका (Hans Magazine) hans patrika, hans hindi magazine,
2/36, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली-110002, ईमेल- info@hansmonthly.in
हिंदी चेतना त्रैमासिक पत्रिका (Hindi Chetna International Magazine)
Hindi Pracharini Sabha, 6, Larksmere Court, Markham, Ontario, L3R 3R1, Canada, E-mail- hindichetna@yahoo.ca

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अकार प्रकाशन, 15/269, सिविल लाइंस, कानपुर-208001, उ.प्र.
अनुकृति त्रैमासिक पत्रिका (Anukriti Magazine)
सं.-जयश्री शर्मा, 11 क 6, ज्योति नगर, सहकार मार्ग, जयपुर-302006, राजस्थान
अन्यथा त्रैमासिक पत्रिका (Anyatha Magazine)
सं.-कृष्ण किशोर, 2035, फेज़-1, अरबन इस्टेट डुगरी, लुधियाना-141013, पंजाब
अवध अर्चना मासिक पत्रिका (Avadh Archana Magazine)
19, अश्फाक उल्लाह कॉलोनी, फैजाबाद, उ.प्र.
अक्षरम संगोष्ठी द्वैमासिक पत्रिका (Akshram Sangoshthi Magazine)
सं0- नरेश शांडिल्य, एम-5, मंसाराम पार्क, संडेबाजार रोड, उत्तम नगर, नई दिल्ली-110059, ईमेल- aksharamsangoshthi@gmail.com
अक्षरा द्वैमासिक पत्रिका (Akshra Magazine)
मध्‍य प्रदेश राष्‍ट्रभाषा प्रचार समिति, हिन्‍दी भवन, श्‍यामला हिल्‍स, भोपाल-462002, ईमेल- hindibhawan.2009@rediffmail.com
आजकल मासिक साहित्यिक पत्रिका (Aajkal Magazine)
प्रकाशन विभाग, सीजीओ कॉम्‍लेक्‍स, लोधी रोड, नई दिल्‍ली-110003
आधुनिक साहित्य त्रैमासिक द्विभाषी पत्रिका (Aadhunik Sahitya Bilingual Magazine) एडी-94-डी, शालीमार बाग,  दिल्ली-110088, ईमेल- vishwahindisahityaparishad@gmail.com
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राजकमल प्रकाशन, 1-बी, नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली-110002
इंद्रप्रस्‍थ भारती त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका (Indraprasth Bharti Magazine)
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कथा समय मासिक पत्रिका (Katha Samay Magazine)
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विद्या भवन, शिक्षा संदर्भ केन्द्र, वि.भ.सोसायटी परिसर, मोहन सिंह मेहता मार्ग,फतहपुरा,उदयपुर (राजस्थान) 313001 फोन-0294-2451497,  ईमेल: vbs.khoja@gmail.com
गगनांचल द्वैमासिक पत्रिका (Gagnanchal Magazine)
भारतीय सांस्‍कृतिक सम्‍बंध परिषद (Indian Council for Cultural Relations), आजाद भवन, इंद्रप्रस्‍थ एस्‍टेट, नई दिल्‍ली-110002, ईमेल-iccr@vsnl.net
गवेष्‍णा त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका (Gaveshna Magazine)
केन्‍द्रीय हिन्‍दी संस्‍थान, हिंदी संस्‍थान मार्ग, आगरा-282005, उ.प्र.
ग्राम्‍य संदेश मासिक पत्रिका (Gramya Sandesh Magazine)
बी.-1/207, निराला नगर, लखनऊ-206020, ईमेल- gramyasandesh@gmail.com
दलित साहित्‍य मासिक साहित्यिक पत्रिका (Dalit Sahitya Magazine)
सं.-जयप्रकाश कर्दम, बी-634, डीडीए लैट्स, ईस्ट ऑफ लोदी रोड, दिल्ली-110093
दस्‍तावेज़ त्रैमासिक पत्रिका (Dastavez Magazine)Dastavej Magazine Ed.-Vishvanath Prasad Tiwari
सं.-विश्‍वनाथ प्रसाद तिवारी, बेतियाहाता, गोरखपुर-273001
द्वीप लहरी मासिक पत्रिका (Dweep Lahri Magazine)
हिन्‍दी साहित्‍य कला परिषद, अण्‍डमान निकोबाद द्वीप समूह, पोर्टब्‍लेयर-744101
दृश्‍यांतर मासिक पत्रिका (Drishyantar Magazine)
सं.-अजित राय, दूरदर्शन महानिदेशालय, कमरा नं. 1027, बी विंग, कोपरनिकस मार्ग, नई दिल्‍ली-110001, ईमेल- drishyantardd@gmail.com
धर्मयुग मासिक साहित्यिक पत्रिका (Dharmayug Magazine)
पी0ओ0 बॉक्‍स-213, टाइम्‍स इंडिया बिल्डिंग, मुम्‍बई-400001 (पत्रिका का प्रकाशन बंद है)
नटरंग साहित्यिक पत्रिका (Natrang Magazine)
सं.-अशोक वाजपेयी, बी-31, स्वास्थ्य विहार, विकास मार्ग, दिल्ली-1100092
नया ज्ञानोदय मासिक साहित्यिक पत्रिका (Naya Gyanodaya Magazine)
भारतीय ज्ञानपीठ (Bhartiya Jnanpith), 18, इंस्‍टीट्यूशनल एरिया, लोदी रोड, पोस्‍ट बॉक्‍स-3113, नई दिल्‍ली-110003 ईमेल- jananpith@satyam.net.in
परिकथा साहित्यिक पत्रिका (Parikatha Magazine)
25, बेसमेंट, फेज-ट, इरोज़ गार्डन, सूरजकुंड रोड, नई दिल्ली-110044
परिवेश साहित्यिक पत्रिका (Parivesh Magazine)
सं.-मूलचंद गौतम, शक्तिनगर, चंदौसी, मुरादाबाद-202412, उ.प्र.
पुरवाई अन्तर्राष्ट्रीय त्रैमासिक पत्रिका (Purvai International Magazine)
U.K. Hindi Samiti (यू.के. हिंदी समिति), 130, Pavilion Way, Ruislip Middlesex HA4 9JP, U.K., E-mail- hindisamiti@hotmail.com
प्रारम्‍भ शैक्षिक संवाद त्रैमासिक शैक्षिक पत्रिका (Prarambh Shaikshik Samvad)
बी-1/84, सेक्‍टर-बी, अलीगंज, लखनऊ-226024
बहुवचन त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका (Bahuvachan Magazine)
महात्‍मा गांधी अंतर्राष्‍ट्रीय हिन्‍दी विश्‍वविद्यालय, पो.बा. नं. 16, पंचटीला, वर्धा-442001, महाराष्ट्र
भारतीय रेल मासिक पत्रिका (Bhartiya Rail Magazine)
कमरा नं0 209, रेल भवन, रायसीना रोड, नई दिल्‍ली-110001, ईमेल- editorbhartiyarail@gmail.com
भाषा त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका (Bhasha Magazine)
केन्‍द्रीय हिन्‍दी निदेशालय, उच्‍चतर शिक्षा विभाग, मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार, पश्चिमी खण्‍ड-7, रामकृष्‍ण पुरम, नई दिल्‍ली-110066, फोन- 011-23817823/9689, ईमेल- acop-dep@nic.in, pub,dep@nic.in
मीडिया त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका (Media Magazine)
केन्‍द्रीय हिन्‍दी संस्‍थान, हिंदी संस्‍थान मार्ग, आगरा-282005, उ.प्र.
यू.एस.एम. पत्रिका मासिक (USM Patrika Magazine)
695, न्‍यू कोट गांव, जी.टी. रोड, गाजियाबाद-201009, ईमेल- usm_patrika@yahoo.co.in
राजभाषा भारती त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका (Rajbhasha Bharti Magazine)
राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय, लोकनायक भवन (द्वितीय तल), खान मार्केट, नई दिल्‍ली-110003, ईमेल- patrika-ol@nic.in
रंगकर्म मासिक (Rangkarma Magazine)
सं.-उषा आठले, आठले हाउस, सिविल लाइंस, दरोगा पारा, रायगढ़, छतीसगढ़
रंगवार्ता मासिक रंगमंच पत्रिका (Rang Varta Magazine) प्यारा केरकेट्टा फाउंडेशन, चैशायर होम रोड, बरियाटु, रांची—834003, झारखंड, ईमेल- rangvarta@gmail.com
विपाशा द्वैमासिक (Vipasha Magazine)
भाषा एवं संस्कृति विभाग, हिमाचल प्रदेश, 39, SDA, शिमला-171009
व्‍यंग्‍य यात्रा त्रैमासिक (Vyangya Yatra Magazine)
सं.-प्रेम जनमेजय, 73, साक्षर अपार्टमेन्‍ट, ए-3, पश्चिम विहार, नई दिल्ली-110063
समकालीन भारतीय साहित्‍य द्वैमासिक पत्रिका  (Samakalin Bhartiya Sahitya Magazine)
सचिव, साहित्‍य अकादेमी (Sahitya Akademi), रवीन्‍द्र भवन, 35, फिरोजशाह मार्ग, नई दिल्‍ली-110001
समकालीन सरोकार मासिक (Samakalin Sarokar Magazine)
विनीत प्‍लाज़ा, फ्लैट नं0 01, विनीत खण्‍ड-6, गोमती नगर, लखनऊ-226010, ईमेल- samaysarokar@gmail.com
सम्‍मेलन पत्रिका शोध त्रैमासिक (Sammelan Patrika Magazine)
प्रधानमंत्री, हिन्‍दी साहित्‍य सम्‍मेलन, प्रयाग (Hindi Sahitya Sammelan, Prayag), 12, सम्‍मेलन मार्ग, इलाहाबाद-211001, उ.प्र.
समाज कल्‍याण मासिक साहित्यिक पत्रिका (Samaj Kalyan Magazine)
डॉ. दुर्गाबाई देशमुख समाज कल्याण भवन, बी-12, कुतुब इंस्टीट्यूशनल एरिया, नई दिल्ली-110603
समीक्षा त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका (Samiksha Magazine)
सं.-गोपालराय, हरदयाल, एच-2, यमुना, इंदिरा मांधी राष्‍ट्रीय मुक्‍त विश्वविद्यालय, मैदानगढ़ी, नई दिल्ली-110068
सरस सलिल मासिक पत्रिका (Saras Salil Magazine)
दिल्‍ली प्रेस भवन, ई-3, झंडेवाला एस्‍टेट, रानी झॉंसी मार्ग, नई दिल्‍ली-110055, ई-मेल- article.hindi@delhipress.in
सरिता पाक्षिक पत्रिका (Sarita Magazine)
संपादकीय कार्यालय (Editorial Add.): दिल्‍ली प्रेस भवन, ई-3, झंडेवाला एस्‍टेट, रानी झॉंसी मार्ग, नई दिल्‍ली-110055, ई-मेल- article.hindi@delhipress.in
संधान मासिक साहित्यिक पत्रिका (Sandhan Magazine)
सं.-सुभाष गाताडे, बी-2/51, रोहिणी, सेक्टर-16, दिल्ली-110085
साहित्‍य भारती त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका (Sahitya Bharti Magazine)
उत्‍तर प्रदेश हिन्‍दी संस्‍थान, 6 महात्‍मा गांधी मार्ग, हजरतगंज, लखनऊ-226001
साक्षात्‍कार मासिक साहित्यिक पत्रिका (Sakchhatkar  Magazine)
सं.-त्रिभुवननाथ शुक्‍ल, मुल्‍ला रमूजी संस्‍कति भवन, बाणगंगा, भोपाल-462003
सृजनपथ मासिक साहित्यिक पत्रिका (Srijanpath Magazine)
सं.-रंजना श्रीवास्तव, श्रीपल्ली, गली नं. 2, तीन बत्ती मोड़ के पास, पो.आ.- सिलीगुड़ी बाजार, जलपाईगुड़ी-734405
शेष त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका (Sesh Magazine)
सं.-हसन जमाल, पन्ना निवास, साइकिल मार्केट के पास, लोहारपुरा, जोधपुर-342002, राजस्थान
शिक्षा साहित्‍य अर्धवार्षिक पत्रिका (Shiksha Sahitya Educational Magazine)
भारतीय शिक्षा विकास संस्‍थानम, 2/5/206, शास्‍त्री नगर, फैजाबाद-224001, उ.प्र.
शीराज़ हिंदी त्रैमासिक पत्रिका (Shiraz Hindi Magazine)Shiraj Hindi Magazine
जम्‍मू कश्‍मीर कला, संस्‍कृति एवं भाषा अकादमी (Jammu & Kashmir Academy of Art, Culture and Languages), जम्‍मू-180001
शैक्षिक पलाश त्रैमासिक शैक्षिक पत्रिका (Shaikshik Palash Educational Magazine)
राज्‍य शिक्षा केन्‍द्र, बी-विंग, पुस्‍तक भवन, अरेरा हिल्‍स, भोपाल-462011
हिन्‍दुस्‍तानी त्रैमासिक पत्रिका (Hindustani Magazine)
हिन्‍दुस्‍तानी एकेडेमी (Hindustani Academi), 12 डी, कमला नेहरू मार्ग, इलाहाबाद-211001, उ.प्र. ईमेल- hindustanyacademy@gmail.com, kalyan magazine
India Tuday Hindi Patrika
इंडिया टुडे, पाक्षिक पत्रिका

ऑनलाइन समसामयिक पत्रिकाएं 
(Online Hindi News Magazines)
इन डॉट कॉम (in.Com Hindi News Portal)
इंडिया टुडे (India Today Hindi News Portal) India Tuday Maagazine
गूगल समाचार (Googal Samachar Hindi News Portal)
तहलका (Tahelka Hindi News Portal) tahelka magazine
प्रभासाक्षी (Prabhasakshi Hindi News Portal)
प्रवासी दुनिया (Pravasi Duniya Hindi News Portal)
बीबीसी हिन्दी (BBC Hindi Hindi News Portal)
रविवार (Raviwar Hindi News Portal) Raviwar Magazine
वेब दुनिया (Web Duniya Hindi News Portal)
शुक्रवार (Shukrawar Hindi News Portal) shukrawar magazine
IBN खबर (IBN Khabar Hindi News Channel)
P7 न्‍यूज़ (P7 News Hindi News Channel)
NDTV खबर (एनडीटीवी Khabar Hindi News Channel)
आज तक (Aaj Tak News Channel Hindi News Channel)

ऑनलाइन वित्‍त (फाइनैंशियल) पत्रिकाएं 
(Online Hindi Financial Magazines) 
इकनॉमिक टाइम्स (Iconomic Times Financial Hindi Magazine)
नफा नुकसान (Nafa Nuksan Financial Hindi Magazine)
बिजनेस भास्कर (Business Bhaskar Financial Hindi Magazine)
बिजनेस खास खबर (Business Khas Khabar Financial Hindi Magazine)
मोल-तोल  (Mol Tol Financial Hindi Magazine)
मनी मंत्र (Money Mantra Financial Hindi Magazine)
Filmi Kaliyan Hindi Film Patrika

 ऑनलाइन/ऑफलाइन हिन्‍दी फिल्‍मी पत्रिकाएं 
(Online/Ofline Hindi Film Magazines)
चित्रलेखा मासिक फिल्‍म पत्रिका  (Chitralekha Magazine)
94, बनारसीदास एस्‍टेट, तिमारपुर (निकट माल रोड), दिल्‍ली-110004
फिल्‍मी कलियां फिल्‍म पत्रिका (Filmi Kaliyan Magazine)
4675/21, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्‍ली-110002
फिल्‍मी दुनिया मासिक पत्रिका (Filmi Duniya Magazine)
16, दरियागंज, नई दिल्‍ली-110002
Vigyan Pragati Hindi Vigyan Patrika

ऑनलाइन/ऑफलाइन हिन्‍दी विज्ञान पत्रिकाएं   
(Online/Ofline Hindi Science Magazines)
आई.सी.एम.आर. विज्ञान पत्रिका (ICMR Vigyan Patrika Magazine)
इंडियन काउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च (Indian Council of Medical Research), पी.ओ. बॉक्‍स नं. 4911, अंसारी नगर, नई दिल्‍ली-110029, ईमेल- headquarters@icmr.org.in
आविष्‍कार विज्ञान पत्रिका (Avishkar Magazine)
नेशनल रिसर्च डेवलेपमेंट कार्पोरेशन (National Research Development Corporation), 20-22, जमरूदपुर सामुदायिक केन्‍द्र, कैलाश कॉलोनी एक्‍सटेंशन, नई दिल्‍ली-48
इलेक्ट्रॉनिकी आपके लिए मासिक विज्ञान पत्रिका (Electroniki Aapke Liye Magazine)
स्‍कोप कैम्‍पस, एन.एच.-12, होशंगाबाद रोड, भोपाल, म.प्र., ईमेल- electroniki@electroniki.com
जल चेतना मासिक विज्ञान पत्रिका (Jal Chetna Magazine)
राष्‍ट्रीय जल विज्ञान संस्‍थान (National Institute of Hydrology), जल विज्ञान भवन, रूड़की-247667, ईमेल- rama@nih.ernet.in
ड्रीम 2047 मासिक विज्ञान पत्रिका (Dream 2047 Magazine)
विज्ञान प्रसार, सी-24, कुतुब इंस्‍टीट्यूशनल एरिया, नई दिल्‍ली-दिल्‍ली-110016, ईमेल- info@vigyanprasar.gov.in
दुधवा लाइव मासिक पर्यावरण पत्रिका (Dudhva Live Science Portal)
77, कैनाल रोड, शिव कालोनी, लखीमपुर खीरी- 262701, उ.प्र., ईमेल- editor.dudhwalive@gmail.com
पर्यावरण डाइजेस्‍ट मासिक पर्यावरण पत्रिका (Paryavaran Digest Magazine)
डॉ. खुशाल सिंह पुरोहित, 19 पत्रकार कॉलोनी, रतलाम , मप्र 457001, ईमेल- kspurohit@rediffmail.com
पैदावार मासिक कृषि पत्रिका (Paidawar Agriculture Magazine)
इमेज मीडिया ग्रुप, 518, हिंद नगर चौराहा, पुरानी चुंगी, कानपुर रोड, लखनऊ-226012, ईमेल- paidawar@gmail.com
फार्म-एन-फूड मासिक कृषि पत्रिका (Farm N Food Agriculture Magazine)
दिल्‍ली प्रेस भवन, ई-3, झंडेवाला एस्‍टेट, रानी झॉंसी मार्ग, नई दिल्‍ली-110055, ई-मेल- aditor@delhipress.in
विज्ञान मासिक विज्ञान पत्रिका (Vigyan Magazine)
डॉ. शिवगोपाल मिश्र, विज्ञान परिषद प्रयाग (Vigyan Parishad Prayag), महर्षि दयानंद मार्ग, इलाहाबाद-211002, ईमेल- vijnanaparishad_prayag@rediffmail.com
विज्ञान आपके लिए त्रैमासिक विज्ञान पत्रिका (Vigyan Apke Liye Magazine)
सं.-ओउम प्रकाश शर्मा, लोक विज्ञान परिषद (Lok Vigyan Parishad), बी-18, डिवाइन पार्क व्‍यू अपार्टमेंट, अभय खंड-3, इंदिरापुरम, गाजियाबाद-201012, ईमेल- vigyan4u@hotmail.com
विज्ञान कथा त्रैमासिक पत्रिका (Vigyan Katha Science fiction Magazine)
डॉ. राजीव रंजन उपाध्‍याय, भारतीय विज्ञान कथा लेखक समिति (Bhartiya Vigyan Katha Lekhak Samiti), परिसर कोठी काकेबाबू, देवकाली मार्ग, फैजाबाद-224001, ईमेल- rajeevranjan.fzd@gmail.com
विज्ञान गरिमा सिंधु विज्ञान पत्रिका (Vigyan Garima Sindhu Magazine)
विज्ञान एवं तकनीकी शब्‍दावली आयोग (Commission for Scientific and Technical Terminology), केन्‍द्रीय हिन्‍दी निदेशालय, पश्चिमी खण्‍ड-7, रामकृष्‍ण पुरम, नई दिल्‍ली
विज्ञान प्रगति मासिक विज्ञान पत्रिका (Vigyan Pragati Magazine), vigyan pragati magazine in hindi,
सी.एस.आई.आर. (Council of Scientific and Industrial Research (CSIR), डॉ. के.एस. कृष्‍णन मार्ग, नई दिल्‍ली-110012, ईमेल- vp@niscair.res.in
स्रोत मासिक  पत्रिका (Srote Magazine)
ई-10, शंकर नगर, बी.डी.ए. कालोनी, शिवाजी नगर, भोपाल-2671017, ईमेल- srote@eklavya.in
हरियाणा साइंस बुलेटिन मासिक विज्ञान पत्रिका (Haryana Science Bulletin Magazine) 509, सेक्‍टर-16 डी0, चंडीगढ़-160015, हरियाणा।
हमारा भूमंडल मासिक विज्ञान पत्रिका (Hamara Bhumandal Magazine)
30, सेक्‍टर-13, अर्बन स्‍टेट, कुरूक्षेत्र- 136118, ईमेल- janshaktingo@gmail.com
Nirogdham Patrika, Yauvan Visheshank

ऑनलाइन/ऑफलाइन हिन्‍दी स्‍वास्‍थ्‍य पत्रिकाएं
(Online/Ofline Hindi Health Magazines) 
अक्षय जीवन मासिक स्‍वास्‍थ्‍य पत्रिका (Akshyay Jeevan Magazine)
39 बी, रूआबांधा सेक्‍टर, भिलाई, दुर्ग-490006, छत्‍तीसगढ़, ईमेल- info@akshyajeevan.com
आरोग्‍यधाम मासिक स्‍वास्‍थ्‍य पत्रिका (Arogyadham Magazine)
आर्य समाज रोड, मुजफ्फर नगर-251001, उ.प्र., ईमेल- arogyadhammzn@yahoo.com
आयुर्वेद विकास मासिक स्‍वास्‍थ्‍य पत्रिका (Ayurved Vikas Magazine)
डॉबर इंडिया लि., डॉबर टॉवर, कौशाम्‍बी, साहिबाबाद, गाजियाबाद-201010, उ.प्र., ईमेल-ayurvedvikas@dabur.com
आरोग्‍य संजीवनी मासिक स्‍वास्‍थ्‍य पत्रिका (Arogya Sanjivani Magazine)
पायोनियर बुक कं. प्रा.लि., सी-14, रॉयल इंडस्ट्रियल एस्‍टेट, 5 बी, नयागांव क्रॉस रोड, वडाला, मुम्‍बई-400031
ओनली माई हेल्‍थ ऑनलाइन स्‍वास्‍थ्‍य पोर्टल (Only My Health Online Health Portal)
  nirogdham hindi ayurvedic agazine
निरोगधाम मासिक स्‍वास्‍थ्‍य पत्रिका (Nirogdham Magazine)
डी-1, एच.आई.जी. कालोनी, ए.बी. रोड, इंदौर-452008, म.प्र.
nirogdham patrika hindi magazine
निरोग ऑनलाइन स्‍वास्‍थ्‍य पोर्टल (Nirog Online Health Portal)
निरोग सुख मासिक स्‍वास्‍थ्‍य पत्रिका (Nirog Sukh Magazine)
एस-8, द्वारिका, सेन्‍ट्रल स्‍पाईन, विद्याधर नगर, जयपुर-302023, ईमेल-nirogsukh@live.in
मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य मासिक स्‍वास्‍थ्‍य पत्रिका (Mansik Swasthya Magazine)
सुजीवन मासिक स्‍वास्‍थ्‍य पत्रिका (Sujivan Magazine)
ए-7, कॉमर्शियल कॉम्‍प्‍लेक्‍स, डॉ. मुखर्जी नगर, दिल्‍ली-110009, ईमेल- naisadiprakashan@gmail.com
स्‍वास्‍थ्‍य स्‍वास्‍थ्‍य पत्रिका (Swasthya Magazine)
स्वास्‍थ्‍य रक्षक मासिक स्‍वास्‍थ्‍य पत्रिका (Swasthya Rakshak Magazine)
204-205, ब्‍लॉक-बी, द्यितीय तल, प्‍लॉट नं.-11, दुर्गा कॉम्‍प्‍लेक्‍स, एस.एल.सी. बिल्डिंग, मयूर विहार, फेस-2, नई दिल्‍ली-110092, ईमेल-swasthayarakshak@gmail.com
स्वास्‍थ्‍य वाटिका मासिक स्‍वास्‍थ्‍य पत्रिका (Swasthya Vatika Magazine)
जीकुमार प्रकाशन, 238, नारा रोड, जरी पटका, नागपुर-14, महाराष्‍ट्र, ईमेल-gkumararogyadham@yahoo.co.in
हर्बल हेल्‍थ द्वैमासिक स्‍वास्‍थ्‍य पत्रिका (Herbal Health Magazine)
राही ग्रामीण विकास एवं शोध संस्‍थान, पावन हर्बल, महाराणा प्रताप चौक, व्‍यापार विहार रोड, बिलासपुर-495001, छत्‍तीसगढ़, ईमेल-rahi.india@gmail.com
Bindiya Mahila Patrika

ऑनलाइन/ऑफलाइन हिन्‍दी महिला पत्रिकाएं
(Online/Ofline Hindi Magazines for Women)
आपकी सहेली (Aapki Saheli Online Magazine)
बिंदिया मासिक पत्रिका (Bindiya Magazine)
के—25, पर्ल्‍स प्लाजा, सेक्टर—18, नोएडा—201301, उत्तर प्रदेश
मेरी सहेली मासिक पत्रिका (Meri Saheli Magazine) meri saheli magazine in hindi
पायोनियर बुक कं0 प्रा0 लि0, सी-14, रॉयल इंडस्ट्रियल एस्‍टेट, 5-बी, नयागांव क्रॉस रोड, वड़ाला, मुम्‍बई-400031, meri saheli hindi magazine, meri saheli magazine free download, saheli magazine, meri saheli magazine in hindi,  hindi magazine meri saheli
मनोरमा मासिक (Manorama Magazine)
मित्र प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड, मुट्ठीगंज, इलाहाबाद, उत्‍तर प्रदेश
गृहलक्ष्‍मी मासिक पत्रिका (Grih Lakshmi Magazine)
के-45, जंगपुरा एक्‍सटेंशन, नई दिल्‍ली-110014
गृहशोभा मासिक पत्रिका (Grihshobha Magazine)
दिल्‍ली प्रेस भवन, ई-3, झंडेवाला एस्‍टेट, रानी झॉंसी मार्ग, नई दिल्‍ली-110055, ई-मेल- article.hindi@delhipress.in
महकता आंचल मासिक पत्रिका (Mahakta Aanchal Magazine)
जे-17, जंगपुरा एक्‍सटेंशन, नई दिल्‍ली-110014
वनिता मासिक पत्रिका (Vanita Magazine)vvanita hindi magazine
वुमेन ऑन टॉप मासिक पत्रिका (Women On Top Magazine)
दिशा भारती मीडिया प्रा.लि., ए-96, सेक्‍टर-65, 1 नोएडा-20130, ईमेल- info@dishabharti.com
सखी मासिक पत्रिका (Jagran Sakhi Magazine)   sakhi hindi magazine,
जागरण प्रकाशन लि., 2, सर्वोदय नगर, कानपुर-208005, ईमेल- jagrancorp@jagran.com
सुजाता मासिक पत्रिका (Sujata Magazine)   sakhi hindi magazine,
104/2, माधवपुरम, मेरठ-250002, ईमेल- editor@sujataonline.com
सुषमा मासिक पत्रिका (Sushma Magazine)
13/14, आसफ अली रोड, नई दिल्‍ली-110002

Devputra Hindi Children Magazine
ऑनलाइन/ऑफलाइन हिन्‍दी बाल पत्रिकाएं 
(Online/Ofline Hindi Kids Magazines)
अभिनव बालमन मासिक बाल पत्रिका (Chakmak Magazine)
17/239, ज़ेड, 13/59, पंचनगरी, अलीगढ़- 202001, उ.प्र., ईमेल- abhinavbalmann@gmail.com
गुल्‍लक त्रैमासिक बाल पत्रिका (Gullak Magazine)
सं.-गुरबचन सिंह, पुस्‍तकालय कक्ष, राज्‍य शिक्षा केन्‍द्र, बी-विंग, पुस्‍तक भवन, अरेरा हिल्‍स, भोपाल-462011, ईमेल-gurbachan_55@yahoo.co.in
चकमक मासिक बाल पत्रिका (Chakmak Magazine)
ई-10, शंकर नगर, बीडीए कॉलोनी, शिवाजी नगर, भोपाल-462016, ईमेल- chakmak@eklavya.in
चंदामामा मासिक बाल पत्रिका (Chandamama Magazine)
ऑफिस बी-3, लुनिक  इंडस्‍ट्रीज, क्रास रोड ‘बी’, एम.आई.दी.सी., अँधेरी (ईस्ट), मुंबई-400093, ईमेल- chandamama@chandamama.com
चंपक मासिक बाल पत्रिका (Champak Magazine)
दिल्‍ली प्रेस भवन, ई-3, झंडेवाला एस्‍टेट, रानी झॉंसी मार्ग, नई दिल्‍ली-110055, ई-मेल- article.hindi@delhipress.in
टिंकल मासिक बाल पत्रिका (Tinkle Magazine)
14, मरथानडा, 84, एनी बेसेंट रोड, वर्ली, मुम्‍बई-400018, ईमेल- tinklesubscription@ack-media.com
पाठक मंच बुलेटिन मासिक बाल पत्रिका (Readers' Club Bulletin Magazine)
राष्‍ट्रीय बाल साहित्‍य केन्‍द्र, नेशनल बुक ट्रस्‍ट, नेहरू भवन, 5, इंस्‍टीट्यूशनल एरिया, फेस-2, वसंत कुंज, नई दिल्‍ली-110070
देवपुत्र मासिक बाल पत्रिका (Devputra Magazine)
40, संवाद नगर, इंदौर-452001 (मध्‍य प्रदेश), ईमेल- devputraindore@gmail.com
नंदन मासिक बाल पत्रिका (Nandan Magazine)
Champak Hindi  Children Magazine
चंपक, बाल पत्रिका
हिंदुस्‍तान टाइम्‍स हाउस, 18-20, कस्‍तूरबा गॉंधी मार्ग, नई दिल्‍ली-10001, ईमेल- nandan@livehindustan.com
नन्हे सम्राट पत्रिका (Nanhe Samrat Magazine)
अ-6/1, मायापुरी, फेस-1, नई दिल्‍ली-110064, ईमेल- nanheysamrat@gmail.com
बचपन त्रैमासिक बाल पत्रिका (Bachpan Magazine)
राज्‍य शैक्षिक अनुसंधान परिषद, शंकर नगर, रायपुर, छत्‍तीसगढ़
बच्‍चों का देश मासिक बाल पत्रिका (Bachchon Ka Desh Magazine)
7, उषा कालोनी, जयपुर-302017, ईमेल- bachchon_ka_desh@yahoo.co.in
बाल प्रहरी त्रैमासिक बाल पत्रिका (Bal Prahari Magazine)
सं.-उदय किरौला, बाल साहित्‍य शोध एवं संवर्धन समिति, रानीखेत रोड, द्वाराहाट, अल्‍मोड़ा, उत्‍तराखण्‍ड, ईमेल- balprahri@gmail.com
बाल भारती मासिक बाल पत्रिका (Balbharti Magazine)  
प्रकाशन विभाग, सी.जी.ओ. कॉम्‍लेक्‍स, लोधी रोड, नई दिल्‍ली-110003, ईमेल- balbharti1948@gmail.com
बाल भास्‍कर (Bal Bhaskar Magazine)bal bhaskar magazine hindi
6, द्वारिका सदन, प्रेस कॉम्‍पलेक्‍स, एम0पी0 नगर, भोपाल-11
बाल वाटिका मासिक बाल पत्रिका (Balvatika Magazine)
नंद भवन, कावांखेड़ा पार्क, भीलवाड़ा-301001 (राजस्‍थान), ईमेल- balvatika96@gmail.com
बालसाहित्‍य समीक्षा मासिक बाल पत्रिका (Balsahitya Samiksha Magazine)
सं.-डॉ. राष्‍ट्रबंधु, 109/309, रामकृष्‍ण नगर, कानपुर-208012, ईमेल- rastrabandhu@gmail.com
बालमित्र त्रैमासिक बाल पत्रिका (Balmitra Magazine)
राज्‍य शैक्षिक अनुसंधान परिषद, शंकर नगर, रायपुर, छत्‍तीसगढ़
बालवाणी द्वैमासिक पत्रिका (Balvani Magazine)
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बालहंस पाक्षिक बाल पत्रिका (Balhans Magazine)
राजस्‍थान पत्रिका प्राइवेट लिमिडेट, केसरगढ़, नेहरू मार्ग, जयपुर-302004, ईमेल- balhans123@gmail.com
लोटपोट पाक्षिक बाल पत्रिका (Lotpot Magazine)
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समझ झरोखा मासिक बाल पत्रिका (Samajh Jharokha Magazine)
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चकमक, बाल पत्रिका
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सुमन सौरभ मासिक बाल पत्रिका (Suman Saurabh Magazine)
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स्‍नेह मासिक बाल पत्रिका (Sneh Magazine)
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हंसती दुनिया मासिक बाल पत्रिका (Hansti Duniya Magazine)
संत निरंकारी कॉलोनी, दिल्‍ली-110009


Sunday, 22 February 2015

विदा वर्डबुक फेयर 2015

विश्व पुस्तक मेले से लौटा आज सुबह, मीडिया पर गंभीर वाद-संवाद, बधाईयों और उलाहनों, मित्रों की ढेर सारी मीठी स्मृतियों के साथ। बड़ी सूनी लग रही है आज की शाम।
वे आठ दिन, किताबों के मेले में साहित्यिक चर्चाओं, गोष्ठियों, उत्साही मित्र यशवंत सिंह की सामूहिक-सार्वजनिक टिप्पणियों, 'लेखक से मिलिए' रोजाना के कार्यक्रम में सुप्रसिद्ध कवि मंगलेश डबराल, कथाकार शिवमूर्ति, संजीव, नासिरा शर्मा, आलोक श्रीवास्तव, पत्रकार रवीश कुमार (‘इश्क़ में शहर होना’), राजकमल के स्टॉल पर जावेद अख्तर, गांधी शांति प्रतिष्ठान के स्व-प्रायोजित कार्यक्रम में पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी, प्रो.निर्मला जैन, आईआईएमसी के प्रोफेसर आनंद प्रधान, डॉ.वर्तिका नंदा, राज्यसभा टीवी के पत्रकार अरविंद कुमार सिंह, मशहूर जर्नलिस्ट मुकेश कुमार, गार्गी कालेज के अत्यंत हंसमुख और जागरूक प्रोफेसर श्रीनिवास त्यागी, नये आत्मीय साथी राजीव शर्मा, जालौन के वरिष्ठ पत्रकार साथी अनिल शर्मा, नेशनल बुक ट्रस्ट की पत्रिका के संपादक पंकज चतुर्वेदी, जनसत्ता-अमरउजाला आदि समाचारपत्रों में अपनी लेखनी का जलवा दिखाते रहे शंभुनाथ शुक्ल, युवा प्रकाशक शैलेश भारतवासी, युवा समीक्षक डॉ.गणेश शंकर श्रीवास्तव आदि की यादों का मेला, आज की शाम बहुत उदास कर रहा है। जैसे मन के मेले में अकेला-अकेला सा..
हर दिन शब्दों के नये नये युग्म जीता रहा, हिंद युग्म और वर्धा यूनिवर्सिटी के स्टॉल हमारे अड्डे बने रहे, कभी अशोक मिश्र, राकेश यादव तो कभी दिविक रमेश, उदभ्रांत, नित्यानंद तिवारी, कंवल भारती, अपनी धर्मपत्नी के साथ मीठे-मीठे मुस्कराते मिले प्रसिद्ध साहित्यकार रामदरश मिश्र। इसी दौरान मेरी कनिष्ठ पुत्री रंजना के संकलन 'कुल्हड़ में वोदका' के विमोचन। कई पुस्तकें खरीद लाया हूं, जिनमें सत्य व्यास का उपन्यास 'भारत टाकीज' सबसे अदभुत। अब अगली फरवरी तक वे दिन बहुरेंगे, तब तक जीवन पता नहीं कितने रंग, कितने रूप धर चुका होगा... वे पंक्तियां दुहराते हुए कि ...आओ अपनी-अपनी क़िस्मत बदलते हैं..
अपना गुज़रा हुआ कल अभी ज़्यादा पीछे नहीं गया है
फिर उसी सिफ़र से शुरू करते हैं

Wednesday, 11 February 2015

'आम आदमी पार्टी' की फतह के कड़वे सबक

गाल बाजे है तो बाजे है, बजाते रहिए।
हर्ज क्या है कि सच से आंख चुराते रहिए।

मोदी के मुंह की खाते ही झटपट गिरगिट की तरह रंग बदलने लगा धन-मीडिया। गुंडों के बल पर पार्टियां चलाने वाले सफेदपोश भी देखने लगे दिन बहुरने के सपने, जबकि देर-सवेर उन सबका भी दिल्ली जैसा हाल होना है। छपास रोगियों की भी कलम और जुबान के सुर बदले। और तो और, कथित वामपंथी भी कांग्रेस का हाथी मरते ही 'आप' से चिपक लिये, खुद के बूते का तो कुछ रहा नहीं।
बात लाख टके कि उस जीत का सिर्फ इतना भर सबक... समय बदल रहा है, लोग मुट्ठी तान रहे हैं। उन सब का लुढ़कना तय है, जो अवसरवादी है, जो दूसरो की बहादुरी पर अपनी पीठ थपथपाने वाले मनोरोगी हैं। अभी तो वो तूफान उठा ही नहीं है, जो गालबजाऊ पार्टियों के साथ केजरीवाल जैसे छद्म क्रांतिकारियों का कुनबा भी उड़ा ले जाएगा.... वह समय कभी तो आएगा..जरूर आएगा...क्योंकि सिर्फ ट्यूब की हवा निकालकर वायुमंडल खाली मान लेना केवल खुशफहमी होगी।
इस देश ने जेपी-क्रांति का हश्र देखा है, केजरी-क्रांति का भी देखेगा, वह आम आदमियों की पार्टी नहीं है, जो आम आदमी विरोधी आर्थिक नीतियों से आंखे चुराने लगती है और कमोबेश उन्हीं नाज-नखरों के वशीभूत है, जो बाकी सत्ताजीवी दिखाते हैं...

हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन
दिल को बहलाने को गालिब खयाल अच्छा है... 

Monday, 9 February 2015

किताबों की दुनिया

कोलटन का मानना था- सच्चे मित्र और अच्छी किताबों का साथ कभी नुकसान नहीं पहुंचाता। थोरो कहता था - पुराने कपड़े पहनो लेकिन किताबें नई खरीदो। ऐमी ब्रासन एलकार का कहना था - अच्छी पुस्तक वह है, जो आशा के साथ खोली जाए और लाभ के साथ बंद की जाए। टाल्स्टाय लिखते हैं- बुरी पुस्तकों का पढ़ना जहर पीने के समान है। फ्रांसिस बेकन की राय तो सबसे उम्दा और निराली - कुछ पुस्तकें रखने के लिए, कुछ परीक्षण के लिए, कुछ चबाने के लिए, कुछ खाने के लिए, कुछ निगलने के लिए तथा कुछ हजम करने के लिए होती हैं।

08 फरवरी 2015 को इलाहाबाद में पुस्तक-प्रकाशनोत्सव

'मीडिया हूं मैं' और 'क्लास रिपोर्टर' का विमोचन किया रवींद्र कालिया और ममता कालिया ने

Friday, 6 February 2015

मेरी पाठशाला (13) : जिनको, अक्सर पढ़ता रहता हूं

'महान चिंतक बेंजामिन जानते थे कि संस्कृति का सबसे रोचक खेल आधुनिक महानगरों में खेला जा रहा है। उन्होंने लिखा : 'कोई चेहरा इतना अतियथार्थवादी नहीं है, जितना कि एक शहर का चेहरा' यहाँ इच्छाओं और लालसाओं की एक भयावह मरीचिका रची गई है। मैं इलाहाबाद से भागा। बार बार दिल्ली, बंबई, कलकत्ते गया। मुझे वाल्टर बेंजामिन के बावजूद आज भी महानगरों से उम्मीद बनी हुई है क्योंकि इलाहाबाद से उम्मीद टूट गई है। वह मरियल बेचारा न गाँव है न कस्बा न शहर। उसकी श्रेणी ही पिघल गई है, भंग हो गई है। इलाहाबाद अपने पिछले रूप में न वापस आ सकता है और न नया रास्ता फोड़ सकता है।'
ये हैं ज्ञान रंजन, कहें तो 'पहल' वाले। उन्होंने पढ़ना यानी रचनात्मक यथार्थ की कई कई परतों में तिरते-उतरते जाना। फेन्स के इधर और उधर, यात्रा, मेरी प्रिय संपादित कहानियाँ, क्षणजीवी, सपना नहीं, प्रतिनिधि कहानियों और कबाड़खाना के रचनाकार और पहल (त्रैमासिक पत्रिका) के संपादक। उनका संस्मरणात्मक सृजन है तारामंडल के नीचे एक आवारागर्द।

और ये है - तारामंडल के नीचे एक आवारागर्द की पंक्तियां

'' इलाहाबाद की यात्रा में जिस तरह के चित्र दिखे या बने थे उनको देख कर बहुत भ्रमित हूँ। इस बीच निराला के बाद पचास साल के लगभग का समय व्यतीत हो गया है। पता नहीं यह परिवर्तित होते चित्र हैं या नष्ट होते हुए। मैं बार बार गया, हजार बार गया, पचास सालों में। कुछ चीजें हैं जो जस की तस हैं। और कुछ जो घड़ियों, कैलंडरों के हिसाब से घूम रही हैं, पिछड़ रही हैं। चीजें, जीवन के बाद मृत्यु की तरह नष्ट होतीं तो सहज लगता, ध्यान न जाता। लेकिन जो चीजें स्थिर हैं वे भी अंत की तरह हैं और जो जीवन का आभास देती हैं वे भी अंत का ही निवाला हैं। ऐसा लगता है कि अकाल अब हर समय चल रहा है। अब अकाल ही अकाल है। लोग जादुई तरह से, कराहते हुए गायब हो रहे हैं। अभी अभी वे थे और अभी अभी वे नहीं हैं। चीजों के निशान बचे नहीं या बने ही नहीं। क्या आज सभी शहरों की एक जैसी हालत है या इलाहाबाद ही वह एक शहर है जो मरी हुई आँखों की पुतली की तरह फैल गया है।
निराला जिस गंगातट को छोड़ कर, या उदास टिप्पणियों के साथ त्याग कर चले गए वह किस तरह हमारे कवि ज्ञानेंद्रपति को लुभा रहा है इसकी पड़ताल अभी की जानी है। आज जो शहर जहर से भरा पेटा है उस पर इतना गर्व और पवित्रता की ऐसी छाया समझ में नहीं आ रही है। जगदीश गुप्त ने इस गंगातट की जीवन रेखा को कुछ हद तक हिचकते हिचकते खींचा और उनके अस्त होने के बाद वह इलाहाबाद का अंतिम सूर्यास्त हुआ। हिचकते हिचकते इसलिए लिख रहा हूँ कि वे इलाहाबाद के एकमात्र ऐसे कवि थे शायद जिनका मन बृजवासी था और कविता की मूल आत्मा भी बृज में ही भटक रही थी। वे नई कविता के आंदोलनकर्ताओं में शामिल हो गए पर पूरी तरह उसमें समाहित नहीं हो सके विभक्त रहे क्योंकि गंगा के आसपास उनकी संवेदना भटक रही थी। उसके साथ उनकी नदी थी, नावें थीं, मल्लाह थे, मत्स्य कन्याएँ थीं और थी वह चित्रकला जिसमें शांतिनिकेतन बैठा हुआ था। आज गंगा तट पर रेत, निराला के तन से सौ गुना अधिक बढ़ गई है। महाप्राण में रेत ही रेत धधक रही है। जिन ग्रीक देवताओं ने बकौल धर्मवीर भारती इलाहाबाद का गौरव शिल्प तैयार किया था उनके मृत्यु लेखों का भी नामोनिशान बकाया नहीं है। शिल्प और मानव गतिविधियों की संगति का संगीत भंग हो गया है। बाबू भगवती चरण वर्मा का जगाती रास्ते रास्ते 'तीन वर्ष' उपन्यास के बाद डूब ही गया। रास्ते राहत में बस लू की ज्वाला ही बची है। छायादार पाकड़ का पेड़ गिर गया है, बूढ़ा होकर और रेस्तराँ की कुर्सियाँ भी लँगड़ी हो गई हैं। दूधनाथ सिंह की जिस कहानी में साउथ रोड की बत्तियाँ झिलमिलाती थीं, मैरीन ड्राइव पर लहराती हुई रोशनी की लंबी लड़ की तरह, उस सड़क पर शाम का पीलापन है और रात का अँधेरा। इस दुनिया में बँटवारा हर जगह है, हर चीज का है। शहर में इतना झमेला बढ़ जाएगा सोचा नहीं था। आदमी खुश होने की जगह थका थका है। बागीचों में दफ्तर खुल गए हैं और सड़कों पर घर बन गए हैं।
इलाहाबाद के तीन तरफ नदी थी। तीनों तरफ की सड़कें निकलती हुई नदी में गिर जाती थीं। फिर तीन तरफ ब्रितानिया सरकार के बनाए गए जंगी पुल थे। नदी में गिरी सड़कें इन पुलों पर चढ़ जाती थीं। इन पुलों से सड़क भी गुजरती थी और रेलगाड़ी भी। इन सड़कों से लोग दिन पर नदी की तरफ जाते थे। अब बहुसंख्यक शरीफ लोग नदी को अपने घरों तक ले आए हैं। इन्होंने नारा दिया है गंगा लाओ अपने द्वार। भद्र जन जिस सुख और सुविधा को देख लेते हैं उसे अपने दरवाजे पर लाने की हिकमत पूरी कर लेते हैं। इनमें संचय करने की अद्भुत सिफत है। इसलिए अब बहुत से लोगों को नदी की तरफ जाने की जरूरत नहीं रही। रेलगाड़ी और बैलगाड़ी और नावें और डग्गे इनके लिए इनके दरवाजे सब कुछ ले आते हैं। इस तरह नदियों के किनारे सभ्यताएँ हैं भी और उनसे दूर भी चली गई हैं। नदियों के किनारे जो रहते हैं वे डूब जाते हैं। दूर रहने वाले बच जाते हैं।
जिस तरह निर्मल वर्मा की सभी कृतियाँ बार बार 'वे दिन' हो जाती हैं, कुछ उसी तरह मुझे भी इलाहाबाद के वे दिन याद आते हैं। हमें समझ नहीं आता कि शहर के प्रति यह कैसी दीवानगी है। हम अपनी उम्र की स्वाभाविक चाहतों से दूर और लगभग उनके विरुद्ध स्थानों, दोस्तों, किताबों और उनके लिखने वालों पर फिदा हैं। एक समय तक हिंदी का आधुनिक इतिहास इलाहाबाद की उपज था। रामस्वरूप चतुर्वेदी ने जब यह कहा था कि हिंदी की नई कविता का इतिहास और परिमल का इतिहास एक है तो कमलेश्वर ने उसी सभा में जमीन हड़पने वाले इस पटवारी पर गहरा आक्रमण किया था। लेकिन यह बहुत विचित्र है कि कवि और कथाकार बँटे हुए थे। अजित कुमार, भारती, साही, जगदीश गुप्त, विपिन अग्रवाल, मलयज, पंत, लक्ष्मीकांत वर्मा, श्रीराम वर्मा, शिवकुटी आदि कविता वाले इलाहाबाद में थे। और अमरकांत, कमलेश्वर, मार्कंडेय, शेखर जोशी, भैरव प्रसाद गुप्त, अश्क, अमृतराय, बलवंत सिंह, दूधनाथ सिंह, शैलेश मटियानी, कालिया दंपत्ति, रामनारायण शुक्ल आदि कहानी वाले इलाहाबाद के थे। इन सभी नामों के साथ एक और लंबी लाइन दोनों तरफ थीं जिसमें हम लोग सूचीबद्ध हो सकते हैं। दोनों दलों की पत्रिकाएँ थीं और दोनों के संगठन थे। दोनों का समान दबदबा था पूरे हिंदी साम्राज्य में।
महान यायावरों ने भौगोलिक अस्मिताओं की खोज की है। यह खोज आज भी जारी है। वे लाँघते रहे हैं लंबी चौड़ी दूरियाँ और हम भी नगर पालिका के नक्शों और सीमाओं में भटकते रहे। अपने शहर का अर्थ और शहर का रहस्य खोजते रहे। जिन चीजों को हम भरपूर आँखों से देखते हैं, जिनके बारे में शतप्रतिशत गारंटी होती है उनकी भी खोज करनी होती है। एक अच्छे बुरे दृश्य को बार बार हजार बार देखना होता है। हमने असंख्य बार शहर की परिक्रमा की। चप्पे चप्पे को पददलित किया। और हम कभी ऊबे नहीं, कभी हमारा मन भरा नहीं। जिस तरह रोटी दाल खाते खाते हम कभी ऊबते नहीं। कई बार दिन और रात हमारी परिक्रमाओं के इतने सुनसान होते थे कि हमें अपने पदचाप सुनने के अलावा कोई ध्वनि तंग नहीं करती थी। इस तरह हमने अपने युवावस्था में अपने शहर को, सब कुछ छोड़छाड़ कर केवल प्यार किया। ऐसी दुकानें थीं, ऐसे ढाबे, ऐसे गुमटियाँ थीं, ऐसे रेस्तराँ जिनमें हमें उपभोक्ता नहीं स्वामी समझा जाता था। ऐसे ऐसे घर थे जहाँ हम मेहमान नहीं घर के सदस्य थे। चूँकि हम हर समय शहर में उपस्थित रहते थे इसलिए हमसे अधिक विश्वसनीय कोई नहीं था। ऐसा भ्रम हो सकता था कि हमारी जेबों में मजे के पैसे हैं पर वास्तविकता यह थी कि हमारी जेबों की सिलाई ही उखड़ी हुई थी।
आज मैं जिस समकालीनता की इतनी गहरी गिरफ्त में हूँ तो इसका कुछ लांछन इलाहाबाद को भी दिया जा सकता है। इलाहाबाद में बनारस के तत्व बिल्कुल नहीं हैं। अब यह स्वप्न एक लंबे नशे के बाद तब भंग हुआ जब चिड़िया चुग गईं खेत। अब समझ में आ रहा है कि समकालीनता को इतने शिद्दत से गले लगाना एक फालतू कर्म था। हमने इसमें डूबे रह कर इसको ही अपार संसार मान लिया था। हमारी उम्र ऐसी थी, और हमारे शहर का पर्यावरण कुछ इस प्रकार का था कि हमने छायावाद के शीर्ष रचनाकारों और प्रगतिशील उन्मेष के अलावा पश्चिम के तमाम आधुनिक हस्ताक्षरों के दबदबे में ही अपना चक्र पूरा किया। बादलेयर की कविताएँ, मोदिग्लायानी की जीवनी और ओसामू जाय के सेटिंग सन की आत्महत्याएँ और दास्तोवेस्की की अवसाद की मथानी से हृदय को मथते हुए हमने अपनी सुबह शामों को व्यतीत किया। बहुत ही विचित्र तरह से हम अपने शहर को पहचानते थे। आवेग और सनक ही थी कि पहचानने की इसी शैली पर बार बार मुहर लगाते रहते थे। समकालीनता का नशा ऐसा होता है कि वह धुर अतीत और दूर भविष्य दोनों पर धूल डाल देता है।
उत्सुक, जिज्ञासु और फड़फड़ाते लोग जो इलाहाबाद आते थे और जानकारियाँ चाहते थे उनसे हम लोग इस तरह पेश आते थे जैसे किसी ऐतिहासिक स्थल के गाइड हों। हम बताते थे कि काफी हाउस के इस कोने और इस कुर्सी पर साही जी बैठते हैं। और यहाँ लक्ष्मीकांत वर्मा जिनको इलाहाबाद का एनसायक्लोपीडिया कहा जा सकता है। यह जैन पान वाला है, यहाँ धर्मवीर भारती पान खाते थे और चिल्लर करवाते थे। यह निराला जी की मिठाई की दुकान है मतलब यहाँ उनका उधार चलता है। जगदीश गुप्त के इस घर से गंगा का पाट सबसे विस्तार में दिखता है। इस न्याय मार्ग, पुराने हेस्टिंग्स रोड से अमृतराय और महादेवी के घर जा सकते हैं। इधर मुड़ो तो बच्चन जी का घर, अंग्रेजी कब्रिस्तान से घूम कर चले जाओ तो मार्कंडेय और ओंकार शरद के घर मिंटो रोड पर पहुँच जाएँगे। इस गली में नरेश मेहता और उस गली में भैरव प्रसाद गुप्त और सामने खुशरूबाग की ऐतिहासिक दीवार के सामने उपेंद्रनाथ अश्क का मोर्चा था। यह मोर्चा बहुत रंगीला और हलचल भरा था। यहाँ कूटनीतिक विवाह और प्रेम प्रसंग हुए और मतवाली साहित्यिक लड़ाइयाँ लड़ी गईं। यहीं से संकेत निकला। फिराक साहब ने बैंक रोड का मकान सेवानिवृत होने के बाद भी नहीं छोड़ा और विश्वविद्यालय ने उनको छूट भी दे दी। यह लाउदर रोड का एनीबेसेंट मेमोरियल है जहाँ परिमल ने अपने अनेक महत्वपूर्ण आयोजन संपन्न किये। यह खपरैल वाला पुराना बंगला बालकृष्ण राव के माध्यम का संपादकीय कार्यालय है। पीछे संगम निकलता था लीडर प्रेस से और इलाचंद्र जोशी उसके संपादक थे। यहीं पर इक्कीस कहानियों वाले वाचस्पति पाठक का पटिया था जहाँ इलाहाबाद के वे लेखक आते जाते थे जिन्हें साहित्यिक गपाष्टक और चुहलबाजी की चाट लगी थी। इसी परिसर में भारती भंडार था जिसने जयशंकर प्रसाद, मैथलीशरण गुप्त, निराला और उस समय के महान जीवित रचनाकारों का प्रकाशन किया। इलाहाबाद में जो जहाँ रहता था वहीं रहता रहा। अपने ही शहर में बार बार स्थान परिवर्तन यहाँ नहीं मिलेगा। लोग जहाँ रहे प्रायः वहीं दिवंगत हो गए। या बचे हुए हैं, निष्कासित नहीं हुए। ममता कालिया और रवींद्र कालिया जरूर रानीमंडी से गंगातट गए। लेकिन उनका यह परिवर्तन केवल एक बार और बहुत लंबी देर बाद हुआ। ये लोग शबखून वाली गली के अंत में रहते थे। यह बहुत ही संवेदनशील और संगीन इलाका था। यहाँ अकेला हिंदू घर उन्हीं का था। इस इलाके में कलेजे वाले ही रह सकते थे। यहाँ लंबे दंगे होते थे, लंबे समय तक यह क्षेत्र निषिद्ध हो जाता था। कालिया दंपत्ति यहाँ सर्वाधिक सुरक्षित रहे और अपने जीवन की सबसे सुस्वादु बिरियानी भी खाते रहे। बीसों साल बाद यमुना के पुश्ते से गंगा के पुश्ते की तरफ गए। दूधनाथ सिंह कासिल्स रोड के बैरक्स को बमुश्किल त्याग कर गंगा पार चले गए हैं। दूधनाथ सिंह ने मकान बार बार बदले और गए तो अपरंपार गए। हालाँकि उनकी कहानियों के मुख्य अभियंता सब इसी पार छूट गए हैं। गिरिराज किशोर काफी हाउस के बगल में जब तक रहे, डटे रहे। उनका घर हमारा रास्ते राहत था क्योकि हमारे घोर भुक्कड़ दिनों में गिरिराज ही एक चमचमाते दोस्त थे। मेरे घर से सौ कदम पर पद्मकोट नाम की सुप्रसिद्ध कोठी है जहाँ कभी श्रीधर पाठक रहा करते थे। शानदार कोठी तेजी से उजड़ रही है। इससे पता चलता है कि महान वास्तुकलाएँ भी सौंदर्य की आपदाएँ बन जाती हैं। सुमित्रानंदन पंत कब तक कौसानी रहे और कब इलाहाबाद आकर बस गए यह पता नहीं पर पहाड़ी काटेज के चारों ओर के नैसर्गिक सौंदर्य और शीतल आबोहवा को शायद वे इसलिए छोड़ आए गर्मागर्म इलाहाबाद के लिए कि उन दिनों इलाहाबाद के बिना किसी का चारा नहीं था जिस तरह आज दिल्ली का चारा चल रहा है। उस जमाने की साहित्यिक राजनीति रचनाशीलता कुल मिला कर बनारस और इलाहाबाद के केंद्र में थी। बाकी थोड़ा बहुत पटना और कलकत्ता। पंत जी उन दिनों स्टेनली रोड पर मैसानिक लाज के पास रहते थे। वहीं अंतिम समय तक रहे। मनहूस भुतहे मैसानिक लाज की छाया पंत जी के मकान पर पड़ रही है। मैसानिक लाज जिस शहर में रहता है कुछ रहस्यमय और गोपनीय ही बना रहता है। पंत जी के घर की चुप्पी उतनी ही आधुनिक थी जितनी वह कालोनी थी। इस घर में कुँआरे रहते हैं। दो तीन की जनसंख्या ही रहती है यहाँ। यहाँ चुनिंदा लोग आते हैं। पंत जी के बारे में कहा जाता था कि वे इतने सुकुमार और कोमल हैं कि बच्चों की कूक और किलकारी भी उनके कर्णतंत्र पर घाव कर सकती है। उस समय हमें बार बार यही व्याकुलता थी कि कोई लंबे लंबे घुंघराले बालों की झूलती लटों से स्त्री की अनुपस्थिति को कैसे भर सकता है। मैंने उनकी झलक दो तीन बार ही देखी। न मैं दांते था न वो बीत्रिस। पर पंत जी में एक लुभाने वाली झलक थी। हम कभी विश्वविद्यालय से वापसी पर उसी तरफ से आते थे। उस इलाके में पेड़ थे, ठंडक थी, एकांत था, कभी कभी दिखते कुछ लोग थे और कुछ शान भी थी। हालाँकि हमारे पास सायकिलें होती थीं पर वह जमाना ऐसा था कि सायकिल की वजह से शान पर बट्टा नहीं लगता था। हम पंत जी के घर के सामने देर देर तक खड़े रहते थे कि काश कभी तो साधारण तरह से वे दरवाजा खोल कर बाहर आ जाएँ और दर्शन दे दें। उसी तरह जिस तरह सुरैया के मैरीन ड्राइव वाले फ्लैट के सामने लोग उसकी एक झलक की प्रतीक्षा करते थे या आज जुहू विले पार्ले स्कीम में अमिताभ बच्चन के बँगले के सामने लोग उनका इंतजार करते हैं। लेकिन पंत जी लगता था कि अंदर कविता ही कविता लिख रहे हैं। उनका व्यक्तित्व ही ऐसा था कि वे कविता लिखने के अलावा कुछ नहीं कर सकते थे। पता नहीं। पता नहीं हमारे भीतर कैसा कौतूहल था, कैसा विस्मय। इस तरह भरी जवानी में हमने अपने को तबाह कर लिया। एक बार प्रभात ने बताया कि पंत जी लोक भारती में आ रहे हैं। सूचना अफवाह की तरह फैल गई। यह भी बताया गया कि वह ग्यारह बज कर चालीस मिनट पर अपनी किसी कृति के अनुबंध पर हस्ताक्षर करेंगे। हम दौड़ते पड़ते कुछ युवजन सायकिल पर डबल सवारी महात्मा गांधी मार्ग पर दरबारी बिल्डिंग की तरफ भागे जहाँ लोक भारती का शो रूम था। खास दिन खास बजे पंत जी आए। तब मारुति का चलन नहीं था। हिलमेन, आस्टिन, मारिस, हिंदुस्तान चलती थी। पंत जी ज्योतिष के जानकार थे, गणना कर के ही काम करते थे अपने प्रकाशन का। जिस तरह फिल्मों में मुहूर्त होता है उसी तरह शायद तय करते थे। पंत जी का समय शुभ, पक्का और सफल था। इसीलिए वे प्रगतिशीलों के प्रिय भी बने, प्रयोगवादियों के भी। उस समय तो उन्होंने निराला को छका ही दिया था। ज्योतिष का जलवा था और अब कुछ सूत्र यह पकड़ में आता है कि इसी इलाहाबाद के और उसी पहाड़ के मुरली मनोहर जोशी जी हैं जो आज तक ज्योतिष के विकास के लिए डटे हुए हैं। अफसोस हम जब लोक भारती पहुँचे तब तक पंत जी निकल चुके थे। अबसर्डिटी न केवल शारीरिक दिनचर्या में थी बल्कि उसके सूत्र हमारे रचनात्मक उपक्रम का भी स्पर्श करने लगे थे। एक मसखरी मेरे व्यवहार में उपज रही थी और इलाहाबाद के नितांत सुसंस्कृत संसार के हमें चाहने वाले लोग भी यह समझ रहे थे कि ये नवोदित शहर के आधुनिक उजड्ड हैं।
मैं नहीं समझता कि उस जमाने में इलाहाबाद के अलावा किसी दूसरे शहर की पहचान में लेखकों का ऊपर जैसा नक्शा बनाया जा सकता था। शायद कलकत्ते की याद आए थोड़ी बहुत बस। पूरब का पेरिस भले अब बियाबान हो गया हो और पूरब के आक्सफोर्ड की आत्मा को भले ही खुर्राट अध्यापक रौंद रहे हों। लेकिन पश्चिम के पेरिस और पश्चिम के आक्सफोर्ड भी अब धुँधले पड़ गए हैं। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के चारों तरफ के इलाकों ऐलनगंज, बेलीरोड, बैंक रोड, चैथम लाइंस, चर्च लेन, टैगोर टाउन की पुरानी काली पड़ रही भव्यताओं का सौदा बिल्डर्स नहीं कर सके हैं। बिल्डर्स इन इलाकों की इमारतों को उस तरह धीरज के साथ देख रहे हैं जैसे बगुले मछली के लिए लंबा इंतजार करते हैं। 1957 में जब हम विश्वविद्यालय में घुसे तो दिल काँपता था। लगता था लोग हमें एक देहाती के रूप में देख रहे हैं। किसी ने कहा था कि यह महान गणितज्ञ प्यारेलाल की कोठी है, यह मकान रसायन शास्त्री सत्यप्रकाश का है और इसमें इतिहासकार ईश्वरी प्रसाद रहते हैं। धीरेंद्र वर्मा सीनेट हाल के सामने ऐलनगंज घुसने वाली सड़क के नुक्कड़ पर रहते थे। और रामकुमार वर्मा के बँगले का नाम साकेत था। उनकी रेशमी टाई आज भी आँखों में सपने की तरह उड़ रही है। आज इन मकानों के खपरे टूट गए हैं, नल टूट गए हैं, पानी फैल रहा है, हेज कोई काटता नहीं, फाटक पर कुत्ते पेशाब कर रहे हैं और बागीचे में नेवले अपने बच्चों की फौज लेकर दौड़ रहे हैं। क्षरण को रोक भी नहीं सकते और चीजों को बदल भी नहीं सकते। ऐश्वर्य की मीनारें गिर गई हैं। इन घरों के बच्चे अब दिल्ली, अहमदाबाद कलकत्ता और मुंबई में खुश होकर भी अपने पुश्तैनी घर में चूना सफेदी करा सकने और लीज रिन्यू कराने में असफल हैं। यह इलाहाबाद की अपनी खुद की बनाई किलेबंदी है कि लाज बाहर न जाने पाए। यहाँ एक खास तरह की अंग्रेजियत का चूल्हा जल बुझ रहा है। न अपनी जलेबी बचाएँगे न डोमीनियो पीजा आने देंगे। मर जाएँगे पर टस से मस नहीं होंगे। क्षरण लगातार हो रहा है। कभी चूना गिरता है कभी दीवार। बँगलों में पान की गुमटी आ गई है। दर्जी और धोबी बैठ गए हैं बीस पचास का किराया देते हुए। इलाहाबाद हर पल पूरब से और पूरब तरफ खिसक रहा है। पश्चिम अगर है तो आकाश पर एक टुकड़ा बादल के बराबर बस। देश की सबसे बड़ी और सबसे शानदार सिविल लाइंस में जगह जगह गाँव कस्बा घुस गया है और हर मकान के कोने अतरों से काला कोट पहने वकील निकलते दिखाई देते हैं।
14 अगस्त 1960 को मैंने लंबे समय के लिए इलाहाबाद छोड़ा था। उसके बाद यहाँ असंख्य बार आया गया। बार बार वहाँ जाता हूँ। उसे कभी छूकर कभी उसमें आधा अधूरा विलीन होकर वापस आ जाता हूँ। पिछली बार जब गया तो 41 साल बिछुड़े हुए हो गए थे। वहाँ आज भी लोग अपनी बोली बोल रहे थे। यह बोली किस तरह बची है समझ में नहीं आता। दारागंज और लोकनाथ में तो बोल ही रहे थे अल्फ्रेड पार्क में भी सुबह सुबह बोल रहे थे। अब एक जीवन में सारा कुछ तो जान नहीं लिया जा सकता किसी शहर का। मरते मरते भी कुछ बचा ही रह जाता है। कभी कभी तो यह भी होता है मर भी वे ही जाते है जो सब कुछ बचा लेना चाहते हैं। मैंने कई बार अपने भीतर इलाहाबाद को कुचलना चाहा क्योंकि जब आप किसी दूसरे शहर में बसने जाते हैं तो वहाँ के लोग कभी यह पसंद नहीं करते कि आप दोहरी नागरिकता चलाते रहें। पत्नी कोई हो, और प्रेमिका कोई और, यह मंद शहरों में स्वीकृत नहीं है। यहाँ पत्नी को ही प्रेम करो, और प्रेमिका को ही पत्नी बनाओ वाला नियम है। इसलिए मैं जबलपुर में अब कभी इलाहाबाद का नाम नहीं लेता। अंततः भारती भी बंबई के बाद इलाहाबाद कभी लौट कर नहीं आए। हरिप्रसाद चौरसिया कुछ दिन तो अपनी मलाई की दुकान वाले दोस्त विश्वंभर के पास जाते रहे पर एक ऐसा दिन आया जब वे भी अलविदा हो गए इलाहाबाद से। ओंकारनाथ, अजित कुमार सब बैरंग लौट गए। जिस तरह दो स्त्रियाँ बुलंदी के साथ आपके जीवन में बराबर कभी नहीं रह सकतीं उसी तरह एक साथ दो शहरों को प्यार नहीं किया जा सकता। अपवादों को छोड़ दिया जाए तो दो भाषाओं में और कभी इस शहर और कभी उस शहर में लिखना भी प्रायः असंभव है। अंततः जिसने भी इलाहाबाद छोड़ा उसको इलाहाबाद ने भी छोड़ दिया।
अब बिलकुल सही बँटवारा तो हो नहीं सकता लेकिन अगर इलाहाबाद को दो टुकड़ों में बीच से फाड़ दें तो महात्मा गांधी मार्ग बचेगा या सुप्रसिद्ध ग्रांट ट्रंक रोड। इसके एक पहलू में सुंदर और लकदक इलाहाबाद है और दूसरी तरफ गरीब भीड़ वाला पुराना इलाहाबाद। जिस तरह गंगा यमुना के रंग अलग अलग हैं उसी तरह इन दो हिस्सों की अलग अलग दुनिया है। एक तरफ पढ़ लिख कर कुछ कमा धमा कर निकल गए भद्रजनों की दुनिया है, दूसरी तरफ पुराने बाशिंदों, क्लर्कों, कारीगरों की सघन बस्तियाँ। इलाहाबाद के तीन तरफ नदी है एक तरफ दिल्ली तक सड़क ही सड़क चले जाइए। तीन तरफ पुल हैं अंग्रेजों के बनाए हुए। नदियाँ जब निर्जल हो जाएँगी तो ये पुल और अधिक काम के होंगे। ऋतुराज की कविता पुल पर पानी का और नरेश सक्सेना की कविता पुल पार करने से नदी पार नहीं होती का मतलब तब क्या होगा जब हमारी संतानें पुल से नीचे देखेंगी। उनके हाथ में माताओं के दिए हुए सिक्के होंगे पर नीचे पानी नहीं सैकत राशि होगी और धड़धड़ाती हुई रेलगाड़ी गुजर जाएगी। शशांक ने अपनी एक कहानी में आने वाले समय को अधिक साफ देख लिया है। वह कहानी एक सूखी नदी के ऊपर चल रही है।
निराला से शशांक तक बीते 50 साल इसी रेतीली दुनिया के बढ़ने की कहानी है। शायद मैं इस सृष्टि के प्रति एक शंकालु व्यक्ति हो गया हूँ। लेकिन उम्मीद करने और निराश होने के जो अनुभव हैं, जो परिणाम हैं, वे बिलकुल एक जैसे हैं। अभी अभी मैंने इलाहाबाद को बीच से विभक्त किया था। एक तरफ बसाहट में नयापन है। एक समय के सांसद अमिताभ बच्चन के जमाने की बनाई पक्की पगडंडियाँ हैं। पश्चिमी इलाहाबाद की तरफ अमिताभ ने भी ध्यान नहीं दिया। उसे भी अपने मुहल्ले की स्मृतियाँ कुछ अधिक सताती रही होंगी। इधर गरीबी है इसलिए सराय ही सराय है। गलियाँ दर गलियाँ हैं। हिंदू मोहल्लों में भी गलियाँ और मोहाल हैं मुसलमान बस्तियाँ भी गलियों की भूलभुलैया में खोई हैं। सराय आकिल, सुलेम सराय, गढ़ी सराय से लेकर शहर के हृदय स्थलों तक सरायों की कतार है। इलाहाबाद एक ऐसा शहर है जिसमें शेरशाह, अकबर, अशोक और अंग्रेज शासक सभी के हाथ लगे हैं। इस तरफ मुसाफिर और यात्रियों का संसार है। कुंभ मेला हो या मुहर्रम के जुलूस सबके लिए यह समान क्षेत्र है। गलियों के मुहानों पर रात दिन चलते ऐसे चायघर हैं जो मुझे ताशकंद और तजाकिस्तान में हर जगह यहाँ तक कि एयरपोर्ट पर भी मिले थे। आटे की बिस्किट मिलती है और चाय के लिए आग हमेशा जलती रहती है। यहाँ खुले पत्थरों पर और पिंजरों में पक्षी दाना खा रहे हैं फुदक रहे हैं। बंद दुकानों के बाहर देर शाम तक पतंग, डोर और मंझा बिक रहा है, लटाई भी बिक रही है। सन तीस चालीस के जमाने के तवे लगातार बजते रहते हैं। कबाब के सींके लगे हैं। घोड़े पक्की चरहियों में पानी पी रहे हैं। इक्के मनौरी से संगम तक दौड़ रहे हैं। रूई धुनी जा रही है। रंगरेज हंडों में रंग उबाल रहे हैं। रंग कर कपड़े सुखा रहे हैं। इत्र फुलेल तांत की थैलियों में बिक रहा है। सब्जी और फलों की मंडी है। तरबूजों को स्टूल बना कर दुकानदार बैठे बैठे पंखा झल रहे हैं। ये लोग अपनी ग्रांट ट्रंक रोड छोड़ कर सिविल लाइंस की तरफ कभी नहीं जाते। इनको किसी और दुनिया का अतापता नहीं है। ये ऊबते नहीं। इस क्षेत्र में लगता है एक जीवंत तमाशा निरंतर चलता रहता है। जिस तरह से मेलों में लोग मंद मंथर कदमताल करते हैं कुछ वैसी चाल यहाँ सदा सर्वदा होती है। जिस तरह पश्चिम के महान उपन्यासों के अंत में मरहम लगाती एक ईसाइयत छिपी रहती है यहाँ तक कि कामू के उपन्यासों में भी, उसी तरह शहर कोतवाली के पास भीड़ में दबा छुपा एक धर्म प्रचारक सुबह शाम भोंपू से मसीही वंदना सुनाता रहता है और दुखी दलितों के लिए उम्मीदें बिखेरता रहता है। वहाँ एक बंद चर्च है। 20-25 साल तक यह भोंपू बजा और अब भोंपू बजाने वाला वह शख्स गुम हो गया। ये सब लोग धीरज दिल हैं, कभी थकते नहीं। इलाहाबाद के हर तरफ ध्यानाकर्षित करते चर्च हैं। सफेद चर्च, लाल चर्च, पीले चर्च और पत्थर गिरजा। ये देश के सर्वोत्तम, विशाल, सुंदर और मनहरन चर्चों में थे। अब ये केवल इमारत मात्र रह गए हैं। इमारतों का कंकाल। इनमें साल में एक बार या एक भी बार घंटा नहीं बजता। ये खामोश हो चुके हैं। शायद इनको अब लोग देख भी नहीं रहे हैं और लगता है ये चर्च नहीं चर्च का ढाँचा हैं और अब ढाँचों को क्रूर और हिंसक लोग ढहा देंगे। लेकिन दुनिया में इन पूजा स्थलों के विनाश के बावजूद चर्च की ताकत बढ़ गई है। अब राजनैतिक स्पर्धाओं में धर्म की विकृत शक्तियों का साम्राज्य है। जगह जगह धर्म स्थल डेजर्ट हो रहे हैं पर उनकी राजनैतिक ताकत बढ़ रही है।
इलाहाबाद के एक तरफ बदहाली कंगाली और आबादी है। फर्क बिल्कुल सीधा खिंचा हुआ है। एक तरफ स्टेशन है, तारघर है, क्लब हैं, रायल और बार्नेट होटल हैं, विश्वविद्यालय और हाईकोर्ट हैं। वित्त, पुलिस, शिक्षा, पब्लिक सार्विस के शानदार दफ्तर हैं। रेडियो दूरदर्शन वकील डाक्टर व्यापारी अपनी कोठियों में बसे हुए हैं। फौज के मेस हैं, पार्क हैं। दूसरी तरफ यह सब कुछ नदारद है। मिर्च मसाला, अनाज, बर्तन सब्जी की दुकानें। शहर की रसोईं अलग है और भोजन कक्ष तथा ड्राइंग रूम अलग। मैं सोचता था जो भी हो इलाहाबाद बचा रहेगा। सारी दुनिया जैसी वह नहीं हो पाएगा। लेकिन इलाहाबाद बचता कैसे। जहाँ सदियों पहले सरस्वती लुप्त हो चुकी हो वहाँ यह संकेत पर्याप्त था कि इलाहाबाद भी नहीं बचेगा। मिथक के अनुसार वह वट वृक्ष है किले के भीतर जिसकी फुनगी जल प्रलय के बावजूद बचनी थी। लेकिन यह वृक्ष भी नकली निकला शायद। अब वह क्या बचाएगा डूबते को। चीजें एक एक करके कराहती हुई गायब हो रही हैं और लोग जीवन से अधिक चमत्कार पर भरोसा कर रहे हैं।
इलाहाबाद शांत संतुष्ट और बेपरवाह था। यहाँ बड़ी माँग नहीं उठती थी। यहाँ चवन्नी जेब में रहे तो काफी हाउस की लंबी शाम निकल जाती थी और न भी हो तो काफी हाउस में पैसा माँगा नहीं जाता था। लोग पैसा कभी न कभी दे देते थे। प्रबंधक, बेयरा भी इस बात के लिए निश्चिंत थे। सातवें दशक तक बिना करेन्सी के भी दिन मिलजुल कर निकल जाते थे। मुझे ख्याल है कि मेरे पास सायकिल नहीं थी और तीन साल मैं युनिवर्सिटी अबाध आता जाता रहा। कोई गम नहीं था।
यहाँ कविता पर लोगों का गहरा भरोसा था। लक्ष्मीकांत वर्मा ने कविता पर मूलभूत किताब की रचना की। उससे पता नहीं कितनी और किताबें निकलीं। मुझे रघुवंश जी, रामस्वरूप चतुर्वेदी, भारती और जगदीश गुप्त जैसे नई कविता के महारथियों ने पढ़ाया पर मैं उनकी राह पर नहीं चल सका। वहाँ शिक्षा से गुलामी कभी पैदा नहीं हुई। यहाँ मौत के मुँह में गंगा जल के बाद सर्वाधिक उम्मीद कविता पर ही लोगों ने की। घर बार की चिंता सताती नहीं थी लोगों को। शास्त्रार्थ कभी टूटा नहीं। नव्यतम रूपों में जारी रहा। देश के सर्वोत्तम दिमागों और रचनाकारों का आगमन यहाँ अबाध था। जिस शहर में राजापुर के विशाल कब्रिस्तान में शोक पंक्तियों को पढ़ते हुए या गंगातट पर चिताओं के जलते हुए रत्ती भर भी उद्धिग्नता आगामी जीवन को लेकर नहीं हुई सवाल यह है कि उस इलाहाबाद में भगदड़ कैसे मच गई? वहाँ कोई अब रचने के लिए नहीं आ रहा है। आगमन यहाँ बंद है। दुनिया ने अपने भावी को बचाने के लिए जिन जिन मार्गों को चुना अब इलाहाबाद भी उन सबको स्वीकार कर रहा है। गर्वीले लोगों की गर्दन पर पक्षाघात हो गया है। अब केवल जनसंख्या है और हिंसा। कालकूट मचा हुआ है। फिराक साहब की शायरी का रोमांटिक धुआँ धुआँ हो गया है। जनसंख्या और हिंसा इस शहर को सपाट बनाते हैं। यहाँ कविता बची अवश्य है पर उसके रचनाकार हिंस्र हैं। कविता का शास्त्र कवियों से छिन गया है। जिन इलाहाबाद की सड़कों पर मरा कुत्ता एक दुर्लभ दृश्य था वहाँ रोज लाशें पड़ रही हैं। मुझे पता नहीं था कि मेरी अनुभव कहानी की एक गप्प आज इतना सच हो जाएगी। समय बीतता रहा, उलटपुलट होता रहा तमाम दुनिया की तरह लेकिन शहर हिंसा को वशीभूत नहीं कर सका। उन मार्गों पर आपका सांस्कृतिक प्रदर्शन छीन लिया गया है। अब पाकड़ इमली और बबूल नीम के विशाल वृक्षों के नीचे से निकलती छायादार सड़कें लहू से लथपथ हैं। असंख्य लोगों ने सबसे सस्ते सुलभ अपने चाकू को चमकाया हुआ है। सवाल है कि क्या कभी संसार के कवियों चित्रकारों और विचारकों ने हिंसा की जबरदस्त तरफदारी की थी। और अगर की थी तो अब उनके हाथ से यह तरफदारी भी छिन चुकी है। कविता, अकविता, प्रगतिशील कविता के जबरदस्त विमर्श इस शहर में तीस साल तक होते रहे। माध्यम, क ख ग, और निकष जैसी पत्रिकाएँ निकलती रहीं। कविता दर दर और कदम कदम लिखी गई। इतना प्यार, इतनी कविता और इतना दीवानापन हुआ लेकिन इलाहाबाद बचा नहीं। देखिए न, अब सब ओर दीवाने मारे जा रहे हैं।.............

'मीडिया हूं मैं' और 'क्लास रिपोर्टर' का प्रकाशनोत्सव

रविवार 08 फरवरी को अपराह्न 01 बजे इलाहाबाद में 'मीडिया हूं मैं' और 'क्लास रिपोर्टर' का प्रकाशनोत्सव। मुख्य अतिथि रवींद्र कालिया, मुख्य वक्ता ममता कालिया, प्रो.अली अहमद फातमी, अमरनाथ उपाध्याय, रविनंदन सिंह, प्रो.अमर सिंह, अनिल शर्मा आदि। इस अवसर पर कामरेड जियाउल हक, जफर बख्त, प्रो.ओपी मालवीय, ड़ॉ.देवराज सिंह आदि का 'शान-ए-इलाहाबाद' सम्मान।

Thursday, 5 February 2015

मेरी पाठशाला (12) : जिनको, अक्सर पढ़ता रहता हूं

'नसीब सिंह, नसीब सिंह कहाँ जा रिये हो, जरा दम तो ले लो, जहाँ जा रिये हो...' अजित वडनेरकर 'राग भोपाली' और ‘शब्दों का सफर’ नाम से फेसबुक पर हैं। उनका ब्लॉग भी है- shabdavali.blogspot.in वह कहते हैं- ‘ शब्दों के जन्मसूत्रों को तलाशने की मुझे धुन है। ज़िद की हद तक मैं रोज़ इनके पीछे भागता हूँ। इसे जुनून समझ सकते हैं। यह शौक बीते क़रीब तीस साल से है। मैंने १९८५ से आजीविका कमानी शुरू की। इस शौक से जुड़ी सामग्री, ज़ाहिर है वह किताबों की शक्ल में ही थी, जुटानी शुरू की। संवाद माध्यम के रूप में भाषा का इस्तेमाल करने के बावजूद भाषा को अध्ययन के स्तर पर, कठिन विषय समझा जाता है। २००५ में दैनिक भास्कर में साप्ताहिक कॉलम के रूप से शब्दों का सफ़र शुरू हुआ। २००६ तक मुझे लगने लगा था कि लोगों को यह अंदाज़ पसंद आ रहा है और मैंने उसी वर्ष इसी नाम से ब्लॉग शुरू कर दिया।’

अजित वाडनेकर को हिंदी ब्लॉग लेखन जगत का पाणिनी भी कहा जाता है। अत्यंत श्रमसाध्य उनके शब्दों के सफर से हिंदी साहित्य जगत ही नहीं, विशाल पाठक वर्ग भी सुपरिचत है। कैसा है उनका, शब्दों का सफर, जरा एक ताजा बानगी देखिए---

बराक साहब तो लौट गए और भारत सरकार में अब 'मुबारकाँ-मुबारकाँ' का दौर है। दरअसल बराक नाम में ही 'मुबारक' छुपा हुआ है। बराक शब्द मूल रूप से स्वाहिली का नहीं बल्कि अरबी का है। अरबी में यह हिब्रू से आया या नहीं इस विवाद में न पड़ते हुए यही कहा जा सकता है कि स्वाहिली में यह ज़रूर अरबी से गया है। अरबी al-baraka (या al-barack) बना है सेमिटिक धातु b-r-k (बा-रा-काफ) से जिसका अर्थ होता है आशीर्वाद देना, प्रशंसा करना, उपकृत करना, धन्य करना आदि। अरबी के अलावा हिब्रू में भी यह धातु है। समृद्धि, वृद्धि या खुशहाली के अर्थ में हिन्दी में इसी मूल से बना 'बरक्कत' शब्द प्रचलित है। मांगलिक अवसरों पर शुभकामना देने के लिए अक्सर मुबारकबाद दी जाती है। यह 'मुबारक' भी इसी मूल से आ रहा है और बराक में 'मु' उपसर्ग लगने से बना है। जाहिर है 'बराक' का अर्थ हुआ शक्तिशाली, विशिष्ट, मांगलिक, समृद्ध आदि। इस नाम के महत्व को विश्व में इस महाशक्ति की विशिष्ट भूमिका के संदर्भ में देखें तो 'अल-बराक' का सजातीय 'ब्रोकर' और भी अर्थवान नज़र आता है। दुनियाभर के इस स्वयंभू पंच की सौदागरी को ध्यान में रख कर आप मध्यस्थ, दलाल, ब्रोकर या डीलर क्या कहना चाहेंगे?

उपन्यास, कहानी, शब्द-व्युत्पत्ति-विवेचना, आलोचना आदि विविध विधाओं में रचनारत अजित वाडनेकर पेशे से पत्रकार हैं। उनकी मुख्य कृतियों में एक है, दो खंडों में शब्दों का सफर। उन्होंने शानी के साहित्य पर शोध-प्रबंध लिखा है। वह कृति पाण्डुलिपि पुरस्कार, विद्यानिवास मिश्र-हिंदी की शब्द-संपदा सम्मान से सम्मानित हो चुके हैं।

उनकी खोजपरक शब्द-यात्रा की एक और बानगी / ‘हवा, पानी और टंकण’
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इनसान ने अब तक ज्यादातर ज्ञान प्रकृति से ही सीखा है। भाषाविज्ञान के नजरिए से इसे आसानी से समझा जा सकता है। इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार के साथ-साथ द्रविड़ भाषा परिवार के कई शब्दों से यह बात साफ हो जाती है। गति और प्रवाह संबंधी ज्यादातर शब्दों में अंतर्संबंध है और इनका उद्गम भी एक ही है और वे हैं हवा और पानी। प्रकृति की इन दोनों शक्तियों के गति और प्रवाह जैसे लक्षणों ने मानव स्मृति पर ऐसा असर डाला कि भाषा का जन्म होने के बाद इनके कई अर्थ प्रकट हुए।
इंडो-यूरोपीय भाषाओं में वः वायु और जल दोनों से संबंधित है और इससे कई शब्द बने हैं जिनसे प्रवाह, गति जैसे अर्थ उजागर होते हैं। संस्कृत मेंवः का अर्थ होता है वायु। हिन्दी का हवा शब्द इससे ही जन्मा है। (अलबत्ता वः यानी वह केहवा बनने में वर्णविपर्यय का सिद्धांत लागू हो रहा है।) संस्कृत का एक अन्य शब्द है वह् जिसका मतलब हुआ प्रवाह । बहाव, बहना, बहकना जैसे शब्दों का मूल भी यही है। वह् से ही बना संस्कृत का वात् जिसका अर्थ भी हवा ही होता है। वात् से बना वार्, जिसका एक रूप अंग्रेजी के एअर में नजर आता है। मराठी में भी हवा को वारं ही कहा जाता है। हिन्दी में मंद हवा के झोंके को बयार कहते हैं। संस्कृत वात् से रूसी भाषा के वेतेरयानी (हवा) की समानता पर गौर करें। वह् के प्रवाही अर्थ से ही जलसूचक शब्द वार जन्मा है। वरुण भी इससे ही बना है जिसका अर्थ समुद्र देव है। अब जरा गौर करें जर्मन के व्हासर , ग्रीक के हुदौर और अंग्रेजी के वाटर पर। इन सभी का मतलब होता है पानी। रूसी में पानी के लिए वोद शब्द है। विश्वप्रसिद्ध रूसी शराब वोदका का नामकरण इससे ही हुआ है। यही नहीं, अंग्रेजी के वेट यानी गीला, नम या भीगा शब्द में भी यही वह् मौजूद है। पसीने के लिए अंग्रेजी के स्वेट, हिन्दी शब्द स्वेद और नमी, गीलेपन के लिए आर्द्र जैसे शब्दों की समानता सहज ही स्पष्ट है।
ट का-सा जवाब देना, टाँग खींचना या टाँग अड़ाना जैसे मुहावरे आम तौर पर बोलचाल की हिन्दी में प्रचलित हैं। इन मुहावरों में टका और टाँग जैसे शब्द संस्कृत के मूल शब्द टङ्कः (टंक:) से बने हैं। संस्कृत में टङ्कः का अर्थ है बाँधना, छीलना, जोड़ना, कुरेदना या तराशना। हिन्दी के टंकण या टाँकना जैसे शब्द भी इससे ही निकले है। दरअसल, टका या टंका शब्द का मतलब है चार माशे का एक तौल या इसी वजन का चाँदी का सिक्का। अंग्रेजों के जमाने में भारत में दो पैसे के सिक्के को टका कहते थे। आधा छँटाक की तौल भी टका ही कहलाती थी। पुराने जमाने में मुद्रा को ढालने की तरकीब ईजाद नहीं हुई थी तब धातु के टुकड़ों पर सरकारी चिह्न की खुदाई यानी टंकण किया जाता था। गौरतलब है कि दुनिया भर में ढलाई के जरिए सिक्के बनाने की ईजाद लीडिया के मशहूर शासक (ई.पू. करीब छह सदी) क्रोशस उर्फ कारूँ (खजानेवाला) ने की थी। टका या टंका किसी जमाने में भारत में प्रचलित था मगर अब मुद्रा के रूप में इसका प्रयोग नहीं होता। कहावतों-मुहावरों में यह जरूर मिल जाता है। किसी बात के जवाब में दो टूक यानी सिर्फ दो लफ्जों में साफ इन्कार करने के लिए यह कहावत चल पड़ी - टका-सा जवाब। टके की दो पैसों की कीमत को लेकर और भी कई कहावतों ने जन्म लिया। मसलन टका-सा मुँह लेकर रह जाना, टके को भी न पूछना, टके-टके को मोहताज होना, टके-टके के लिए तरसना, टका पास न होना, वगैरह-वगैरह। भारत में चाहे टके को अब कोई टके सेर भी नहीं पूछता, मगर बाँग्लादेश की सरकारी मुद्रा के रूप में टका आज भी डटा हुआ है। बाँग्लादेश के अलावा कई देशों में यह लफ्ज तमगा, तंका, तेंगे या तंगा के नाम से चल रहा है जैसे ताजिकिस्तान, कजाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, उज्बेकिस्तान और मंगोलिया। इन सभी देशों में यह मुद्रा के रूप में ही है, हालाँकि वहाँ इस शब्द की उत्पत्ति चीनी शब्द तेंगसे से मानी जाती है जिसका अर्थ होता है मुद्रित सिक्का और एक तरह की माप या संतुलन। अर्थ की समानता से जाहिर है कि तेंगसे शब्द भी टङ्कः का ही रूप है। टंका से ही चला टकसाल शब्द अर्थात टंकणशाला यानी जहाँ सिक्कों की ढलाई होती है।
अब आते हैं टङ्कः के दूसरे अर्थों पर । इसका एक मतलब होता है लात या पैर। संस्कृत में इसके लिए टङ्गा शब्द भी है। हिन्दी का टाँग शब्द इसी से बना है। गौर करें, टङ्कः के जोड़वाले अर्थ पर। चूँकि टाँग में घुटना और एड़ी जैसे जोड़ होते हैं, इसलिए इसे कहा गया टाँग।
इसी अर्थ से जुड़ता है इससे बना शब्द टखना । जोड़ या संधि की वजह से ही इसे यह अर्थ मिला होगा। इसी तरह, वस्त्र फट जाने पर, गहना टूट जाने पर, बरतन में छेद हो जाने पर उसे टाँका लगा कर फिर कामचलाऊ बनाने का प्रचलन रहा है। यह जो टाँका है वह भी इस टङ्कः से आ रहा है अर्थात इसमें जोड़ का भाव निहित है। टङ्कः का एक और अर्थ है बाँधना। गौर करें कि धनुष की कमान से जो डोरी बँधी होती है उसे खींचने पर एक खास ध्वनि होती है जिसेटंकार कहते हैं। यह टंकार बना है संस्कृत के टङ्कारिन् से जिसका मूल भी टङ्कः है यानी बाँधने के अर्थ में। तुर्की भाषा का एक शब्द है तमग़ा जो हिन्दी-उर्दू-फारसी में खूब प्रचलित है यानी ईनाम में दिया जानेवाला पदक या शील्ड। प्राचीन समय में चूँकि यह राजा या सुल्तान की तरफ से दिया जाता था, इसलिए इस पर शाही मुहर अंकित की जाती थी। इस तरह तमगा का अर्थ हुआ शाही मुहर या राजचिह्न। अब इस शब्द के असली अर्थ पर विचार करें तो साफ होता है कि यह शब्द भी टंकण से जुड़ा हुआ है।

मेरी पाठशाला (11) : जिनको, अक्सर पढ़ता रहता हूं

हिंदी के जाने-माने व्यंग्यकार प्रेम जनमेजय की ज्यादातर रचनाएं 'धर्मयुग', 'साप्ताहिक हिंदुस्तान' के जमाने से पढ़ी-सराही जा रही हैं। उनके प्रमुख व्यंग्य संकलन हैं-  राजधानी में गँवार, बेर्शममेव जयते, पुलिस! पुलिस!, मैं नहिं माखन खायो, आत्मा महाठगिनी, मेरी इक्यावन व्यंग्य रचनाएँ, शर्म मुझको मगर क्यों आती, डूबते सूरज का इश्क, कौन कुटिल खल कामी, ज्यों ज्यों बूड़ें श्याम रंग, हुड़क, मोबाइल देवता। उन्होंने आलोचनात्मक पुस्तकें भी लिखी हैं- जैसे, प्रसाद के नाटकों में हास्य-व्यंग्य, हिंदी व्यंग्य का समकालीन परिदृश्य, श्रीलाल शुक्ल : विचार, विश्लेषण और जीवन । एक नाट्यकृति भी है- सीता अपहरण केस । बाल साहित्य पर उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं - शहद की चोरी, अगर ऐसा होता, नल्लुराम। उन्होंने, व्यंग्य यात्रा, बींसवीं शताब्दी उत्कृष्ट साहित्य : व्यंग्य रचनाएँ, हिंदी हास्य-व्यंग्य संकलन आदि का संपादन भी किया है।
प्रेम जनमेजय को व्यंग्यश्री सम्मान, कमला गोइन्का व्यंग्यभूषण सम्मान, संपादक रत्न सम्मान, साहित्यकार सम्मान, इंडो-रशियन लिटरेरी क्लब सम्मान, अवंतिका सहस्त्राब्दी सम्मान, हरिशंकर परसाई स्मृति पुरस्कार, प्रकाशवीर शास्त्री सम्मान, अट्टहास सम्मान से समादृत किया जा चुका है।  प्रेम जनमेजय प्रायः फेसबुक पर भी सक्रिय रहते हैं।
(फोटो : उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान में सम्मान)

प्रेम जनमेजय का एक बहुपठित व्यंग्य / 'राम वनवास का सीधा प्रसारण'

आम चुनाव आने को हैं, सबसे बड़ा मुद्दा है - चुनावी मुद्दे की खोज। इधर राम पर भी खोज जारी है। जैसे चुनाव आते ही कुछ दलों का ध्यान आम आदमी की ओर ध्यान आकर्षित होता है, वैसे ही कुछ दलों का राम की ओर भी आकर्षित होता है। इस बार राम मुद्दा दे रहे हैं कि राम सेतु था कि नहीं। था और नहीं था की बहस जारी है। मैं भी एक मुद्दा दे रहा हूँ - राम के समय दूरदर्शन था कि नहीं । मैं कहता हूँ, था। आप यह तो मानेंगे ही कि उस युग में हमारे प्रभु अक्सर आकाशवाणी का प्रयोग किया करते थे । अब जहाँ आकाशवाणी होगी वहाँ दूरदर्शन न होगा? इस था और नही था पर आप चाहें तो मुझे एसएमएस द्वारा भी बता सकते हैं। वैसे भी कल्पना करने में क्या जाता है। जब आप बरसों से देश से गरीबी हटने की कल्पना को सच माने बैठे हैं तो मुझ शेखचिल्ली के साथ यह कल्पना भी कर डालिए कि जैसे द्वापर में संजय ने धृतराष्ट्र को महाभारत का आँखों देखा हाल सुनाया था वैसे ही त्रेता में भी दूरदर्शन था । मानिए और राम वनवास के कुछ दृश्य भी देख डालिए।
दृश्य 1
कल राम का राजतिलक है। सभी चैनल, सरकारी चैनल का प्रसारण रिले कर रहे है। कर नहीं रहे हैं, उन्हें करना पड़ रहा है। सीधे प्रसारण का अधिकार और किसी के पास नहीं है। सुबह से शहनाई बज रही है, राम के बचपन से आज तक की बार-बार फुटेज दिखाई जा चुकी है। कार्यक्रमों में कोई सनसनी नहीं है, व्यूअरशिप कम है, इसलिए विज्ञापन भी नहीं है। अचानक रात बारह बजे सभी चैनल जाग जाते हैं। हर चैनल पर एक ही ब्रेकिंग न्यूज है - राम को चौदह बरस का वनवास। सारी अयोध्या सोते से जाग गई है। पान और चाय की दुकानें खुल गई हैं। ढाबे सज गए है। सुनसान गलियाँ ऐसे ही जीवंत हो गई हैं जैसे प्रभु से वरदान पाया कोई भक्त।
कुछ चैनल सनसनीखेज खुलासा कर, सनसनी वैसे ही फैला रहे हैं जैसे असुर अपनी संसकृति फैलाते है। देखिए सनसनीखेज खुलासा, कैसे एक सौतेली माँ ने किया अत्याचार। जो बेटा उसे अपनी माँ से बढ़कर मानता था उसी माँ ने दिया उसे चौदह बरस का वनवास। आप जाइएगा नहीं, देखते रहिएगा। अयोध्या के इतिहास में ऐसा न कभी घटा और न कभी घटेगा। अपने पुत्र भरत के लिए ऐशो-आराम और वे राम जो कल राजा बनने जा रहे थे, उनके लिए चौदह बरस का वनवास। हम आपको दिखाने जा रहे हैं सनसनीखेज खुलासा कि कैसे हुआ राम को यह वनवास। जाइएगा नहीं, ब्रेक के बाद हम आपको दिखाएँगे कैकेयी की वो चाल जिसने पलट कर रख दी दशरथ की बाजी।'
इसके बाद ब्रेक इतना लंबा होता है कि सनसनी का ब्ल्ड प्रेशर लो होने लगता है। इस ब्रेक में राम छाप दूध् से लेकर कैकेयी छाप सुरा तक के विज्ञापन अपना कमाल दिखाते हैं।
दृश्य 2
कुछ चैनल्स ने विशेषज्ञों को बुला लिया है। विशेषज्ञों का मुकाबला चल रहा है जो किसी डब्ल्यूडब्ल्यू एपफ के दंगल से कम नही है। ऐसे मुकाबले आनंद देते हैं, इसलिए आप भी इस मुकाबले का आनंद लें।
एक - हमारा दल मानता है कि ऐसा अयोध्या के इतिहास में पहले कभी घटा नहीं है।
विशेषज्ञ दो - हमारा दल मानता है कि ऐसा अयोध्या में घटा है पर उसके प्रमाण नहीं मिलते हैं।
विशेषज्ञ तीन - कब घटा है? आपके पास क्या प्रमाण हैं?
विशेषज्ञ दो - जब भी घटा है, घटा है। प्रमाण समय आने पर देंगे।
विशेषज्ञ एक - मैं कहता हूँ नहीं घटा है...
विशेषज्ञ दो - मैं कहता हूँ घटा है।
और इसके बाद खूब मैं मैं चलती है तो संचालक तीसरे की ओर रुख कर के कहता है - आपका दल इस बारे में क्या कहता है?
- हमारा दल इंतजार करेगा कि कौन सत्ता में आता है, राम या भरत, जिसे हमारे दल की आवश्यकता होगी। अपनी आत्मा की आवाज हम तब ही सुनेंगे और उचित समय पर उचित फैसला लेंगे।
दृश्य 3
इस बीच एक और ब्रेकिंग न्यूज आती है - अभी-अभी हमें समाचार मिला है कि सीता के लिए वनवास के वस्त्र रात को एक दुकान खुलवा कर लिए गए हैं। हमारे संवाददाता इस समय दुकान के बाहर मौजूद हैं, चलिए हम उस दुकानदार से बात करते हैं जिसके यहाँ से यह वस्त्र लिए गए हैं।
- आपका नाम?
- मेरा नाम हरीशचंदर है जी
- आप क्या करते हैं
- जी, मैं रिषी-मुनियों को कपड़े बेचता हूँ।
- आपकी दुकान पर केवल रिषी-मुनि ही कपड़े लेने आते हैं?
- हाँ जी।
- और कोई नहीं आता?
- न जी।
- और कोई क्यों नहीं आता?
- पता नहीं जी।
- आप झूठ बोल रहे हैं, आपको सब पता है।
- पता नहीं जी।
- आपको पता है, आपके यहाँ से ही कपड़े गए हैं किसी महिला के लिए । हमारे पास इसकी वीडियो है, हमें सब पता है,
- जब आपको सब पता है तो मुझसे क्यों पूछ रहे हो?
तो आपने देखा महलों का आतंक। हम अभी कुछ देर में आपको वह वीडियो दिखाने जा रहे हैं जो खुलासा कर देगी कि वो कपड़े सीता के लिए ही गए हैं। हमारी टीम उस डिजाइनर की खोज कर रही हैं और उस प्रसाधन केंद्र का भी पता कर रही है जहाँ सीता जी वनवास के लिए सजने गई थीं।
आप हमें एसएमएस करें कि क्या राम अकेले वनवास जाएँगे ? यदि आपका जवाब हाँ है तो हाँ लिखें, न है तो न लिखें और कुछ भी जवाब न हो तो भी आप लिखें 'कुछ नहीं' । हमारे चैनल ने पहली बार ऐसे लोगों को भी मौका दिया है जिनका जवाब 'कुछ नहीं' हो सकता है।
दृश्य 4
एक धर्मिक चैनल ने गुरु वसिष्ठ के विशिष्ट चेले, उनके विशिष्ट विरोधी तथा कुछ पंडितों का पैनल बनाया हुआ है। पोथियाँ खुली हुई हैं, ग्रहों की स्थिति बाँची जा रही है, गणनाएँ जारी हैं तथा अनिश्चित वातावरण में कुछ भी निश्चित कहने से बचा जा रहा है। अलग-अलग चेहरे अलग-अलग अंदाज में दिख रहे हैं। कुछ इस अंदाज में दिखाई दे रहे हैं कि अरे, ये क्या हो गया, कुछ इस अंदाज में हैं कि हमने तो पहले ही कहा था और ये तो होना ही था तथा कुछ इस अंदाज में हैं कि देखें भाग्य में और क्या-क्या होना है। सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न ये है कि गुरु वसिष्ठ ने मुहूर्त निकालते समय ग्रहों की गणना कैसे गलत कर दी। कुछ गुरु की मीन-मेख निकाल रहे हैं, कुछ करम गति टारे नहीं टरे के सिद्धांत की व्याख्या कर रहे हैं और कुछ कोई नृप होय हमें का हानी से निस्पृह हैं और कुछ जुगाड़ यंत्र को साध आगामी शासन में अपनी घुसपैठ बनाने के वचन बोल रहे हैं।
क्या चल रहा है, इसे देखने को अभिशप्त जनता आप भी देखें।
प्रश्नकर्ता - सुना है राम का राजतिलक रुक गया है और वे वनवास जा रहे हैं।
ज्योतिषचार्य - ये सब ग्रहों का खेल है, समय बहुत बलवान है।
- कौन-से ग्रह क्या खेल खेल रहे हैं?
- राम और दशरथ के ग्रह टकरा गए हैं। राहु-केतु प्रबल हो गए हैं। समय शुभ नहीं है।
- पर कल तो आपने राजतिलक के लिए समय को शुभ बताया था, अति शुभ बताया था।
- ग्रहों की चाल बदलती रहती है। समय बहुत बलवान होता है। करम गति टारे नहीं टरती है।
- अब भविष्य में क्या होगा?
- समय शुभ नहीं है।
- यदि कैकेयी ने अपने वचन वापस ले लिए या फिर दशरथ वचन से मुकर गए?
- भविष्य के गर्भ में बहुत कुछ छिपा रहता है। समय शुभ हो सकता है। माता कौशल्या यज्ञ करवा रही हैं, मंत्रोच्चार हो रहे हैं। तांत्रिक व्यस्त हैं। समय बदल सकता है।
- नहीं भी बदल सकता है क्या?
- नहीं भी बदल सकता है। पता नहीं कैकेयी क्या करवा रही हैं।
धर्मिक चैनल की इस चर्चा में सभी गुणी और ज्ञानी जन अपने-अपने धर्म की व्याख्या कर रहे हैं। ऐसे महत्वपूर्ण क्षण में प्रजा के प्रति धर्म की चिंता कहाँ? प्रजा तो वैसे ही सन्नाटे में है।
दृश्य 5
कुछ कैमरामैन कैकेयी के कोपभवन के बाहर तक पहुँच गए हैं। बाहर सुरक्षाकर्मी खड़े हैं। दशरथ तक पहुँचना नामुमकिन है। चलिए हम सरकारी प्रवक्ता सुमंत जी से पूछते हैं - सुमंत जी, आप तो राजा दशरथ के करीबी हैं, आप बताएँ इस समय राजा दशरथ को क्या लग रहा है?
सुमंत सोच की मुद्रा बनाते हुए और आवाज को गंभीर करते हुए - यह बहुत असमंजस का काल है... सभी असंमजस में हैं... असमंजस के इस काल में, मेरे विचार से इस समय महाराज को यह लग रहा है कि वे दशरथ क्यों हैं।
-और उनके पास बैठी रानी कैकेयी को क्या लग रहा है?
- वे भी असंमजस में हैं और रानी कैकेयी को लग रहा है, कि वे कैकेयी क्यों हैं?
- और आपको सुमंत जी?
- मुझे, मैं तो बहुत असंमजस में हूँ... मैं राजा दशरथ और रानी कैकेयी का नजदीकी हूँ, इसलिए मुझे भी लगना ही चाहिए कि मैं सुमंत क्यों हूँ?
देखा आपने यह सनसनीखेज खुलासा, सुमंत तक को पता नहीं है कि वे सुमंत क्यों हैं। राम वनवास की अचानक खबर ने अनिश्चितता का माहौल पैदा कर दिया है। सभी असंमजस में हैं। कहीं आपातकाल...इस बीच कुछ कैमरे राजा जनक के महल तक भी पहुँच गए हैं। महल के द्वार बंद हैं। कोई प्रवक्ता तक नहीं है कुछ कहने के लिए। चारों ओर असंमंजस ही असंमजस है।
कुछ चैनल भरत की पहली बाइट लेने के लिए उन्हें ढूँढ़ रहे हैं, पर भरत पर तो सुरक्षा घेरा कस चुका है। उनका कुछ भी कहना अयोध्या में...
मित्रो, ऐसे ही दृश्य संख्या 6, 7, 8 आदि आदि अनादि हैं - हरि अनंत हरि कथा अनंता की तरह। मैं उनका वर्णन अभी नहीं कर रहा हूँ क्योंकि मुझे पूरा विश्वास है कि उन्हें देखने और सुनने के बाद आप भी असमंजस में पड़ जाएँगे और पगला कर कहेंगे - मुझे लग रहा है कि मैं, मैं क्यों हूँ। बोल वनवासी राम की जय!